सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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होता है कि अश्वघोष से पूर्व ही संस्कृत नाटकों का वह रूप स्थिर हो चुका
था, जिनका परिष्कृत रूप ही हमें परवर्त्ती साहित्य में उपलब्ध होता है।
नाटकीय नियमानुसार भिन्न-भिन्न पात्र सामाजिक स्थिति के आधार पर भिन्न-
भिन्न प्राकृतों का प्रयोग करते हैं। दृष्ट की प्राकृतिक मागधी से, गोयम की
अर्द्धमागधी से और विदूषक की प्राकृत उक्त दोनों के मिश्रण से मिलती-जुलती
है। शारिपुत्र-प्रकरण तथा इनके अन्य रूपकों की शैली बुद्धचरित एवं सौन्दरा-
नन्द की शैली से मिलती है। यह भी एक कारण है कि ये सभी एक ही कवि
के कर्त्तृत्व का संकेत करते हैं। इनका एक उदाहरण द्रष्टव्य है—
'खे वर्षत्यम्बुधारं ज्वलति च युगपत् सन्ध्याम्बुद इव ।'
सौन्दरनन्द के इस तरह की शैली और उपमा का साम्य ही एककर्तृत्व
सिद्ध करता है। सांध्यकालीन बादल जहाँ एक ओर जल वर्षाता है वहीं
दूसरी ओर अस्तंगमित सूर्यं की किरणों के संस्पर्श से आग की तरह जलता
प्रतीत होता है। ठीक उसी तरह वह तेजस्वी करुणार्द्र था। अश्वघोष की
सारी कृतियों में शृंगार और करुण से पुष्ट होकर शान्त रस खिल उठा है, जो
बौद्ध संस्कृति का सर्वस्व है।
अश्वघोष के पश्चात् काव्यशैली में महान् परिवर्तन आया। यह नवीन
काव्यशैली राजसभाओं में विकसित हुई। जैसे-जैसे समय बीतता गया कालि-
दास की स्वाभाविकता कृत्रिमता में बदलती गई। परवर्ती काव्यों में शृङ्गार-
वर्णन की ओर विशेष प्रवृत्ति हुई। भाषा में क्लिष्टता एवं समासों का बाहुल्य
हो गया। प्रतिपाद्य विषय की अपेक्षा भाषा, शैली, अलंकार वर्णन आदि बाह्य
रूपरङ्ग और वैदग्ध्य ने ले लिया।
अश्वघोष का व्यक्तित्व
'सौन्दरनन्द' महाकाव्य के महाकवि 'अश्वघोष' हैं। आपके काव्यग्रंथ
संस्कृत जगत् में यथोचित सम्मान पा चुके हैं। आपका व्यक्तित्व आपकी
कृतियों में स्पष्ट झाँक रहा है। किसी कवि के लिए सामान्य यह बाह्य संसार
ही उसके जीवन को यदि पूर्ण कर देता तो शेष प्राणिजगत् की तरह वह भी
बहुत सारी जटिल समस्याओं से बच जाता, किन्तु कवि के लिए यह संभव
नहीं है। उसकी देह में जैसा भौतिक जगत् का चरम विकास है, उसकी
चेतना भी उसी प्रकार सामान्य जन की चेतना का उत्कृष्टतम रूप है।
किसी कवि का निरन्तर परिष्कृत होता चलने वाला यह मानसिक-जगत्
वस्तु-जगत् के संघर्ष से प्रभावित होता है। उसके संकेतों में अपनी अभिव्यक्ति
चाहता है, किन्तु उनके बन्धनों को पूर्णतः स्वीकार नहीं करना चाहता। अतः
जो कुछ प्रत्यक्ष है, उसे ही किसी कवि का व्यक्तित्व नहीं कहा जा सकता—
उसके साथ-साथ उसका जितना विस्तृत और गतिशील अप्रत्यक्ष जीवन है, उसे
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भी समझना होगा। प्रत्यक्ष-जगत् में उसका भी मूल्यांकन करना होगा, अन्यथा
किसी भी कवि के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में हमारा सारा ज्ञान अपूर्ण और सारे
साधन-समाधान अधूरे रहेंगे। कोई भी कवि या महाकवि अपनी कृति की पट
भूमिका के पीछे अन्तर्निहित होकर अपने व्यक्तित्व का परिचय देता है।
विषयिप्रधान कृतियों में कवि का व्यक्तित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, परन्तु
विषयप्रधान कृतियों में अन्तःसलिला फल्गु के पानी की तरह उसे खोजने का
प्रयास करना पड़ता है। किसी भी कवि का व्यक्तित्व, उसकी अभिरुचि, उसकी
जीवन सम्बन्धी मान्यता प्रभृति का पता तो उसकी कृति ही बतला देती है।
कवि के इस दोहरे जीवन की तरह उसके समीपवर्ती बाह्य जगत् की सारी
वस्तुओं का उपयोग भी दोहरा है। अपने चिन्तन में कोई कवि अपनी बहि-
र्मुखी वृत्तियों को समेटकर किसी वस्तु के सम्बन्ध में अपना बौद्धिक समाधान
ढूंढता है। अतः कभी-कभी वह इतना एकान्तिक होता है कि अपने से बाहर
प्रत्यक्ष-जगत् के प्रति उस कवि की चेतना पूर्णरूप से जागरूक ही नहीं रहती
और यदि रहती है तो कवि के चिन्तन में बाधक बनकर ही। किसी कवि का
काव्य उसके समग्र जीवन का सजीव चित्र होता है। बुद्धचरित एवं सौन्दरनन्द से
अश्वघोष का व्यक्तित्व स्पष्ट झलकता है। अश्वघोष ने अपनी कृतियों में एक
ओर अपने मानसिक जगत् की दुरूहता को स्पष्ट करते चले हैं, वही दूसरी ओर
अपने बाह्य संसार की समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है। उसकी
कलात्मक अभिरुचि, सौन्दर्यशास्त्रीय मान्यता और पाण्डित्य उसकी बाह्य
स्थिति की व्याख्या है। उसकी धार्मिक सहिष्णुता बौद्धधर्म के मूलतत्त्वों से उसके
संघर्ष का इतिहास है। उसके जीवन के विषय में दार्शनिक मान्यता सृष्टि के
रहस्यमय जीवन का बौद्धिक निरूपण है। संक्षेप में अश्वघोष का समग्र
व्यक्तित्व श्रृंगार की चोटी से हहराकर बहती ऊर्जस्वित करुणा की गंगा, शान्त
सागर बनकर उन्हें स्नपित किया है। उन्हें हम निम्नलिखित शीर्षकों में बाँटकर
देख सकते हैं।
( १ ) धार्मिक उत्साह
अश्वघोष की समग्र रचनाओं में उनका धार्मिक उत्साह स्पष्ट झलकता
है। बौद्धधर्म के प्रचार-प्रसार के सम्बन्ध में हम जिक्र कर चुके हैं। अपनी
सहज विशेषता के कारण यह धर्म और इसकी प्रकृति ने विकल्पित मानव-धर्मों
के विभिन्न प्रभावों को अपने अन्दर इस तरह आत्मसात् कर लिया कि इससे
उसके मौलिक स्वरूप एवं प्राणिधर्म में कोई अन्तर नहीं पड़ा। सबसे रस
ग्रहण कर वह और भी परिपुष्ट हो गया। चूंकि बौद्धधर्म का मूल लक्ष्य
मानवात्मा का संधान था और इस लक्ष्य को ही वह समस्त मानवीय साधनाओं
का आधार मानता था, अतः उसका प्रचार-प्रसार आवश्यक था। इसका
मानसिक और आध्यात्मिक पक्ष इतना प्रबल रहा है कि बौद्धधर्म का प्रसार जिन
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देशों में हुआ, वहाँ न तो इसके लिए राज्यजय की आवश्यकता हुई और न
शोषण या परस्वापहरण की। एशिया के विभिन्न देशों में बौद्धधर्म की दिग्वि-
जय की कहानी हम इतिहास-ग्रंथों में पढ़ते हैं। एक ओर सुदूर पूर्व और दूसरी
ओर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों में बौद्धधर्म का व्यापक प्रचार
एवं विस्तार हुआ। अनेक जातियां इनके सम्पर्क में आईं और उनकी राज-
नीति, आचार-व्यवहार, धर्मानुष्ठान, साहित्य और दर्शन पर इसका गहरा
प्रभाव पड़ा। बौद्धधर्म ने चीन जैसे सुसभ्य देश के धार्मिक उत्साह में भी एक
अपूर्व परिवर्तन ला दिया। इस धर्म से चीन की मानवीयता और भी विकसित
एवं समृद्ध हुई। बौद्धधर्म के अवदानों से चीन के उच्चादर्शों को गहरी प्रेरणा
