पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १५
पिउ पिउ करै पुकार जगत को प्रेम दिखावै ।
कहवै कथा पुरान पिया को तनिक न भावै ॥
खिन रोवै खिन हँसै ज्ञान की बात बतावै ।
आप न रीझै भाँड़ और को बैठि रिझावै ॥
सुनै न वा की बात तनिक जो अंतर जानी ।
चाहै भेटा पीव चलै ना सुपथ रहानी ॥
पलटू ऊपर से कहै भीतर भरा बिकार ।
पिसनो पीसै राँड़ री पिव पिव करै पुकार ॥
( ३७ )
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
सन असंत है एक काट के जल में सारै ।
कूँचै खैंचै खाल उपर से मुँगरा मारै ॥
तेकर बटि के भाँजि भाँजि के बरतै रसरा ।
नर की बाँधै मुसुक बाँधते गउ और बछरा ॥
अमरजाल फिर होय बझावै जलचर १ जाई ।
खग मृग जीवा जंतु तेही में बहुत बझाई ॥
जिव दे जिव संतावते २ पलटू उन की टेक ।
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
( ३८ )
बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बजार ॥
बैठी बीच बजार नजारा सब से मारै ।
बातैं मीठी करै सभन की गाँठि निहारै ॥
चोवा चंदन लाइ पहिरि के मलमल खासा ।
पंचभतारी भई करै औरन की आसा ॥
लेइ खसम को नाँव खसम से परिचै नाहीं ।
(१) जल में रहने वाले जीव जन्तु । (२) दूसरे जीव को सताने के निमित्त
अपने जीव पर कष्ट सहते हैं ।
बेचि बड़न को नाँव सभन को ठगि ठगि खाही ॥
पलटू तेकर बात है जेकरे एक भतार ।
बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बजार ॥
( ३६ )
हवा हिरिस पलटू लगी नाहक भये फकीर ॥
नाहक भये फकीर पीर की सेवा नाहीं ।
अपने मुँह से बड़े कहावैं सब से जाहीं ॥
धमधूसर होइ रहे बात में सब से लड़ते ।
लाम काफ१ वो कहैं इमान को नाहीं डरते ॥
हमहीं हैं दुरवेस२ और ना दूसर कोई ।
सब को देहिं मुराद यकीन से ओकरे होई ॥
मन मुरीद होवै नहीं आप कहावैं पीर ।
हवा हिरिस पलटू लगी नाहक भये फकीर ॥
( ४० )
जौं लगि फाटै फिकिर ना गई फकीरी खोय ॥
गई फकीरी खोय लगी है मान बड़ाई ।
मोर तोर में परा नाहिं छूटी दुचिताई ॥
दुख सुख संपति बिपति सोच दोऊ की लागी ।
जीवन की है चाह मरन की डेर नहिं त्यागी ॥
कौड़ी जिव के संग रैन दिन करै कलपना ।
दुष्ट३ कहै दुख देइ मित्र को जानै अपना ॥
पलटू चिन्ता लगी है जनम गँवाये रोय ।
जौं लगि फाटै फिकिर ना गई फकीरी खोय ॥
॥ चितावनी ॥
( ४१ )
क्या सोवै तू बावरी चाला जात बसंत ॥
चाला जात बसंत कंत ना घर में आये ।
(१) गाली देना । (२) सच्चे फकीर । (३) शत्रु ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १७
धृग जीवन है तोर कंत बिन दिवस गँवाये ॥
गर्ब गुमानी नारि फिरै जोवन की माती ।
खसम रहा है रूठि नहीं तू पठवै पाती ॥
लगै न तेरो चित्त कंत को नाहिं मनावै ।
का पर करै सिंगार फूल की सेज बिछावै ॥
पलटू ऋतु भरि खेलि ले फिर पछितैहै अंत ।
क्या सोतूवै बावरी चाला जात बसंत ॥
( ४२ )
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
बीती जात बहार सम्बत लगने पर आया ।
