अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रामवासियों ने बाद में गवाही नहीं दी।$^1$ इस डकैती से निराशा ही
हाथ लगी। सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है-'ऐसी डकैती के बाद बिस्मिल का
मन भारी बोझ से दब गया। वे सोचने लगे कि इस तरह देशवासियों को
सताना उचित नहीं है। इनसे खतरा उठाकर भी न तो दल को आर्थिक
रूप से सुदृढ़ता मिलती है और न ही दल की प्रतिष्ठा को ही लाभ होता
है। बिस्मिल इन कामों से अब थक गये थे और वे दूसरे साधनों व
तरीकों पर गम्भीरता से सोचने लगे थे, ताकि जनता के बीच क्रांतिकारियों
के कार्यों पर उंगली न उठ सके।$^2$ इस प्रकार काफी विचार-विमर्श के बाद
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की प्रान्तीय समिति ने तय किया कि
गाँव में डकैती डालने के अभियान को समाप्त किया जाय और केवल
बैंक और सरकारी सम्पत्ति ही लूटी जाय।$^3$ समिति ने यह निर्णय खास
तौर पर इसलिए लिया कि इस प्रकार की लगातार डकैतियों से क्षेत्र की
जनता राम प्रसाद बिस्मिल को पहचान लेगी। इसी समय पिस्तौल हेतु
नकद रूपयों की जरूरत थी जो जर्मन की थी और रूपये देकर कलकत्ता
से प्राप्त करना था। यह योजना गुप्त थी और यह भी था कि ऐसा मौका
हाथ से जाने नहीं दिया जा सकता, परन्तु रूपयों की बहुत कमी थी। ऐसे
समय में गाँव में डकैती डालने का विचार छोड़ा जा चुका था।$^4$ निश्चित
ही यह भी कारण था जो काकोरी काण्ड के रूप में सम्पादित हुआ। यह
सत्य था कि संघर्ष हेतु भारत के क्रांतिकारी संगठित होने लगे थे और
घटनाएँ कहीं न कहीं घटती रहती थीं।
- क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री से विश्वमित्र उपाध्याय की भेंटवार्ता -29 अगस्त 1982
- शहीद रोशन सिंह -सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-23
- पूर्वो टरारिज्म इन इण्डिया, रिपोर्ट - पृष्ठ 79
- अमर शहीद अशफाक उल्ला खाँ, बनारसी दास चतुर्वेदी, पृष्ठ-128
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