महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2287)
अष्टमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना
युधिष्ठिर उवाच
एवमेतत् करिष्यामि यथाऽऽत्थ पृथिवीपते ।
भूयश्चैवानुशास्योऽहं भवता पार्थिवर्षभ ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— पृथ्वीनाथ! नृपश्रेष्ठ! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही करूँगा। अभी आप मुझे कुछ और उपदेश दीजिये ॥ १ ॥
भीष्मे स्वर्गमनुप्राप्ते गते च मधुसूदने ।
विदुरे संजये चैव कोऽन्यो मां वक्तुमर्हति ॥ २ ॥
भीष्मजी स्वर्ग सिधारे, भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका पधारे और विदुर तथा संजय भी आपके साथ ही जा रहे हैं। अब दूसरा कौन रह जाता है, जो मुझे उपदेश दे सके ॥ २ ॥
यत् तु मामनुशास्तीह भवानद्य हिते स्थितः ।
कर्तास्मि तन्महीपाल निर्वृतो भव पार्थिव ॥ ३ ॥
भूपाल! पृथ्वीपते! आज मेरे हितसाधनमें संलग्न होकर आप मुझे यहाँ जो कुछ उपदेश देते हैं, मैं उसका पालन करूँगा। आप संतुष्ट हों ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स राजर्षिर्धर्मराजेन धीमता ।
कौन्तेयं समनुज्ञातुमियेष भरतर्षभ ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर राजर्षि धृतराष्ट्रने कुन्तीकुमारसे जानेके लिये अनुमति लेनेकी इच्छा की और कहा — ॥ ४ ॥
पुत्र संशाम्यतां तावन्ममापि बलवान् श्रमः ।
इत्युक्त्वा प्राविशद् राजा गान्धार्या भवनं तदा ॥ ५ ॥
‘बेटा! अब शान्त रहो। मुझे बोलनेमें बड़ा परिश्रम होता है (अब तो मैं जानेकी ही अनुमति चाहता हूँ)।’ ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने उस समय गान्धारीके भवनमें प्रवेश किया ॥ ५ ॥
तमासनगतं देवी गान्धारी धर्मचारिणी ।
उवाच काले कालज्ञा प्रजापतिसमं पतिम् ॥ ६ ॥
वहाँ जब वे आसनपर विराजमान हुए, तब समयका ज्ञान रखनेवाली धर्मपरायणा गान्धारी देवीने उस समय प्रजापतिके समान अपने पतिसे इस प्रकार पूछा— ॥ ६ ॥
अनुज्ञातः स्वयं तेन व्यासेन त्वं महर्षिणा ।
युधिष्ठिरस्यानुमते कदारण्यं गमिष्यसि ॥ ७ ॥
‘महाराज! स्वयं महर्षि व्यासने आपको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी है और युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल ही गयी है। अब आप कब वनको चलेंगे?’ ॥ ७ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
गान्धार्यहमनुज्ञातः स्वयं पित्रा महात्मना ।
युधिष्ठिरस्यानुमते गन्तास्मि नचिराद् वनम् ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— गान्धारि! मेरे महात्मा पिता व्यासने स्वयं तो आज्ञा दे ही दी है, युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है; अतः अब मैं जल्दी ही वनको चलूँगा ॥ ८ ॥
अहं हि तावत् सर्वेषां तेषां दुर्धूतदेविनाम् ।
पुत्राणां दातुमिच्छामि प्रेतभावानुगं वसु ॥ ९ ॥
सर्वप्रकृतिसांनिध्यं कारयित्वा स्ववेश्मनि ।
जानेके पहले मैं चाहता हूँ कि समस्त प्रजाको घरपर बुलाकर अपने मरे हुए उन जुआरी पुत्रोंके उद्देश्यसे उनके पारलौकिक लाभके लिये कुछ धन दान कर दूँ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजाय प्रेषयामास वै तदा ॥ १० ॥
स च तद् वचनात् सर्वं समानिन्ये महीपतिः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने धर्मराज युधिष्ठिरके पास अपना विचार कहला भेजा। राजा युधिष्ठिरने देनेके लिये उनकी आज्ञाके अनुसार वह सब सामग्री जुटा दी (धृतराष्ट्रने उसका यथायोग्य वितरण कर दिया) ॥ १०½ ॥
ततः प्रतीतमनसो ब्राह्मणाः कुरुजाङ्गलाः ॥ ११ ॥
क्षत्रियाश्चैव वैश्याश्च शूद्राश्चैव समाययुः ।
उधर राजाका संदेश पाकर कुरुजांगलदेशके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वहाँ आये। उन सबके हृदयमें बड़ी प्रसन्नता थी ॥ ११½ ॥
ततो निष्क्रम्य नृपतिस्तस्मादन्तःपुरात् तदा ॥ १२ ॥
ददृशे तं जनं सर्वं सर्वाश्च प्रकृतीस्तथा ।