लीजै डफ्फ बजाय सुभग मानुष तन पाया ॥
खेलो घूँघट खोलि लाज फागुन में नाहीं ।
जे कोउ करिहै लाज काज ना सपनेहुँ नाहीं ॥
प्रेम की माट भराय सुरति की करु पिचकारी ।
ज्ञान अबीर बनाय नाम की दीजै गारी ॥
पलटू रहना है नहीं सपना यह संसार ।
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
( ४३ )
तू क्यों गफलत में फिरै सिर पर बैठा काल ॥
सिर पर बैठा काल दिनो दिन वादा पूजै ।
आज काल में कूच मूरख नहिं तोकँह सूझै ॥
कौड़ी कौड़ी जोरि ब्याज दे करते बट्टा ।
सुखी रहै परिवार मुक्ति में होवत ठट्ठा ॥
तू जानै मैं ठग्यो आप को तुही ठगावै ।
नाम संजीवन मूर छोरि के माहुर खावै ॥
पलटू सेखी ना रही चेत करो अब लाल ।
तू क्यों गफलत में फिरै सिर पर बैठा काल ॥
३
१८ कुंडलिया
( ४४ )
गरमै गरमै हेलुवा गंफा लीजै मारि ॥
गंफा लीजै मारि मनुष तन जात सिराना ।
भजि लीजै भगवान काल सिर पर नियरना ॥
मीठा है हरि नाम जियन का नाहिं भरोसा ।
खाय लेहु भरि पेट आगे से जात परोसा ॥
लीजै लाहा लूटि दिना दुइ संतन पासा ।
अज हूँ चेत गँवार जात है खाली स्वासा ॥
पलटू अटक न कीजिये कूच है साँझ सकारि ।
गरमै गरमै हेलुवा गंफा लीजै मारि ॥
( ४५ )
सुर नर मुनि जोगी जती सबै काल बसि होय ॥
सबै काल बसि होय मौत कालौ की होती ।
पारब्रह्म भगवान मरै ना अबिगत जोती ॥
जा को काल डेराय ओट ताही की लीजै ॥
काल की कहा बसाय भक्ति जो गुरु की कीजै ॥
जरामरन मिटि जाय सहज में औना जाना ।
जपि कै नाम अनाम संत जन तत्व समाना ॥
बेद धनंतर मरि गया पलटू अमर न कोय ।
सुर नर मुनि जोगी जती सबै काल बसि होय ॥
( ४६ )
चोला भया पुराना आज फटै की काल ॥
आज फटै की काल तेहू पै है ललचाना ।
तीनों पन गे बीत भजन का मरम ना जाना ॥
नख सिख भये सफेद तेहू पै नाहीं चेतै ।
जोरि जोरि धन धरै गला औरन का रेतै ॥
अब का करिहौ यार काल ने किहा तगादा ।
पलटू साहिब की बानी भाग-१ १८
चलै न एकौ जोर आय जब पहुँचा वादा ॥
पलटू तेहु पै लेत है माया मोह जँजाल ।
चोला भया पुराना आज फटै की काल ॥
( ४७ )
धूआँ का धौरेहरा ज्यों बालू की भीत ॥
ज्यों बालू की भीत ताहि को कौन भरोसा ।
ज्यों पक्का फल डारि गिरत से लगै न दोसा ।
कच्चे घड़े ज्यों नीर पानी के बीच बतासा ।
दारू१ भीतर अगिनि जिवन की ऐसी आसा ॥
पलटू नर तन जात है घास के ऊपर सीत ।
धूआँ का धौरेहरा ज्यों बालू की भीत ॥
( ४८ )
यही दिदारी दार२ है सुनहु मुसाफिर लोग ॥
सुनहु मुसाफिर लोग भेट फिर बहुरि न होना ।
को तुम को हम आय मिले सपने मैं सोना ॥
हिल मिल दिन दस रहे ताहि को सोच न कीजै ।
कोऊ है थिर नाहिं दोस ना हम को दीजै ॥
अहिर बाँधि के गाय एक लेहड़े में आनी ।
कूँवाँ की पनिहारि गई ले घर घर पानी ॥
पलटू मखरी आम ज्यों नदी नाव संजोग ।
यही दिदारी दार है सुनहु मुसाफिर लोग ॥
( ४६ )
आग लगी लंका दहै उनचासौ बही बयार ॥
उनचासौ बही बयार ताहि को कौन बचावै ।
घर के प्रानी रहे सोऊ आगी गुहरावैं ॥
फूटी घर की नारि सगा भाई अलगाना ।
(१) लकड़ी । (२) सराय ।
