महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2408)
षट्त्रिंशोऽध्यायः
व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना
जनमेजय उवाच
दृष्ट्वा पुत्रांस्तथा पौत्रान् सानुबन्धान् जनाधिपः ।
धृतराष्ट्रः किमकरोद् राजा चैव युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! राजा धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरने परलोकसे आये हुए पुत्रों, पौत्रों तथा सगे-सम्बन्धियोंके दर्शन करके क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं पुत्राणां दर्शनं नृप ।
वीतशोकः स राजर्षिः पुनराश्रममागमत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— नरेश्वर! मरे हुए पुत्रोंका दर्शन एक महान् आश्चर्यकी घटना थी। उसे देखकर राजर्षि धृतराष्ट्रका दुःख-शोक दूर हो गया। वे फिर अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २ ॥
इतरस्तु जनः सर्वस्ते चैव परमर्षयः ।
प्रतिजग्मुर्यथाकामं धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञया ॥ ३ ॥
दूसरे सब लोग तथा महर्षिगण धृतराष्ट्रकी अनुमति ले अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको चले गये ॥ ३ ॥
पाण्डवास्तु महात्मानो लघुभूयिष्ठसैनिकाः ।
पुनर्जग्मुर्महात्मानं सदारास्तं महीपतिम् ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डव छोटे-बड़े सैनिकों और अपनी स्त्रियोंके साथ पुनः महामना राजा धृतराष्ट्रके पीछे-पीछे गये ॥ ४ ॥
तत्राश्रमपदं धीमान् ब्रह्मर्षिर्लोकपूजितः ।
मुनिः सत्यवतीपुत्रो धृतराष्ट्रमभाषत ॥ ५ ॥
उस समय लोकपूजित बुद्धिमान् सत्यवतीनन्दन ब्रह्मर्षि व्यास भी उस आश्रमपर गये तथा इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्र महाबाहो शृणु कौरवनन्दन ।
श्रुतं ते ज्ञानवृद्धानामृषीणां पुण्यकर्मणाम् ॥ ६ ॥
श्रद्धाभिजनवृद्धानां वेदवेदाङ्गवेदिनाम् ।
धर्मज्ञानां पुराणानां वदतां विविधाः कथाः ॥ ७ ॥
मा स्म शोके मनः कार्षीर्दिष्टे न व्यथते बुधः ।
‘कौरवनन्दन महाबाहु धृतराष्ट्र! तुमने श्रद्धा और कुलमें बढ़े-चढ़े, वेद-वेदांगवेत्ता, ज्ञानवृद्ध, पुण्यकर्मा एवं धर्मज्ञ प्राचीन महर्षियोंके मुखसे नाना प्रकारकी कथाएँ सुनी हैं; अतः अपने मनसे शोकको निकाल दो; क्योंकि विद्वान् पुरुष प्रारब्धके विधानमें दुःख नहीं मानते हैं ।। ६-७ १/२ ।।
श्रुतं देवरहस्यं ते नारदाद् देवदर्शनात् ।। ८ ।।
गतास्ते क्षत्रधर्मेण शस्त्रपूतां गतिं शुभाम् ।
यथा दृष्टास्त्वया पुत्रास्तथा कामविहारिणः ।। ९ ।।
‘तुमने देवदर्शी नारद मुनिसे देवताओंका गुप्त रहस्य भी सुन लिया है। वे सब वीर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार शस्त्रोंसे पवित्र हुई शुभ गतिको प्राप्त हुए हैं। जैसा कि तुमने देखा है, तुम्हारे सभी पुत्र इच्छानुसार विहार करनेवाले स्वर्गवासी हुए हैं ।। ८-९ ।।
