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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2463)

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षष्ठोऽध्यायः

द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

तं शयानं महात्मानं वीरमानकदुन्दुभिम् ।
पुत्रशोकेन संतप्तं ददर्श कुरुपुङ्गवः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मामाके महलमें पहुँचकर कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने देखा कि वीर महात्मा वसुदेवजी पुत्रशोकसे दुखी होकर पृथ्वीपर पड़े हुए हैं॥ १ ॥

तस्याश्रुपरिपूर्णाक्षो व्यूढोरस्को महाभुजः ।
आर्तस्यार्ततरः पार्थः पादौ जग्राह भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! चौड़ी छाती और विशाल भुजावाले कुन्तीकुमार अर्जुन अपने शोकाकुल मामाकी वह दशा देखकर अत्यन्त संतप्त हो उठे। उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये और उन्होंने मामाके दोनों पैर पकड़ लिये ॥ २ ॥

तस्य मूर्धानमाघ्रातुमिषेषानकदुन्दुभिः ।
स्वस्रीयस्य महाबाहुर्न शशाक च शत्रुहन् ॥ ३ ॥
शत्रुघाती नरेश! महाबाहु आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-ने चाहा कि मैं अपने भानजे अर्जुनका मस्तक सूँघ लूँ; परंतु असमर्थतावश वे ऐसा न कर सके ॥ ३ ॥

समालिङ्ग्यार्जुनं वृद्धः स भुजाभ्यां महाभुजः ।
रुदन् पुत्रान् स्मरन् सर्वान् विललाप सुविह्वलः ॥ ४ ॥
भ्रातॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च दौहित्रान् ससखीनपि ।
महाबाहु बूढ़े वसुदेवजीने अपनी दोनों भुजाओंसे अर्जुनको खींचकर छातीसे लगा लिया और अपने समस्त पुत्रोंका स्मरण करके रोने लगे। फिर भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, दौहित्रों और मित्रोंका भी याद करके अत्यन्त व्याकुल हो वे विलाप करने लगे ॥ ४ ½ ॥

वसुदेव उवाच

यैर्जिता भूमिपालाश्च दैत्याश्च शतशोऽर्जुन ॥ ५ ॥
तान् दृष्ट्वा नेह पश्यामि जीवाम्यर्जुन दुर्मरः ।
**वसुदेव बोले—**अर्जुन! जिन वीरोंने सैकड़ों दैत्यों तथा राजाओंपर विजय पायी थी उन्हें आज यहाँ मैं नहीं देख पा रहा हूँ तो भी मेरे प्राण नहीं निकलते। जान पड़ता है, मेरे लिये मृत्यु दुर्लभ है ॥ ५ ½ ॥

यौ तावार्जुन शिष्यौ ते प्रियौ बहुमतौ सदा ॥ ६ ॥
तयोरपनयात् पार्थ वृष्णयो निधनं गताः ।

अर्जुन! जो तुम्हारे प्रिय शिष्य थे और जिनका तुम बहुत सम्मान किया करते थे उन्हीं दोनों (सात्यकि और प्रद्युम्न)-के अन्यायसे समस्त वृष्णिवंशी मृत्युको प्राप्त हो गये हैं ॥ ६ १/२ ॥

यौ तौ वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथौ मतौ ॥ ७ ॥
प्रद्युम्नो युयुधानश्च कथयन् कत्थसे च यौ ।
तौ सदा कुरुशार्दूल कृष्णस्य प्रियभाजनौ ॥ ८ ॥
तावुभौ वृष्णिनाशस्य मुखमास्तां धनंजय ।
कुरुश्रेष्ठ धनंजय! वृष्णिवंशके प्रमुख वीरोंमें जिन दोको ही अतिरथी माना जाता था तथा तुम भी चर्चा चलाकर जिनकी प्रशंसाके गीत गाते थे वे श्रीकृष्णके प्रीतिभाजन प्रद्युम्न और सात्यकि ही इस समय वृष्णिवंशियोंके विनाशके प्रमुख कारण बने हैं ॥

