महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
About this granth
This is the sixth and last volume (book No. 37) of the Gita Press, Gorakhpur, Mahabharata, containing the Anushasana, Ashvamedhika, Ashramavasika, Mausala, Mahaprasthanika and Svargarohana Parvas, with the Sanskrit text and a plain Hindi translation. The copy is the fifteenth reprint, of Samvat 2072, and the imprint gives 77,700 copies printed in all.
In the Anushasana Parva Bhishma continues his teaching from the bed of arrows, above all on giving. The contents list consolations for Yudhishthira, the dialogue of Upamanyu and Krishna, the sage Tandi's hymn to Mahadeva, the thousand names of Shiva, the apsaras Panchachuda's talk with Narada, the merit of giving land, and Vasishtha and Parashurama on the origin of gold. The parva also contains the Vishnu Sahasranama and ends with Bhishma's death.
The remaining books close the epic: Yudhishthira's horse sacrifice and the Anugita; the retirement of Dhritarashtra, Gandhari, Kunti and Vidura to the forest; the self-destruction of the Yadavas and Krishna's departure; the Pandavas' last journey into the Himalaya; and Yudhishthira's ascent to heaven.
वहाँकी भूमि कितने ही सरोवरोंसे शोभा पाती है। उन सरोवरोंमें नीलोत्पलमिश्रित बहुत-से कमल खिले रहते हैं। उन कमलोंके दल बहुमूल्य मणिमय होते हैं और उनके केसर अपनी स्वर्णमयी प्रभासे प्रकाशित होते हैं॥ २२॥
करवीरवनैः फुल्लैः सहस्रावर्तसंवृतैः।
संतानकवनैः फुल्लैर्वृक्षैश्च समलंकृताः॥ २३॥
उस लोकमें बहुत-सी नदियाँ हैं, जिनके तटोंपर खिले हुए कनेरोंके वन तथा विकसितसंतानक (कल्पवृक्ष-विशेष) के वन एवं अन्यान्य वृक्ष उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे वृक्ष और वन अपने मूल भागमें सहस्रों आवतोंसे घिरे हुए हैं॥ २३॥
निर्मलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाप्रभैः।
उद्भूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः॥ २४॥
उन नदियोंके तटोंपर निर्मल मोती, अत्यन्त प्रकाशमान मणिरत्न तथा सुवर्ण प्रकट होते हैं॥ २४॥
सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा द्रुमोत्तमैः।
जातरूपमयैश्चान्यैर्हुताशनसमप्रभैः॥ २५॥
कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभागके द्वारा उन नदियोंके जलमें प्रविष्ट दिखायी देते हैं। वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं। कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत-से वृक्ष प्रज्ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होते हैं॥ २५॥
सौवर्णा गिरयस्तत्र मणिरत्नशिलोच्चयाः।
सर्वरत्नमयैर्भान्ति शृंगैश्चारुभिरुच्छ्रितैः॥ २६॥
वहाँ सोनेके पर्वत तथा मणि और रत्नोंके शैलसमूह हैं, जो अपने मनोहर, ऊँचे तथा सर्वरत्नमय शिखरोंसे सुशोभित होते हैं॥ २६॥
नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः।
दिव्यगन्धरसैः पुष्पैः फलैश्च भरतर्षभ॥ २७॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फूल और फल लगे रहते हैं। वे वृक्ष पक्षियोंसे भरे होते हैं तथा उनके फूलों और फलोंमें दिव्य सुगन्ध और दिव्य रस होते हैं॥
रमन्ते पुण्यकर्माणस्तत्र नित्यं युधिष्ठिर।
सर्वकामसमृद्धार्था निःशोका गतमन्यवः॥ २८॥
युधिष्ठिर! वहाँ पुण्यात्मा पुरुष ही सदा निवास करते हैं। गोलोकवासी शोक और क्रोधसे रहित, पूर्णकाम एवं सफलमनोरथ होते हैं॥ २८॥
विमानेषु विचित्रेषु रमणीयेषु भारत।
मोदन्ते पुण्यकर्माणो विहरन्तो यशस्विनः॥ २९॥
भरतनन्दन! वहाँके यशस्वी एवं पुण्यकर्मा मनुष्य विचित्र एवं रमणीय विमानोंमें बैठकर यथेष्ट विहार करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं॥ २९॥
उपक्रीडन्ति तान् राजन् शुभाश्चाप्सरसां गणाः ।
एताल्लोँकानवाप्नोति गां दत्त्वा वै युधिष्ठिर ॥ ३० ॥
राजन्! उनके साथ सुन्दरी अप्सराएँ क्रीड़ा करती हैं। युधिष्ठिर! गोदान करके मनुष्य इन्हीं लोकोंमें जाते हैं ॥ ३० ॥
येषामधिपतिः पूषा मारुतो बलवान् बली ।
ऐश्वर्ये वरुणो राजा नाममात्रं युगन्धराः ॥ ३१ ॥
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः ।
प्राजापत्यमिति ब्रह्मन् जपेन्नित्यं यतव्रतः ॥ ३२ ॥
नरेन्द्र! शक्तिशाली सूर्य और बलवान् वायु जिन लोकोंके अधिपति हैं, एवं राजा वरुण जिन लोकोंके ऐश्वर्यपर प्रतिष्ठित हैं, मनुष्य गोदान करके उन्हीं लोकोंमें जाता है। गौएँ युगन्धरा, सुरूपा, बहुरूपा, विश्वरूपा तथा सबकी माताएँ हैं। शुकदेव! मनुष्य संयम-नियमके साथ रहकर गौओंके इन प्रजापतिकथित नामोंका प्रतिदिन जप करे ॥ ३१-३२ ॥
गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः ।
तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान् ॥ ३३ ॥
जो पुरुष गौओंकी सेवा और सब प्रकारसे उनका अनुगमन करता है, उसपर संतुष्ट होकर गौएँ उसे अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं ॥ ३३ ॥
द्रुह्येन्न मनसा वापि गोषु नित्यं सुखप्रदः ।
अर्चयेत सदा चैव नमस्कारैश्च पूजयेत् ॥ ३४ ॥
गौओंके साथ मनसे भी कभी द्रोह न करे, उन्हें सदा सुख पहुँचाये, उनका यथोचित सत्कार करे और नमस्कार आदिके द्वारा उनका पूजन करता रहे ॥ ३४ ॥
दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ।
त्र्यहमुष्णं पिबेन्मूत्रं त्र्यहमुष्णं पिबेत् पयः ॥ ३५ ॥
जो मनुष्य जितेन्द्रिय और प्रसन्नचित्त होकर नित्य गौओंकी सेवा करता है, वह समृद्धिका भागी होता है। मनुष्य तीन दिनोंतक गरम गोमूत्र पीकर रहे, फिर तीन दिनतक गरम गोदुग्ध पीकर रहे ॥ ३५ ॥
गवामुष्णं पयः पीत्वा त्र्यहमुष्णं घृतं पिबेत् ।
त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वायुभक्षो भवेत् त्र्यहम् ॥ ३६ ॥
गरम गोदुग्ध पीनेके पश्चात् तीन दिनोंतक गरम-गरम गोघृत पीये। तीन दिनतक गरम घी पीकर फिर तीन दिनोंतक वह वायु पीकर रहे ॥ ३६ ॥
येन देवाः पवित्रेण भुञ्जते लोकमुत्तमम् ।
यत् पवित्रं पवित्राणां तद् घृतं शिरसा वहेत् ॥ ३७ ॥
देवगण भी जिस पवित्र घृतके प्रभावसे उत्तम-उत्तम लोकका पालन करते हैं तथा जो पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र है, उससे घृतको शिरोधार्य करे ॥ ३७ ॥
घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् ।
घृतं प्राशेद् घृतं दद्याद् गवां पुष्टिं तथाश्रुते ॥ ३८ ॥
गायके घीके द्वारा अग्निमें आहुति दे। घृतकी दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये। घृत भोजन करे तथा गोघृतका ही दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य गौओंकी समृद्धि एवं अपनी पुष्टिका अनुभव करता है ॥ ३८ ॥
निर्हृतैश्च यवैर्गोभिर्मासं प्रश्रितयावकः ।
ब्रह्महत्यासमं पापं सर्वमेतेन शुध्यते ॥ ३९ ॥
गौओंके गोबरसे निकाले हुए जौकी लप्सीका एक मासतक भक्षण करे। इससे मनुष्य ब्रह्महत्या-जैसे पापसे भी छुटकारा पा जाता है ॥ ३९ ॥
पराभवाच्च दैत्यानां देवैः शौचमिदं कृतम् ।
ते देवत्वमपि प्राप्ताः संसिद्धाश्च महाबलाः ॥ ४० ॥
जब दैत्योंने देवताओंको पराजित कर दिया, तब देवताओंने इसी प्रायश्चित्तका अनुष्ठान किया। इससे उन्हें पुनः (नष्ट हुए) देवत्वकी प्राप्ति हुई तथा वे महाबलवान् और परम सिद्ध हो गये ॥ ४० ॥
गावः पवित्राः पुण्याश्च पावनं परमं महत् ।
ताश्च दत्त्वा द्विजातिभ्यो नरः स्वर्गमुपाश्नुते ॥ ४१ ॥
गौएँ परम पावन, पवित्र और पुण्यस्वरूपा हैं। वे महान् देवता हैं। उन्हें ब्राह्मणोंको देकर मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है ॥ ४१ ॥
गवां मध्ये शुचिर्भूत्वा गोमतीं मनसा जपेत् ।
पुताभिरद्भिराचम्य शुचिर्भवति निर्मलः ॥ ४२ ॥
पवित्र जलसे आचमन करके पवित्र होकर गौओंके बीचमें गोमतीमन्त्र (गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि इत्यादि) का मन-ही-मन जप करे। ऐसा करनेसे वह अत्यन्त शुद्ध एवं निर्मल (पापमुक्त) हो जाता है ॥ ४२ ॥
अग्निमध्ये गवां मध्ये ब्राह्मणानां च संसदि ।
विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः पुण्यकर्मिणः ॥ ४३ ॥
अध्यापयेरन् शिष्यान् वै गोमतीं यज्ञसम्मिताम् ।
त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा गोमतीं लभते वरम् ॥ ४४ ॥
विद्या और वेदव्रतमें निष्णात पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे अग्नियों और गौओंके बीचमें तथा ब्राह्मणोंकी सभामें शिष्योंको यज्ञतुल्य गोमतीविद्याकी शिक्षा दें। जो तीन राततक उपवास करके गोमती-मन्त्रका जप करता है, उसे गौओंका वरदान प्राप्त होता है ॥ ४३-४४ ॥
पुत्रकामश्च लभते पुत्रं धनमथापि वा ।
पतिकामा च भर्तारं सर्वकामांश्च मानवः ।
गावस्तुष्टाः प्रयच्छन्ति सेविता वै न संशयः ॥ ४५ ॥
पुत्रकी इच्छावाला पुत्र और धन चाहनेवाला धन पाता है। पतिकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको मनके अनुकूल पति मिलता है। सारांश यह है कि गौओंकी आराधना करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। गौएँ मनुष्योंद्वारा सेवित और संतुष्ट होकर उन्हें सब कुछ देती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥
एवमेता महाभागा यज्ञियाः सर्वकामदाः ।