मिली। मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष-लाभ किया।
भगवान् बुद्ध के उपदेशों को अधिकाधिक लोगों के पास तक पहुँचाना
अश्वघोष का मूल उद्देश्य था। भारतीय पण्डित समाज जनभाषा में लिखे बुद्ध
के उपदेशों को हेय दृष्टि से देखते थे। अश्वघोष ने संस्कृत और परिनिष्ठित
भाषा में काव्य के माध्यम से उन लोगों तक पहुँचाने के अपने लक्ष्य की सम्पूर्ति
में सफलता प्राप्त की। इनके महाकाव्यों को पढ़ने, जानने और समझने की
चेष्टा करने पर स्पष्ट पतां चलता है कि अश्वघोष न केवल दार्शनिक या कोरे
पण्डित हैं बल्कि भगवान् बुद्ध के प्रति इनकी अपूर्व आस्था है, अनन्य भक्ति है
और आमूलचूल श्रद्धा है। उनके शब्द-शब्द में इस रससिद्ध कवि के हृदय की
भक्ति-गंगा की तरलता विद्यमान है। अश्वघोष का अन्तःस्रावी समुत्साह धार्मिक
निष्ठा भक्ति की डोरी में गूंथकर इतनी गहरी भावात्मक बन गई है कि उनकी
रचनाएँ काव्यत्व की गंगा स्वयं सर्वकल्याणी बन गई है। इनके धार्मिक उत्साह
का एक महत् एवं उदात्त पक्ष भी है, जिसे हम आदर्श कहते हैं। इनसे भी
ऊपर उठकर जब पाठक का मन इनकी कृतियों में सुगुम्फित अध्यात्म, बौद्ध-
दर्शन एवं धर्म के क्षेत्र में विचरण करने लगता है, उस समय वह कुछ क्षण के
लिए ही सही—सारे संसार को भूल जाता है और महत् धर्म की प्रेरणा उसके
दृष्टिकोण को व्यापक, उसकी अनुभूति को गंभीर और उसके हृदय को
विशाल बना देती है। प्रेम, शौर्य, सहानुभूति, प्राणिजगत् के प्रति मैत्रीभाव,
ज्ञान, उदारता, करुणा तथा क्षमा की भावना मन में हिलोरे मारने लगती है।
अश्वघोष के धार्मिक उत्साह से हमारे मन में महत् आदर्शों की सृष्टि होती
है और उन आदर्शों को चरितार्थ करने के लिए हम बड़ा से बड़ा त्याग करने
को तैयार हो जाते हैं। मानव-जीवन की प्रधान साधनाएँ भी तो यही हैं।
इन साधनाओं के क्षेत्र में मनुष्य मनुष्य में कोई भेद नहीं रह जाता और यही
है अश्वघोष का धार्मिक उत्साह, जिसे हम इनके काव्यों में बेदाग परख
सकते हैं।
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( २ ) पौराणिक ब्राह्मण-धर्म के प्रति सहिष्णु
ब्राह्मणधर्म हजारो वर्षों से भारत के आध्यात्मिक जगत् में प्रमुख स्थान
ग्रहण किये है और इस तथ्य का प्रतीक है कि आत्मविजय, साहस, पवित्रता,
जीवन में एकता और भाईचारे से ही पूर्णता प्राप्त की जा सकती है । यही
आदर्श हमें परमात्मा के चिन्तन में लीन, उपनिषदों के द्रष्टाओं में, अज्ञान और
ईर्ष्या को पराजित करने वाले शान्त एवं सौम्य बुद्ध में आत्मसमर्पण के पश्चात्
सार्वभौम प्रेम में एकाकार हो जाने और ईश्वरभक्त हो जाने तथा आत्मलीन
लालसाओं से ऊपर उठकर परमपिता परमात्मा की इच्छा का पालन इस
पार्थिव जगत् में सदैव करने वाले साधु अश्वघोष के काव्य में उनके आनन्दा-
तिरेक में मिलता है ।
दासगुप्ता ने—'History of Sanskrit Litarature' page 78 में लिखा
है कि—हीनयान शाखा के बौद्धों ने अश्वघोष को पर्याप्त सम्मान नहीं दिया ।
इसका कारण उन्होंने बतलाया है कि एक ओर तो अश्वघोष ने अपना स्वतंत्र
विचार व्यक्त किया है और दूसरी ओर ब्राह्मणधर्म और पौराणिक साहित्य के
प्रति वे अत्यधिक उन्मुख थे । इसके लिए उन्होंने सोन्दरनन्द और बुद्धचरित में
अनेक उदाहरण भी प्रस्तुत किये हैं, किन्तु दासगुप्ता का यह कथन गले से नीचे
नहीं उतरता । निश्चय ही अश्वघोष ब्राह्मण थे । प्रारंभिक जीवन में उन्होंने गम्भी-
रतापूर्वक ब्राह्मणधर्म का अध्ययन किया था । यह भी सत्य है कि अश्वघोष के
समय तक पुराणों का वर्त्तमान रूप पल्लवित हो चुका था । पौराणिक गाथाएँ
भी उस समय तक पर्याप्त ख्याति पा चुकी थी । रामायण-महाभारत की कथाएँ
लोक-प्रचलित हो चुकी थी । अश्वघोष एक बहुज्ञ, शास्त्रज्ञ, ब्राह्मणधर्मवेत्ता,
विशिष्ट किन्तु स्वतन्त्र विचारक कवि थे । ब्राह्मणधर्म भी अपने आप में एक
विशिष्ट धर्म था, जो किसी भी विश्वास-विशेष के लिए दुराग्रह नहीं करता, जो
सहिष्णुता, स्वाधीन चिन्तन एवं वैयक्तिक स्वतंत्रता के संसार में सबसे बड़ा
हामी रहा है । ईश्वर को मानो या न मानो, उपासना साकार की करो या
निराकार की, अनेक देवताओं में विश्वास रखो या फिर किसी भी देवता को
मत मानो, किन्तु यदि तुम पौराणिक ब्राह्मणधर्मी बने रहना चाहते हो तो
हिन्दू समाज से कोई तुम्हें भी नहीं निकालेगा; इतनी स्वतंत्रता और छूट अपने
अनुयायियों को संसार के किसी भी धर्म ने नहीं दी है । यही कारण है कि
अश्वघोष ने पूर्वार्जित ज्ञान का अपने काव्यों में यत्र-तत्र प्रयोग किया है । सांख्य
दर्शन के तो उदाहरणों से बुद्धचरित का वर्णन भरा पड़ा है । बुद्धचरित के
प्रथम सर्ग पद्य ४१-४५ तथा चतुर्थ सर्ग ७२-७८ श्लोक दर्शनीय है । इसी
तरह सोन्दरनन्द में पौराणिक उपाख्यानों की अभिव्यक्ति दर्शनीय है—
‘सूर्यः सरण्यूं प्रति जातरागस्तत्प्रीतये तष्ट इति श्रुतं नः ।
यामश्वभूतोऽश्ववधूं समेत्य यतोऽश्विनौ तौ जनयाम्बभूव ॥'—सौ० न० ७।२६
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इस सर्ग की श्लोक सं० २७ से ४५ तक ऐसे ही पौराणिक उपाख्यानों के
उदाहरण प्रसंग को सशक्त बनाने के लिए ही दिये गये । उदाहरण किसी भी
स्थिति में किसी भी व्यक्ति की बहुज्ञता के अतिरिक्त आसक्ति नहीं कही जा
सकती है। इसी तरह जब छन्दक बुद्ध को वन में अकेले छोड़कर लौट आये तो
सारी प्रजा ने उसी तरह आँसू गिराये, जैसे पहले राम के वनगमन पर सुमन्त
के लौटने पर अयोध्या की प्रजा रोई थी—
‘मुमोच वाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते ।'
—बुद्धचरित ८।८
इसी तरह शिव-विजय की एक घटना का पौराणिक संकेत—
'शैलेन्द्रपुत्रीं प्रति येन विद्धो देवोऽपि शम्भुश्चलितो बभूव ।
न चिन्तयत्येष तमेव वाणं किं स्यादचित्तेन शरः स एषः ॥'
—बुद्धचरित १३।१६
इस प्रकार बुद्धचरित एवं सौन्दरनन्द के अनेकों पद्यों में रामकथा शिव-
पार्वतीकथा, स्वर्ग, इन्द्र, देवता, अप्सराएं आदि की चर्चा भरी पड़ी है। इसका
यह अर्थ कदापि नहीं कि अश्वघोष बौद्धधर्मावलम्बी नहीं थे। वे हृदय से बुद्ध के
भक्त थे। बौद्ध सिद्धान्तों में उनकी अनन्य निष्ठा थी। ब्राह्मणधर्म के वे ज्ञाता
थे। अतः साधिकार प्रासंगिक क्रम में उन्होंने उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। भगवान्
सुगत के विचारों और मान्यताओं का जमकर उन्होंने अध्ययन-मनन किया
था और तदनुकूल उन्हें अपने आचरण में उतारने की चेष्टा की है।
भगवान् बुद्ध के लिए केवल वैदिक हिंसा अमान्य थी। हिंसा तो अहिंसा