युधिष्ठिरः स्वयं धीमान् भवन्तमनुरुध्यते ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैः सदारः ससुहृज्जनः ।। १० ।।
‘ये बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर अपने समस्त भाइयों, घरकी स्त्रियों और सुहृदोंके साथ स्वयं तुम्हारी सेवामें लगे हुए हैं ।। १० ।।
विसर्जयैनं यात्वेष स्वराज्यमनुशासताम् ।
मासः समधिकस्तेषामतीतो वसतां वने ।। ११ ।।
‘अब इन्हें विदा कर दो। ये जायँ और अपने राज्यका काम सँभालें। इन लोगोंको वनमें रहते एक महीनेसे अधिक हो गया ।। ११ ।।
एतद्धि नित्यं यत्नेन पदं रक्ष्यं नराधिप ।
बहुप्रत्यर्थिकं ह्येतद् राज्यं नाम कुरूद्वह ।। १२ ।।
‘कुरुश्रेष्ठ! नरेश्वर! राज्यके बहुत-से शत्रु होते हैं; अतः इसकी सदा ही यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये’ ।। १२ ।।
इत्युक्तः कौरवो राजा व्यासेनासुलतेजसा ।
युधिष्ठिरमथाहूय वाग्मी वचनमब्रवीत् ।। १३ ।।
अनुपम तेजस्वी व्यासजीके ऐसा कहनेपर प्रवचनकुशल कुरुराज धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरको बुलाकर इस प्रकार कहा— ।। १३ ।।
अजातशत्रो भद्रं ते शृणु मे भ्रातृभिः सह ।
त्वत्प्रसादान्महीपाल शोको नास्मान् प्रबाधते ।। १४ ।।
‘अजातशत्रो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपने भाइयोंसहित मेरी बात सुनो। भूपाल! तुम्हारे प्रसादसे अब हमलोगोंको किसी प्रकारका शोक कष्ट नहीं दे रहा है ।। १४ ।।
रमे चाहं त्वया पुत्र पुरेव गजसाह्वये ।
नाथेनानुगतो विद्वन् प्रियेषु परिवर्तिना ।। १५ ।।
प्राप्तं पुत्रफलं त्वत्तः प्रीतिर्मे परमा त्वयि ।
न मे मन्युर्महाबाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम् ॥ १६ ॥
'बेटा! तुम्हारे साथ रहकर तथा तुम-जैसे रक्षकसे सुरक्षित होकर मैं उसी तरह आनन्दका अनुभव कर रहा हूँ, जैसे पहले हस्तिनापुरमें करता था। विद्वन्! प्रियजनोंकी सेवामें लगे रहनेवाले तुम्हारे द्वारा मुझे पुत्रका फल प्राप्त हो गया। तुमपर मेरा बहुत प्रेम है। महाबाहो! पुत्र! मेरे मनमें तुम्हारे प्रति किंचिन्मात्र भी क्रोध नहीं है; अतः तुम राजधानीको जाओ, अब विलम्ब न करो ॥ १५-१६ ॥
भवन्तं चेह सम्प्रेक्ष्य तपो मे परिहीयते ।
तपोयुक्तं शरीरं च त्वां दृष्ट्वा धारितं पुनः ॥ १७ ॥
'तुमको यहाँ देखकर मेरी तपस्यामें बाधा पड़ रही है। यह शरीर तपस्यामें लगा दिया था, परंतु तुम्हें देखकर फिर इसकी रक्षा करने लगा ॥ १७ ॥
मातरौ ते तथैवेमे शीर्णपर्णकृताशने ।
मम तुल्यव्रते पुत्र न चिरं वर्तयिष्यतः ॥ १८ ॥
