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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 297 में से

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इन दोनों क्रांतिकारियों का पूरा असर अशफाक पर था। वे इन
क्रांतिकारियों की कहानियाँ सुनते। यही नहीं वे बंगाली बमों का भी हाल
सुनते रहते। अशफाक के हृदय में जिज्ञासा जागती कि कितना अच्छा
होता कि मैं भी ऐसा होता। उन्हें क्या पता कि वे भी उनकी तरह फाँसी
घर में कैद रहेंगे। एक दिन का समाचार है कि अशफाक स्कूल जा रहे थे
कि अचानक उन्होंने सुना कि दिल्ली में वायसराय बहादुर पर किसी ने
बम मार दिया और स्कूल बन्द हो गया। अब क्या था अशफाक की खुशी
का ठिकाना न रहा। वे बाजारों में होने वाली चर्चाएं सुनते रहते और
प्रभावित होते, प्रेरणा पाते, स्वप्न देखते कि मैं भी ऐसा काम करूँगा कि
लोग मेरे नाम की चर्चा आम बाजारों में करें। अशफाक के दिल में दबा
हुआ देशभक्ति का बीज अंकुरित होने लगा। वे देश में होने वाली
घटनाओं से परिचित होने लगे थे।
1918 में मैनपुरी षड्यंत्र की घटना जब प्रकाश में आई तो अशफाक
भला बिना सूचित हुए कैसे रह सकते थे। यही घटना अशफाक के
क्रांतिकारी अंकुरण को पल्लवित करने में सहायक बनी। मैनपुरी घटना ने
उर्वरक का काम किया। इस षड्यंत्र का भेद खुल जाने के बाद अशफाक
के स्कूल की तलाशी ली गयी, पहचान हुई और एक छात्र राजाराम
गिरफ्तार हुए। संदेह के आधार पर कुछ और छात्र पकड़े गये। बंगाल के
विद्यार्थी क्रांतिकारी संगठनों के सदस्य थे और खूब भाग लिया करते थे
लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए यह घटना नई थी। जिस दिन स्कूल में
पुलिस पहुँची उस दिन अशफाक स्कूल देर से पहुँचे। वहाँ दहशत का
माहौल था। हर तरफ पगड़ियाँ ही नजर आ रही थी। कोई लड़का अन्दर
से बाहर नहीं निकल सकता था। हर कक्षा में पहचान हो रही थी। कोई
ऐसा छात्र नहीं था जो अपनी जान की खैर न मनाता हो। पहचान करने
वाले सरकारी गवाह पुलिस साथ लेकर आई थी।
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