२० | कुंडलिया
बड़े मित्र जो रहे भये सब सत्रु समाना ॥
कंचन कौ सब नगर रती कौ रावन तरसै ।
दिया सिन्धु ने थाह ऊपर से पर्वत बरसै ॥
पलटू जेहि ओर राम हैं तेहि ओर सब संसार ।
आग लगी लंका दहै उनचासौ बही बयार ॥
( ५० )
भजन आतुरी¹ कीजिये और बात में देर ॥
और बात में देर जगत में जीवन थोरा ।
मानुष तन धन जात गोड़ धरि करौ निहोरा ॥
काँचे महल के बीच पवन इक पंछी रहता ।
दस दरवाजा खुला उड़न को नित उठि चहता ॥
भजि लीजै भगवान एहा में भल है अपना ।
आवागौन छुटि जाय जनम की मिटै कलपना ॥
पलटू अटक न कीजिये चौरासी घर फेर ।
भजन आतुरी कीजिये और बात में देर ॥
( ५१ )
यही समय गुरु पाँय में गोता लीजै खाय ॥
गोता लीजै खाय नाम के सरवर² माहीं ।
अवधि आइ नगिचान दाँव फिर ऐसा नाहीं ॥
मानुष तन सकराँत महोदधि³ जात सिरानी ।
ऐसी परबी पाइ नहीं तुम महिमा जानी ॥
सतसंगत के घाट पैठि कै कर असनाना ।
तन मन दीजै दान बहुरि नहिं औना जाना ॥
पलटू बिलम न कीजिये ऐसा औसर पाय ।
यही समय गुरु पाँय में गोता लीजै खाय ॥
(१) जल्दी, बिना टाल टूल के । (२) तालाब । (३) नदी, समुद्र ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ २१
( ५२ )
भया तगादा साहु का गया बहाना भूल ॥
गया बहाना भूल नफा में मूर गँवाया ।
भया साहु से झूठ बैठि के पूँजी खाया ॥
नहीं लिहा हरि नाम करी नहिं संतन सेवा ।
तीनों पन गये बीत पूजते देवी देवा ॥
सारी सरहज सास धाइ के लूटि मजा री ।
तुम्हरे सीस बिसान कोऊ ना संग तुम्हारी ॥
पलटू मानै काल ना कठिन चलावै सूल ।
भया तगादा साहु का गया बहाना भूल ॥
( ५३ )
काल महासिल¹ साहु का सिर पर पहुँचा आय ॥
सिर पर पहुँचा आय उजुर कछु एकौ नाहीं ।
पहुँचा धै अगुआय² लिहे धरि मारत जाही ॥
मार परे भा चेत लगा तब करन बिचारा ।
मूरख के परसंग बैठि कै बात बिगारा ॥
चलै न एकौ जोर बहाना का को लेवै ।
नहीं ब्याज नहि मूर साहु को का लै देवै ॥
पलटू वादा³ टरि गया पूँजी गई वराय⁴ ।
काल महासिल साहु का सिर पर पहुँचा आय ॥
( ५४ )
ज्यों ज्यो सूखै ताल है त्यों त्यों मीन मलीन ॥
त्यों त्यों मीन मलीन जेठ में सूख्यो पानी ।
तीनों पन गये बीति भजन का मरम न जानी ॥
कँवल गये कुम्हिलाय हंस ने किया पयाना ।
(१) तहसील करने वाला सिपाही । (२) पहुँचा पकड़ कर आगे कर लिया
जिस में भाग न सकें । (३) इकरार । (४) चुक गई ।
२२ कुंडलिया
मीन लिया कोउ मारि ठाँव ढेला चिहराना१ ॥
ऐसी मानुष देह बृथा में जात अनारी ।
भूला कौल करार आप से काम बिगारी ॥
पलट बरस औ मास दिन पहर घड़ी पल छीन ।
ज्यों ज्यों सूखै ताल है त्यों त्यों मीन मलीन ॥
( ५५ )
बूड़ी जात जहाज है नाम निवर्तिक२ बोल ॥
नाम निवर्तिक बोल हाथ से तेरे जाती ।
माँझ धार में फटी सूम की जोगवै थाती ॥
ऐसे मूरख लोग लालच में जनम गँवावैं ।
गई हाथ से चीज तेहू पर लेखा लावैं ॥
कंठा रूँधन भये मोह में लागा अजहूँ ।
कीन्हे प्रान पयान नाम ना सुमिरे तबहूँ ॥
पलटू नर तन रतन सम भा कौड़ी के मोल ।
