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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 496 में से

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( १६ )
भी समझना होगा। प्रत्यक्ष-जगत् में उसका भी मूल्यांकन करना होगा, अन्यथा
किसी भी कवि के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में हमारा सारा ज्ञान अपूर्ण और सारे
साधन-समाधान अधूरे रहेंगे। कोई भी कवि या महाकवि अपनी कृति की पट
भूमिका के पीछे अन्तर्निहित होकर अपने व्यक्तित्व का परिचय देता है।
विषयिप्रधान कृतियों में कवि का व्यक्तित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, परन्तु
विषयप्रधान कृतियों में अन्तःसलिला फल्गु के पानी की तरह उसे खोजने का
प्रयास करना पड़ता है। किसी भी कवि का व्यक्तित्व, उसकी अभिरुचि, उसकी
जीवन सम्बन्धी मान्यता प्रभृति का पता तो उसकी कृति ही बतला देती है।
कवि के इस दोहरे जीवन की तरह उसके समीपवर्ती बाह्य जगत् की सारी
वस्तुओं का उपयोग भी दोहरा है। अपने चिन्तन में कोई कवि अपनी बहि-
र्मुखी वृत्तियों को समेटकर किसी वस्तु के सम्बन्ध में अपना बौद्धिक समाधान
ढूंढता है। अतः कभी-कभी वह इतना एकान्तिक होता है कि अपने से बाहर
प्रत्यक्ष-जगत् के प्रति उस कवि की चेतना पूर्णरूप से जागरूक ही नहीं रहती
और यदि रहती है तो कवि के चिन्तन में बाधक बनकर ही। किसी कवि का
काव्य उसके समग्र जीवन का सजीव चित्र होता है। बुद्धचरित एवं सौन्दरनन्द से
अश्वघोष का व्यक्तित्व स्पष्ट झलकता है। अश्वघोष ने अपनी कृतियों में एक
ओर अपने मानसिक जगत् की दुरूहता को स्पष्ट करते चले हैं, वही दूसरी ओर
अपने बाह्य संसार की समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है। उसकी
कलात्मक अभिरुचि, सौन्दर्यशास्त्रीय मान्यता और पाण्डित्य उसकी बाह्य
स्थिति की व्याख्या है। उसकी धार्मिक सहिष्णुता बौद्धधर्म के मूलतत्त्वों से उसके
संघर्ष का इतिहास है। उसके जीवन के विषय में दार्शनिक मान्यता सृष्टि के
रहस्यमय जीवन का बौद्धिक निरूपण है। संक्षेप में अश्वघोष का समग्र
व्यक्तित्व श्रृंगार की चोटी से हहराकर बहती ऊर्जस्वित करुणा की गंगा, शान्त
सागर बनकर उन्हें स्नपित किया है। उन्हें हम निम्नलिखित शीर्षकों में बाँटकर
देख सकते हैं।
( १ ) धार्मिक उत्साह
अश्वघोष की समग्र रचनाओं में उनका धार्मिक उत्साह स्पष्ट झलकता
है। बौद्धधर्म के प्रचार-प्रसार के सम्बन्ध में हम जिक्र कर चुके हैं। अपनी
सहज विशेषता के कारण यह धर्म और इसकी प्रकृति ने विकल्पित मानव-धर्मों
के विभिन्न प्रभावों को अपने अन्दर इस तरह आत्मसात् कर लिया कि इससे
उसके मौलिक स्वरूप एवं प्राणिधर्म में कोई अन्तर नहीं पड़ा। सबसे रस
ग्रहण कर वह और भी परिपुष्ट हो गया। चूंकि बौद्धधर्म का मूल लक्ष्य
मानवात्मा का संधान था और इस लक्ष्य को ही वह समस्त मानवीय साधनाओं
का आधार मानता था, अतः उसका प्रचार-प्रसार आवश्यक था। इसका
मानसिक और आध्यात्मिक पक्ष इतना प्रबल रहा है कि बौद्धधर्म का प्रसार जिन