सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१ )
'आकाशयोनिः पवनो यथा हि यथा शमीगर्भशयो हुताशः ।
आपो यथान्तर्वसुधाशयाश्च दुःखं तथा चित्तशरीरयोनिः ॥'
—सौन्दरनन्द १६।११
'अपां द्रवत्वं कठिनत्वमुर्व्या वायोश्चलत्वं ध्रुवमौष्ण्यमग्नेः ।
यथा स्वभावो हि तथा स्वभावो दुःखं शरीरस्य च चेतसश्च ॥'
—सौ० न० १६।१२
इस दुःख से छुटकारा पाना ही मोक्ष है। बौद्धों की मुक्ति या निर्वाण
की स्थिति या धारणा बिलकुल अन्य दर्शनों की अपेक्षा भिन्न एवं अभिनव है।
उनके अनुसार निर्वाण की स्थिति में व्यक्ति के समग्र क्लेश या दुःख का क्षय
हो जाता है। किन्तु यह क्लेशक्षय नैयायिकों की दुःखाभाववाली स्थिति की
तरह नहीं है। नैयायिकों की आत्मा की मुक्त स्थिति शिलात्वमुक्ति की है।
परन्तु अश्वघोष की दार्शनिकता में उनकी बुद्धि और भावना इस तरह घुल-मिल
गई है जैसे धूपछाँही वस्त्र में दो रंगों के तार, जो अपनी-अपनी भिन्नता के
कारण अपने रंगों से भिन्न एक तीसरे रंग की सृष्टि करते हैं। मानसिक वृत्तियों
की ऐसी सामञ्जस्यपूर्ण एकता 'सौन्दरनन्द' के अतिरिक्त अन्यत्र संभव नहीं
है। इसके लिए न अन्तर्जगत् त्याज्य है और न बाह्य, क्योंकि इसका विषय
सम्पूर्ण जीवन है, आंशिक नहीं। मुक्ति समग्र जीवन के लिए है; किसी खण्ड
या अंश के लिए नहीं। दुःखरूपी कारण का विनाश होते ही मुक्ति का मार्ग
स्वतः खुल जाता है। संसार में इस जन्मरूपी दुःख का कारण तृष्णाजन्य भोग-
रूपी दुःख का समूह ही होता है। इसके लिए न तो ईश्वर कारण है और न
विधि ही; प्रकृति, काल, स्वभाव या संयोग भी इसके कारण नहीं हो सकते—
'प्रवृत्तिदुःखस्य च तस्य लोके तृष्णादयो दोषगणा निमित्तम् ।
नैवेश्वरो न प्रकृतिर्न कालो नापि स्वभावो न विधिर्यदृच्छा ॥'
—सौ० न० १६।१७
मुक्तिधर्म अतर्क्य है, क्योंकि धर्म का कोई विचार नहीं है। वह असंगत भी
है, क्योंकि इन्द्रियजन्य ज्ञान से उसकी कोई संगति नहीं है और वह इन्द्रियों
से नहीं बल्कि किसी बहुत ही अन्य और भिन्न मार्ग से उपलब्ध होता है। मोक्ष
या धर्म किसी विचार की अनुभूति नहीं, बल्कि निर्विचार चैतन्य में हुआ बोध
है; जीवन से मुक्ति है। मुक्ति आत्मा की होती है और आत्मा अर्थात् निर्विचार
चैतन्य अतीन्द्रिय है। जीवन की परम निष्पत्ति ही मुक्ति है। निर्विचार चैतन्य
का चरम साक्षात् आत्मा है। इसलिए जो विचारणा आत्मा के सम्बन्ध में है,
वह व्यर्थ है। वह साधन सार्थक है, जो मुक्ति की ओर है। किसी चिन्तन के
पीछे जो है, वही बोध है, विवेक है, प्रज्ञा है। विचार में व्यस्त और ग्रस्त
व्यक्ति इस आत्मा को नहीं जान पाता है। मुक्ति की ओर जब यह आत्मा
अग्रसर होती है तो न यह पृथ्वी की ओर जाती है, न अन्तरिक्ष की ओर, न