बूड़ी जात जहाज है नाम निवर्तिक बोल ॥
॥ भक्ति ॥
( ५६ )
एक भक्ति मैं जानौं और झूठ सब बात ॥
और झूठ सब बात करै हठजोग अनारी ।
ब्रह्म दोष वो लेय काया को राखै जारी ॥
प्रान करै आयाम कोई फिर मुद्रा साधै ।
धोती नेती करै कोई लै स्वासा बाँधै ॥
उनमुनि लावै ध्यान करै चौरासी आसन ।
कोई साखी सबद कोइ तप कुस कै डासन ॥
पलटू सब परपंच है करै सो फिर पछितात ।
(१) पानी के सूख जाने पर तलैया की तली फट कर मट्टी के थक्के बन जाते
हैं। (२) बचाने वाला ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ २३
एक भक्ति मैं जानौं और झूठ सब बात ॥
( ५७ )
संत न चाहें मुक्ति को नहीं पदारथ चार ॥
नहीं पदारथ चार मुक्ति संतन की चेरी ।
ऋद्धि सिद्धि पर थुकैं स्वर्ग की आस न हेरी ॥
तीरथ करहिं न बर्त नहीं कछु मन में इच्छा ।
पुन्य तेज परताप संत को लगै अनिच्छा ॥
ना चाहें बैकुंठ न आवागवन निवार ।
सात स्वर्ग अपबर्ग तुच्छ सम ताहि बिचारा ॥
पलटू चाहै हरि भगति ऐसा मता हमार ।
संत न चाहें मुक्ति को नहीं पदारथ चार ॥
( ५८ )
ऐसी भक्ति चलावै मची नाम की कीच ॥
मची नाम की कीच बूढ़ा औ बाला गावै ।
परदे में जो रहै सब्द सुनि रोवत आवै ॥
भक्ति करै निरधार रहै तिर्गुन से न्यारा ।
आवै देय लुटाय आपु ना करै अहारा ॥
मन सब को हरि लेय सभन को राखै राजी ।
तीन देख ना सकै बैरागी पंडित काजी ॥
पलटूदास इक बानिया रहै अवध के बीच ।
ऐसी भक्ति चलावै मची नाम की कीच ॥
॥ प्रेम ॥
( ५६ )
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठी बोल ॥
पिय की मीठी बोल सुनत मैं भई दिवानी ।
भँवरगुफा के बीच उठत है सोहं बानी ॥
दखा पिय का रूप रूप में जाय समानी ।
२४ कुंडलिया
जब से भया मिलाप मिले पर ना अलगानी ॥
प्रीत पुरानी रही लिया हम ने पहिचानी ।
मिली जोत में जोत सुहागिन सुरत समानी ॥
पलटू सब्द के सुनत ही घूँघट डारा खोल ।
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठी बोल ॥
( ६० )
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
आपुइ गई हिराय कवन अब कहै सँदेसा ।
जेकर पिय में ध्यान भई वह पिय के भेसा ॥
आगि माहिं जो परै सोऊ अग्नी ह्वै जावै ।
भृङ्गी कीट को भेंट आपु सम लेइ बनावै ॥
सरिता बहि के गई सिन्धु में रही समाई ।
सिव सक्ती के मिले नहीं फिर सक्ती आई ॥
पलटू दिवाल कहकहा १ मत कोउ झाँकन जाय ।
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
( ६१ )
मगन भई मेरी माइजी जब से पाया कंथ ॥
जब से पाया कंथ पंथ सतगुरु बतलाया ।
सतगुरु बड़े दयाल करी उन मो पर दाया ॥
स्वस्ता २ मन में आइ छुटी मेरी दुचिताई ।
सोऊँ कंथ के साथ अंग से अंग लगाई ॥
अभ्यन्तर ३ जागी प्रीत निरन्तर कंथ से लागी ।
दरस परस के करत जगत की भ्रमना भागी ॥
पलटू सतगुरु सब्द सुनि हृदय खुला है ग्रंथ ।
(१) एक दीवार कहानी की जिसका होना चीन देश में मशहूर है जिस
पर चढ़ कर दूसरी ओर झाँकने से परिस्तान दीख पड़ता है और ऐसा हर्ष होता है
