सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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किसी दिशा में, न विदिशा में, अपितु क्लेशक्षय होते ही यह स्वतः शान्त हो
जाती है, इसे ही बौद्धों ने मोक्ष या निर्वाण कहा है। इस निर्वाण को अश्वघोष
ने बड़े ही सरल ढंग से दीपकन्याय से उपन्यस्त किया है। दीपक बुझने पर जैसे
शान्त हो जाता है, उसी तरह क्लेशक्षय होते ही आत्मा मुक्त हो जाती है—
'दीपो यथा निवृत्तिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् ।
दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥'
—सौ० न० १६।२८
'तथा कृती निवृत्तिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् ।
दिशं न काञ्चित् विदिशं न काञ्चित्, क्लेशक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥'
—सौ० न० १६।२९
ऊपर इसकी चर्चा हो चुकी है कि बौद्ध दार्शनिक आत्मा को केवल चैतन्य-
प्रवाह मानते हैं। अन्य पदार्थों की भांति वह भी क्षणिकवाद के सिद्धान्त से
आबद्ध है। मनुष्य का चित्त सतत विषय-प्रभाव से भरा है। कोई न कोई ज्ञेय
उसके ज्ञान को घेरे रहते हैं। ज्ञेय से ज्ञान को मुक्त करना पड़ता है। समाधि
चित्त की लयावस्था है। जैसे सागर की लहरें सागर में ही अन्ततः लय को
प्राप्त हो जाती है, वैसे ही चित्त भी समाधि अवस्था में अपनी समस्त वृत्ति-
तरंगों को शून्य कर परम चेतना में लय होता है। बौद्धदर्शन के इस सिद्धान्त
को स्पष्ट करने के लिए 'दीपकलिकान्याय' या 'नदीप्रवाहन्याय' का आश्रय
लिया है। दीपक की लौ जैसे प्रतिक्षण परिवर्त्तनशील है, किन्तु प्रतिक्षण परि-
वर्त्तितरूप तत्सदृश बना रहने से हमें ताद्रूप्य की भ्रान्ति कराता है। नदी सदा ही
प्रवहनशील है, परन्तु भ्रान्तिवश उसे हम वही पानी समझ लेते हैं। इसमें तो
पल-पल परिवर्त्तन है। जीवन का प्रवाह तो नदी की भांति है। नदी के प्रवाह
में भी अडिग चट्टान की तरह जो स्थिर है, वही चेतना है, वही आत्मा है,
उसका परमतत्त्व में विलयन ही मुक्ति है। इसके अतिरिक्त जीवन कुछ नहीं है,
यही परिवर्त्तनशीलता या प्रवाहमयता है, इसे ही दोष, दुःख या क्लेश कहा गया
है। दीपक जब तक जलता है, उसे स्वयं तो जलन की अनुभूति होती ही रहती
है, उसके बुझते ही वह जैसे शान्त हो जाता है उसी तरह क्लेशक्षय होते ही आत्मा
स्वतः मुक्त हो जाती है। यह परमशान्ति तो तभी होगी जब इस आत्मा की
क्षणिकता, चैतन्य प्रवाह की गतिशीलता शान्त हो जाय। इस दशा में आत्मा
कहीं जाती नहीं, इसकी आकृति में कोई परिवर्त्तन नहीं होता, प्रत्युत क्लेशक्षय
होते ही स्वयं शान्त हो जाती है। परन्तु बौद्ध दार्शनिकों के अनुसार वह शान्ति
नकारात्मक भी बिल्कुल नहीं कही जा सकती हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त
पर तथागत ने यहं बतलाया कि संसार में प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण उत्पत्ति, स्थिति
और विनष्टि क्रम में सतत प्रगतिशील है। अस्तित्व होना या अस्तित्व नहीं