रोहिण्य इति जानीहि नैताभ्यो विद्यते परम् ॥ ४६ ॥
इस प्रकार ये महाभाग्यशालिनी गौएँ यज्ञका प्रधान अंग हैं और सबको सम्पूर्ण कामनाएँ देनेवाली हैं। तुम इन्हें रोहिणी समझो। इनसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है ॥ ४६ ॥
इत्युक्तः स महातेजाः शुकः पित्रा महात्मना ।
पूजयामास गां नित्यं तस्मात् त्वमपि पूजय ॥ ४७ ॥
युधिष्ठिर! अपने महात्मा पिता व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी शुकदेवजी प्रतिदिन गौकी सेवा-पूजा करने लगे; इसलिये तुम भी गौओंकी सेवा-पूजा करो ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके
एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥
लक्ष्मी और गौओंका संवाद तथा लक्ष्मीकी प्रार्थनापर गौओंके द्वारा गोबर और गोमूत्रमें लक्ष्मीको निवासके लिये स्थान दिया जाना
द्व्यशीतितमोऽध्यायः
लक्ष्मी और गौओंका संवाद तथा लक्ष्मीकी प्रार्थनापर गौओंके द्वारा गोबर और गोमूत्रमें लक्ष्मीको निवासके लिये स्थान दिया जाना
युधिष्ठिर उवाच
मया गवां पुरीषं वै श्रिया जुष्टमिति श्रुतम् ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं संशयोऽत्र पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! मैंने सुना है कि गौओंके गोबरमें लक्ष्मीका निवास है; किंतु इस विषयमें मुझे संदेह है; अतः इसके सम्बन्धमें मैं यथार्थ बात सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गोभिर्नृपेह संवादं श्रिया भरतसत्तम ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष गौ और लक्ष्मीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
श्रीः कृत्वेह वपुः कान्तं गोमध्येषु विवेश ह ।
गावोऽथ विस्मितास्तस्या दृष्ट्वा रूपस्य सम्पदम् ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, लक्ष्मीने मनोहर रूप धारण करके गौओंके झुंडमें प्रवेश किया। उनके रूप-वैभवको देखकर गौएँ आश्चर्यचकित हो उठीं ॥ ३ ॥
गाव ऊचुः
कासि देवि कुतो वा त्वं रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
विस्मिताः स्म महाभागे तव रूपस्य सम्पदा ॥ ४ ॥
गौओंने पूछा— देवि! तुम कौन हो और कहाँसे आयी हो? इस पृथ्वीपर तुम्हारे रूपकी कहीं तुलना नहीं है। महाभागे! तुम्हारी इस रूप-सम्पत्तिसे हमलोग बड़े आश्चर्यमें पड़ गये हैं ॥ ४ ॥
इच्छाम त्वां वयं ज्ञातुं का त्वं क्व च गमिष्यसि ।
तत्त्वेन वरवर्णाभे सर्वमेतद् ब्रवीहि नः ॥ ५ ॥
इसलिये हम तुम्हारा परिचय जानना चाहती हैं। तुम कौन हो और कहाँ जाओगी? वरवर्णिनि! ये सारी बातें हमें ठीक-ठीक बताओ ॥ ५ ॥
श्रीरुवाच
लोककान्तास्मि भद्रं वः श्रीर्नामाहं परिश्रुता ।
मया दैत्याः परित्यक्ता विनष्टाः शाश्वतीः समाः ॥ ६ ॥
**लक्ष्मी बोलीं—**गौओ! तुम्हारा कल्याण हो। मैं इस जगत्में लक्ष्मी नामसे प्रसिद्ध हूँ। सारा जगत् मेरी कामना करता है। मैंने दैत्योंको छोड़ दिया, इसलिये वे सदाके लिये नष्ट हो गये हैं ॥ ६ ॥
मयाभिपन्ना देवाश्च मोदन्ते शाश्वतीः समाः ।
इन्द्रो विवस्वान् सोमश्च विष्णुरापोऽग्निरेव च ॥ ७ ॥
मेरे ही आश्रयमें रहनेके कारण इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, जलके अधिष्ठाता देवता वरुण और अग्नि आदि देवता सदा आनन्द भोग रहे हैं ॥ ७ ॥
मयाभिपन्नाः सिध्यन्ते ऋषयो देवतास्तथा ।
यान् नाविशाम्यहं गावस्ते विनश्यन्ति सर्वशः ॥ ८ ॥
देवताओं तथा ऋषियोंको मुझसे अनुगृहीत होनेपर ही सिद्धि मिलती है। गौओ! जिनके शरीरमें मैं प्रवेश नहीं करती, वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मया जुष्टाः सुखान्विताः ।
एवंप्रभावं मां गावो विजानीत सुखप्रदाः ॥ ९ ॥
धर्म, अर्थ और काम मेरा सहयोग पाकर ही सुखद होते हैं; अतः सुखदायिनी गौओ! मुझे ऐसे ही प्रभावसे सम्पन्न समझो ॥ ९ ॥
इच्छामि चापि युष्मासु वस्तुं सर्वासु नित्यदा ।
आगत्य प्रार्थये युष्मान् श्रीजुष्टा भवताथ वै ॥ १० ॥
मैं तुम सब लोगोंके भीतर भी सदा निवास करना चाहती हूँ और इसके लिये स्वयं ही तुम्हारे पास आकर प्रार्थना करती हूँ। तुमलोग मेरा आश्रय पाकर श्रीसम्पन्न हो जाओ ॥ १० ॥
गाव ऊचुः
अध्रुवा चपला च त्वं सामान्या बहुभिः सह ।
न त्वामिच्छाम भद्रं ते गम्यतां यत्र रंस्यसे ॥ ११ ॥
**गौओंने कहा—**देवि! तुम चंचला हो। कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती। इसके सिवा तुम्हारा बहुतोंके साथ एक-सा सम्बन्ध है; इसलिये हम तुम्हें नहीं चाहतीं। तुम्हारा कल्याण हो। तुम जहाँ आनन्दपूर्वक रह सको, जाओ ॥ ११ ॥
वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयाद्य वै ।
