पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब की बानी भाग-१ १८
चलै न एकौ जोर आय जब पहुँचा वादा ॥
पलटू तेहु पै लेत है माया मोह जँजाल ।
चोला भया पुराना आज फटै की काल ॥
( ४७ )
धूआँ का धौरेहरा ज्यों बालू की भीत ॥
ज्यों बालू की भीत ताहि को कौन भरोसा ।
ज्यों पक्का फल डारि गिरत से लगै न दोसा ।
कच्चे घड़े ज्यों नीर पानी के बीच बतासा ।
दारू१ भीतर अगिनि जिवन की ऐसी आसा ॥
पलटू नर तन जात है घास के ऊपर सीत ।
धूआँ का धौरेहरा ज्यों बालू की भीत ॥
( ४८ )
यही दिदारी दार२ है सुनहु मुसाफिर लोग ॥
सुनहु मुसाफिर लोग भेट फिर बहुरि न होना ।
को तुम को हम आय मिले सपने मैं सोना ॥
हिल मिल दिन दस रहे ताहि को सोच न कीजै ।
कोऊ है थिर नाहिं दोस ना हम को दीजै ॥
अहिर बाँधि के गाय एक लेहड़े में आनी ।
कूँवाँ की पनिहारि गई ले घर घर पानी ॥
पलटू मखरी आम ज्यों नदी नाव संजोग ।
यही दिदारी दार है सुनहु मुसाफिर लोग ॥
( ४६ )
आग लगी लंका दहै उनचासौ बही बयार ॥
उनचासौ बही बयार ताहि को कौन बचावै ।
घर के प्रानी रहे सोऊ आगी गुहरावैं ॥
फूटी घर की नारि सगा भाई अलगाना ।
(१) लकड़ी । (२) सराय ।