श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
[संस्कृत]
पूर्वोक्तमेव प्रश्नसमुदायपरि-
हाराणां सूत्रमुत्तरत्र प्रत्येकं प्रप-
ञ्चयिष्यते। तत्रायं प्रश्नसंग्रहः-किं
ब्रह्म कारणम् ? आहोस्वित्कालादि?
तथा किं कारणं ब्रह्माहोस्वित्कार्य-
कारणविलक्षणम् ? अथवा कारणं
वाऽकारणं वा ? कारणत्वेऽपि
किमुपादानमुत निमित्तम् ? अथ-
वोभयकारणं ब्रह्म किंलक्षणम् ?
अकारणं वा ब्रह्म किंलक्षणम् ? इति।
तत्रायं परिहारः—न कारणं
नाप्यकारणं न चोभयं नाप्यनु-
भयं न च निमित्तं न चोपादानं
न चोभयम् । एतदुक्तं भवति—
अद्वितीयस्य परमात्मनो न स्वतः
कारणत्वमुपादानत्वं निमित्तत्वं
च। यदुपाधिकमस्य कारणत्वादि
तदेव कारणं निमित्तमुपपाद्य
तदेव प्रयोजकं निष्कृष्य दर्श-
[हिन्दी भाष्यार्थ]
प्रश्नसमुदाय और उसके समा-
धानोंका जो सूत्र पहले कहा जा
चुका है उसीको अब आगे प्रत्येकका
विस्तार करके कहा जायगा । इनमें
प्रश्नसमुदाय तो इस प्रकार है—
क्या ब्रह्म जगत्का कारण है अथवा
कालादि? तथा ब्रह्म कारण है या कार्य-
कारणसे अतीत ? अथवा ब्रह्म कारण है
या नहीं ? यदि कारण है भी तो
उपादान कारण है या निमित्त
कारण ? अथवा दोनों प्रकारका कारण
होनेपर भी ब्रह्मका लक्षण क्या है ?
और यदि वह कारण नहीं है तो
भी उसका क्या लक्षण है ?
इस प्रश्नसमुदायका यह उत्तर
है—ब्रह्म न कारण है, न अकारण
है, न कारणाकारण उभयरूप है, न
इन दोनोंसे भिन्न है, न निमित्त
कारण है, न उपादान कारण है और
न दोनों प्रकारका कारण है। यहाँ
कहना यह है कि अद्वितीय परमात्मा-
का कारणत्व, उपादानत्व अथवा
निमित्तत्व स्वतः कुछ भी नहीं है।
जिस उपाधिके कारण इसका
कारणत्वादि है उसी कारण यानी
निमित्तका उपपादन कर और
उसीको प्रयोजक निश्चित करके
६४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
यति—देवात्मशक्तिमिति। देवस्य | 'देवात्मशक्तिम्' इत्यादि वाक्यसे
द्योतनादियुक्तस्य मायिनो महे- | दिखाते हैं—उन्होंने देव—
श्वरस्य परमात्मन आत्मभूताम- | द्योतनादियुक्त मायावी महेश्वर—
स्वतन्त्रां न सांख्यपरिकल्पित- | परमात्माकी स्वरूपभूता—अस्वतन्त्रा
प्रधानादिवत्पृथग्भूतां स्वतन्त्रां | शक्तिको कारणरूपसे देखा,
शक्तिं कारणमपश्यन् । दर्शयि- | सांख्यमतद्वारा कल्पना किये हुए
ष्यति च—"मायां तु प्रकृतिं | प्रधानादिके समान उससे भिन्न किसी
विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्” | स्वतन्त्रा शक्तिको नहीं। आगे श्रुति
( श्वेता० उ० ४ । १०) इति । | यह दिखलावेगी भी—"मायाको
| प्रकृति जानो और मायावीको
| महेश्वर ।"
तथा ब्राह्मे—"एषा चतुर्विं- | इसी प्रकार ब्रह्मपुराणमें कहा है—
शतिभेदभिन्ना माया परा प्रकृति- | "यह चौबीस प्रकारके भेदोंवाली माया
स्तत्समुत्था ।” तथा च—"मया- | परमात्मासे प्रकट हुई उसीकी परा-
ध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचरा- | प्रकृति है।" तथा गीतामें कहा
चरम् ।” ( गीता ९।१०) इति । | है---"मुझ अधिष्ठानके द्वारा प्रकृति
| चराचरको उत्पन्न करती है।"
स्वगुणैः प्रकृतिकार्यभूतैः पृथि- | [ कैसी शक्तिको देखा—] जो
व्यादिभिश्च निगूढां संवृतां का- | अपने गुणोंसे प्रकृतिके कार्यभूत
र्याकारेण कारणाकारस्याभिभूत- | पृथ्वी आदिसे निगूढ—आच्छादित
त्वात्कार्यात्पृथक्स्वरूपेणोपलब्धु- | थी । अर्थात् कारणका स्वरूप
मयोग्यामित्यर्थः । तथा च प्रकृ- | कार्यके स्वरूपसे दब जानेके कारण,
तिकार्यत्वं गुणानां दर्शयति | जो कार्यसे पृथक् अपने स्वरूपसे
व्यासः—"सत्त्वं रजस्तम इति | उपलब्ध होनेयोग्य नहीं थी । गुण
गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।” ( गीता | प्रकृतिके कार्य हैं—यह बात
१४ । ५) इति । | "सत्त्व, रज और तम ये प्रकृतिसे
| उत्पन्न हुए गुण हैं।" इस वाक्यसे
| व्यासजी भी दिखलाते हैं ।