कि हँसी के मारे देखने वाला बेइख्तियार होकर उधर कूद कर गायब हो जाता है ।
(२) शांति । (३) अंतर में ।
मगन भई मेरी माइजी जब से पाया कंथ ॥
( ६२ )
आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर ॥
जैसे चन्द चकोर पलक से टारत नाहीं ।
चुगै बिरह से आग रहै मन चन्दै माहीं ॥
फिरै जेही दिस चंद तेही दिसि को मुख फेरै ।
चन्दा जाय छिपाय आग के भीतर हेरै ॥
मधुकर तजै न पदम जान से जाइ बँधावै१ ।
दीपक में ज्यों पतंग प्रेम से प्रान गँवावै ॥
पलटू ऐसी प्रीत कर परधन चाहै चोर ।
आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर ॥
( ६३ )
अम्मा मेरा दिल लगा मुझ से रहा न जाय ॥
मुझ से रहा न जाय बिना साहिब को देखे ।
जान तसद्बुक२ करौं लगै साहिब के लेखे ॥
मुझ को भया है रोग जायगा जीव हमारा ।
एकर दारु यही मिलै जो प्रीतम प्यास ॥
पड़ा प्रेम जंजाल जिकिर३ सीने में लागी ।
मैं गिरि परी बेहोस लोक की लज्जा भागी ॥
पलटू सतगुरु बैद बिन कौन सकै समझाय ।
अम्मा मेरा दिल लगा मुझ से रहा न जाय ॥
( ६४ )
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहिं ॥
सहज आसिकी नाहिं खाँड़ खाने को नाहीं ।
(१) रात को जब कमल सम्पुट अर्थात् बन्द होने लगता है तो भवँरा जो उस पर आसक्त है उड़ कर भागता नहीं बरन उसी के भीतर बन्द हो जाता है ।
(२) न्यौछावर । (३) सुमिरन ।
४
२६ कुंडलिया
झूठ आसिकी करै मुलुक में जूती खाही ॥
जीते जी मरि जाय करै ना तन की आसा ।
आसिक को दिन रात रहै सूली पर बासा ॥
मान बड़ाई खोय नींद भर नाहीं सोना ।
तिल भर रक्त न माँस नहीं आसिक को रोना ॥
पलटू बड़े बेकूफ वे आसिक होने जाहिं ।
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहिं ॥
( ६५ )
भूली जग की चाल सब भई जोगिनि अलमस्त ॥
भई जोगिनि अलमस्त खबर कछु तन की नाहीं ।
खाय पियै अब कौन रहै मन भजनै माहीं ॥
ऐसी लागी नेह तुरिया से भई अतीता ।
आठ पहर गलतान जोति के घर को जीता ॥
है गइ दसा अरूढ़ ज्ञान तजि भई बिज्ञानी ।
धरती नभ जरि गई जरा है पवन औ पानी ॥
पलटू दिनकर उदय भा रजनी है गई अस्त ।
भूली जग की चाल सब भई जोगिनि अलमस्त ॥
( ६६ )
फनि से मनि ज्यों बीछुरै जल से बिछुरै मीन ॥
जल से बिछुरै मीन प्रान को तुरत गँवावै ।
रहै न कोटि उपाय दूध के भीतर नावै ॥
ऐसी करै जो प्रीति ताहि की प्रीति सराहो ।
बिछुरे पर नर जियै प्रीति वाहू की नाहीं ॥
पटकि पटकि तन रहै बिछोहा सहा न जाई ।
नैन ओट जब भये प्रान को संग पठाई ॥
पलटू हरि से बीछुरे ये ना जीवैं तीन ।
फनि से मनि जो बीछुरे जल से बिछुरै मीन ॥
पलटू साहिब की बानी भाग—१ २७
( ६७ )
प्रेम बान जा के लगा सो जानैगा पीर ॥
सो जानैगा पीर काह मूरख से कहिये ।
तिल भरि लगै न ज्ञान ताहि से चुप है रहिये ॥
लाख कहै समुझाय बचन मूरख नहिं मानै ।
तासे कहा बसाय ठान जो अपनी ठानै ॥
जेहि के जगत पियार ताहि से भक्ति न आवै ।
सतसंगति से बिमुख और के सन्मुख धावै ॥
जिन कर हिया कठोर है पलटू धसै न तीर ।
