महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भाविनि ॥ १ ॥
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय-कुलका संहार
ब्राह्मण उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भाविनि ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा— भामिनि! इस विषयमें भी कार्तवीर्य और समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १ ॥
कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् ।
येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ॥ २ ॥
पूर्वकालमें कार्तवीर्य अर्जुनके नामसे प्रसिद्ध एक राजा था, जिसकी एक हजार भुजाएँ थीं। उसने केवल धनुष-बाणकी सहायतासे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको अपने अधिकारमें कर लिया था ॥ २ ॥
स कदाचित् समुद्रान्ते विचरन् बलदर्पितः ।
अवाकिरन् शरशतैः समुद्रमिति नः श्रुतम् ॥ ३ ॥
सुना जाता है, एक दिन राजा कार्तवीर्य समुद्रके किनारे विचर रहा था। वहाँ उसने अपने बलके घमण्डमें आकर सैकड़ों बाणोंकी वर्षासे समुद्रको आच्छादित कर दिया ॥ ३ ॥
तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाच ह ।
मा मुञ्च वीर नाराचान् ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ४ ॥
मदाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः ।
वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देह्यभयं विभो ॥ ५ ॥
तब समुद्रने प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा—‘वीरवर! राजसिंह! मुझपर बाणोंकी वर्षा न करो। बोलो, तुम्हारी किस आज्ञाका पालन करूँ? शक्तिशाली नरेश्वर! तुम्हारे छोड़े हुए इन महान् बाणोंसे मेरे अन्दर रहनेवाले प्राणियोंकी हत्या हो रही है। उन्हें अभय दान करो’ ॥ ४-५ ॥
अर्जुन उवाच
मत्समो यदि संग्रामे शरासनधरः क्वचित् ।
विद्यते तं समाचक्ष्व यः समासीत मां मृधे ॥ ६ ॥
**कार्तवीर्य अर्जुन बोला—**समुद्र! यदि कहीं मेरे समान धनुर्धर वीर मौजूद हो, जो युद्धमें मेरा मुकाबला कर सके तो उसका पता बता दो। फिर मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊँगा ।। ६ ।।
समुद्र उवाच
महर्षिर्जमदग्निस्ते यदि राजन् परिश्रुतः ।
तस्य पुत्रस्तवातिथ्यं यथावत् कर्तुमर्हति ।। ७ ।।
**समुद्रने कहा—**राजन्! यदि तुमने महर्षि जमदग्निका नाम सुना हो तो उन्हींके आश्रमपर चले जाओ। उनके पुत्र परशुरामजी तुम्हारा अच्छी तरह सत्कार कर सकते हैं ।। ७ ।।
ततः स राजा प्रययौ क्रोधेन महता वृतः ।
स तमाश्रममागम्य राममेवान्वपद्यत ।। ८ ।।
स रामप्रतिकूलानि चकार सह बन्धुभिः ।
आयासं जनयामास रामस्य च महात्मनः ।। ९ ।।
ततस्तेजः प्रजज्वाल रामस्यामिततेजसः ।
प्रदहन् रिपुसैन्यानि तदा कमललोचने ।। १० ।।
ततः परशुमादाय स तं बाहुसहस्रिणम् ।
चिच्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्रुमम् ॥ ११ ॥
(ब्राह्मणने कहा—) कमलके समान नेत्रोंवाली देवि! तदनन्तर राजा कार्तवीर्य बड़े क्रोधमें भरकर महर्षि जमदग्निके आश्रमपर परशुरामजीके पास जा पहुँचा और अपने भाई-बन्धुओंके साथ उनके प्रतिकूल बर्ताव करने लगा। उसने अपने अपराधोंसे महात्मा परशुरामजीको उद्विग्न कर दिया। फिर तो शत्रु-सेनाको भस्म करनेवाला अमित तेजस्वी परशुरामजीका तेज प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने अपना फरसा उठाया और हजार भुजाओंवाले उस राजाको अनेक शाखाओंसे युक्त वृक्षकी भाँति सहसा काट डाला ॥ ८—११ ॥