का अभाव है। अहिंसा के वह विपरीत है। अहिंसा हिंसा से भिन्न है, विपरीत
नहीं। सुगत की अहिंसा तो प्रेम की प्रतिमूर्ति है। उन्होंने जब समाधि को
साधा तब जाना कि भीतर सोये हुए प्रेम के अनन्त झरने अनायास ही सहज
और सक्रिय हो उठे हैं। यह प्रेम तो उनके हृदय में था और सहज ही प्रवा-
हित हो रहा था अहिंसा के माध्यम से। जैसे दीए से प्रकाश बहता है और
फूलों से सुगन्ध, वैसे ही उनके हृदय में जीवों के प्रति प्रेम बह रहा था। बोध
के उस अद्भुत क्षण में उन्होंने जाना था कि यह प्रेम तो उनके स्वभाव का
प्रकाश था। आत्मा की स्फुरणा थी। यह प्रेम हृदय के अभिनव ऊर्जा का
सद्भाव था। यह ऊर्जा स्वयं से सर्व के प्रति बहती थी, स्वयं से स्फुरित होकर,
मैत्रीधर्म से अनुप्राणित होकर वह जीवमात्र को एक ही सूत्र में पिरोती थी।
इस प्रकार बुद्ध की अहिंसा सबके लिए सबको सोचने और कर्म करने की
प्रेरणा भी प्रदान करती थी। उनका प्रेम या 'मैत्रीधर्म' का तात्पर्य केवल
मानव से मानव की मैत्री नही थीं, अपितु मानव अपने स्वाभाविक वैरी—शेर,
सांप, हिंसक जन्तु प्रभृति के प्रति भी मैत्रीभावना प्रबल रखे—यही बुद्ध का
संदेश है। बुद्ध का प्रेम प्रज्ञा का परिणाम है। किसी भी धर्म की मूल जिज्ञासा
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भी यही है। हममें जो ज्ञानशक्ति है, वह विषयमुक्त हो तो प्रज्ञा बन जाती है
और ऐसी क्रान्ति समाधि से उत्पन्न होती है। प्रज्ञा का साधन समाधि है।
समाधि साधन है, प्रज्ञा साध्य है, प्रेम उस सिद्धि का परिणाम है। प्रज्ञा हो
और प्रेम न हो, यह असंभव है। ज्ञान हो और अहिंसा न हो, यह कैसे हो
सकता है? इसीलिए सौन्दरनन्द में बुद्ध ने अहिंसा को सत्यज्ञान की परीक्षा
माना है। यह परमधर्म है, क्योंकि यह आत्यन्तिक कसौटी है। इसके निष्कर्ष
पर खरा उतरकर ही कोई धर्म खरा साबित होता है। इसी धर्म का प्रचार-
प्रसार अश्वघोष को अपेक्षित है। इसके लिए काव्यों में प्रदत्त उदाहरण की
विज्ञता है, न कि आसक्ति या और कुछ।
( ३ ) अश्वघोष की दार्शनिक मान्यता
अश्वघोष की दार्शनिक मान्यता एक वाक्य में—आनन्द मोक्ष है और मुक्ति
आनन्द है। निश्चय ही मनुष्य की जो परम आकांक्षा है, वह बीजरूप में प्रत्येक
व्यक्ति में प्रसुप्त होनी ही चाहिए, क्योंकि जिस बीज में वृक्ष न छिपा हो, उसमें
अंकुर भी नहीं आ सकता है। हमारी जो चरम कामना है, वही हमारा
आत्यन्तिक स्वरूप भी है। क्योंकि स्वरूप ही अपने पूर्ण विकास में आनन्द
और स्वतंत्रता में परिणत हो सकता है। स्वरूप ही सत्य है और उसकी पूर्ण
उपलब्धि ही संतुष्टिपूर्ण मुक्ति का मार्ग खोलती है। बुद्ध ने कहा है—तृष्णा
दुष्पूर है।
एक बौद्ध दार्शनिक होने के कारण बुद्धचरित में अश्वघोष का स्वर काव्या-
नुभूति की अपेक्षा कुछ अधिक ऊपर उठ गया है। बुद्धचरित का बारहवां सर्ग
तो बौद्धदर्शन के सिद्धान्तों से आच्छन्न है। इस संदर्भ में सांख्यदर्शन से प्रभावित
मुनि अराड का उपदेश द्रष्टव्य है—
'तत्र तु प्रकृतिं नाम विद्धि प्रकृतिकोविद ।
पञ्चभूतान्यहङ्कारं बुद्धिमव्यक्तमेव च ॥' —बु० च० १२।१८
बौद्धदर्शन दुःखवाद के लिए प्रसिद्ध है। बौद्ध दार्शनिक जन्म और जीवन
को दुःख से समवेत मानता है। वह तृषित मानवता को शीतल शान्ति का
जल देता है, दुःखी आत्मा को संवेदना का संदेश देता है। सबकी अज्ञानता
का भार स्वयं वहन करता है। उनके जीवन में इतनी विशालता संभव
है कि उसमें सबके वर्गभेद एकाकार होकर समा जाते हैं। उनकी भावना का
आंचल इतना विशाल है कि उसमें सबके आंसू समा जाते हैं। बौद्ध दार्शनिक
अपने लिए अनागरिक होकर भी संसार के लिए गृही, अपने प्रति वीतराग
होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संसारी होकर भी सबके लिए कर्म-
योगी; क्योंकि वह अपने आपको खोकर ही सब कुछ पाता है। क्योंकि मानव-
जीवन में दुःख की स्थिति इतनी नियत है कि उसके शरीर और चित्त का
स्वभाव उसका अविच्छेद्य धर्म बन जाता है—
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'आकाशयोनिः पवनो यथा हि यथा शमीगर्भशयो हुताशः ।
आपो यथान्तर्वसुधाशयाश्च दुःखं तथा चित्तशरीरयोनिः ॥'
—सौन्दरनन्द १६।११
'अपां द्रवत्वं कठिनत्वमुर्व्या वायोश्चलत्वं ध्रुवमौष्ण्यमग्नेः ।
यथा स्वभावो हि तथा स्वभावो दुःखं शरीरस्य च चेतसश्च ॥'
—सौ० न० १६।१२
इस दुःख से छुटकारा पाना ही मोक्ष है। बौद्धों की मुक्ति या निर्वाण
की स्थिति या धारणा बिलकुल अन्य दर्शनों की अपेक्षा भिन्न एवं अभिनव है।
उनके अनुसार निर्वाण की स्थिति में व्यक्ति के समग्र क्लेश या दुःख का क्षय
हो जाता है। किन्तु यह क्लेशक्षय नैयायिकों की दुःखाभाववाली स्थिति की
तरह नहीं है। नैयायिकों की आत्मा की मुक्त स्थिति शिलात्वमुक्ति की है।
परन्तु अश्वघोष की दार्शनिकता में उनकी बुद्धि और भावना इस तरह घुल-मिल
गई है जैसे धूपछाँही वस्त्र में दो रंगों के तार, जो अपनी-अपनी भिन्नता के
कारण अपने रंगों से भिन्न एक तीसरे रंग की सृष्टि करते हैं। मानसिक वृत्तियों
की ऐसी सामञ्जस्यपूर्ण एकता 'सौन्दरनन्द' के अतिरिक्त अन्यत्र संभव नहीं
है। इसके लिए न अन्तर्जगत् त्याज्य है और न बाह्य, क्योंकि इसका विषय
सम्पूर्ण जीवन है, आंशिक नहीं। मुक्ति समग्र जीवन के लिए है; किसी खण्ड
या अंश के लिए नहीं। दुःखरूपी कारण का विनाश होते ही मुक्ति का मार्ग
स्वतः खुल जाता है। संसार में इस जन्मरूपी दुःख का कारण तृष्णाजन्य भोग-
रूपी दुःख का समूह ही होता है। इसके लिए न तो ईश्वर कारण है और न
विधि ही; प्रकृति, काल, स्वभाव या संयोग भी इसके कारण नहीं हो सकते—
'प्रवृत्तिदुःखस्य च तस्य लोके तृष्णादयो दोषगणा निमित्तम् ।
नैवेश्वरो न प्रकृतिर्न कालो नापि स्वभावो न विधिर्यदृच्छा ॥'
—सौ० न० १६।१७
मुक्तिधर्म अतर्क्य है, क्योंकि धर्म का कोई विचार नहीं है। वह असंगत भी
है, क्योंकि इन्द्रियजन्य ज्ञान से उसकी कोई संगति नहीं है और वह इन्द्रियों
से नहीं बल्कि किसी बहुत ही अन्य और भिन्न मार्ग से उपलब्ध होता है। मोक्ष
या धर्म किसी विचार की अनुभूति नहीं, बल्कि निर्विचार चैतन्य में हुआ बोध
है; जीवन से मुक्ति है। मुक्ति आत्मा की होती है और आत्मा अर्थात् निर्विचार
चैतन्य अतीन्द्रिय है। जीवन की परम निष्पत्ति ही मुक्ति है। निर्विचार चैतन्य
का चरम साक्षात् आत्मा है। इसलिए जो विचारणा आत्मा के सम्बन्ध में है,
वह व्यर्थ है। वह साधन सार्थक है, जो मुक्ति की ओर है। किसी चिन्तन के
पीछे जो है, वही बोध है, विवेक है, प्रज्ञा है। विचार में व्यस्त और ग्रस्त
