न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें३३२ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ०
कार्यद्रव्यं कारणद्रव्याश्रितं तत्कारणेभ्यः पृथङ् नोपलभ्यते, विपर्यये पृथ-
ग्ग्रहणात्, यत्राश्रयाश्रितभावो नास्ति तत्र पृथग्ग्रहणमिति । बुद्ध्या विवेचनात्तु
भावानां पृथग्ग्रहणम्, अतीन्द्रियेष्वणुषु यदिन्द्रियेण गृह्यते तदेतया बुद्ध्या
विविच्यमानमन्यदिति ॥ २८ ॥
प्रमाणतश्चार्थप्रतिपत्तेः ॥ २९ ॥
बुद्ध्या विवेचनाद्भावानां याथात्म्योपलब्धिः । यदस्ति यथा च यत्रास्ति
यथा च तत्सर्वं प्रमाणत उपलब्ध्या सिध्यति, या च प्रमाणत उपलब्धिस्तद्
बुद्ध्या विवेचनं भावानाम्, तेन सर्वशास्त्राणि सर्वकर्माणि सर्वे च शरीरिणां
व्यवहारा व्याप्ताः । परीक्षमाणो हि बुद्ध्याऽध्यवस्यति—इदमस्ति, इदं नास्तीति ।
तत्र न सर्वभावानुपपत्तिः ॥ २९ ॥
प्रमाणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम् ॥ ३० ॥
एवं च सति सर्वं नास्तीति नोपपद्यते, कस्मात् ? प्रमाणानुपपत्त्युपपत्ति-
भ्याम् । यदि सर्वं नास्तीति प्रमाणमुपपद्यते, सर्वं नास्तीत्येतद्व्याहन्यते ! अथ
प्रमाणं नोपपद्यते, सर्वं नास्तीत्यस्य कथं सिद्धिः ! अथ प्रमाणमन्तरेण सिद्धिः,
सर्वमस्तीत्यस्य कथं न सिद्धिः ! ॥ ३० ॥
कार्यद्रव्य कारणद्रव्याश्रित है, अतः वह उन कारणों से पृथक् गृहीत नहीं होता ।
जहाँ यह आश्रयाश्रित भाव न हो वहाँ पृथग् ग्रहण होता ही है ! बुद्धि द्वारा विवेचन-
मात्र से स्थूल भावों का इन्द्रियों द्वारा पृथक् ज्ञान गृहीत होता है, जैसे अतीन्द्रिय पर-
माणुओं का पृथक् ग्रहण बुद्धि द्वारा होता ही है, अतः बुद्धि से विवेचित हुआ अवयवी
परमाणु से पृथक् है ॥ २८ ॥
अर्थप्रतिपत्ति के प्रमाणाधीन होने से ॥ २९ ॥
बुद्धिविवेचन से भावों की याथात्म्योपलब्धि होती है । जो घटादि द्रव्य है तथा
स्वावयवसमवेतत्व जैसा है, या जो शशविषाणादि कार्यकारणभाव से जैसा नहीं है—
यह सब प्रमाण द्वारा उपलब्धि से सिद्ध होता है । प्रमाण द्वारा उपलब्धि ही 'भावों का
बुद्धि से विवेचन' है । इस बुद्धिविवेचन के अन्तर्गत ही सब शास्त्र, सब कर्म तथा
प्राणियों के सब व्यवहार आ जाते हैं । विवेचन करता हुआ जिज्ञासु—'यह है, यह
नहीं है' ऐसा अध्यवसाय ( यथार्थ निर्णय ) करता है, अतः 'सर्वभावानुपपत्ति' सिद्धान्त
युक्त नहीं ॥ २९ ॥
प्रमाणों की उपपत्ति, अनुपपत्ति से भी ॥ ३० ॥
इतना व्याख्यान होने के बाद, 'सब कुछ नहीं है' यह सिद्धान्त उपपन्न नहीं होता;
क्योंकि प्रमाणों की उपपत्ति तथा अनुपपत्ति उसका आधार है । जैसे—यदि 'सब कुछ
नहीं है' इसमें कोई प्रमाण देते हैं तो उस प्रमाण के होने से तुम्हारी 'सब कुछ नहीं है'
यह प्रतिज्ञा कैसे बनेगी ! यदि प्रमाण न देते हो तो 'सब कुछ नहीं है' इसे कैसे सिद्ध
करोगे ! यदि प्रमाण के बिना ही सिद्धि मानें तो 'सब कुछ है' यह क्यों न सिद्ध मान
लिया जाये ! ॥ ३० ॥