तं हतं पतितं दृष्ट्वा समेताः सर्वबान्धवाः ।
असीनादाय शक्तीश्च भार्गवं पर्यधावयन् ॥ १२ ॥
उसे मरकर जमीनपर पड़ा देख उसके सभी बन्धु-बान्धव एकत्र हो गये तथा हाथोंमें तलवार और शक्तियाँ लेकर परशुरामजीपर चारों ओरसे टूट पड़े ॥ १२ ॥
रामोऽपि धनुरादाय रथमारुह्य सत्वरः ।
विसृजन् शरवर्षाणि व्यधमत् पार्थिवं बलम् ॥ १३ ॥
इधर परशुरामजी भी धनुष लेकर तुरंत रथपर सवार हो गये और बाणोंकी वर्षा करते हुए राजाकी सेनाका संहार करने लगे ॥ १३ ॥
ततस्तु क्षत्रियाः केचिज्जामदग्न्यभयार्दिताः ।
विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहार्दिता इव ॥ १४ ॥
उस समय बहुत-से क्षत्रिय परशुरामजीके भयसे पीड़ित हो सिंहके सताये हुए मृगोंकी भाँति पर्वतोंकी गुफाओंमें घुस गये ॥ १४ ॥
तेषां स्वविहितं कर्म तद्भयान्नानुतिष्ठताम् ।
प्रजा वृषलतां प्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥ १५ ॥
उन्होंने उनके डरसे अपने क्षत्रियोचित कर्मोंका भी त्याग कर दिया। बहुत दिनोंतक ब्राह्मणोंका दर्शन न कर सकनेके कारण वे धीरे-धीरे अपने कर्म भूलकर शूद्र हो गये ॥ १५ ॥
एवं ते द्रविडाऽऽभीराः पुण्ड्राश्च शबरैः सह ।
वृषलत्वं परिगता व्युत्थानात् क्षत्रधर्मिणः ॥ १६ ॥
इस प्रकार द्रविड, आभीर, पुण्ड्र और शबरोंके सहवासमें रहकर वे क्षत्रिय होते हुए भी धर्म-त्यागके कारण शूद्रकी अवस्थामें पहुँच गये ॥ १६ ॥
ततश्च हतवीरासु क्षत्रियासु पुनः पुनः ।
द्विजैरुत्पादितं क्षत्रं जामदग्न्यो न्यकृन्तत ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् क्षत्रियवीरोंके मारे जानेपर ब्राह्मणोंने उनकी स्त्रियोंसे नियोगकी विधिके अनुसार पुत्र उत्पन्न किये, किंतु उन्हें भी बड़े होनेपर परशुरामजीने फरसेसे काट डाला ॥ १७ ॥
एकविंशतिमेधान्ते रामं वागशरीरिणी ।
दिव्या प्रोवाच मधुरा सर्वलोकपरिश्रुता ॥ १८ ॥
इस प्रकार एक-एक करके जब इक्कीस बार क्षत्रियोंका संहार हो गया, तब परशुरामजीको दिव्य आकाशवाणीने मधुर स्वरमें सब लोगोंके सुनते हुए यह कहा — ॥ १८ ॥
राम राम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि ।
क्षत्रबन्धूनिमान् प्राणैर्विप्रयोज्य पुनः पुनः ॥ १९ ॥
‘बेटा! परशुराम! इस हत्याके कामसे निवृत्त हो जाओ। परशुराम! भला बारंबार इन बेचारे क्षत्रियोंके प्राण लेनेमें तुम्हें कौन-सा लाभ दिखायी देता है?’ ॥ १९ ॥
तथैव तं महात्मानमृचीकप्रमुखास्तदा ।
पितामहा महाभाग निवर्तस्वेत्यथाब्रुवन् ॥ २० ॥
उस समय महात्मा परशुरामजीको उनके पितामह ऋचीक आदिने भी इसी प्रकार समझाते हुए कहा—‘महाभाग! यह काम छोड़ दो, क्षत्रियोंको न मारो’ ॥ २० ॥
पितुर्वधममृष्यंस्तु रामः प्रोवाच तानृषीन् ।
नार्हन्तीह भवन्तो मां निवारयितुमित्युत ॥ २१ ॥
पिताके वधको सहन न करते हुए परशुरामजीने उन ऋषियोंसे इस प्रकार कहा —‘आपलोगोंको मुझे इस कामसे निवारण नहीं करना चाहिये’ ॥ २१ ॥
पितर ऊचुः
नार्हसे क्षत्रबन्धूंस्त्वं निहन्तुं जयतां वर ।
नेह युक्तं त्वया हन्तुं ब्राह्मणेन सता नृपान् ॥ २२ ॥
**पितर बोले—**विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ परशुराम! बेचारे क्षत्रियोंको मारना तुम्हारे योग्य नहीं है; क्योंकि तुम ब्राह्मण हो, अतः तुम्हारे हाथसे राजाओंका वध होना उचित नहीं है ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