यथेष्टं गम्यतां तत्र कृतकार्या वयं त्वया ॥ १२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 709)
हमारा शरीर तो यों ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है। हमें तुमसे क्या काम? तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ। तुमने दर्शन दिया, इतनेहीसे हम कृतार्थ हो गयीं ॥ १२ ॥
भगवती लक्ष्मीकी गौओंसे आश्रयके लिये प्रार्थना
श्रीरुवाच
किमेतद् वः क्षमं गावो यन्मां नेहाभिनन्दथ ।
न मां सम्प्रति गृह्णीध्वं कस्माद् वै दुर्लभां सतीम् ॥ १३ ॥
**लक्ष्मीजीने कहा—**गौओ! यह क्या बात है? क्या यही तुम्हारे लिये उचित है कि तुम मेरा अभिनन्दन नहीं करती? मैं सती-साध्वी हूँ, दुर्लभ हूँ। फिर भी इस समय तुम मुझे स्वीकार क्यों नहीं करती? ॥ १३ ॥
सत्यं च लोकवादोऽयं लोके चरति सुव्रताः ।
स्वयं प्राप्ते परिभवो भवतीति विनिश्चयः ॥ १४ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाली गौओ! लोकमें जो यह प्रवाद चल रहा है कि 'बिना बुलाये स्वयं किसीके यहाँ जानेपर निश्चय ही अनादर होता है।' यह ठीक ही जान पड़ता है ॥ १४ ॥
महदुग्रं तपः कृत्वा मां निषेवन्ति मानवाः ।
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ॥ १५ ॥
देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य बड़ी उग्र तपस्या करके मेरी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करते हैं ॥ १५ ॥
प्रभाव एष वो गावः प्रतिगृह्णीत मामिह ।
नावमन्या ह्यहं सौम्यास्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ १६ ॥
सौम्य स्वभाववाली गौओ! यह तुम्हारा प्रभाव है कि मैं स्वयं तुम्हारे पास आयी हूँ। अतः तुम मुझे यहाँ ग्रहण करो। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें कहीं भी मैं अपमान पानेके योग्य नहीं हूँ ॥ १६ ॥
गाव ऊचुः
नावमन्यामहे देवि न त्वां परिभवामहे ।
अध्रुवा चलचित्तासि ततस्त्वां वर्जयामहे ॥ १७ ॥
गौओंने कहा— देवि! हम तुम्हारा अपमान या अनादर नहीं करतीं। केवल तुम्हारा त्याग कर रही हैं। वह भी इसलिये कि तुम्हारा चित्त चंचल है। तुम कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती ॥ १७ ॥
बहुना च किमुक्तेन गम्यतां यत्र वाञ्छसि ।
वपुष्मन्त्यो वयं सर्वाः किमस्माकं त्वयानघे ॥ १८ ॥
इस विषयमें बहुत बात करनेसे क्या लाभ? तुम जहाँ जाना चाहो—चली जाओ। अनघे! हम सब लोगोंका शरीर तो यों ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है; अतः तुमसे हमें क्या काम है? ॥ १८ ॥
श्रीरुवाच
अवज्ञाता भविष्यामि सर्वलोकस्य मानदाः ।
प्रत्याख्यानेन युष्माकं प्रसादः क्रियतां मम ॥ १९ ॥
लक्ष्मीने कहा— दूसरोंको सम्मान देनेवाली गौओ! तुम्हारे त्याग देनेसे मैं सम्पूर्ण जगत्के लिये अवहेलित और उपेक्षित हो जाऊँगी, इसलिये मुझपर कृपा करो ॥ १९ ॥
महाभागा भवत्यो वै शरण्याः शरणागताम् ।
परित्रायन्तु मां नित्यं भजमानामनिन्दिताम् ॥ २० ॥
तुम महान् सौभाग्यशालिनी और सबको शरण देनेवाली हो। मैं भी तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। तुम्हारी भक्त हूँ। मुझमें कोई दोष भी नहीं है; अतः तुम मेरी रक्षा करो—मुझे अपना लो ॥ २० ॥
माननामहमिच्छामि भवत्यः सततं शिवाः ।
अप्येकांगेष्वधो वस्तुमिच्छामि च सुकुत्सिते ॥ २१ ॥
गौओ! मैं तुमसे सम्मान चाहती हूँ। तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो। तुम्हारे किसी एक अंगमें, नीचेके कुत्सित अंगमें भी यदि स्थान मिल जाय तो मैं उसमें रहना चाहती हूँ ॥ २१ ॥
न वोऽस्ति कुत्सितं किंचिदंगेष्वालक्ष्यतेऽनघाः।
पुण्याः पवित्राः सुभगा ममादेशं प्रयच्छथ ॥ २२ ॥
वसेयं यत्र वो देहे तन्मे व्याख्यातुमर्हथ।
निष्पाप गौओ! वास्तवमें तुम्हारे अंगोंमें कहीं कोई कुत्सित स्थान नहीं दिखायी देता। तुम परम पुण्यमयी, पवित्र और सौभाग्यशालिनी हो। अतः मुझे आज्ञा दो। तुम्हारे शरीरमें जहाँ मैं रह सकूँ, उसके लिये मुझे स्पष्ट बताओ ॥ २२ ½ ॥
एवमुक्तास्ततो गावः शुभाः करुणवत्सलाः।
सम्मन्त्र्य सहिताः सर्वाः श्रियमूचुर्नराधिप ॥ २३ ॥
नरेश्वर! लक्ष्मीके ऐसा कहनेपर करुणा और वात्सल्यकी मूर्ति शुभस्वरूपा गौओंने एक साथ मिलकर सलाह की; फिर सबने लक्ष्मीसे कहा— ॥ २३ ॥
अवश्यं मानना कार्या तवास्माभिर्यशस्विनि।
शकृन्मूत्रे निवस त्वं पुण्यमेतद्धि नः शुभे ॥ २४ ॥
‘शुभे! यशस्विनि! अवश्य ही हमें तुम्हारा सम्मान करना चाहिये। तुम हमारे गोबर और मूत्रमें निवास करो; क्योंकि हमारी ये दोनों वस्तुएँ परम पवित्र हैं’ ॥ २४ ॥
श्रीरुवाच
दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः।
एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदाः ॥ २५ ॥
