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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

पलटू साहिब की बानी भाग—१ १७
धृग जीवन है तोर कंत बिन दिवस गँवाये ॥
गर्ब गुमानी नारि फिरै जोवन की माती ।
खसम रहा है रूठि नहीं तू पठवै पाती ॥
लगै न तेरो चित्त कंत को नाहिं मनावै ।
का पर करै सिंगार फूल की सेज बिछावै ॥
पलटू ऋतु भरि खेलि ले फिर पछितैहै अंत ।
क्या सोतूवै बावरी चाला जात बसंत ॥
( ४२ )
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
बीती जात बहार सम्बत लगने पर आया ।
लीजै डफ्फ बजाय सुभग मानुष तन पाया ॥
खेलो घूँघट खोलि लाज फागुन में नाहीं ।
जे कोउ करिहै लाज काज ना सपनेहुँ नाहीं ॥
प्रेम की माट भराय सुरति की करु पिचकारी ।
ज्ञान अबीर बनाय नाम की दीजै गारी ॥
पलटू रहना है नहीं सपना यह संसार ।
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
( ४३ )
तू क्यों गफलत में फिरै सिर पर बैठा काल ॥
सिर पर बैठा काल दिनो दिन वादा पूजै ।
आज काल में कूच मूरख नहिं तोकँह सूझै ॥
कौड़ी कौड़ी जोरि ब्याज दे करते बट्टा ।
सुखी रहै परिवार मुक्ति में होवत ठट्ठा ॥
तू जानै मैं ठग्यो आप को तुही ठगावै ।
नाम संजीवन मूर छोरि के माहुर खावै ॥
पलटू सेखी ना रही चेत करो अब लाल ।
तू क्यों गफलत में फिरै सिर पर बैठा काल ॥
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