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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 496 में से

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पृष्ठ 24

( १८ )
( २ ) पौराणिक ब्राह्मण-धर्म के प्रति सहिष्णु
ब्राह्मणधर्म हजारो वर्षों से भारत के आध्यात्मिक जगत् में प्रमुख स्थान
ग्रहण किये है और इस तथ्य का प्रतीक है कि आत्मविजय, साहस, पवित्रता,
जीवन में एकता और भाईचारे से ही पूर्णता प्राप्त की जा सकती है । यही
आदर्श हमें परमात्मा के चिन्तन में लीन, उपनिषदों के द्रष्टाओं में, अज्ञान और
ईर्ष्या को पराजित करने वाले शान्त एवं सौम्य बुद्ध में आत्मसमर्पण के पश्चात्
सार्वभौम प्रेम में एकाकार हो जाने और ईश्वरभक्त हो जाने तथा आत्मलीन
लालसाओं से ऊपर उठकर परमपिता परमात्मा की इच्छा का पालन इस
पार्थिव जगत् में सदैव करने वाले साधु अश्वघोष के काव्य में उनके आनन्दा-
तिरेक में मिलता है ।
दासगुप्ता ने—'History of Sanskrit Litarature' page 78 में लिखा
है कि—हीनयान शाखा के बौद्धों ने अश्वघोष को पर्याप्त सम्मान नहीं दिया ।
इसका कारण उन्होंने बतलाया है कि एक ओर तो अश्वघोष ने अपना स्वतंत्र
विचार व्यक्त किया है और दूसरी ओर ब्राह्मणधर्म और पौराणिक साहित्य के
प्रति वे अत्यधिक उन्मुख थे । इसके लिए उन्होंने सोन्दरनन्द और बुद्धचरित में
अनेक उदाहरण भी प्रस्तुत किये हैं, किन्तु दासगुप्ता का यह कथन गले से नीचे
नहीं उतरता । निश्चय ही अश्वघोष ब्राह्मण थे । प्रारंभिक जीवन में उन्होंने गम्भी-
रतापूर्वक ब्राह्मणधर्म का अध्ययन किया था । यह भी सत्य है कि अश्वघोष के
समय तक पुराणों का वर्त्तमान रूप पल्लवित हो चुका था । पौराणिक गाथाएँ
भी उस समय तक पर्याप्त ख्याति पा चुकी थी । रामायण-महाभारत की कथाएँ
लोक-प्रचलित हो चुकी थी । अश्वघोष एक बहुज्ञ, शास्त्रज्ञ, ब्राह्मणधर्मवेत्ता,
विशिष्ट किन्तु स्वतन्त्र विचारक कवि थे । ब्राह्मणधर्म भी अपने आप में एक
विशिष्ट धर्म था, जो किसी भी विश्वास-विशेष के लिए दुराग्रह नहीं करता, जो
सहिष्णुता, स्वाधीन चिन्तन एवं वैयक्तिक स्वतंत्रता के संसार में सबसे बड़ा
हामी रहा है । ईश्वर को मानो या न मानो, उपासना साकार की करो या
निराकार की, अनेक देवताओं में विश्वास रखो या फिर किसी भी देवता को
मत मानो, किन्तु यदि तुम पौराणिक ब्राह्मणधर्मी बने रहना चाहते हो तो
हिन्दू समाज से कोई तुम्हें भी नहीं निकालेगा; इतनी स्वतंत्रता और छूट अपने
अनुयायियों को संसार के किसी भी धर्म ने नहीं दी है । यही कारण है कि
अश्वघोष ने पूर्वार्जित ज्ञान का अपने काव्यों में यत्र-तत्र प्रयोग किया है । सांख्य
दर्शन के तो उदाहरणों से बुद्धचरित का वर्णन भरा पड़ा है । बुद्धचरित के
प्रथम सर्ग पद्य ४१-४५ तथा चतुर्थ सर्ग ७२-७८ श्लोक दर्शनीय है । इसी
तरह सोन्दरनन्द में पौराणिक उपाख्यानों की अभिव्यक्ति दर्शनीय है—
‘सूर्यः सरण्यूं प्रति जातरागस्तत्प्रीतये तष्ट इति श्रुतं नः ।
यामश्वभूतोऽश्ववधूं समेत्य यतोऽश्विनौ तौ जनयाम्बभूव ॥'—सौ० न० ७।२६