लक्ष्मीने कहा—सुखदायिनी गौओ! धन्यभाग्य जो तुमलोगोंने मुझपर अपना कृपापूर्ण प्रसाद प्रकट किया। ऐसा ही होगा—मैं तुम्हारे गोबर और मूत्रमें ही निवास करूँगी। तुमने मेरा मान रख लिया, अतः तुम्हारा कल्याण हो ॥ २५ ॥
एवं कृत्वा तु समयं श्रीर्गोभिः सह भारत।
पश्यन्तीनां ततस्तासां तत्रैवान्तरधीयत ॥ २६ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार गौओंके साथ प्रतिज्ञा करके लक्ष्मीजी उनके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं ॥ २६ ॥
एवं गोशकृतः पुत्र माहात्म्यं तेऽनुवर्णितम्।
माहात्म्यं च गवां भूयः श्रूयतां गदतो मम ॥ २७ ॥
बेटा! इस तरह मैंने तुमसे गोबरका माहात्म्य बतलाया है। अब पुनः गौओंका माहात्म्य बतला रहा हूँ, सुनो ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्रीगोसंवादो नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और गौओंका संवादात्मक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 713)
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना
भीष्म उवाच
ये च गां सम्प्रयच्छन्ति हुतशिष्टाशिनश्च ये ।
तेषां सत्राणि यज्ञाश्च नित्यमेव युधिष्ठिर ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जो मनुष्य सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन और गोदान करते हैं उन्हें प्रतिदिन अन्नदान और यज्ञ करनेका फल मिलता है ॥ १ ॥
ऋते दधि घृतेनेह न यज्ञः सम्प्रवर्तते ।
तेन यज्ञस्य यज्ञत्वमतो मूलं च कथ्यते ॥ २ ॥
दही और गोघृतके बिना यज्ञ नहीं होता। उन्हींसे यज्ञका यज्ञत्व सफल होता है। अतः गौओंको यज्ञका मूल कहते हैं ॥ २ ॥
दानानामपि सर्वेषां गवां दानं प्रशस्यते ।
गावः श्रेष्ठाः पवित्राश्च पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥
सब प्रकारके दानोंमें गोदान ही उत्तम माना जाता है; इसलिये गौएँ श्रेष्ठ, पवित्र तथा परम पावन हैं ॥ ३ ॥
पुष्ट्यर्थमेताः सेवेत शान्त्यर्थमपि चैव ह ।
पयोदधिघृतं चासां सर्वपापप्रमोचनम् ॥ ४ ॥
मनुष्यको अपने शरीरकी पुष्टि तथा सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये भी गौओंका सेवन करना चाहिये। इनके दूध, दही और घी सब पापोंसे छुड़ानेवाले हैं ॥ ४ ॥
गावस्तेजः परं प्रोक्तमिह लोके परत्र च ।
न गोभ्यः परमं किंचित् पवित्रं भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! गौएँ इहलोक और परलोकमें भी महान् तेजोरूप मानी गयी हैं। गौओंसे बढ़कर पवित्र कोई वस्तु नहीं है ॥ ५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पितामहस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इन्द्र और ब्रह्माजीके इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ६ ॥
पराभूतेषु दैत्येषु शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः ।
प्रजाः समुदिताः सर्वाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
पूर्वकालमें देवताओंद्वारा दैत्योंके परास्त हो जानेपर जब इन्द्र तीनों लोकोंके अधीश्वर हुए तब समस्त प्रजा मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ सत्य और धर्ममें तत्पर रहने लगी ॥ ७ ॥
अथर्षयः सगन्धर्वाः किन्नरोरगराक्षसाः ।
देवासुरसुपर्णाश्च प्रजानां पतयस्तथा ॥ ८ ॥
पर्युपासन्त कौन्तेय कदाचिद् वै पितामहम् ।
नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहूहूः ॥ ९ ॥
दिव्यतानेषु गायन्तः पर्युपासन्त तं प्रभुम् ।
तत्र दिव्यानि पुष्पाणि प्रावहत् पवनस्तदा ॥ १० ॥
आजहुर्ऋतवश्चापि सुगन्धीनि पृथक् पृथक् ।
तस्मिन् देवसमावाये सर्वभूतसमागमे ॥ ११ ॥
दिव्यवादित्रसंघुष्टे दिव्यस्त्रीचारणावृते ।
इन्द्रः पप्रच्छ देवेशमभिवाद्य प्रणम्य च ॥ १२ ॥
कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान् ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्-पृथक् ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा— ॥ ८—१२ ॥
देवानां भगवन् कस्माल्लोकेशानां पितामह ।
उपरिष्टाद् गवां लोक एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ १३ ॥
'भगवन्! पितामह! गोलोक समस्त देवताओं और लोकपालोंके ऊपर क्यों है? मैं इसे जानना चाहता हूँ ॥
किं तपो ब्रह्मचर्यं वा गोभिः कृतमिहेश्वर ।
देवानामुपरिष्टाद् यद् वसन्त्यरजसः सुखम् ॥ १४ ॥
'प्रभो! गौओंने यहाँ किस तपस्याका अनुष्ठान अथवा ब्रह्मचर्यका पालन किया है, जिससे वे रजोगुणसे रहित होकर देवताओंसे भी ऊपर स्थानमें सुखपूर्वक निवास करती हैं?' ॥ १४ ॥
ततः प्रोवाच ब्रह्मा तं शक्रं बलनिषूदनम् ।
अवज्ञातास्त्वया नित्यं गावो बलनिषूदन ॥ १५ ॥
तेन त्वमासां माहात्म्यं वेत्सि शृणु यत् प्रभो ।
गवां प्रभावं परमं माहात्म्यं च सुरर्षभ ॥ १६ ॥