तदनन्तर महाराज धृतराष्ट्र अन्तःपुरसे बाहर निकले और वहाँ नगर तथा जनपदकी समस्त प्रजाके उपस्थित होनेका समाचार सुना ॥ १२½ ॥
समवेतांश्च तान् सर्वान् पौरान् जानपदांस्तथा ॥ १३ ॥
तानागतानभिप्रेक्ष्य समस्तं च सुहृज्जनम् ।
ब्राह्मणांश्च महीपाल नानादेशसमागतान् ॥ १४ ॥
उवाच मतिमान् राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
भूपाल जनमेजय! राजाने देखा कि समस्त पुरवासी और जनपदके लोग वहाँ आ गये हैं। सम्पूर्ण सुहृद्-वर्गके लोग भी उपस्थित हैं और नाना देशोंके ब्राह्मण भी पधारे हैं। तब बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उन सबको लक्ष्य करके कहा— ॥ १३-१४ १/२ ॥
भवन्तः कुरवश्चैव चिरकालं सहोषिताः ॥ १५ ॥
परस्परस्य सुहृदः परस्परहिते रताः ।
‘सज्जनो! आप और कौरव चिरकालसे एक साथ रहते आये हैं। आप दोनों एक-दूसरेके सुहृद् हैं और दोनों सदा एक-दूसरेके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ १५ १/२ ॥
यदिदानीमहं ब्रूयामस्मिन् काले उपस्थिते ॥ १६ ॥
तथा भवद्भिः कर्तव्यमविचार्य वचो मम ।
‘इस समय मैं आपलोगोंसे वर्तमान अवसरपर जो कुछ कहूँ, मेरी उस बातको आपलोग बिना विचारे स्वीकार करें; यही मेरी प्रार्थना है ॥ १६ १/२ ॥
अरण्यगमने बुद्धिर्गान्धारीसहितस्य मे ॥ १७ ॥
व्यासस्यानुमते राजंस्तथा कुन्तीसुतस्य मे ।
‘मैंने गान्धारीके साथ वनमें जानेका निश्चय किया है; इसके लिये मुझे महर्षि व्यास तथा कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है ॥ १७ १/२ ॥
भवन्तोऽप्यनुजानन्तु मा च वोऽभूद् विचारणा ॥ १८ ॥
अस्माकं भवतां चैव येयं प्रीतिर्हि शाश्वती ।
न च सान्येषु देशेषु राज्ञामिति मतिर्मम ॥ १९ ॥
‘अब आपलोग भी मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें। इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आपलोगोंका हमारे साथ जो यह प्रेम-सम्बन्ध सदासे चला आ रहा है, ऐसा सम्बन्ध दूसरे देशके राजाओंके साथ वहाँकी प्रजाका नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १८-१९ ॥
शान्तोऽस्मि वयसानेन तथा पुत्रविनाकृतः ।
उपवासकृशश्चास्मि गान्धारीसहितोऽनघाः ॥ २० ॥
‘निष्पाप प्रजाजन! अब इस बुढ़ापेने गरधारीसहित मुझको बहुत थका दिया है। पुत्रोंके मारे जानेका दुःख भी बना ही रहता है तथा उपवास करनेके कारण भी हम दोनों अधिक दुर्बल हो गये हैं ॥ २० ॥
युधिष्ठिरगते राज्ये प्राप्तश्चास्मि सुखं महत् ।
मन्ये दुर्योधनैश्वर्याद् विशिष्टमिति सत्तमाः ॥ २१ ॥
‘सज्जनो! युधिष्ठिरके राज्यमें मुझे बड़ा सुख मिला है। मैं समझता हूँ कि दुर्योधनके राज्यसे भी बढ़कर सुख मुझे प्राप्त हुआ है’ ॥ २१ ॥
मम चान्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य का गतिः ।
ऋते वनं महाभागास्तन्मानुज्ञातुमर्हथ ॥ २२ ॥
‘एक तो मैं जन्मका अन्धा हूँ, दूसरे बूढ़ा हो गया हूँ, तीसरे मेरे सभी पुत्र मारे गये हैं। महाभाग प्रजाजन! अब आप ही बतायें, वनमें जानेके सिवा मेरे लिये दूसरी कौन-सी गति है? इसलिये अब आपलोग मुझे जानेकी आज्ञा दें’ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सर्वे ते कुरुजाङ्गलाः ।
बाष्पसंदिग्धया वाचा रुरुदुर्भर्तर्षभ ॥ २३ ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्रकी ये बातें सुनकर वहाँ उपस्थित हुए कुरुजांगलनिवासी सभी मनुष्योंके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली और वे फूट-फूटकर रोने लगे ॥ २३ ॥
तानविब्रुवतः किंचित् सर्वान् शोकपरायणान् ।
पुनरेव महातेजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥ २४ ॥
उन सबको शोकमग्न होकर कुछ भी उत्तर न देते देख महातेजस्वी धृतराष्ट्रने पुनः बोलना आरम्भ किया ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि
धृतराष्ट्रकृतवनगमनप्रार्थनेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रकी वनमें जानेके लिये प्रार्थनाविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