पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेचि बड़न को नाँव सभन को ठगि ठगि खाही ॥
पलटू तेकर बात है जेकरे एक भतार ।
बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बजार ॥
( ३६ )
हवा हिरिस पलटू लगी नाहक भये फकीर ॥
नाहक भये फकीर पीर की सेवा नाहीं ।
अपने मुँह से बड़े कहावैं सब से जाहीं ॥
धमधूसर होइ रहे बात में सब से लड़ते ।
लाम काफ१ वो कहैं इमान को नाहीं डरते ॥
हमहीं हैं दुरवेस२ और ना दूसर कोई ।
सब को देहिं मुराद यकीन से ओकरे होई ॥
मन मुरीद होवै नहीं आप कहावैं पीर ।
हवा हिरिस पलटू लगी नाहक भये फकीर ॥
( ४० )
जौं लगि फाटै फिकिर ना गई फकीरी खोय ॥
गई फकीरी खोय लगी है मान बड़ाई ।
मोर तोर में परा नाहिं छूटी दुचिताई ॥
दुख सुख संपति बिपति सोच दोऊ की लागी ।
जीवन की है चाह मरन की डेर नहिं त्यागी ॥
कौड़ी जिव के संग रैन दिन करै कलपना ।
दुष्ट३ कहै दुख देइ मित्र को जानै अपना ॥
पलटू चिन्ता लगी है जनम गँवाये रोय ।
जौं लगि फाटै फिकिर ना गई फकीरी खोय ॥
॥ चितावनी ॥
( ४१ )
क्या सोवै तू बावरी चाला जात बसंत ॥
चाला जात बसंत कंत ना घर में आये ।
(१) गाली देना । (२) सच्चे फकीर । (३) शत्रु ।