सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 23, कुल 496 में से
संदर्भ में पढ़ें( १७ )
देशों में हुआ, वहाँ न तो इसके लिए राज्यजय की आवश्यकता हुई और न
शोषण या परस्वापहरण की। एशिया के विभिन्न देशों में बौद्धधर्म की दिग्वि-
जय की कहानी हम इतिहास-ग्रंथों में पढ़ते हैं। एक ओर सुदूर पूर्व और दूसरी
ओर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों में बौद्धधर्म का व्यापक प्रचार
एवं विस्तार हुआ। अनेक जातियां इनके सम्पर्क में आईं और उनकी राज-
नीति, आचार-व्यवहार, धर्मानुष्ठान, साहित्य और दर्शन पर इसका गहरा
प्रभाव पड़ा। बौद्धधर्म ने चीन जैसे सुसभ्य देश के धार्मिक उत्साह में भी एक
अपूर्व परिवर्तन ला दिया। इस धर्म से चीन की मानवीयता और भी विकसित
एवं समृद्ध हुई। बौद्धधर्म के अवदानों से चीन के उच्चादर्शों को गहरी प्रेरणा
मिली। मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष-लाभ किया।
भगवान् बुद्ध के उपदेशों को अधिकाधिक लोगों के पास तक पहुँचाना
अश्वघोष का मूल उद्देश्य था। भारतीय पण्डित समाज जनभाषा में लिखे बुद्ध
के उपदेशों को हेय दृष्टि से देखते थे। अश्वघोष ने संस्कृत और परिनिष्ठित
भाषा में काव्य के माध्यम से उन लोगों तक पहुँचाने के अपने लक्ष्य की सम्पूर्ति
में सफलता प्राप्त की। इनके महाकाव्यों को पढ़ने, जानने और समझने की
चेष्टा करने पर स्पष्ट पतां चलता है कि अश्वघोष न केवल दार्शनिक या कोरे
पण्डित हैं बल्कि भगवान् बुद्ध के प्रति इनकी अपूर्व आस्था है, अनन्य भक्ति है
और आमूलचूल श्रद्धा है। उनके शब्द-शब्द में इस रससिद्ध कवि के हृदय की
भक्ति-गंगा की तरलता विद्यमान है। अश्वघोष का अन्तःस्रावी समुत्साह धार्मिक
निष्ठा भक्ति की डोरी में गूंथकर इतनी गहरी भावात्मक बन गई है कि उनकी
रचनाएँ काव्यत्व की गंगा स्वयं सर्वकल्याणी बन गई है। इनके धार्मिक उत्साह
का एक महत् एवं उदात्त पक्ष भी है, जिसे हम आदर्श कहते हैं। इनसे भी
ऊपर उठकर जब पाठक का मन इनकी कृतियों में सुगुम्फित अध्यात्म, बौद्ध-
दर्शन एवं धर्म के क्षेत्र में विचरण करने लगता है, उस समय वह कुछ क्षण के
लिए ही सही—सारे संसार को भूल जाता है और महत् धर्म की प्रेरणा उसके
दृष्टिकोण को व्यापक, उसकी अनुभूति को गंभीर और उसके हृदय को
विशाल बना देती है। प्रेम, शौर्य, सहानुभूति, प्राणिजगत् के प्रति मैत्रीभाव,
ज्ञान, उदारता, करुणा तथा क्षमा की भावना मन में हिलोरे मारने लगती है।
अश्वघोष के धार्मिक उत्साह से हमारे मन में महत् आदर्शों की सृष्टि होती
है और उन आदर्शों को चरितार्थ करने के लिए हम बड़ा से बड़ा त्याग करने
को तैयार हो जाते हैं। मानव-जीवन की प्रधान साधनाएँ भी तो यही हैं।
इन साधनाओं के क्षेत्र में मनुष्य मनुष्य में कोई भेद नहीं रह जाता और यही
है अश्वघोष का धार्मिक उत्साह, जिसे हम इनके काव्यों में बेदाग परख
सकते हैं।