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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 297 में से

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पृष्ठ 107

तुमने मुझसे मैनपुरी काण्ड के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करनी चाही
थी। मैंने वह समझकर कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझसे इस
तरह की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि
से दिया था। तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक
भावों का प्रकाश हो रहा था। तुमने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़
दिया, अपने निश्चय पर डटे रहे। जिस प्रकार हो सका काँग्रेस में
बातचीत की। अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का विश्वास दिलाने की
कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नहीं, तुम्हारे दिल में मुल्क की
खिदमतकरने की ख्वाहिश थी। अन्त में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी
कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली। तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू
मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे। यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई।
थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे
भाई बनकर तुम्हें संतोष न हुआ। तुम समानता के अधिकार चाहते थे,
मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे, वही हुआ। तुम सच्चे मित्र बन
गये। सबको आश्चर्य था कि एक कट्टर आर्य समाजी और मुसलमान का
मेल कैसा? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्य समाज मंदिर में
मेरा निवास था, किन्तु तुम इन बातों की किंचित मात्र चिन्ता न करते
थे। मेरे कुछ साथी तुम्हारे मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि
से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे। मेरे साथ आर्य समाज
मंदिर में आते जाते थे। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के
सब कोई तुम्हे खुल्लम खुल्ला गालियाँ देते थे, काफिर के नाम से पुकारते
थे, पर तुम कभी भी उनके विचारों से सहमत न हुए। सदैव हिन्दू-मुस्लिम
ऐक्य के पक्षपाती रहे। तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त
थे। तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही कि मुसलमानों को
खुदा अक्ल देता, कि वे हिन्दुओं के साथ मिल करके हिन्दुस्तान की
भलाई करते। जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम
सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी
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