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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

२० | कुंडलिया

बड़े मित्र जो रहे भये सब सत्रु समाना ॥
कंचन कौ सब नगर रती कौ रावन तरसै ।
दिया सिन्धु ने थाह ऊपर से पर्वत बरसै ॥
पलटू जेहि ओर राम हैं तेहि ओर सब संसार ।
आग लगी लंका दहै उनचासौ बही बयार ॥
( ५० )
भजन आतुरी¹ कीजिये और बात में देर ॥
और बात में देर जगत में जीवन थोरा ।
मानुष तन धन जात गोड़ धरि करौ निहोरा ॥
काँचे महल के बीच पवन इक पंछी रहता ।
दस दरवाजा खुला उड़न को नित उठि चहता ॥
भजि लीजै भगवान एहा में भल है अपना ।
आवागौन छुटि जाय जनम की मिटै कलपना ॥
पलटू अटक न कीजिये चौरासी घर फेर ।
भजन आतुरी कीजिये और बात में देर ॥
( ५१ )
यही समय गुरु पाँय में गोता लीजै खाय ॥
गोता लीजै खाय नाम के सरवर² माहीं ।
अवधि आइ नगिचान दाँव फिर ऐसा नाहीं ॥
मानुष तन सकराँत महोदधि³ जात सिरानी ।
ऐसी परबी पाइ नहीं तुम महिमा जानी ॥
सतसंगत के घाट पैठि कै कर असनाना ।
तन मन दीजै दान बहुरि नहिं औना जाना ॥
पलटू बिलम न कीजिये ऐसा औसर पाय ।
यही समय गुरु पाँय में गोता लीजै खाय ॥
(१) जल्दी, बिना टाल टूल के । (२) तालाब । (३) नदी, समुद्र ।