श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
परमेश्वरके विषयमें ज्ञानीजनोंके अनुभवका प्रदर्शन
इदानीमुक्तमर्थं द्रढयितुं मन्त्र- | अब उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करने-
| के लिये मन्त्रद्रष्टा ऋषिका अनुभव
दृगनुभवं दर्शयित्वा पूर्णानन्दा- | दिखलाती हुई श्रुति यह प्रदर्शित
द्वितीयब्रह्मात्मपरिज्ञानादेव परम- | करती है कि पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्म-
| का आत्मस्वरूपसे ज्ञान होनेपर ही
पुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्शयति— | परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है,
| अन्य किसी उपायसे नहीं—
वेदाहमेतं पुरुषं महान्त-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥
मैं इस अज्ञानातीत प्रकाशस्वरूप महान् पुरुषको जानता हूँ । उसे
ही जानकर पुरुष मृत्युको पार करता है, इसके सिवा परमपदप्राप्तिका कोई
और मार्ग नहीं है ॥ ८ ॥
वेदाहमेतमिति । वेद जाने | 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । मैं उस
तमेतं परमात्मानम् । अथैतं प्रत्य- | परमात्माको जानता हूँ । यह जो
गात्मानं साक्षिणं पुरुषं पूर्णं | प्रत्यगात्मा-साक्षी, पुरुष-पूर्ण,
महान्तं सर्वात्मत्वात् । आदित्य- | और सर्वरूप होनेसे महान् तथा
वर्णं प्रकाशरूपं तमसोऽज्ञानात् | आदित्यवर्ण-प्रकाशस्वरूप एवं तम
परस्तात्तमेव विदित्वाति मृत्युमेति | यानी अज्ञानसे अतीत है इसे जानकर
मृत्युमत्येति । कस्मात् ? अस्मा- | जीव मृत्युको पार कर लेता है; कैसे
न्नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय | कर लेता है ? क्योंकि परमपदप्राप्तिके
परमपदप्राप्तये ॥ ८ ॥ | लिये इससे भिन्न कोई और मार्ग
| नहीं है ॥ ८ ॥
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१
कस्मात्पुनस्तमेव विदित्वाति | किन्तु जीव उसीको जानकर
मृत्युमेति ? इत्युच्यते— | मृत्युको कैसे पार कर लेता है ? सो
| बतलाया जाता है—
यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चि-
द्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक-
स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९ ॥
जिससे उत्कृष्ट और कोई नहीं है, तथा जिससे छोटा और बड़ा भी
कोई नहीं है वह यह अद्वितीय परमात्मा अपनी द्योतनात्मक महिमामें
वृक्षके समान निश्चलभावसे स्थित है, उस पुरुषने ही इस सम्पूर्ण जगत्को
व्याप्त कर रखा है ॥ ९ ॥
यस्मादिति । यस्मात्परं पुरु- | 'यस्मात्' इत्यादि । जिस
षात्परमुत्कृष्टमपरमन्यन्नास्ति, य- | पुरुषसे उत्कृष्ट अन्य कोई नहीं है,
स्मान्नाणीयोऽणुतरं न ज्यायो | तथा जिससे अणीयस्—न्यूनतर और
महत्तरं वास्ति । वृक्ष इव स्तब्धो | ज्यायस्—महत्तर भी कोई नहीं है
निश्चलो दिवि द्योतनात्मनि स्वे | वह अद्वितीय परमात्मा दिवि अर्थात्
महिम्नि तिष्ठत्येकोऽद्वितीयः पर- | अपनी द्योतनात्मक महिमामें वृक्षके
मात्मा तेनाद्वितीयेन परमात्मनेदं | समान स्तब्ध-निश्चलभावसे स्थित है।
सर्वं पूर्णं नैरन्तर्येण व्याप्तं पुरुषेण | उस अद्वितीय परमात्मा पूर्ण पुरुषने
पूर्णेन ॥ ९ ॥ | इस सबको पूर्ण--निरन्तरतासे व्याप्त
| कर रखा है ॥ ९ ॥
इदानीं ब्रह्मणः पूर्वोक्तकार्य- | अब पहले बतलायी हुई ब्रह्मकी
कारणतां दर्शयञ्ज्ञानिनाममृतत्व- | कार्य-कारणता दिखलाकर श्रुति
| ज्ञानियोंको अमृतत्व और अन्य सबको
मितरेषां च संसारित्वं दर्शयति- | संसारित्वकी प्राप्ति प्रदर्शित करती है—