प्रेम बान जा के लगा सो जानैगा पीर ॥
( ६८ )
अपने पिय की सुन्दरी लोग कहैं बौरान ॥
लोग कहैं बौरान काहि की पकरौं बानी ।
घर घर घोर मथान फिरौं मैं नाम दिवानी ॥
घूँघट डारेउँ खोलि ज्ञान कै ढोल बजाई ।
चढ़िउँ बाँस पर धाइ सहर के बिचै गड़ाई ॥
देखि देखि सब चिढ़ें लोग मैं अधिक चिढ़ावौं ।
लगी गुरु से डोरि मगन है ताहि रिझावौं ॥
पलटू हमरे देस की जानैं संत सुजान ।
अपने पिय की सुन्दरी लोग कहैं बौरान ॥
( ६६ )
सतगुरु सब्द के सुनत ही तन की सुधि रहि जात ॥
तन की सुधि रहि जात जाय मन अंतै अटका ।
बिसरी भूख पियास किया सतगुरु ने टोटका¹ ॥
दतुइन करी न जाय नहीं अब जाय नहाई ।
बैठा उठा न जाय फिरी अब नाम दुहाई ॥
(१) जादू ।
कौन बनावै भेष कौन अब टोपी देवै ।
बिसरा माला तिलक कौन अब दर्पन लेवै ॥
पलटू झुका है आपु को मुख से भली बात ।
सतगुरु सब्द के सुनत ही तन की सुधि रहि जात ॥
( ७० )
की तौ इक ठौरै रहै की दुइ में इक मरि जाय ॥
दुइ में इक मरि जाय रहत है दुबिधा लागी ।
सुचित नहीं दिन रात उठत बिरहा की आगी ॥
तुम जीवो भगवान मरन है मेरो नीका ।
तुम बिन जीवन धिक्क लगे कारिख को टीका ॥
की तुम आवो इहाँ लेव की प्रान अपाना ।
दोऊ को दुख होय हस जोड़ी अलगाना ॥
कह पलटू स्वामी सुनो चिन्ता सही न जाय ।
की तौ इक ठौरै रहै की दुइ में इक मरि जाय ॥
( ७१ )
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ॥
खाला का घर नाहिं सीस जब धरै उतारी ।
हाथ पाँव कटि जाय करै ना संत करारी१ ॥
ज्यों ज्यों लागै घाव तेहुँ तेहुँ कदम चलावै ।
सूरा रन पर जाय बहुरि ना जियता आवै ॥
पलटू ऐसे घर मँहैं बड़े मरद जे जाहिं ।
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ॥
( ७२ )
आसिक का घर दूर है पहुँचै बिरला कोय ॥
पहुँचै बिरला कोय होय जो पूरा जोगी ।
बिंद२ करै जो छार नाद के घर में भोगी ॥
(१) ठहराव, रोक । (२) काम को जला कर खाक कर डाले ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ २६
जीते जी मरि जाय मुए पर फिर उठि जागै ।
ऐसा जो कोइ होइ सोई इन बातन लागै ॥
पुरजे पुरजे उड़ै अन्न बिनु बस्तर पानी ।
ऐसे पर ठहराय सोई महबूब¹ बखानी ॥
पलटू आपु लुटावही काला मुँह जब होय ।
आसिक का घर दूर है पहुँचै बिरला कोय ॥
( ७३ )
जहाँ तनिक जल बीछुड़ै छोड़ि देतु है प्रान ॥
छोड़ि देतु है प्रान जहाँ जल से बिलगावै ।
देइ दूध में डारि रहै ना प्रान गँवावै ॥
जा को वही अहार ताहि को का लै दीजै ।
रहै ना कोटि उपाय और सुख नाना कीजै ॥
यह लीजै दृष्टान्त सकै सो लेइ बिचारी ।
ऐसो करै सनेह ताहि की मैं बलिहारी ॥
पलट ऐसी प्रीति करु जल और मीन समान ।
जहाँ तनिक जल बीछुड़ै छोड़ि देतु है प्रान ॥
( ७४ )
जो मैं हारौं राम की जो जीतौं तौ राम ॥
जो जीतौं तौ राम राम से तन मन लावौं ।
खेलौं ऐसो खेल लोक की लाज बहावौं ॥
पासा फेंकौं ज्ञान नरद बिस्वास चलावौं ।
चौरासी घर फिरै अड़ी पौबारह नावौं ॥
पौबारह सिरवाय एक घर भीतर राखौं ।
