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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 719 of 2566

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Page 719

असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं। अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये ॥ ४४-४५ ॥

भीष्म उवाच

एतच्छ्रुत्वा सहस्राक्षः पूजयामास नित्यदा ।
गाश्चक्रे बहुमानं च तासु नित्यं युधिष्ठिर ॥ ४६ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रतिदिन गौओंकी पूजा करने लगे। उन्होंने उनके प्रति बहुत सम्मान प्रकट किया ॥ ४६ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं पावनं च महाद्युते ।
पवित्रं परमं चापि गवां माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४७ ॥
महाद्युते! यह सब मैंने तुमसे गौओंका परम पावन, परम पवित्र और अत्यन्त उत्तम माहात्म्य कहा है ॥ ४७ ॥
कीर्तितं पुरुषव्याघ्र सर्वपापविमोचनम् ।
य इदं कथयेन्नित्यं ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥ ४८ ॥
हव्यकव्येषु यज्ञेषु पितृकार्येषु चैव ह ।
सार्वकामिकमक्षय्यं पितृंस्तस्योपतिष्ठते ॥ ४९ ॥
पुरुषसिंह! यदि इसका कीर्तन किया जाय तो यह समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। जो एकाग्रचित्त हो सदा यज्ञ और श्राद्धमें हव्य और कव्य अर्पण करते समय ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उसका दिया हुआ (हव्य और कव्य) समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होगा ॥ ४८-४९ ॥
गोषु भक्तश्च लभते यद् यदिच्छति मानवः ।
स्त्रियोऽपि भक्ता या गोषु ताश्च काममवाप्नुयुः ॥ ५० ॥
गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियोंमें भी जो गौओंकी भक्ता हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं ॥ ५० ॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी तामवाप्नुयात् ।
धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् ॥ ५१ ॥
पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या। धन चाहनेवालेको धन और धर्म चाहनेवालेको धर्म प्राप्त होता है ॥ ५१ ॥
विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम् ।
न किंचिद् दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत ॥ ५२ ॥
विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख। भारत! गोभक्तके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ५२ ॥