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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 496 में से

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होता है कि अश्वघोष से पूर्व ही संस्कृत नाटकों का वह रूप स्थिर हो चुका
था, जिनका परिष्कृत रूप ही हमें परवर्त्ती साहित्य में उपलब्ध होता है।
नाटकीय नियमानुसार भिन्न-भिन्न पात्र सामाजिक स्थिति के आधार पर भिन्न-
भिन्न प्राकृतों का प्रयोग करते हैं। दृष्ट की प्राकृतिक मागधी से, गोयम की
अर्द्धमागधी से और विदूषक की प्राकृत उक्त दोनों के मिश्रण से मिलती-जुलती
है। शारिपुत्र-प्रकरण तथा इनके अन्य रूपकों की शैली बुद्धचरित एवं सौन्दरा-
नन्द की शैली से मिलती है। यह भी एक कारण है कि ये सभी एक ही कवि
के कर्त्तृत्व का संकेत करते हैं। इनका एक उदाहरण द्रष्टव्य है—
'खे वर्षत्यम्बुधारं ज्वलति च युगपत् सन्ध्याम्बुद इव ।'
सौन्दरनन्द के इस तरह की शैली और उपमा का साम्य ही एककर्तृत्व
सिद्ध करता है। सांध्यकालीन बादल जहाँ एक ओर जल वर्षाता है वहीं
दूसरी ओर अस्तंगमित सूर्यं की किरणों के संस्पर्श से आग की तरह जलता
प्रतीत होता है। ठीक उसी तरह वह तेजस्वी करुणार्द्र था। अश्वघोष की
सारी कृतियों में शृंगार और करुण से पुष्ट होकर शान्त रस खिल उठा है, जो
बौद्ध संस्कृति का सर्वस्व है।
अश्वघोष के पश्चात् काव्यशैली में महान् परिवर्तन आया। यह नवीन
काव्यशैली राजसभाओं में विकसित हुई। जैसे-जैसे समय बीतता गया कालि-
दास की स्वाभाविकता कृत्रिमता में बदलती गई। परवर्ती काव्यों में शृङ्गार-
वर्णन की ओर विशेष प्रवृत्ति हुई। भाषा में क्लिष्टता एवं समासों का बाहुल्य
हो गया। प्रतिपाद्य विषय की अपेक्षा भाषा, शैली, अलंकार वर्णन आदि बाह्य
रूपरङ्ग और वैदग्ध्य ने ले लिया।
अश्वघोष का व्यक्तित्व
'सौन्दरनन्द' महाकाव्य के महाकवि 'अश्वघोष' हैं। आपके काव्यग्रंथ
संस्कृत जगत् में यथोचित सम्मान पा चुके हैं। आपका व्यक्तित्व आपकी
कृतियों में स्पष्ट झाँक रहा है। किसी कवि के लिए सामान्य यह बाह्य संसार
ही उसके जीवन को यदि पूर्ण कर देता तो शेष प्राणिजगत् की तरह वह भी
बहुत सारी जटिल समस्याओं से बच जाता, किन्तु कवि के लिए यह संभव
नहीं है। उसकी देह में जैसा भौतिक जगत् का चरम विकास है, उसकी
चेतना भी उसी प्रकार सामान्य जन की चेतना का उत्कृष्टतम रूप है।
किसी कवि का निरन्तर परिष्कृत होता चलने वाला यह मानसिक-जगत्
वस्तु-जगत् के संघर्ष से प्रभावित होता है। उसके संकेतों में अपनी अभिव्यक्ति
चाहता है, किन्तु उनके बन्धनों को पूर्णतः स्वीकार नहीं करना चाहता। अतः
जो कुछ प्रत्यक्ष है, उसे ही किसी कवि का व्यक्तित्व नहीं कहा जा सकता—
उसके साथ-साथ उसका जितना विस्तृत और गतिशील अप्रत्यक्ष जीवन है, उसे