व्यक्ति इस आत्मा को नहीं जान पाता है। मुक्ति की ओर जब यह आत्मा
अग्रसर होती है तो न यह पृथ्वी की ओर जाती है, न अन्तरिक्ष की ओर, न
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किसी दिशा में, न विदिशा में, अपितु क्लेशक्षय होते ही यह स्वतः शान्त हो
जाती है, इसे ही बौद्धों ने मोक्ष या निर्वाण कहा है। इस निर्वाण को अश्वघोष
ने बड़े ही सरल ढंग से दीपकन्याय से उपन्यस्त किया है। दीपक बुझने पर जैसे
शान्त हो जाता है, उसी तरह क्लेशक्षय होते ही आत्मा मुक्त हो जाती है—
'दीपो यथा निवृत्तिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् ।
दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥'
—सौ० न० १६।२८
'तथा कृती निवृत्तिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् ।
दिशं न काञ्चित् विदिशं न काञ्चित्, क्लेशक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥'
—सौ० न० १६।२९
ऊपर इसकी चर्चा हो चुकी है कि बौद्ध दार्शनिक आत्मा को केवल चैतन्य-
प्रवाह मानते हैं। अन्य पदार्थों की भांति वह भी क्षणिकवाद के सिद्धान्त से
आबद्ध है। मनुष्य का चित्त सतत विषय-प्रभाव से भरा है। कोई न कोई ज्ञेय
उसके ज्ञान को घेरे रहते हैं। ज्ञेय से ज्ञान को मुक्त करना पड़ता है। समाधि
चित्त की लयावस्था है। जैसे सागर की लहरें सागर में ही अन्ततः लय को
प्राप्त हो जाती है, वैसे ही चित्त भी समाधि अवस्था में अपनी समस्त वृत्ति-
तरंगों को शून्य कर परम चेतना में लय होता है। बौद्धदर्शन के इस सिद्धान्त
को स्पष्ट करने के लिए 'दीपकलिकान्याय' या 'नदीप्रवाहन्याय' का आश्रय
लिया है। दीपक की लौ जैसे प्रतिक्षण परिवर्त्तनशील है, किन्तु प्रतिक्षण परि-
वर्त्तितरूप तत्सदृश बना रहने से हमें ताद्रूप्य की भ्रान्ति कराता है। नदी सदा ही
प्रवहनशील है, परन्तु भ्रान्तिवश उसे हम वही पानी समझ लेते हैं। इसमें तो
पल-पल परिवर्त्तन है। जीवन का प्रवाह तो नदी की भांति है। नदी के प्रवाह
में भी अडिग चट्टान की तरह जो स्थिर है, वही चेतना है, वही आत्मा है,
उसका परमतत्त्व में विलयन ही मुक्ति है। इसके अतिरिक्त जीवन कुछ नहीं है,
यही परिवर्त्तनशीलता या प्रवाहमयता है, इसे ही दोष, दुःख या क्लेश कहा गया
है। दीपक जब तक जलता है, उसे स्वयं तो जलन की अनुभूति होती ही रहती
है, उसके बुझते ही वह जैसे शान्त हो जाता है उसी तरह क्लेशक्षय होते ही आत्मा
स्वतः मुक्त हो जाती है। यह परमशान्ति तो तभी होगी जब इस आत्मा की
क्षणिकता, चैतन्य प्रवाह की गतिशीलता शान्त हो जाय। इस दशा में आत्मा
कहीं जाती नहीं, इसकी आकृति में कोई परिवर्त्तन नहीं होता, प्रत्युत क्लेशक्षय
होते ही स्वयं शान्त हो जाती है। परन्तु बौद्ध दार्शनिकों के अनुसार वह शान्ति
नकारात्मक भी बिल्कुल नहीं कही जा सकती हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त
पर तथागत ने यहं बतलाया कि संसार में प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण उत्पत्ति, स्थिति
और विनष्टि क्रम में सतत प्रगतिशील है। अस्तित्व होना या अस्तित्व नहीं
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होना, इन तथ्यों का सत्यस्वरूप यही है । बौद्धदर्शन में इसी को 'मज्झिमा-
पटिपदा' अर्थात् 'मध्यम मार्ग' कहा गया है ।
पश्चाद्वर्त्ती नागार्जुन ने इसी विचार को आगे बढाया और माध्यमिक दर्शन
या शून्यता दर्शन की स्थापना की, जिसका पर्याप्त विकास नालन्दा विश्व-
विद्यालय में हुआ । मध्यमकारिका में नागार्जुन ने लिखा है—
'न सतो नाऽपि परतो न द्वाभ्यां नाप्यहेतुतः ।
उत्पन्ना जातु विद्यन्ते भावाः क्वचन केचन ।।'
—नागार्जुन ।
मोक्षकामी दार्शनिक काम यानि मार को संसार का अधिपति समझता
है । अतः सर्वप्रथम उसे जीतकर शान्ति या परम शान्ति प्राप्त कर सकता है ।
यही कारण है कि वह काम को जीतने के लिए बद्धपरिकर रहता है । बुद्ध-
चरित का ग्यारहवां सर्ग इसका उदाहरण है । इस संसार में शत्रु हत्या करना
चाहते हैं, पर वे तो समय पर शत्रुभाव छोड़कर मित्र भी बन जाते हैं, किन्तु
काम इस संसार में या परलोक में प्रतिक्षण दुःख के हेतु हैं—
'इहैव भूत्वा रिपवो वधात्मकाः प्रयान्ति काले पुरुषस्य मित्रताम् ।
परत्र चैवेह च दुःखहेतवो भवन्ति कामाः न तु कस्यचिच्छिवाः ।।'
—सौ० न० ९।४७
यदि तुम्हें शक्तिशाली होने का घमंड है, अपने बल को महान् समझते हो
तो इसकी परीक्षा के लिए काम से युद्ध करो, अगर तुम इन्हें पराजित किये तो
निश्चय ही तुम बलवान् हो, अन्यथा तुम्हारा बल बेकार है । यही मारविजय
बौद्धदर्शन की कामना है ।
यह 'काम' क्या है ? साधारणतः जिसे काम कहते हैं—वह राग है, विष-
योपभोग की आसक्ति है और उसमें अपने आपको भुलाने का एक उपाय है,
एक युक्ति है । मनुष्य प्रतिपल दुःख में है, अपने आपको भूलना चाहता है ।
तथाकथित विषयोपभोग से वह यथार्थ जीवन से बहुत दूर चला जाता है । वह
आसक्ति में डूबकर अपने आपको भुला देता है । केवल दुःखों के प्रति मूर्च्छा
ला देता है । साधारणः काम नाम से जाने जानेवाले 'मार' ऐसे ही मूर्च्छा और
विस्मरण की चित्तस्थिति है । यह कामोपभोग सुख अति क्षणिक है । वह
दुःख से ही उत्पन्न होता है, दुःख को भुलाने के उपाय से ज्यादा नहीं है ।
जगत् के जाल से छुटकारा पाये नन्द की फिर से उसमें फँसने की इच्छा
की दयनीय दशा का एक मार्मिक चित्र दर्शनीय है—
'कृपणं बत यूथलालसो महतो व्याधभयाद्विनिःसृतः ।
प्रविविक्षति वागुरां मृगश्चपलो गीतरवेण वञ्चितः ।।'—सौ० न० ८।१५
इसी तरह बौद्धधर्म के चार आर्यसत्यों का वर्णन बौद्धदर्शन का ही एक
निदर्शन है—
( २४ )
'बाधात्मकं दुःखमिदं प्रसक्तं दुःखस्य हेतुः प्रभवात्मकोऽयम् ।
दुःखक्षयो निःशरणात्मकोऽयं, त्राणात्मकोऽयं प्रशमस्य मार्गः ॥'
—सौ० न० १६।४
शील, संयम और ब्रह्मचर्य के माध्यम से जीवन्मुक्त होने का उपाय,
प्रदर्शन ही बौद्धदर्शन के जीवन्त तत्त्व हैं। इसमें अहिंसा, सत्य, मैत्रीधर्म,
काम-विजय, इन्द्रिय-नियन्त्रण, आहार और आचारशुद्धि को महत्त्वपूर्ण स्थान
दिया गया है। सर्वप्राणियों पर मित्रचक्षु ही इस दर्शन का सर्वस्व है। इसका
स्वरूप ही प्राणिकल्याण या-सीमित अर्थ में आत्ममुक्ति है। अश्वघोष का दर्शन
उनकी कृतियों में इसी विचार से अनुप्राणित है।
( ४ ) अश्वघोष की कलात्मक मान्यता
अश्वघोष का कलात्मक दृष्टिकोण निश्चित रूप से उपदेशवादी या प्रचार-
वादी है। वे काव्यानन्द को रस का साधन मानते हैं, कालिदास की तरह
साध्य नहीं। इनकी कलात्मक मान्यता पर सोचते ही ध्यान आता है कि कविता
