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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 496 में से

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पृष्ठ 25

( १९ )
इस सर्ग की श्लोक सं० २७ से ४५ तक ऐसे ही पौराणिक उपाख्यानों के
उदाहरण प्रसंग को सशक्त बनाने के लिए ही दिये गये । उदाहरण किसी भी
स्थिति में किसी भी व्यक्ति की बहुज्ञता के अतिरिक्त आसक्ति नहीं कही जा
सकती है। इसी तरह जब छन्दक बुद्ध को वन में अकेले छोड़कर लौट आये तो
सारी प्रजा ने उसी तरह आँसू गिराये, जैसे पहले राम के वनगमन पर सुमन्त
के लौटने पर अयोध्या की प्रजा रोई थी—
‘मुमोच वाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते ।'
—बुद्धचरित ८।८
इसी तरह शिव-विजय की एक घटना का पौराणिक संकेत—
'शैलेन्द्रपुत्रीं प्रति येन विद्धो देवोऽपि शम्भुश्चलितो बभूव ।
न चिन्तयत्येष तमेव वाणं किं स्यादचित्तेन शरः स एषः ॥'
—बुद्धचरित १३।१६
इस प्रकार बुद्धचरित एवं सौन्दरनन्द के अनेकों पद्यों में रामकथा शिव-
पार्वतीकथा, स्वर्ग, इन्द्र, देवता, अप्सराएं आदि की चर्चा भरी पड़ी है। इसका
यह अर्थ कदापि नहीं कि अश्वघोष बौद्धधर्मावलम्बी नहीं थे। वे हृदय से बुद्ध के
भक्त थे। बौद्ध सिद्धान्तों में उनकी अनन्य निष्ठा थी। ब्राह्मणधर्म के वे ज्ञाता
थे। अतः साधिकार प्रासंगिक क्रम में उन्होंने उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। भगवान्
सुगत के विचारों और मान्यताओं का जमकर उन्होंने अध्ययन-मनन किया
था और तदनुकूल उन्हें अपने आचरण में उतारने की चेष्टा की है।
भगवान् बुद्ध के लिए केवल वैदिक हिंसा अमान्य थी। हिंसा तो अहिंसा
का अभाव है। अहिंसा के वह विपरीत है। अहिंसा हिंसा से भिन्न है, विपरीत
नहीं। सुगत की अहिंसा तो प्रेम की प्रतिमूर्ति है। उन्होंने जब समाधि को
साधा तब जाना कि भीतर सोये हुए प्रेम के अनन्त झरने अनायास ही सहज
और सक्रिय हो उठे हैं। यह प्रेम तो उनके हृदय में था और सहज ही प्रवा-
हित हो रहा था अहिंसा के माध्यम से। जैसे दीए से प्रकाश बहता है और
फूलों से सुगन्ध, वैसे ही उनके हृदय में जीवों के प्रति प्रेम बह रहा था। बोध
के उस अद्भुत क्षण में उन्होंने जाना था कि यह प्रेम तो उनके स्वभाव का
प्रकाश था। आत्मा की स्फुरणा थी। यह प्रेम हृदय के अभिनव ऊर्जा का
सद्भाव था। यह ऊर्जा स्वयं से सर्व के प्रति बहती थी, स्वयं से स्फुरित होकर,
मैत्रीधर्म से अनुप्राणित होकर वह जीवमात्र को एक ही सूत्र में पिरोती थी।
इस प्रकार बुद्ध की अहिंसा सबके लिए सबको सोचने और कर्म करने की
प्रेरणा भी प्रदान करती थी। उनका प्रेम या 'मैत्रीधर्म' का तात्पर्य केवल
मानव से मानव की मैत्री नही थीं, अपितु मानव अपने स्वाभाविक वैरी—शेर,
सांप, हिंसक जन्तु प्रभृति के प्रति भी मैत्रीभावना प्रबल रखे—यही बुद्ध का
संदेश है। बुद्ध का प्रेम प्रज्ञा का परिणाम है। किसी भी धर्म की मूल जिज्ञासा