बेटा! मेरी ही तरह तुम्हारी ये दोनों माताएँ भी व्रत धारणपूर्वक सूखे पत्ते चबाकर रहा करती हैं। अब ये अधिक दिनोंतक जीवन धारण नहीं कर सकतीं ॥ १८ ॥
दुर्योधनप्रभृतयो दृष्टा लोकान्तरं गताः ।
व्यासस्य तपसो वीर्याद् भवतश्च समागमात् ॥ १९ ॥
प्रयोजनं च निर्वृत्तं जीवितस्य ममानघ ।
उग्रं तपः समास्थास्ये त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ २० ॥
'तुम्हारे समागम और व्यासजीके तपोबलसे मुझे अपने परलोकवासी पुत्र दुर्योधन आदिके दर्शन हो गये; इसलिये मेरे जीवित रहनेका प्रयोजन पूरा हो गया। अनघ! अब मैं कठोर तपस्यामें संलग्न होऊँगा। तुम इसके लिये मुझे अनुमति दे दो ॥ १९-२० ॥
त्वय्यद्य पिण्डः कीर्तिश्च कुलं चेदं प्रतिष्ठितम् ।
श्वो वाद्य वा महाबाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम् ॥ २१ ॥
'महाबाहो! आजसे पितरोंके पिण्डका, सुयशका और इस कुलका भार भी तुम्हारे ही ऊपर है। पुत्र! आज या कल अवश्य चले जाओ; विलम्ब न करना ॥
राजनीतिः सुबहुशः श्रुता ते भरतर्षभ ।
संदेश्टव्यं न पश्यामि कृतं मे भवता विभो ॥ २२ ॥
'भरतश्रेष्ठ! प्रभो! तुमने राजनीति बहुत बार सुनी है; अतः तुम्हें संदेश देने लायक कोई बात मुझे नहीं दिखायी देती। तुमने मेरे लिये बहुत कुछ किया है ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवचनं तं तु नृपो राजानमब्रवीत् ।
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्रने वैसी बात कही, तब
युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार कहा—'धर्मके ज्ञाता महाराज! आप मेरा परित्याग न करें,
क्योंकि मैं सर्वथा निरपराध हूँ ॥ २३ ॥
कामं गच्छन्तु मे सर्वे भ्रातरोऽनुचरास्तथा ।
भवन्तमहमन्विष्ये मातरौ च यतव्रतः ॥ २४ ॥
'मेरे ये सब भाई और सेवक इच्छा हो तो चले जायें; किंतु मैं नियम और व्रतका पालन
करता हुआ आपकी तथा इन दोनों माताओंकी सेवा करूँगा ॥ २४ ॥
तमुवाचाथ गान्धारी मैवं पुत्र शृणुष्व च ।
त्वय्यधीनं कुरुकुलं पिण्डश्च श्वशुरस्य मे ॥ २५ ॥
गम्यतां पुत्र पर्याप्तमेतावत् पूजिता वयम् ।
राजा यदाह तत् कार्यं त्वया पुत्र पितुर्वचः ॥ २६ ॥
यह सुनकर गान्धारीने कहा—'बेटा! ऐसी बात न कहो। मैं जो कहती हूँ उसे सुनो। यह
सारा कुरुकुल तुम्हारे ही अधीन है। मेरे श्वशुरका पिण्ड भी तुमपर ही अवलम्बित है; अतः
पुत्र! तुम जाओ, तुमने हमारे लिये जितना किया है, वही बहुत है। तुम्हारे द्वारा हमलोगोंका
स्वागत-सत्कार भलीभाँति हो चुका है। इस समय महाराज जो आज्ञा दे रहे हैं, वही करो;
क्योंकि पिताका वचन मानना तुम्हारा कर्तव्य है' ॥ २५-२६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तु गान्धार्या कुन्तीमिदमभाषत ।
