सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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भी यही है। हममें जो ज्ञानशक्ति है, वह विषयमुक्त हो तो प्रज्ञा बन जाती है
और ऐसी क्रान्ति समाधि से उत्पन्न होती है। प्रज्ञा का साधन समाधि है।
समाधि साधन है, प्रज्ञा साध्य है, प्रेम उस सिद्धि का परिणाम है। प्रज्ञा हो
और प्रेम न हो, यह असंभव है। ज्ञान हो और अहिंसा न हो, यह कैसे हो
सकता है? इसीलिए सौन्दरनन्द में बुद्ध ने अहिंसा को सत्यज्ञान की परीक्षा
माना है। यह परमधर्म है, क्योंकि यह आत्यन्तिक कसौटी है। इसके निष्कर्ष
पर खरा उतरकर ही कोई धर्म खरा साबित होता है। इसी धर्म का प्रचार-
प्रसार अश्वघोष को अपेक्षित है। इसके लिए काव्यों में प्रदत्त उदाहरण की
विज्ञता है, न कि आसक्ति या और कुछ।
( ३ ) अश्वघोष की दार्शनिक मान्यता
अश्वघोष की दार्शनिक मान्यता एक वाक्य में—आनन्द मोक्ष है और मुक्ति
आनन्द है। निश्चय ही मनुष्य की जो परम आकांक्षा है, वह बीजरूप में प्रत्येक
व्यक्ति में प्रसुप्त होनी ही चाहिए, क्योंकि जिस बीज में वृक्ष न छिपा हो, उसमें
अंकुर भी नहीं आ सकता है। हमारी जो चरम कामना है, वही हमारा
आत्यन्तिक स्वरूप भी है। क्योंकि स्वरूप ही अपने पूर्ण विकास में आनन्द
और स्वतंत्रता में परिणत हो सकता है। स्वरूप ही सत्य है और उसकी पूर्ण
उपलब्धि ही संतुष्टिपूर्ण मुक्ति का मार्ग खोलती है। बुद्ध ने कहा है—तृष्णा
दुष्पूर है।
एक बौद्ध दार्शनिक होने के कारण बुद्धचरित में अश्वघोष का स्वर काव्या-
नुभूति की अपेक्षा कुछ अधिक ऊपर उठ गया है। बुद्धचरित का बारहवां सर्ग
तो बौद्धदर्शन के सिद्धान्तों से आच्छन्न है। इस संदर्भ में सांख्यदर्शन से प्रभावित
मुनि अराड का उपदेश द्रष्टव्य है—
'तत्र तु प्रकृतिं नाम विद्धि प्रकृतिकोविद ।
पञ्चभूतान्यहङ्कारं बुद्धिमव्यक्तमेव च ॥' —बु० च० १२।१८
बौद्धदर्शन दुःखवाद के लिए प्रसिद्ध है। बौद्ध दार्शनिक जन्म और जीवन
को दुःख से समवेत मानता है। वह तृषित मानवता को शीतल शान्ति का
जल देता है, दुःखी आत्मा को संवेदना का संदेश देता है। सबकी अज्ञानता
का भार स्वयं वहन करता है। उनके जीवन में इतनी विशालता संभव
है कि उसमें सबके वर्गभेद एकाकार होकर समा जाते हैं। उनकी भावना का
आंचल इतना विशाल है कि उसमें सबके आंसू समा जाते हैं। बौद्ध दार्शनिक
अपने लिए अनागरिक होकर भी संसार के लिए गृही, अपने प्रति वीतराग
होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संसारी होकर भी सबके लिए कर्म-
योगी; क्योंकि वह अपने आपको खोकर ही सब कुछ पाता है। क्योंकि मानव-
जीवन में दुःख की स्थिति इतनी नियत है कि उसके शरीर और चित्त का
स्वभाव उसका अविच्छेद्य धर्म बन जाता है—