मानव-मन की तरह ही अतिपुरातन है। आजतक इस कलात्मकता की कोई
परिभाषा नहीं बन पाई, जिसमें तर्क-वितर्क की कोई संभावना न रहे। आदि-
युग से 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' से लेकर आजतक शुष्कवादी युग तक जो कुछ
काव्यकला के रूप में और उसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में कहा जा चुका है,
वह परिणाम में कम नहीं हैं, किन्तु इससे न तो मनुष्य के मन का परितोष हो
सका और न ही उसकी तार्किक बुद्धि का समाधान। कवि अपने युग का प्रतिनिधि
होता है और युग अपनी समस्याएँ लेकर समाधान खोजता है। युग ही किसी
कवि की कलात्मक मान्यता को एक विशिष्ट रूपरेखा देता है। ऐसी स्थिति में
किसी कवि से किसी अन्य कवि की तुलना आलोचक के लिए कठिन काम बन
जाता है। फिर भी इनके अध्ययन-मनन से आलोचक को किसी निष्कर्ष पर तो
आना ही पड़ता है। इस दृष्टि से देश-विदेश के समानधर्मी कवियों के दृष्टि-
कोण की समता-विषमता पर स्थिर दृष्टि से किसी निष्कर्ष पर तो आना ही
पड़ेगा। कोटि-निर्धारण में इनके परवर्त्ती कवि कालिदास, भारवि, माघ और
श्रीहर्ष के समूह में इन्हें किसी भी स्थिति में डाला नहीं जा सकता। कालिदास
यदि विशुद्ध रसवादी कवि हैं तो भारवि अपनी अर्थगुरुता के कारण अल-
ङ्कार और रसवादी कवि हैं तथा कलाबाज पण्डित कवि हैं। जहाँ तक श्रीहर्ष
का प्रश्न है तो वे मूलतः विशुद्ध रसवादी कवि हैं। इनके बीच अश्वघोष कवि
होने के नाते दो व्यक्तित्व को अपनाकर चलते नजर आते हैं। बुद्धचरित का
कवि अपने पाठकों को परमशान्ति के मन्दिर तक कभी-कभी रमणीय,
अन्यथा अधिकतर शुष्क पार्वत्य प्रदेश से ले जाना चाहता है, परन्तु ठीक
उसके विपरीत सौन्दरनन्द का कवि अपने पाठकों को सीधे राजमार्ग से ले
( २५ )
चलता है। जहाँ मार्ग के दोनों ओर शीतल सुरभित सुखद पेड़ों की छाया
पथिक को शान्ति का अनुभव नहीं होने देती है। मार्ग की मनोहरता.पथिक
के पैरों को आगे बढ़ने की स्वतः प्रेरणा देती है। इनके काव्य का लक्ष्य 'रतये'
नहीं 'व्युपशान्तये' है। इसी तरह विदेशी कवियों के बीच अश्वघोष दान्ते या
मिल्टन के समीपवर्त्ती प्रतीत होते हैं। लेकिन सिद्धान्त को अगर छोड़ दिया
जाय तो शैली की दृष्टि से ये फिर उन दोनों से भी अलग पड़ जाते हैं। शैली
की दृष्टि से मिल्टन कलावादी है, दान्ते थोड़ा-बहुत अश्वघोष से मिलते
हैं। अश्वघोष की एक स्वगतोक्ति इस सन्दर्भ में दर्शनीय है—
'इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भाकृतिः,
श्रोतॄणां ग्रहणार्थमन्यमनसः काव्योपचारात् कृता।
यन्मोक्षात्कृतमन्यदत्र हि मया तत्काव्यधर्मात् कृतम्,
पातुं तिक्तमिवौषधं मधुयुतं हृद्यं कथं स्यादिति ॥'—सौ० न० १८।६३
मुक्तिधर्म की व्याख्या से परिपूर्ण यह कृति शान्ति प्रदान करने के लिए है,
न कि आनन्द देने के लिए; अन्यमनस्क श्रोताओं को आकृष्ट करने के लिए
यह कृति काव्यशैली में रची गयी है। इसमें मुक्तिधर्म के अतिरिक्त मैंने जो कुछ
भी लिखा है, सो इसे काव्यधर्म के अनुसार सरस बनाने के लिए ही; जैसे कि
कड़वी औषधि को पीने लायक बनाने के लिए उसमें मधु मिलाया जाता है।
अश्वघोष कालिदास के इस कथन—'किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्'
से पूर्ण सहमत प्रतीत होते हैं। नीतिपरक होने के नाते अव्युपदेशवादी कवियों
के काव्य की परिणति जिस तरह अतिदयनीय होती है; इस दुःखद परिणति से
अश्वघोष उपदेशवादी होने के बावजूद बचे हैं। इससे भी यह प्रतीत होता है कि
अश्वघोष के पास निश्चय ही एक कवि का सच्चा हृदय था। पाश्चात्य आलोचक
और कवि 'मैथ्यू आर्नल्ड' ने उदात्त काव्य की एक पहचान स्थिर की है। तद-
नुसार साहित्य में वही काव्य स्थायित्व प्राप्त कर सकता है, जो नीतिपरक है।
जीवन का उदात्त दृष्टिकोण, जो निश्चितरूप से नैतिक मर्यादा पर स्थिर रहता
है, उसी से काव्य में स्थायी मूल आंका जा सकता है। जीवन की समष्टि में सूक्ष्म
स्थूल से बाहर कहीं अपना अस्तित्व नहीं रखता। नैतिक मर्यादा के व्यक्ति-
परक, दार्शनिक तथ्य की सौन्दर्यानुभूति पर आश्रित अश्वघोष के महाकाव्य
अपने लौकिक रूपों में इतना परिचित और मर्मस्पर्शी बन गया है कि उसके
प्रवाह में युगों से प्रचलित सस्ती भावुकतामूलक वासना के विकृत चित्र देने-
वाले काव्य सहज ही बह गये हैं। जीवन और कला के क्षेत्र में अश्वघोष ने
जो परिष्कार किया है, वह अविस्मरणीय है।
किसी भी काव्य के लिए आध्यात्मिक या दार्शनिक पृष्ठभूमि उचित है
अथवा अनुचित—इसका निर्णय व्यक्तिगत चेतना ही कर सकेगी। दुःख, स्मृति,
मुक्ति, चैतन्य, प्रवाह स्थूल, व्यक्त, प्रत्यक्ष या यथार्थ जो कुछ, यदि केवल यही
( २६ )
अध्यात्म या दर्शन से अभिप्रेत है तो हमें वह सौन्दर्य, शील, शक्ति, मैत्रीधर्म
आदि की सभी सूक्ष्मभावनाओं में फैला है । अनेक अव्यक्त, किन्तु यथार्थ
सम्बन्धी धारणाओं में अंकुरित, इन्द्रियानुभूत प्रत्यक्ष की पूर्णता से उत्पन्न,
उसी की परोक्षरूप भावना में छिपा हुआ और अपनी ऊर्ध्वगामी वृत्तियों से
निर्मित मैत्रीधर्म, मानवधर्म आदि के ऊँचे आदर्शों से अनुप्राणित मिलेगा ।
अश्वघोष की कृतियों में ऐसी दार्शनिक अनुभूतियाँ तो भरी पड़ी मिलेगी । एक
चित्र अश्वघोष का कितना नैतिक है, सार्वजनीन एवं मानवधर्मी हैं—इसे देखने
से ही पता चल जाता है । मनुष्य को सभी अवस्थाओं में दृष्टि, घ्राण, श्रवण,
आस्वाद और स्पर्श—इन बुराई करनेवाले शत्रुओं का नियंत्रण करने में सदैव
सावधान रहना चाहिए । इस विषय में क्षणभर के लिए भी प्रमाद या आलस्य
घातक सिद्ध हो सकता है—
'तस्मादेषामकुशलकराणामरीणां चक्षुर्घाणश्रवणरसनस्पर्शनानाम् ।
सर्वावस्थं भव विनियमादप्रमत्तो मास्मिन्नर्थे क्षणमपि कृथास्त्वं प्रमादम् ।।'
—सौन्दरनन्द १३।५६
यदि अश्वघोष के इस कथन को परम्परागत धार्मिक रूढ़ि या अध्यात्म की
संज्ञा देते हैं तो उस रूप में इस काव्य में इसका वह महत्त्व नहीं रह जाता, जो
कवि को अभिप्रेत है । इस कथन में अध्यात्म या दर्शन को बलात् प्रचारवादी
रूप देने का या उसकी मानवीय अतिचेतना की एकान्तिक अनुभूति को अस्वी-
कार करने के आग्रह का औचित्य प्रतीत नहीं होता है । अवश्य ही वह अपने
एकान्तिक रूप में भी सफल है, किन्तु इस मानवीय नैतिकता की अभिव्यक्ति
लौकिक रूपकों में ही तो संभव है ।
अश्वघोष की मुक्तिजन्य परोक्षानुभूति चाहे जितनी एकान्तिक रही हो,
परन्तु उनका शील, इन्द्रिय-संयम, मारजय, आर्यसत्य या वितर्कप्रहाण प्रभृति
की मर्मस्पशिनी अभिव्यञ्जना क्या किसी लोकोत्तर लोक से रूपक लाई है ?