स्नेहबाष्पाकुले नेत्रे प्रमृज्य रुदतीं वचः ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! गान्धारीके इस प्रकार आदेश देनेपर राजा
युधिष्ठिरने अपने आँसूभरे नेत्रोंको पोंछकर रोती हुई कुन्तीसे कहा— ॥ २७ ॥
विसर्जयति मां राजा गान्धारी च यशस्विनी ।
भवत्यां बद्धचित्तस्तु कथं यास्यामि दुःखितः ॥ २८ ॥
'माँ! राजा और यशस्विनी गान्धारीदेवी भी मुझे घर लौटनेकी आज्ञा दे रही हैं; किंतु
मेरा मन आपमें लगा हुआ है। जानेका नाम सुनकर ही मैं बहुत दुखी हो जाता हूँ। ऐसी
दशामें मैं कैसे जा सकूँगा? ॥ २८ ॥
न चोत्सहे तपोविघ्नं कर्तुं ते धर्मचारिणि ।
तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥ २९ ॥
'धर्मचारिणि! मैं आपकी तपस्यामें विघ्न डालना नहीं चाहता; क्योंकि तपसे बढ़कर
कुछ नहीं है। (निष्काम भावपूर्वक) तपस्यासे परब्रह्म परमात्माकी भी प्राप्ति हो जाती
है ॥ २९ ॥
ममापि न तथा राज्ञि राज्ये बुद्धिर्यथा पुरा ।
तपस्येवानुरक्तं मे मनः सर्वात्मना तथा ॥ ३० ॥
'रानी माँ! अब मेरा मन भी पहलेकी तरह राजकाजमें नही लगता है। हर तरहसे तपस्या करनेको ही जी चाहता है ॥ ३० ॥
शून्येयं च मही कृत्स्ना न मे प्रीतिकरी शुभे ।
बान्धवा नः परिक्षीणा बलं नो न यथा पुरा ॥ ३१ ॥
'शुभे! यह सारी पृथ्वी मेरे लिये सूनी हो गयी है; अतः इससे मुझे प्रसन्नता नहीं होती। हमारे सगे-सम्बन्धी नष्ट हो गये; अब हमारे पास पहलेकी तरह सैन्यबल भी नहीं है ॥ ३१ ॥
पञ्चालाः सुभृशं क्षीणाः कथामात्रावशेषिताः ।
न तेषां कुलकर्तारं कंचित् पश्याम्यहं शुभे ॥ ३२ ॥
'पांचालोंका तो सर्वथा नाश ही हो गया। उनकी कथामात्र शेष रह गयी है। शुभे! अब मुझे कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो उनके वंशको चलानेवाला हो ॥ ३२ ॥
सर्वे हि भस्मसान्नीतास्ते द्रोणेन रणाजिरे ।
अवशिष्टाश्च निहता द्रोणपुत्रेण वै निशि ॥ ३३ ॥
'प्रायः द्रोणाचार्यने ही सबको समरांगणमें भस्म कर डाला था। जो थोड़े-से बच गये थे, उन्हें द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने रातको सोते समय मार डाला ॥ ३३ ॥
चेदयश्चैव मत्स्याश्च दृष्टपूर्वास्तथैव नः ।
केवलं वृष्णिचक्रं च वासुदेवपरिग्रहात् ॥ ३४ ॥
'हमारे सम्बन्धी चेदि और मत्स्यदेशके लोग भी जैसे पहले देखे गये थे, वैसे ही अब नहीं रहे। केवल भगवान् श्रीकृष्णके आश्रयसे वृष्णिवंशी वीरोंका समुदाय अबतक सुरक्षित है ॥ ३४ ॥
यद् दृष्ट्वा स्थातुमिच्छामि धर्मार्थं नार्थहेतुतः ।
शिवेन पश्य नः सर्वान् दुर्लभं तव दर्शनम् ॥ ३५ ॥
अविषह्यं च राजा हि तीव्रं चारप्स्यते तपः ।
'उसे ही देखकर अब मैं केवल धर्मसम्पादनकी इच्छासे यहाँ रहना चाहता हूँ, धनके लिये नहीं। तुम हम सब लोगोंकी ओर कल्याणमयी दृष्टिसे देखो; क्योंकि तुम्हारा दर्शन हमलोगोंके लिये अब दुर्लभ हो जायगा। कारण कि राजा धृतराष्ट्र अब बड़ी कठोर और असह्य तपस्या आरम्भ करेंगे' ॥ ३५ १/२ ॥