कच्ची मारौं पाँच रैनि दिन सत्रह भाखौं ॥
पलट बाजी लाइहौं दोऊ बिधि से राम ।
जो मैं हारौं राम की जो जीतौं तौ राम ॥
(१) प्रीतम ।
३० कुंडलिया
॥ बिस्वास ॥
( ७५ )
लगन महूरत झूठ सब और बिगाडै काम ॥
और बिगाड़ै काम साइत जनि सोधै कोई ।
एक भरोसा नाहिं कुसल कहवाँ से होई ॥
जेकरे हाथै कुसल ताहि को दिया बिसारी ।
आपन इक चतुराई बीच में करै अनारी ॥
तिनका टूटै नाहिं बिना सतगुरु की दाया ।
अजहूँ चेत गँवार जगत है झूठी काया ॥
पलटू सुभ दिन सुभ घड़ी याद पड़े जब नाम ।
लगन महूरत झूठ सब और बिगाड़ै काम ॥
( ७६ )
मोर राम मैं राम का ता से रहौं निसंक ॥
ता से रहौं निसंक तनिक मोर बार ना बाँकै ।
जो कोइ मानै बैर हारि के आपुइ थाकै ॥
दोऊ१ बिधि से राम भार उनके सिर दीन्हा ।
मो पर परै जो गाढ़ राम आपुइ पर लीन्हा ॥
राम भरोसा पाय डेरौं काहू से नाहीं ।
फूल में है ज्यों बास राम हैं हमहीं माहीं ॥
पलटू सब में राम है क्या राजा क्या रंक ।
मोर राम मैं राम का ता से रहौं निसंक ॥
( ७७ )
मगन आपने ख्याल में भाड़ परै संसार ॥
भाड़ परै संसार नाहिं काहू से कामा ।
मन बच करम लगाय जानिहौ केवल रामा ॥
लोक लाज कुल त्यागि जगत की बूझ बड़ाई२ ।
(१) परमार्थ और स्वार्थ दोनों में । (२) दुनिया की बूझ और बड़ाई की हैसियत ।
पलटू साहिब की बानी भाग-१ ३१
निंदा कोउ कै जाय रहौ संतन सरनाई ॥
छोड़ौ दिन दिन संग सुनौ ना बेद पुराना ।
ठान अपनी ठानि आन ना करिहौ काना ॥
पलटू संसै छूटि गई मिलिया पूरा यार ।
मगन आपने ख्याल में भाड़ परै संसार ॥
॥ सतसंग ॥
( ७५ )
जो कोउ चाहै अभय पद जाइ करै सतसंग ॥
जाइ करै सतसंग प्रान बैराग उठावै ।
स्रवन करै बेदान्त मनन करि मन समुझावै ॥
तब साधै हठ जोग बिपर्जय¹ कौ घर पावै ।
प्रान करै आयाम पुरुष तब नजरि में आवै ॥
देखै अपनो रूप होय तब ज्ञान समाधी ।
तब दे साधन छोड़ि लेइ जब पहिले साधी ॥
पलटू खोवै आपु को तब लागैगा रंग ।
जो कोउ चाहै अभय पद जाइ करै सतसंग ॥
( ७६ )
बैरागिनि भूली आप में जल में खोजै राम ॥
जल में खोजै राम जाय के तीरथ स्रानै ।
भरमै चारिउ खूँट नहीं सुधि अपनी आनै ॥
फूल माहिं ज्यों बास काठ में अगिन छिपानी ।
खोदे बिनु नहिं मिलै अहै धरती में पानी ॥
जैसे दूध घृत छिपा छिपी मिहँदी में लाली ।
ऐसे पूरन ब्रह्म कहूँ तिल भरि नहिं खाली ॥
पलटू सतसंग बीच में करि ले अपना काम ।
बैरागिनि भूली आप में जल में खोजै राम ॥
(१) आपे को भूल जाना ।
३२ कुंडलिया
( ८० )
मलया के परसंग से सीतल होवत साँप ॥
सीतल होवत साँप ताप को तुरत बुझाई ।
संगत के परभाव सीतलता वा में आई ॥
मूरख ज्ञानी होय जाय ज्ञानी में बैठै ।
फूल अलग का अलग बासना तिल में पैठै ॥
कंचन लोहा होय जहाँ पारस छुइ जाई ।
पनपै ऊकठा १ काठ जहाँ उन सरदी पाई ॥
पलटू संगत किये से मिटते तीनिउँ ताप ।
मलया के परसंग से सीतल होवत साँप ॥
( ८१ )
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
लोहा महँग बिकान छुए से कीमत निकरी ।