तब ब्रह्माजीने बलसूदन इन्द्रसे कहा—'बलासुरका विनाश करनेवाले देवेन्द्र! तुमने सदा गौओंकी अवहेलना की है। प्रभो! इसीलिये तुम इनका माहात्म्य नहीं जानते। सुरश्रेष्ठ! गौओंका महान् प्रभाव और माहात्म्य मैं बताता हूँ, सुनो ॥ १५-१६ ॥
यज्ञांगं कथिता गावो यज्ञ एव च वासव ।
एताभिश्च विना यज्ञो न वर्तेत कथंचन ॥ १७ ॥
‘वासव! गौओंको यज्ञका अंग और साक्षात् यज्ञरूप बतलाया गया है; क्योंकि इनके दूध, दही और घीके बिना यज्ञ किसी तरह सम्पन्न नहीं हो सकता ॥ १७ ॥
धारयन्ति प्रजाश्चैव पयसा हविषा तथा ।
एतासां तनयाश्चापि कृषियोगमुपासते ॥ १८ ॥
जनयन्ति च धान्यानि बीजानि विविधानि च ।
‘ये अपने दूध-घीसे प्रजाका भी पालन-पोषण करती हैं। इनके पुत्र (बैल) खेतीके काम आते तथा नाना प्रकारके धान्य एवं बीज उत्पन्न करते हैं ॥ १८ १/२ ॥
ततो यज्ञाः प्रवर्तन्ते हव्यं कव्यं च सर्वशः ॥ १९ ॥
पयोदधिघृतं चैव पुण्याश्चैताः सुराधिप ।
वहन्ति विविधान् भारान् क्षुत्तृष्णापरिपीडिताः ॥ २० ॥
‘उन्हींसे यज्ञ सम्पन्न होते और हव्य-कव्यका भी सर्वथा निर्वाह होता है। सुरेश्वर! इन्हीं गौओंसे दूध, दही और घी प्राप्त होते हैं। ये गौएँ बड़ी पवित्र होती हैं। बैल भूख-प्याससे पीड़ित होकर भी नाना प्रकारके बोझ ढोते रहते हैं ॥ १९-२० ॥
मुनींश्च धारयन्तीह प्रजाश्चैवापि कर्मणा ।
वासवाकूटवाहिन्यः कर्मणा सुकृतेन च ॥ २१ ॥
‘इस प्रकार गौएँ अपने कर्मसे ऋषियों तथा प्रजाओंका पालन करती रहती हैं। वासव! इनके व्यवहारमें माया नहीं होती। ये सदा सत्कर्ममें ही लगी रहती हैं ॥ २१ ॥
उपरिष्टात् ततोऽस्माकं वसन्त्येताः सदैव हि ।
एवं ते कारणं शक्र निवासकृतमद्य वै ॥ २२ ॥
गवां देवोपरिष्टाद्धि समाख्यातं शतक्रतो ।
एता हि वरदत्ताश्च वरदाश्चापि वासव ॥ २३ ॥
‘इसीसे ये गौएँ हम सब लोगोंके ऊपर स्थानमें निवास करती हैं। शक्र! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह बात बतायी कि गौएँ देवताओंके भी ऊपर स्थानमें क्यों निवास करती हैं। शतक्रतु इन्द्र! इसके सिवा ये गौएँ वरदान भी प्राप्त कर चुकी हैं और प्रसन्न होनेपर दूसरोंको वर देनेकी भी शक्ति रखती हैं ॥ २२-२३ ॥
सुरभ्यः पुण्यकर्मिण्यः पावनाः शुभलक्षणाः ।
यदर्थं गां गताश्चैव सुरभ्यः सुरसत्तम ॥ २४ ॥
तच्च मे शृणु कात्स्न्येन वदतो बलसूदन ।
‘सुरभी गौएँ पुण्यकर्म करनेवाली और शुभ-लक्षणा होती हैं। सुरश्रेष्ठ! बलसूदन! वे जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर गयी हैं, उसको भी मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ, सुनो ।। २४½ ।।
पुरा देवयुगे तात देवेन्द्रेषु महात्मसु ।। २५ ।।
त्रींल्लोकाननुशासत्सु विष्णौ गर्भत्वमागते ।
अदित्यास्तप्यमानायास्तपो घोरं सुदुश्चरम् ।। २६ ।।
पुत्रार्थममरश्रेष्ठ पादेनैकेन नित्यदा ।
तां तु दृष्ट्वा महादेवीं तप्यमानां महत्तपः ।। २७ ।।
दक्षस्य दुहिता देवी सुरभी नाम नामतः ।
अतप्यत तपो घोरं हृष्टा धर्मपरायणा ।। २८ ।।
‘तात! पहले सत्ययुगमें जब महामना देवेश्वरगण तीनों लोकोंपर शासन करते थे और अमरश्रेष्ठ! जब देवी अदिति पुत्रके लिये नित्य एक पैरसे खड़ी रहकर अत्यन्त घोर एवं दुष्कर तपस्या करती थी और उस तपस्यासे संतुष्ट होकर साक्षात् भगवान् विष्णु ही उनके गर्भमें पदार्पण करनेवाले थे उन्हीं दिनोंकी बात है, महादेवी अदितिको महान् तप करती देख दक्षकी धर्मपरायणा पुत्री सुरभी देवीने बड़े हर्षके साथ घोर तपस्या आरम्भ की ।। २५—२८ ।।
कैलासशिखरे रम्ये देवगन्धर्वसेविते ।
व्यतिष्ठदेकपादेन परमं योगमास्थिता ।। २९ ।।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
संतप्तास्तपसा तस्या देवाः सर्षिमहोरगाः ।। ३० ।।
‘कैलासके रमणीय शिखरपर जहाँ देवता और गन्धर्व सदा विराजते रहते हैं, वहाँ वह उत्तम योगका आश्रय ले ग्यारह हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़ी रही। उसकी तपस्यासे देवता, ऋषि और बड़े-बड़े नाग भी संतप्त हो उठे ।। २९-३० ।।
तत्र गत्वा मया सार्धं पर्युपासन्त तां शुभाम् ।
अथाहमब्रुवं तत्र देवीं तां तपसान्विताम् ।। ३१ ।।
‘वे सब लोग मेरे साथ ही उस शुभलक्षणा तपस्विनी सुरभी देवीके पास जाकर खड़े हुए। तब मैंने वहाँ उससे कहा— ।। ३१ ।।
किमर्थं तप्यसे देवि तपो घोरमनिन्दिते ।
प्रीतस्तेऽहं महाभागे तपसानेन शोभने ।। ३२ ।।
वरयस्व वरं देवि दातास्मीति पुरंदर ।। ३३ ।।
‘सती-साध्वी देवी! तुम किसलिये यह घोर तपस्या करती हो? शोभने! महाभागे! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। देवि! तुम इच्छानुसार वर माँगो।” पुरंदर! इस तरह मैंने सुरभीको वर माँगनेके लिये प्रेरित किया ।। ३२-३३ ।।
सुरभ्युवाच
