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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 297 में से

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पृष्ठ 105

वह तो अशफाक को एक सामान्य विद्यार्थी ही समझ रहे थे। उनके
उत्साह का उन्हें ज्ञान नहीं। बिना संज्ञान में लिए क्रांतिकारी बात करना
उचित भी नहीं था। इससे अशफाक निराश हुए, उन्हें दुख हुआ। परन्तु
अशफाक का उत्साह मरा नहीं था। बनारसी लाल अभी भी अशफाक के
सम्पर्क में थे। अशफाक ने बनारसी लाल से अनुरोध किया कि वह राम
प्रसाद से मिला दे। अशफाक के बड़े भाई और बिस्मिल साथ-साथ पढ़े भी
थे। भाई के सहपाठी होने के कारण बनारसी लाल ने राम प्रसाद बिस्मिल
से अशफाक को अच्छी तरह से परिचित करा दिया। अशफाक उल्ला खाँ
स्वयं लिखते हैं - "फिर मैंने बनारसी लाल से कहा कि राम प्रसाद के
पास चलो और मुझको उनसे इण्ट्रोड्यूस करा दो। क्योकि राम प्रसाद मेरे
बड़े भाई के क्लासफेलो उर्दू स्कूल में रह चुके थे और आपस में दोस्त भी
थे। मेरे भी स्कूलफेलो रह चुके थे मगर मेरे ताल्लुकात कम थे। चूँकि
राम प्रसाद शुरू से ही खासी शख्सियत रखने वाले इन्सान थे और
कसरती व होशियार तलिबेइल्म समझे जाते थे, आम तौर पर मशहूर भी
थे। मैंने ख्याल किया कि राम प्रसाद से मिलो शायद वहाँ दवा मिल
जाय और कोई तस्कीन कल्ब की सूरत निकल आये। गरज यह कि एक
दिन खन्नौत के किनारे जलसा हुआ। राम प्रसाद ने उसमें एक मुख्तसर
सा लेक्चर दिया और शुरू में यह शेर पढ़ा -
बहे बहरे फना में जल्द या रब लाश बिस्मिल की,
कि भूखी मछलियाँ है जौहरे शमशीरे कातिल की।¹
जो मुझे अब भी याद है इसे मैंने कण्डेम्ड सेल में मुलाकात के वक्त
पढ़ा था। मैंने भी कुछ कहा था। गरज कि बनारसी ने हम दोनों का
इन्ट्रोडक्शन करा दिया। गो कि इससे कब्ल भी एक दिन मैं राम प्रसाद से
मिला था।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-38
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