चंदन के परसंग चंदन भई बन की लकरी ॥
जैसे तिल का तेल फूल सँग महँग बिकाई ।
सतसंगति में पड़ा संत भा सदन कसाई ॥
गंग में है सुभगंग मिली जो नारा सोती ।
सीप बीच जो पड़ै बूँद सो होवै मोती ॥
पलटू हरि के नाम से गनिका चढ़ी बिमान ।
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
( ८२ )
फिर फिर नहीं दिवारी दियना लीजै बार ॥
दियना लीजै बार महल में है उँजियारा ।
उदय होय ससि भान अमावस मिटै अँधियारा ॥
ज्ञान होय परगास कुमति जूआ में हारै ।
दुतिया २ खंडन करै एक को बैठि बिचारै ॥
(१) कटा हुआ । (२) द्वैत भाव ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ ३३
रचि रचि तीसौ सखी अभूषन प्रेम बनाई ।
गोबरधन मन पूजि बहुरि सब घर को आई ॥
पलटू सतसंगत मिला खेलि लेहु दिन चार ।
फिर फिर नहीं दिवारी दियना लीजै बार ॥
( ८३ )
जंगल जंगल मैं फिरौं घर में रहै सिकार ॥
घर में रहै सिकार भेद ना कोउ बतावै ।
गया अहेरी भूलि कहाँ से सावज¹ पावै ॥
खोजा चारिउ खूँट कहीं कुछ नजर न आवै ।
कतहूँ ना सुधि आइ नहीं कोउ भेद बतावै ॥
जप तप तीरथ बरत किया बहु नेम अचारा ।
खोजा बेद पुरान सबै सतसंग पुकारा ॥
सतगुरु किया इसारा पलटू लीन्हा मार ।
जंगल जंगल मैं फिरौं घर में रहै सिकार ॥
( ८४ )
बिन खाये चित चैन नहिं खाये आलस होय ॥
खाये आलस होय कहो कैसी बिधि कीजै ।
दोऊ बिधि से बिपति दोस का को हम दीजै ॥
मन बैरी है बड़ा कहे में अपने नाहीं ।
पुन्न में करता पाप पाप में पुन्न कराही ॥
सुभ असुभ के बीच पड़ा है जीव बिचारा ।
दोऊ में वह मिला बात सब वही बिगारा ॥
पलटू सतसंगत दोऊ छुटै करै जो कोय ।
बिन खाये चित चैन नहिं खाये आलस होय ॥
( ८५ )
जो जो गा सतसंग में सो सो बिगरा² जाय ॥
(१) शिकार । (२) इस कुंडलिया में बिगड़ने का शब्द व्यंग से सुधरने के
अर्थ में कहा है।
५
३५ कुंडलिया
सो सो बिगरा जाय फूल सँग तेल बसाना ।
ज्ञानी के संग परा ज्ञान मूरख ने जाना ॥
पारस के परसंग बिगरि गा लोहा जाई ।
लोहा से भा कनक आपनी जाति गँवाई ॥
सलिता गइ है बिगरि मिली गंगा में जाई ।
मलया के परसंग काठ चन्दन कहवाई ॥
पलटू काग से हंस भा और काग पछिताइ ।
जो जो गा सतसंग में सो सो बिगरा जाइ ॥
( ८६ )
पलटू मेरी बनि परी मुद्दा१ हुआ तमाम ॥
मुद्दा हुआ तमाम परे सतसंगति माहीं ।
निस दिन तौलै पूर घाट२ अब सुपनेहु नाहीं ॥
पूँजी पाई साच दिनों दिन होती बढ़ती ।
सतगुरु के परताप भई है दौलत चढ़ती ॥
कोठी दसवें द्वार३ सहज की खेप चलावो ।
कोई न टोकनहार नफ़ा घर बैठे पावो ॥
दूनों पाँव पसारि कै निस दिन करो अराम ।
पलटू मेरी बनि परी मुद्दा हुआ तमाम ॥
॥ सतसंग अनधिकारी को ॥
( ८७ )
सतगुरु सब को देत हैं लेता नाहीं कोय ॥
लेता नाहीं कोय सीस को धरै उतारी ।
वही सकस४ को मिलै मरै की करै तयारी ॥
कडू बहुत सतनाम देखत कै डेरै सरीरा ।
रोटी खावनहार खायगा क्योंकर हीरा ॥
अंधा होवै नीक बैद का पथ जो खावै ।
(१) मतलब या काम। (२) कमी। (३) शून्य। (४) आदमी।