वरेण भगवन् मह्यं कृतं लोकपितामह ।
एष एव वरो मेऽद्य यत् प्रीतोऽसि ममानघ ॥ ३४ ॥
**सुरभीने कहा—**भगवन्! निष्पाप लोकपितामह! मुझे वर लेनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे लिये तो सबसे बड़ा वर यही है कि आज आप मुझपर प्रसन्न हो गये हैं॥ ३४ ॥
ब्रह्मोवाच
तामेवं ब्रुवतीं देवीं सुरभिं त्रिदशेश्वर ।
प्रत्यब्रुवं यद् देवेन्द्र तन्निबोध शचीपते ॥ ३५ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**देवेश्वर! देवेन्द्र! शचीपते! जब सुरभी ऐसी बात कहने लगी तब मैंने उसे जो उत्तर दिया, वह सुनो ॥ ३५ ॥
अलोभकाम्यया देवि तपसा च शुभानने ।
प्रसन्नोऽहं वरं तस्मादमरत्वं ददामि ते ॥ ३६ ॥
(मैंने कहा—) देवि! शुभानने! तुमने लोभ और कामनाको त्याग दिया है। तुम्हारी इस निष्काम तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम्हें अमरत्वका वरदान देता हूँ ॥ ३६ ॥
त्रयाणामपि लोकानामुपरिष्टान्निवत्स्यसि ।
मत्प्रसादाच्च विख्यातो गोलोकः सम्भविष्यति ॥ ३७ ॥
तुम मेरी कृपासे तीनों लोकोंके ऊपर निवास करोगी और तुम्हारा वह धाम ‘गोलोक’ नामसे विख्यात होगा ॥ ३७ ॥
मानुषेषु च कुर्वाणाः प्रजाः कर्म शुभास्तव ।
निवत्स्यन्ति महाभागे सर्वा दुहितरश्च ते ॥ ३८ ॥
महाभागे! तुम्हारी सभी शुभ संतानें—समस्त पुत्र और कन्याएँ मानवलोकमें उपयुक्त कर्म करती हुई निवास करेंगी ॥ ३८ ॥
मनसा चिन्तिता भोगास्त्वया वै दिव्यमानुषाः ।
यच्च स्वर्गे सुखं देवि तत् ते सम्पत्स्यते शुभे ॥ ३९ ॥
देवि! शुभे! तुम अपने मनसे जिन दिव्य अथवा मानवी भोगोंका चिन्तन करोगी तथा जो स्वर्गीय सुख होगा, वे सभी तुम्हें स्वतः प्राप्त होते रहेंगे ॥ ३९ ॥
तस्या लोकाः सहस्राक्ष सर्वकामसमन्विताः ।
न तत्र क्रमते मृत्युर्न जरा न च पावकः ॥ ४० ॥
सहस्राक्ष! सुरभीके निवासभूत गोलोकमें सबकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं। वहाँ मृत्यु और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता है। अग्निका भी जोर नहीं चलता ॥ ४० ॥
न दैवं नाशुभं किंचिद् विद्यते तत्र वासव ।
तत्र दिव्यान्तरण्यानि दिव्यानि भवनानि च ॥ ४१ ॥
विमानानि सुयुक्तानि कामगानि च वासव ।
वासव! वहाँ न कोई दुर्भाग्य है और न अशुभ। वहाँ दिव्य वन, दिव्य भवन तथा परम सुन्दर एवं इच्छानुसार विचरनेवाले विमान मौजूद हैं ॥ ४१ १/२ ॥
ब्रह्मचर्येण तपसा यत्नेन च दमेन च ॥ ४२ ॥
दानैश्च विविधैः पुण्यैस्तथा तीर्थानुसेवनात् ।
तपसा महता चैव सुकृतेन च कर्मणा ॥ ४३ ॥
शक्यः समासादयितुं गोलोकः पुष्करेक्षण ।
कमलनयन इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तपस्या, यत्न, इन्द्रियसंयम, नाना प्रकारके दान, पुण्य, तीर्थसेवन, महान् तप और अन्यान्य शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे ही गोलोककी प्राप्ति हो सकती है ॥ ४२-४३ १/२ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया शक्रानुपृच्छते ॥ ४४ ॥
न ते परिभवः कार्यो गवामसुरसूदन ॥ ४५ ॥
असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं। अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये ॥ ४४-४५ ॥
भीष्म उवाच
एतच्छ्रुत्वा सहस्राक्षः पूजयामास नित्यदा ।
गाश्चक्रे बहुमानं च तासु नित्यं युधिष्ठिर ॥ ४६ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रतिदिन गौओंकी पूजा करने लगे। उन्होंने उनके प्रति बहुत सम्मान प्रकट किया ॥ ४६ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं पावनं च महाद्युते ।
पवित्रं परमं चापि गवां माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४७ ॥
महाद्युते! यह सब मैंने तुमसे गौओंका परम पावन, परम पवित्र और अत्यन्त उत्तम माहात्म्य कहा है ॥ ४७ ॥
कीर्तितं पुरुषव्याघ्र सर्वपापविमोचनम् ।
य इदं कथयेन्नित्यं ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥ ४८ ॥
हव्यकव्येषु यज्ञेषु पितृकार्येषु चैव ह ।
सार्वकामिकमक्षय्यं पितृंस्तस्योपतिष्ठते ॥ ४९ ॥
पुरुषसिंह! यदि इसका कीर्तन किया जाय तो यह समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। जो एकाग्रचित्त हो सदा यज्ञ और श्राद्धमें हव्य और कव्य अर्पण करते समय ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उसका दिया हुआ (हव्य और कव्य) समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होगा ॥ ४८-४९ ॥
गोषु भक्तश्च लभते यद् यदिच्छति मानवः ।
स्त्रियोऽपि भक्ता या गोषु ताश्च काममवाप्नुयुः ॥ ५० ॥
गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियोंमें भी जो गौओंकी भक्ता हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं ॥ ५० ॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी तामवाप्नुयात् ।
धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् ॥ ५१ ॥
पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या। धन चाहनेवालेको धन और धर्म चाहनेवालेको धर्म प्राप्त होता है ॥ ५१ ॥
विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम् ।
न किंचिद् दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत ॥ ५२ ॥
विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख। भारत! गोभक्तके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोलोकवर्णने
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोलोकका वर्णनविषयक
तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥
भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका
चतुरशीतितमोऽध्यायः
भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं पितामहेनेदं गवां दानमनुत्तमम् ।
विशेषेण नरेन्द्राणामिह धर्ममवेक्षताम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपने सब मनुष्योंके लिये, विशेषतः धर्मपर दृष्टि रखनेवाले नरेशोंके लिये परम उत्तम गोदानका वर्णन किया है ॥ १ ॥
राज्यं हि सततं दुःखं दुर्धरं चाकृतात्मभिः ।
भूयिष्ठं च नरेन्द्राणां विद्यते न शुभा गतिः ॥ २ ॥
राज्य सदा ही दुःखरूप है। जिन्होंने अपना मन वशमें नहीं किया है, उनके लिये राज्यको सुरक्षित रखना बहुत ही कठिन है। इसलिये प्रायः राजाओंको शुभ गति नहीं प्राप्त होती है ॥ २ ॥
पूयन्ते तत्र नियतं प्रयच्छन्तो वसुन्धराम् ।
सर्वे च कथिता धर्मास्त्वया मे कुरुनन्दन ॥ ३ ॥
उनमें वे ही पवित्र होते हैं जो नियमपूर्वक पृथ्वीका दान करते हैं। कुरुनन्दन! आपने मुझसे समस्त धर्मोंका वर्णन किया है ॥ ३ ॥
एवमेव गवामुक्तं प्रदानं ते नृगेण ह ।
ऋषिणा नाचिकेतैन पूर्वमेव निदर्शितम् ॥ ४ ॥
इसी तरह राजा नृगने जो गोदान किया था तथा नाचिकेत ऋषिने जो गौओंका दान और पूजन किया था, वह सब आपने पहले ही कहा और निर्देश किया है ॥ ४ ॥
वेदोपनिषदश्चैव सर्वकर्मसु दक्षिणाः ।
सर्वक्रतुषु चोद्दिष्टं भूमिर्गावोऽथ काञ्चनम् ॥ ५ ॥
वेद और उपनिषदोंने भी प्रत्येक कर्ममें दक्षिणाका विधान किया है। सभी यज्ञोंमें भूमि, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा बतायी गयी है ॥ ५ ॥
तत्र श्रुतिस्तु परमा सुवर्णं दक्षिणेति वै ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पितामह यथातथम् ॥ ६ ॥
इनमें सुवर्ण सबसे उत्तम दक्षिणा है—ऐसा श्रुतिका वचन है, अतः पितामह! मैं इस विषयको यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ ।। ६ ।।
किं सुवर्णं कथं जातं कस्मिन् काले किमात्मकम् ।
किं दैवं किं फलं चैव कस्माच्च परमुच्यते ।। ७ ।।
सुवर्ण क्या है? कब और किस तरहसे इसकी उत्पत्ति हुई? सुवर्णका उपादान क्या है? इसका देवता कौन है? इसके दानका फल क्या है? सुवर्ण क्यों उत्तम कहलाता है? ।। ७ ।।
कस्माद् दानं सुवर्णस्य पूजयन्ति मनीषिणः ।
कस्माच्च दक्षिणार्थं तद् यज्ञकर्मसु शस्यते ।। ८ ।।
मनीषी विद्वान् सुवर्णदानका अधिक आदर क्यों करते हैं? तथा यज्ञ-कर्मोंमें दक्षिणाके लिये सुवर्णकी प्रशंसा क्यों की जाती है? ।। ८ ।।
कस्माच्च पावनं श्रेष्ठं भूमेर्गोभ्यश्च काञ्चनम् ।
परमं दक्षिणार्थे च तद् ब्रवीहि पितामह ।। ९ ।।
पितामह! क्यों सुवर्ण पृथ्वी और गौओंसे भी पावन और श्रेष्ठ है? दक्षिणाके लिये सबसे उत्तम वह क्यों माना गया है? यह मुझे बताइये ।। ९ ।।
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितो बहुकारणविस्तरम् ।
जातरूपसमुत्पत्तिमनुभूतं च यन्मया ।। १० ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! ध्यान देकर सुनो! सुवर्णकी उत्पत्तिका कारण बहुत विस्तृत है। इस विषयमें मैंने जो अनुभव किया है, उसके अनुसार तुम्हें सब बातें बता रहा हूँ ।। १० ।।
पिता मम महातेजाः शान्तनुर्निधनं गतः ।
तस्य दित्सुरहं श्राद्धं गंगाद्वारमुपागमम् ।। ११ ।।
मेरे महातेजस्वी पिता महाराज शान्तनुका जब देहावसान हो गया तब मैं उनका श्राद्ध करनेके लिये गंगाद्वार तीर्थ (हरद्वार)-में गया ।। ११ ।।
तत्रागम्य पितुः पुत्र श्राद्धकर्म समारभम् ।
माता मे जाह्नवी चात्र साहाय्यमकरोत् तदा ।। १२ ।।
बेटा! वहाँ पहुँचकर मैंने पिताका श्राद्धकर्म आरम्भ किया। इस कार्यमें वहाँ उस समय मेरी माता गंगाने भी बड़ी सहायता की ।। १२ ।।
ततोऽग्रतस्ततः सिद्धानुपवेश्य बहून्ऋषीन् ।
तोयप्रदानात् प्रभृति कार्याण्यहमथारभम् ।। १३ ।।
तदनन्तर अपने सामने बहुत-से सिद्ध-महर्षियोंको बिठाकर मैंने जलदान आदि सारे कार्य आरम्भ किये ।। १३ ।।