एतच्छ्रुत्वा महाबाहुः सहदेवो युधां पतिः ॥ ३६ ॥
युधिष्ठिरमुवाचेदं बाष्पव्याकुललोचनः ।
यह सुनकर योद्धाओंके स्वामी महाबाहु सहदेव अपने दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ ३६ १/२ ॥
नोत्सहेऽहं परित्यक्तुं मातरं भरतर्षभ ॥ ३७ ॥
प्रतियातु भवान् क्षिप्रं तपस्तप्स्याम्यहं विभो ।
इहैव शोषयिष्यामि तपसेदं कलेवरम् ॥ ३८ ॥
पादशुश्रूषणे रक्तो राज्ञो मात्रोस्तथानयोः ।
‘भरतश्रेष्ठ! मुझमें माताजीको छोड़कर जानेका साहस नहीं है। प्रभो! आप शीघ्र लौट जायँ। मैं यहीं रहकर तपस्या करूँगा और तपके द्वारा अपने शरीरको सुखा डालूँगा। मैं यहाँ महाराज और इन दोनों माताओंके चरणोंकी सेवामें ही अनुरक्त रहना चाहता हूँ’ ॥
तमुवाच ततः कुन्ती परिष्वज्य महाभुजम् ॥ ३९ ॥
गम्यतां पुत्र मैवं त्वं वोचः कुरु वचो मम ।
आगमा वः शिवाः सन्तु स्वस्था भवत पुत्रकाः ॥ ४० ॥
यह सुनकर कुन्तीने महाबाहु सहदेवको छातीसे लगा लिया और कहा—‘बेटा! ऐसा न कहो। तुम मेरी बात मानो और चले जाओ। पुत्रो! तुम्हारे मार्ग कल्याणकारी हों और तुम सदा स्वस्थ रहो ॥ ३९-४० ॥
उपरोधो भवेदेवमस्माकं तपसः कृते ।
त्वत्स्नेहपाशबद्धा च हीयेयं तपसः परात् ॥ ४१ ॥
तस्मात् पुत्रक गच्छ त्वं शिष्टमल्पं च नः प्रभो ।
'तुम लोगोंके रहनेसे हमलोगोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ेगा। मैं तुम्हारे स्नेहपाशमें बँधकर उत्तम तपस्यासे गिर जाऊँगी, अतः सामर्थ्यशाली पुत्र! चले जाओ। अब हमलोगोंकी आयु बहुत थोड़ी रह गयी है' ।। ४११/२ ।।
एवं संस्तम्भितं वाक्यैः कुन्त्या बहुविधैर्मनः ।। ४२ ।।
सहदेवस्य राजेन्द्र राज्ञश्चैव विशेषतः ।
राजेन्द्र! इस तरह अनेक प्रकारकी बातें कहकर कुन्तीने सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरके मनको धीरज बँधाया ।। ४२१/२ ।।
ते मात्रा समनुज्ञाता राज्ञा च कुरुपुङ्गवाः ।। ४३ ।।
अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठमामन्त्रयितुमारेभन् ।
माता तथा धृतराष्ट्रकी आज्ञा पाकर कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंने कुरुकुलतिलक धृतराष्ट्रको प्रणाम किया और उनसे विदा लेनेके लिये इस प्रकार कहा— ।। ४३१/२ ।।
युधिष्ठिर उवाच
राज्यं प्रतिगमिष्यामः शिवेन प्रतिनन्दिताः ।। ४४ ।।
अनुज्ञातास्त्वया राजन् गमिष्यामो विकल्मषाः ।
**युधिष्ठिर बोले—**महाराज! आपके आशीर्वादसे आनन्दित होकर हमलोग कुशलपूर्वक राजधानी लौट जायेंगे। राजन्! इसके लिये आप हमें आज्ञा दें। आपकी आज्ञा पाकर हम पापरहित हो यहाँसे यात्रा करेंगे ।। ४४१/२ ।।
एवमुक्तः स राजर्षिर्धर्मराज्ञा महात्मना ।। ४५ ।।