हम भले ही अश्वघोष के आध्यात्मिक एवं दार्शनिक संकेतों से अपरिचित हों,
किन्तु उनकी लौकिक कलात्मक दृष्टिकोण की सप्राणता से हमारा पूर्ण परिचय
है । जहाँ तक धर्मगत रूढ़िग्रस्त प्रचार या उपदेशात्मक काव्य का प्रश्न है तो
वह तो केवल विधिनिषेधमय सिद्धान्तों का संग्रहमात्र है, जो अपने प्रायोगिक
स्वरूप को खोकर इसके वास्तविक स्वरूप के निर्माण में बाधक सिद्ध हुए हैं ।
बौद्ध धार्मिक दृष्टिकोण ने ही उनकी काव्यात्मक व्यापक दृष्टि को रोक दिया
है, जो व्यापक जीवन-दृष्टि कालिदास में पाई जाती है—यह अभाव अवश्य
खटकता है ।
(५) अश्वघोष की काव्य-प्रतिभा तथा उनके काव्यों का सौन्दर्य
भारतीय संस्कृत साहित्य की विशाल काव्य-परम्परा के प्रारंभ में ही
मानवीय चेतना की एक निश्चित दिशा निर्धारित कर दी गई है । यह परम्परा
( २७ )
आदिकवि की अमर कृति रामायण तथा व्यास के महाभारत के रूप में विद्य-
मान थी। अपना अस्तित्व बनाये रखना, आत्मा की निर्मलता को स्थिर रखना
ही मानव-जीवन का लक्ष्य है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक ये महाकाव्य हैं। इनमें
आत्मपरकता का सिद्धान्त कार्यरत है, जो बाहरी प्रभावों के दबावों से नितान्त
मुक्त हैं। इन आर्षकाव्यों.के अतिरिक्त लौकिक संस्कृत-काव्य-परम्परा भी रही
हो। पाणिनि ने 'जाम्बवती-परिणय' तथा 'पाताल-विजय' नामक दो महा-
काव्यों की रचना की थी। इनके अतिरिक्त कई सुभाषितग्रंथ भी उपलब्ध हैं।
साधारणतः मनुष्य एक स्वचालित यंत्र है; उसके कथन और कार्य,
मानसिक स्थितियाँ और भावनाएँ, विचार और अभिप्राय सभी वाह्य शक्तियों
द्वारा उत्पन्न होते हैं। किन्तु उसे किसी अन्य आधार पर कार्यरत होना
चाहिए। एक पृथक् अस्तित्व बनाना उसके लिए आवश्यक है। जो कुछ वह
है, उतने से ही उसे संतुष्ट नहीं होना चाहिए। वह जो कुछ हो सकता है वहाँ
तक उसे जाना चाहिए। अपनी चेतना में उसका पुनर्जन्म या कायाकल्प
होना चाहिए। आमोद-प्रमोद या विलासमय जीवन बिताने वाला व्यक्ति,
अनिवार्यतः आन्तरिक पथ के पथिक, भीतर से बढने और नई-नई शक्तियाँ
एवं गुण प्राप्त करने वाले व्यक्ति से ऊँचे स्तर पर कदापि नहीं होते। मानव
केवल भौतिक सम्पत्ति—यहाँ तक कि ज्ञानार्जन—से ही संतुष्ट नहीं हो सकता।
उसका ध्येय कुछ और है—आत्मसाक्षात्कार। और इसी सिद्धान्त के प्रति-
पादक संस्कृत साहित्य की काव्य-परम्परा है।
संस्कृत साहित्य आध्यात्मिक जगत् में प्रमुख स्थान ग्रहण किया है और
इस तथ्य का प्रतीक है कि आत्मविजय, साहस, पवित्रता, जीवन में एकता
और मैत्रीभाव से ही पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। यही आदर्श हमें मोक्षमार्ग
के चिन्तन में लीन बौद्ध दार्शनिकों में, अज्ञान, ईर्ष्या और 'मार' को पराजित
करने वाले शान्त एवं सौम्य बुद्ध में आत्मचिन्तन के पश्चात् तपःपूत काया में
सार्वभौम प्रेम में एकाकार हो जाने, मैत्रीभाव से सराबोर, आत्मलीन लाल-
साओं से ऊपर उठकर, परमपिता की इच्छा का पालन इस पार्थिव जगत् में
सदैव करने वाले साधु के आनन्दातिरेक अश्वघोष के साहित्य में मिलता है।
सृजनात्मक जीवन केवल ऐसे कवि के लिए संभव है, जो एकाग्र और
पवित्र रह सकते हैं और जिनमें एकान्त चिन्तन का साहस है। एकान्त के
क्षणों में ही, चित्त की एकाग्रता की स्थिति में, शील, संयम और आहार
नियंत्रण से आत्मोपलब्धि होती है, मुक्तिमार्ग के दर्शन होते हैं और उस
चिन्तन को कोई कवि काव्य-धरातल पर लाता है। फिर उसे अपनी भावनाओं
का परिधान पहनाता है, उसे शब्दों में व्यक्त करता है, गतिमयता प्रदान
करता है अथवा दर्शन के रूप में आंक देता है। मस्तिष्क को आत्मा का वाहन
बनाने के लिए एकान्त चिन्तन और काव्य का सृजन करता है। सम्पूर्ण सिद्धि
( २८ )
भीतर से बाहर निकल आती है। उसका सच्चा ऐश्वर्य यही मानसिक चिन्तन
होता है, भौतिक नहीं। स्वतंत्रचेता अश्वघोष इसी दृष्टि से अन्य लौकिक
कवियों से भिन्न हैं। शैली की दृष्टि से भी अश्वघोष आदिकवि महर्षि
वाल्मीकि के समीपवर्त्ती ही प्रतीत होते हैं। उसी तरह कुछ स्थलों को छोड़ कर
इनकी भाषा भावानुसारिणी सरस, सरल और तरल है। आदिकवि की ही
तरह अनेक छन्दों का प्रयोग करते हुए भी अश्वघोष ने अधिकतर अनुष्टुप् का
ही प्रयोग किया है।
अश्वघोष की कथावस्तु बौद्ध अवदानों पर आधारित है। वस्तु को ऊर्ज-
स्वित एवं काव्यमयता के लिए उन्होंने जातक-कथाओं में वर्णित कथाओं के
मूल रूप में यत्र-तत्र अपेक्षित परिवर्तन एवं परिष्कार भी किया है। जातक-
कथा में एक बन्दरी का वर्णन है, जिसे बौद्ध ग्रन्थों में भगवान् बुद्ध ने नन्द को
दिखलाकर उसके प्रियासक्त मन को सुस्थिर करना चाहते हैं। उस बन्दरी को
न नाक है और न कान ही, उसे आँख भी नहीं है! पर उसी कथा को अश्व-
घोष ने अपने काव्यगंगाजल से धो-पोंछ कर कितना सुन्दर बना दिया है, वह
दर्शनीय है—
'तस्मात्तु यूथादपसार्यमाणां निष्पीडितालक्तरक्तवक्त्राम्।
शाखामृगीमेकविपन्नदृष्टिं दृष्ट्वा मुनिर्नन्दमिदं बभाषे॥'
—सौ० न० १०।१५
× × ×
का नन्द रूपेण च चेष्टया च सम्पश्यतश्चारुतरा मता मे।
एषा मृगी वैकविपन्नदृष्टिः स वा जनो यत्र गता तवेष्टिः॥'
—सौन्दरनन्द १०।१६
बौद्ध अवदान के इस रूखे प्रसंग को अश्वघोष ने कितना आकर्षक बना
डाला है। 'ओ नन्द ! जरा इस कानी बंदरी को तो देखो, जो अपने दल से भटक
कर इधर आ गई है, इसका मुँह तो देखो, लगता है किसी ने महावर निचोड़
कर डाल दिया हो। इसे देखकर अब तुम्ही बतलाओ कि तुम्हारी समझ में
रूप और हावभाव में कौन अधिक खूबसूरत है—यह बंदरी या वह सुन्दरी,
जिसमें तुम्हारा जी रमा है ?' कितना तीखा कटाक्ष है। दिल को बेंधने वाला
कितना दिलकस व्यंग्य मुस्कुरा रहा है ?
अश्वघोष के प्रथम महाकाव्य बुद्धचरित का कथा-प्रवाह वर्ण्य विषय के
हाथों में हाथ डालकर चलते नजर आता है, किन्तु जहाँ दार्शनिक चिन्तन
अधिक तीव्र हो गया है वहाँ कथा-प्रवाह प्रायः पारिभाषिक शब्द-चट्टानों के
नीचे सूखता नजर आता है। ठीक यही स्थिति सौन्दरनन्द की भी है। जहाँ
दार्शनिकता का भार हल्का हुआ वहाँ बौद्ध संन्यासी अश्वघोष का कवित्व जाग
गया है। प्रसंग चाहे रत्यात्मक हो या वैराग्यात्मक—कथा-प्रवाह की प्राञ्जल
( २९ )
धारा फूट पड़ी है। कोरा शृंगार-वर्णन या चित्रमयता के लिए कहीं भी कथा
का प्रवाह रुका नहीं है। यहाँ अश्वघोष भारवि, माघ या श्रीहर्ष को बहुत पीछे
छोड़ जाते हैं। दार्शनिक स्थलों को छोड़कर-अश्वघोष का वस्तु-संविधान अधिक
स्वाभाविक, मनोरम, प्रवाहमय, सरस तथा प्रभावोत्पादक है। यहाँ अश्वघोष
कालिदास के साथ हाथ मिलाकर चलते नजर आते हैं। श्रीहर्ष की तरह न तो
अप्रासंगिक प्रकृति-वर्णन में ये उलझते हैं और न ही माघ की तरह चमत्कार
प्रदर्शन में। भट्टि की तरह व्याकरण के जटिल प्रयोगों के प्रदर्शन में भी इनकी
अभिरुचि नहीं है। ये अपने ढंग के निराले ही हैं।
तपःपूत आर्यभदन्त अश्वघोष ज्ञानी, भक्त और मूलतः शान्तरस के
कवि तो थे ही; लेकिन इसके अलावा श्रेष्ठसाधक, गणितज्ञ, शास्त्रवेत्ता, बौद्ध-
संगति-संशोधक और मँजे हुए आयुर्विज्ञानवेत्ता भी थे। इन सभी का स्पष्ट
स्वरूप इनकी कृतियों में देखने को मिलता है। बुद्धचरित, सौन्दरनन्द तथा
