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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 276 में से

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पृष्ठ 174

१६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
परमेश्वरके विषयमें ज्ञानीजनोंके अनुभवका प्रदर्शन
इदानीमुक्तमर्थं द्रढयितुं मन्त्र- | अब उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करने-
| के लिये मन्त्रद्रष्टा ऋषिका अनुभव
दृगनुभवं दर्शयित्वा पूर्णानन्दा- | दिखलाती हुई श्रुति यह प्रदर्शित
द्वितीयब्रह्मात्मपरिज्ञानादेव परम- | करती है कि पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्म-
| का आत्मस्वरूपसे ज्ञान होनेपर ही
पुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्शयति— | परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है,
| अन्य किसी उपायसे नहीं—
वेदाहमेतं पुरुषं महान्त-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥
मैं इस अज्ञानातीत प्रकाशस्वरूप महान् पुरुषको जानता हूँ । उसे
ही जानकर पुरुष मृत्युको पार करता है, इसके सिवा परमपदप्राप्तिका कोई
और मार्ग नहीं है ॥ ८ ॥
वेदाहमेतमिति । वेद जाने | 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । मैं उस
तमेतं परमात्मानम् । अथैतं प्रत्य- | परमात्माको जानता हूँ । यह जो
गात्मानं साक्षिणं पुरुषं पूर्णं | प्रत्यगात्मा-साक्षी, पुरुष-पूर्ण,
महान्तं सर्वात्मत्वात् । आदित्य- | और सर्वरूप होनेसे महान् तथा
वर्णं प्रकाशरूपं तमसोऽज्ञानात् | आदित्यवर्ण-प्रकाशस्वरूप एवं तम
परस्तात्तमेव विदित्वाति मृत्युमेति | यानी अज्ञानसे अतीत है इसे जानकर
मृत्युमत्येति । कस्मात् ? अस्मा- | जीव मृत्युको पार कर लेता है; कैसे
न्नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय | कर लेता है ? क्योंकि परमपदप्राप्तिके
परमपदप्राप्तये ॥ ८ ॥ | लिये इससे भिन्न कोई और मार्ग
| नहीं है ॥ ८ ॥