अनुजज्ञे स कौरव्यमभिनन्द्य युधिष्ठिरम् ।
महात्मा धर्मराजके ऐसा कहनेपर राजर्षि धृतराष्ट्रने कुरुनन्दन युधिष्ठिरका अभिनन्दन करके उन्हें जानेकी आज्ञा दे दी ।। ४५१/२ ।।
भीमं च बलिनां श्रेष्ठं सान्त्वयामास पार्थिवः ।। ४६ ।।
स चास्य सम्यङ्मेधावी प्रत्यपद्यत वीर्यवान् ।
इसके बाद राजा धृतराष्ट्रने बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको सान्त्वना दी। बुद्धिमान् एवं पराक्रमी भीमसेनने भी उनकी बातोंको यथार्थरूपसे ग्रहण किया—हृदयसे स्वीकार किया ।। ४६१/२ ।।
अर्जुनं च समाश्लिष्य यमौ च पुरुषर्षभौ ।। ४७ ।।
अनुजज्ञे स कौरव्यः परिष्वज्याभिनन्द्य च ।
गान्धार्या चाभ्यनुज्ञाताः कृतपादाभिवादनाः ।। ४८ ।।
जनन्या समुपाघ्राताः परिष्वक्ताश्च ते नृपम् ।
चक्रुः प्रदक्षिणं सर्वे वत्सा इव निवारणे ।। ४९।
पुनः पुनर्निरीक्षन्तः प्रचक्रुस्ते प्रदक्षिणम् ।
तदनन्तर धृतराष्ट्रने अर्जुन और पुरुषप्रवर नकुल-सहदेवको छातीसे लगा उनका अभिनन्दन करके विदा किया। इसके बाद उन पाण्डवोंने गान्धारीके चरणोंमें प्रणाम करके उनकी आज्ञा ली। फिर माता कुन्तीने उन्हें हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा। जैसे बछड़े अपनी माताका दूध पीनेसे रोके जानेपर बार-बार उसकी ओर देखते हुए उसके चारों ओर चक्कर लगाते हैं, उसी प्रकार पाण्डवोंने राजा तथा माताकी ओर बार-बार देखते हुए उन नरेशकी परिक्रमा की ।। ४७—४९ १/२ ।।
द्रौपदीप्रमुखाश्चैव सर्वाः कौरवयोषितः ।। ५० ।।
न्यायतः श्वशुरे वृत्तिं प्रयुज्य प्रययुस्ततः ।
श्वश्रूभ्यां समनुज्ञाताः परिष्वज्याभिनन्दिताः ।। ५१ ।।
संदिष्टाश्चेति कर्तव्यं प्रययुर्भर्तृभिः सह ।
द्रौपदी आदि समस्त कौरवस्त्रियोंने अपने श्वशुरको न्यायपूर्वक प्रणाम किया। फिर दोनों सासुओंने उन्हें गलेसे लगाकर आशीर्वाद दे, जानेकी आज्ञा दी और उन्हें उनके कर्तव्यका उपदेश भी दिया। तत्पश्चात् वे अपने पतियोंके साथ चली गयीं ।। ५०-५१ १/२ ।।
ततः प्रजज्ञे निनदः सूतानां युज्यतामिति ।। ५२ ।।
उष्ट्राणां क्रोशतां चापि हयानां हेषतामपि ।
ततो युधिष्ठिरो राजा सदारः सहसैनिकः ।
नगरं हास्तिनपुरं पुनरायात् सबान्धवः ।। ५३ ।।
तदनन्तर सारथियोंने 'रथ जोतो, रथ जोतो' की पुकार मचायी। फिर ऊँटोंके चिग्घाड़ने और घोड़ोंके हिनहिनानेकी आवाज हुई। इसके बाद अपने घरकी स्त्रियों, भाइयों और सैनिकोंके साथ राजा युधिष्ठिर पुनः हस्तिनापुर नगरको लौट आये ।। ५२-५३ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि युधिष्ठिरप्रत्यागमे षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें युधिष्ठिरका प्रत्यागमनविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६ ।।