उपलब्ध अन्यापदेशी नाटक-खण्डों से भी यह प्रमाणित होता है कि ये शान्तरस
के कवि थे। दया, दान, सत्य, शौच और मृदुता इनके प्रमुख वर्ण्य विषय रहे
हैं। फलतः इन्होंने अपने दोनों ही महाकाव्यों में मुख्य रस के रूप में या
सहयोगी रस के रूप में या विरोधी रस के परिवेश में शान्तरस के अतिरिक्त
वीर, वीभत्स, करुण तथा शृंगार रस का निबन्धन बड़ी कुशलता एवं दक्षता
के साथ किया है। 'बुद्धचरित' के तृतीय, चतुर्थ और पंचम सर्ग में तथा
सौन्दरनन्द के चौथे और दसवें सर्ग में जो उदात्त शृंगार का वर्णन है; उसे
पढ़कर कोई यह सोच भी नहीं सकता कि यह कृति किसी बौद्ध संन्यासी की
है। अश्वघोष के कवि की परिनिष्ठित इस इमानदारी को कोई अस्वीकार नहीं
कर सकता। यह बात अलग है कि अपने चरितनायक बुद्ध की तरह इनका मन
भी शृङ्गार में अधिक नहीं रमता। फिर भी, इनके शृङ्गार की यह विशेषता है
कि वे नायिका की चेष्टा-वर्णन में उपमा को माध्यम के रूप में लेकर एक
ओर उनके दर्शन करते हैं, तो दूसरी ओर उनका गुण-वर्णन कर ये शान्त हो
जाते हैं। अपने शृङ्गार के भव्य एवं मर्यादित स्वरूप को इन्होंने बड़े संयत
एवं मूर्त्त रूप में ही व्यक्त किया है। इन्होंने नारी-सौन्दर्य को शान्त, वैराग्य-
शील एक भिक्षु की दृष्टि से नहीं देखा है। वस्तुस्थिति यह है कि इन्हें जहाँ
कहीं भी नारी के रूप-सौन्दर्य के वर्णन का अवसर मिला है, बाह्य-सौन्दर्य
वर्णन की अपेक्षा अन्तःसौन्दर्य के रहस्य का उद्घाटन करने में ही अत्यधिक
आत्मतोष का अनुभव करते हैं। नारी-सौन्दर्य की रुचिर अभिव्यक्ति में निरी-
क्षण की सूक्ष्मता, नवीनता, हृदय की सरलता और कल्पना की कमनीयता
सर्वत्र पायी जाती है। यद्यपि अश्वघोष स्वयं शान्त, विरक्त एक बौद्धभिक्षु
हैं, फिर भी उन्होंने इस नारी-सौन्दर्य को वैराग्यशील की दृष्टि से देखने की
अपेक्षा सरस लौकिक दृष्टि से ही देखा है। किन्तु जहाँ वे शान्तरस के प्रवाह
३ सौ० भू०
( ३० )
में बहते हैं, वहां नारी का मूल्य उनकी दृष्टि में एक 'कानी बंदरी' से अधिक
नहीं है, उसे वे जर्जर भाण्ड की तरह 'मल-मूत्र-धरा' से अधिक महत्त्व नहीं
देते । फिर भी अपने इस शान्तरस के लिए कहीं भी उन्होंने शृङ्गार की
आत्मा को कुचला नहीं है । शृङ्गार के सारे चित्र सरस, भावमय और
प्रभावोत्पादक हैं । इनके वर्णन में सरसता तो है परन्तु ऐन्द्रिय विलासजन्य
कुत्सा नहीं है । कुछ उदाहरण दर्शनीय है—
'स चेद्भवेस्त्वं खलु दीर्घसूत्रो दण्डं महान्तं त्वयि पातयेयम् ।
मुहुर्मुहुस्त्वां शयितं कुचाभ्यां विबोधयेयं च न चापलेयम् ॥'
—सौन्दरनन्द ४।३५
अगर लौटने में तुमने देर की तो जब तुम सोओगे तो अपने कठोर कुचों
की लगातार ठोकरों से तुम्हें सोने न दूँगी, परन्तु तुमसे बात बिल्कुल ही नहीं
करूँगी । शृङ्गार की यह तरलता रसिक पाठकों के दिल को छू लेती है । कवि
के रूप-सौन्दर्य का एक और हृदय संवेद्य उदाहरण—
'छातोदरीं पीनपयोधरोरुं स सुन्दरीं रुक्मदरीमिवाद्रेः ।
काक्षेण पश्यन्न ततर्प नन्दः पिबन्निवैकेन जलं करेण ॥'
—सौन्दरनन्द ४।४१
सुनहले पर्वत-गुफा की तरह क्षीण उदर वाली, पीन पयोधर और मोटी-मोटी
जांघों वाली उस सुन्दरी को कनखी आंखों से देखता हुआ नन्द उसी तरह तृप्त
नहीं हुआ, जैसे अतिप्यासा व्यक्ति चुल्लू से पानी पीकर नहीं अघाता । शृङ्गार
के सरस-सरल एक और चित्र—
'मुहुर्मुहुंमंदव्याजसुस्तनीलांशुकापरा ।
आलक्ष्यदशना रेजे स्फुरद्विद्युदिव क्षपा ॥'
—बु० च० ४।३३
नारी-सौन्दर्य का उद्दाम, परन्तु कितना मर्यादित यह रूप है। वह नारी
नहीं बिजली से कौंधती रात है। नशे के बहाने वह बार-बार अपने नीले आँचल
को नीचे सरका देती है, जिससे उसकी करधनी चमक उठती है।
अश्वघोष केवल बौद्धभिक्षु या पण्डित कवि ही न थे, अपितु ये प्रचण्ड
साधक और समुन्नत योगी भी थे । इनकी अमूर्त्त कल्पना से गृहीत नारी-
सौन्दर्य का एक और चित्र—
पणव युवतिर्भुजांसदेशादवविस्रंसितचारुपाशमन्या ।
सविलासरतान्ततान्तमूर्वोर्विवरेकान्तमिवाभिनीय शिश्ये ॥
—बु० च० ५।५६
वाह रे खूबसूरती ? कन्धे से हार नीचे खिसक गये हैं, सविलास सुरत के
अन्त में थके प्रिय के पणव को जांघों के बीच दबाकर सो गई है । अन्योक्ति के
कैसे सजीव चित्रण हैं ।
( ३१ )
श्रृंगार के उद्दीपन के लिए नारी-सौन्दर्य एक महत्त्वपूर्ण अङ्ग है। क्योंकि
रस के विभावादि समस्त अवयवों का ही साधारणीकरण होता है और विभा-
वादि के साधारणीकरण के फलस्वरूप ही स्थायी का साधारणीकरण होता
है, जिसमें सहृदय की चेतना व्यक्ति-संसर्गों से मुक्त हो जाती है। इस निर्मुक्ति
के विभाव पक्ष में नारी-सौन्दर्य का वर्णन अश्वघोष के काव्य में कई स्थलों पर
आकर्षक रूप से वर्णित है। सौन्दरनन्द के दशम सर्ग में अप्सराओं का वर्णन
इसी शृङ्गारिक कोटि का है। एक दृश्य द्रष्टव्य है—
'तासां जगुर्धीरमुदात्तमन्याः पद्मानि काश्चिल्ललितं बभञ्जुः ।
अन्योन्यहर्षान्निनृतुस्तथान्याश्चित्राङ्गहाराः स्तनभिन्नहाराः ॥'
—सौ० न० १०।३७
कुछ ने लीलापूर्वक कमल के फूल तोड़े और कुछ ने धैर्यपूर्वक उदात्त गीत
गाये । पारस्परिक आनन्द में डूबे कुछ ने नृत्य किया । कुछ ने अनेक हाव-भाव
प्रकट किये, नृत्य करते समय उनके कठोर स्तनों के कारण हार टूट-टूट कर
गिर गये । कितना उदात्त शृंगार है ?
वस्तुतः कल्पना जितनी स्फीत होगी, वर्णन उतना ही स्पष्ट होगा । कल्पना,
अनुभूति और अभिव्यक्ति—ये तीनों ही गुण इस प्रतिभाशाली संन्यासी वरेण्य
कवि में उपस्थित हैं—
'दरीचरीणामतिसुन्दरीणां मनोहरश्रोणिकुचोदरीणाम् ।
वृन्दानि रेजुर्दिशि किन्नरीणां पुष्पोत्कचानामिव वल्लरीणाम् ॥'
—सौ० न० १०।१३
हिमालय की तलहटियों में विचरण करती किन्नरियों का कितना अनुभूत
और सरस सौन्दर्य वर्णन है ? ये सुन्दर किन्नरियां, जिनके नितम्ब, स्तन और
उदर मनोहर थे, वहाँ हर दिशाओं में ऐसे शोभायमान हो रही थीं जैसे फूलों
से भरी लताएँ हों । सौन्दरनन्द एवं बुद्धचरित दोनों ही महाकाव्यों के सौन्दर्य
वर्णन में अश्वघोष ने पर्याप्त अलङ्कृत शैली का प्रयोग किया है, किन्तु उनकी
अप्रस्तुत योजना स्वाभाविक है, दुरारूढ़ नहीं—
'कासाञ्चिदासां वदनानि रेजुर्वनान्तरेभ्यश्चलकुण्डलानि ।
व्याविद्धपर्णेभ्य इवाकरेभ्यः पद्मानि कारण्डविघट्टितानि ॥'
—सौ० न० १०।३८
इनमें से कुछ अप्सराओं के चंचल कुण्डल वाले मुख वन के बीच इसी
तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे घने पत्तों वाले तालाबों के बीच हंसों के द्वारा
हिलाये गये कमल हों ।
वैसे अश्वघोष ने सुन्दरी के सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त सरलता के साथ
बड़े ही प्रभावपूर्ण ढंग से किया है । आदर्श अनुराग के चित्रों में तो इसने
सजीवता ही उत्पन्न कर दी है ।
( ३२ )
शृङ्गार के बाद अश्वघोष का दूसरा कोमल रस है 'करुण'। करुणरस
की साक्षात् प्रतिकृति उपस्थित करने में अश्वघोष सिद्धहस्त कवि हैं। बुद्ध-
चरित का अष्टम सर्ग तथा सौन्दरनन्द का षष्ठ सर्ग करुणरस से आप्लावित
है। बुद्ध को अकेले वन में छोड़कर जब छन्दक खाली घोड़े के साथ लौटता
है तो सम्पूर्ण कपिलवस्तु दयनीय करुणरस के प्रवाह में मानो डूब जाता है।
सिद्धार्थ के माता-पिता का विलाप तथा यशोधरा का आर्तनाद भला किस
सहृदय के हृदय को हिला नहीं देता। अश्वघोष ने आस-पास के करुण
वातावरण को चित्रित कर करुणा की तीव्रता को और अधिक बढ़ा दिया है।
कपोतपालिका रूपी भुजाएँ फटकाती हुई; बैठे हुए कबूतरों के चिल्लाने की
दीर्घ श्वास वाली ये पंक्तियाँ सिद्धार्थ से वियुक्त होने के कारण दुःखी होकर
अन्तःपुरिकाओं के साथ मानो अत्यधिक रो रही हैं। यहाँ वस्तूप्रेक्षा,
सहोक्ति तथा रूपक केवल आलंकारिक चमत्कार न होकर करुण के उपयुक्त
वातावरण की सृष्टि कर अन्तःपुरिकाओं की करुणदशा का चित्र और कितना
अधिक मार्मिक बना दिया है—
'इमांश्च विक्षिप्तविरङ्गबाहवः प्रसक्तपारावतदीर्घनिःस्वनाः ।
विनाकृतास्तेन महावरोधनैर्भृशं रुदन्तीव विमानपङ्क्तयः ॥'
—बु० च० ८।३७
ठीक इसी तरह का मार्मिक-चित्रण सौन्दरनन्द का भी है। जहाँ बाज के
द्वारा घायल चक्रवाक के कारण तड़पती चकई की तरह सुन्दरी अत्यन्त
विलाप करती है और महल में टिके, चंचल कण्ठ वाले कबूतर मानो उसकी
स्पर्द्धा करते हुए कूजन कर रहे हों—
सा चक्रवाकीव भृशं चुकूज श्येनाग्रपक्षक्षतचक्रवाकाः ।
विस्पर्द्धमानेव विमानसंस्थैः, पारावतैः कूजनलोलकण्ठैः ॥'
—सौ० न० ६।३०
दोनों चित्रों में कितनी समता है? इससे यह प्रमाणित होता है कि
अश्वघोष का करुणरस सरस है तथा व्यंजनावृत्ति पर आधारित है।
अश्वघोष ने अपने दोनों महाकाव्यों में 'मारविजय' में रूपक का आश्रय
लेकर वीररस का प्रयोग किया है। साम्यविवक्षा की दृष्टि से ही यहाँ वीर
और शान्त दोनों ही रसों का सामञ्जस्य उपस्थित किया गया है। ये दोनों
रस तो इन काव्यों में इस तरह घुल-मिल गये हैं कि इनके बिना इस महा-
काव्य की समीक्षा का एक पग भी संचारण असंभव है। विदेश में कल्पना को
काव्य का एक आवश्यक अंग माना गया है और हमारे यहाँ यह एक उपकरण
है। एडिसन ने इस प्रक्रिया को 'Appeal to the imagination' संस्कृत-
साहित्य की ध्वनि-विषयक आत्मा भी तो कल्पना पर ही आश्रित है। इसी
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ध्वन्यात्मक स्थिति का प्रयोग अश्वघोष के सिद्धार्थ नन्द ने 'मार' की सेना को
पराजित करने में किया है। इसका एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा—
'ततः स बोध्यङ्गशितात्तशस्त्रः सम्यक्प्रधानोत्तमवाहनस्थः ।
मार्गाङ्गमातङ्गवता बलेन शनैः शनैः क्लेशचमूं जगाहे ॥'
—सौ० न० १७।२४
यहाँ कवि का प्रधान लक्ष्य शान्तरस ही है, वीररस नहीं। शान्तरस
के विभाव के रूप में संसार की दुःखमयता तथा नारी-सौन्दर्य की बीभत्सता
का वर्णन जो इनके काव्य में हुआ है, वह बड़ा तीव्र है—
'मलपङ्कधरा दिगम्बरा प्रकृतिस्थैर्नखदन्तरोमभिः ।
यदि सा तव सुन्दरी भवेन्नियतं तेऽद्य न सुन्दरी भवेत् ॥
स्रवतीमशुचिं स्पृशेच्च कः सघृणो जर्जरभाण्डवत् स्त्रियम् ।
यदि केवलया त्वचावृता न भवेन्मक्षिकपत्रमात्रया ॥'
— सौ० न० ८।५१-५२
यदि वह सुन्दरी मलरूपी कीचड़ से युक्त और विवस्त्र हो जाए और
उसके नख, दाँत और रोम स्वाभाविक अवस्था में ही आ जाय तो भला कैसी
लगेगी ? इतना ही नहीं, कौन ऐसा घृणित व्यक्ति है, जो टूटे-फूटे बर्तन की तरह
झरती औरत को छू भी सकेगा, अगर मक्खी की पाँख जैसी चमड़ी से वह
ढँकी न हो।
इसी प्रकार अश्वघोष का प्रकृति-वर्णन भी अपने ढंग का ही है। इनके
प्रकृति-चित्रण के अनेक स्थल है। इसके लिए 'बुद्धचरित' का तृतीय और
सप्तम सर्ग तथा सौन्दरनन्द का सप्तम और दशम सर्ग हैं। यहाँ कवि की
निरीक्षण की सूक्ष्मता, नवीनता, हृदय की सरलता और कल्पना की
कमनीयता पायी जाती है। अश्वघोष ने प्रकृति को मूक, चेतनाहीन अथवा
निष्प्राण न मानकर उसमें यत्र-तत्र जीवन-ज्योति जगाने की चेष्टा की है।
फलतः उसमें भी सुख या दुःख की संवेदनशीलता की अनुभूति पाठकों को
होती है। अन्तःप्रकृति और बाह्यप्रकृति की रुचिर सामञ्जस्यपूर्ण उद्भावना
इन्होंने अपने महाकाव्यों में करने की चेष्टा तो की है, परन्तु उसमें इनका मन
रमा नहीं है। सौन्दरनन्द के सप्तम-सर्ग की प्रकृति प्रिया-विरही नन्द के लिए
'उद्दीपन का काम करती हैं—
'स्थितः स दीनः सहकारवीथ्यामालीनसम्मूर्च्छितषट्पदायाम् ।
भृशं जजृम्भे युगदीर्घबाहुर्ध्यात्वा प्रियां चापमिवाचकर्ष ॥'
—सौ० न० ७।३
लगता है वाल्मीकि या कालिदास के प्रकृति-वर्णन के प्रति इस कवि का मोह या
आसक्ति नहीं है। संभवतः ऐसे स्थलों में भिक्षु अश्वघोष के लिए प्रकृति भी
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विकृति का कारण बन गई है। कालिदास के काव्यों में प्रकृति का सर्वाङ्गपूर्ण
वर्णन हुआ है। भवभूति का प्रकृति-वर्णन भी अद्वितीय है। इनका प्रकृति-वर्णन
संश्लिष्ट एवं चित्रोपम है। ये प्रकृति के कोमल तथा कठोर दोनों रूपों के
वर्णन में सिद्धहस्त हैं। इन्होंने प्रकृति का वर्णन आलम्बन के रूप में किया
है। कालिदास का प्रकृति-चित्रण सप्राण सजीव एवं मानवीयकृत है। यदि
कालिदास की प्रकृति का वर्णन अनलंकृत है, तो भवभूति की प्रकृति अनाविल
नैसर्गिक-सौन्दर्य के साथ अलंकार की अनावश्यक अलंकृति से बचती है।
फिर भी प्रकृतिवर्णन प्रभावोत्पादक है। कालिदास और भवभूति के प्रकृति-
वर्णन के सामने सौन्दरनन्द या बुद्धचरित का वर्णन नीरस एवं चलता-सा
दिखलायी पड़ता है।
अश्वघोष का प्रमुख ध्यान अपने प्रतिपाद्य वर्ण्य-वस्तु की ओर अधिक है।
शैली, अलङ्कार, या छन्दोविधान की अभिव्यञ्जनाप्रणाली आनुषङ्गिक है।
यह बात अलग है कि वर्ण्य-वस्तु के साथ ये प्रयोग कहीं-कही अत्यधिक प्रभा-
वोत्पादक या सटीक बन गया है। यह अनायास है, सायास नहीं। कारण
स्पष्ट है, अश्वघोष का दृष्टिकोण कलावादी नहीं है। इनके काव्य में
अश्वघोष का त्रिविध व्यक्तित्व का त्रिकोणात्मक संघर्ष सर्वत्र परिप्रेक्ष्य में है।
कहीं इनकी दार्शनिकता इनके कवित्व पर हावी है, तो कभी इनकी धर्मोप-
देशिकता इनके दर्शन पर भारी है। अतः इनका वर्ण्य-विषय इनकी विधा-
भिव्यञ्जना के बीच असामञ्जस्य जैसा लगता है। इन सभी तथ्यों के
बावजूद इनमें कुछ ऐसी विशेषता है, जो अनायास पाठकों को अपनी ओर
आकृष्ट कर लेती है। कलात्मक विशेषता नहीं रहने के बावजूद अश्वघोष
की काव्यप्रतिभा प्रशंसनीय है।
अश्वघोष की शैली पर जब हम विचार करते हैं तब हमें यह स्पष्ट प्रतीत
होता है कि कवि ने सर्वत्र सुगम भाषा और वैदर्भीरीति को ही प्रश्रय दिया है।
इनकी वर्ण्य-वस्तु की भाषा सुगम एवं सरल है। इनकी शैली परिष्कृत एवं
परिमार्जित है। इनका शब्द-विन्यास सरस, शोभासम्पन्न, विशद और अधिक
अभिव्यञ्जक है। आकर्षक, सरस, प्रवाहमय काव्य के माध्यम से जन-जन तक
बौद्धधर्म का प्रचार-प्रसार इनके काव्य का प्रमुख लक्ष्य था। यही कारण है
कि इनकी शैली प्रसादमयी सरलता के साथ माधुर्य उत्पन्न करती है। इन्होंने
अपने काव्यों में सामासिक शब्दों का प्रयोग तो किया है, परन्तु सदैव दीर्घ और
क्लिष्ट सामासिक पद-विन्यास से बचते रहे हैं। इस दृष्टि से इनकी समग्र
रचनाएँ कृत्रिमता तथा अस्वाभाविकता से सर्वथा दूर हैं। अश्वघोष ने तो
गम्भीर दार्शनिक विचारों को भी अत्यन्त सरल भाषा में प्रकट किया है।
निम्न श्लोक उदाहरणार्थ दर्शनीय है—