न तु गर्हामि शैनेयं हार्दिक्यं चाहमर्जुन ॥ ९ ॥
अक्रूरं रौक्मिणेयं च शापो ह्येवात्र कारणम् ।
अथवा अर्जुन! इस विषयमें मैं सात्यकि, कृतवर्मा, अक्रूर और प्रद्युम्नकी निन्दा नहीं करूँगा। वास्तवमें ऋषियोंका शाप ही यादवोंके इस सर्वनाशका प्रधान कारण है ॥

केशिनं यस्तु कंसं च विक्रम्य जगतः प्रभुः ॥ १० ॥

विदेहावकरोत् पार्थ चैद्यं च बलगर्वितम् ।
नैषादिमेकलव्यं च चक्रे कालिङ्गममागधान् ॥ ११ ॥
गान्धारान् काशिराजं च मरुभूमौ च पार्थिवान् ।
प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च पार्वतियांस्तथा नृपान् ॥ १२ ॥
सोऽभ्युपेक्षितवानेतमनयान्मधुसूदनः ।
कुन्तीनन्दन! जिन जगदीश्वरने पराक्रम प्रकट करके केशी और कंसको देह-बन्धनसे मुक्त कर दिया। बलका घमंड रखनेवाले चेदिराज शिशुपाल, निषादपुत्र एकलव्य, कलिंगराज, मगधनिवासी क्षत्रिय, गान्धार, काशिराज तथा मरुभूमिके राजाओंको भी यमलोक भेज दिया था, जिन्होंने पूर्व, दक्षिण तथा पर्वतीय प्रान्तके नरेशोंका भी संहार कर डाला था, उन्हीं मधुसूदनने बालकोंकी अनीतिके कारण प्राप्त हुए इस संकटकी उपेक्षा कर दी ॥ १०—१२ १/२ ॥

त्वं हि तं नारदश्चैव मुनयश्च सनातनम् ॥ १३ ॥
गोविन्दमनघं देवमभिजानीध्वमच्युतम् ।
प्रत्यपश्यच्च स विभुर्ज्ञातीक्षयमधोक्षजः ॥ १४ ॥
तुम, देवर्षि नारद तथा अन्य महर्षि भी श्रीकृष्णको पापके सम्पर्कसे रहित, सनातन, अच्युत परमेश्वररूपसे जानते हैं। वे ही सर्वव्यापी अधोक्षज अपने कुटुम्बीजनोंके इस विनाशको चुपचाप देखते रहे ॥ १३-१४ ॥

समुपेक्षितवान् नित्यं स्वयं स मम पुत्रकः ।
गान्धार्या वचनं यत् तदृषीणां च परंतप ॥ १५ ॥
तन्नूनमन्यथा कर्तुं नैच्छत् स जगतः प्रभुः ।
परंतप अर्जुन! मेरे पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए वे जगदीश्वर गान्धारी तथा महर्षियोंके शापको पलटना नहीं चाहते थे, इसीलिये उन्होंने सदा ही इस संकटकी उपेक्षा की ॥ १५ १/२
॥

प्रत्यक्षं भवतश्चापि तव पौत्रः परंतप ॥ १६ ॥
अश्वत्थाम्ना हतश्चापि जीवितस्तस्य तेजसा ।
परंतप! तुम्हारा पौत्र परीक्षित् अश्वत्थामाद्वारा मार डाला गया था तो भी श्रीकृष्णके तेजसे वह जीवित हो गया। यह तो तुमलोगोंकी आँखों-देखी घटना है ॥

इमांस्तु नैच्छत् स्वान् ज्ञातीन् रक्षितुं च सखा तव ॥ १७ ॥
ततः पुत्रांश्च पौत्रांश्च भ्रातॄनथ सखींस्तथा ।
शयानान् निहतान् दृष्ट्वा ततो मामब्रवीदिदम् ॥ १८ ॥
इतने शक्तिशाली होते हुए भी तुम्हारे सखाने अपने इन भाई-बन्धुओंको प्राणसंकटसे बचानेकी इच्छा नहीं की। जब पुत्र, पौत्र, भाई और मित्र सभी एक-दूसरेके हाथसे मरकर

धराशायी हो गये तब उन्हें उस अवस्थामें देखकर श्रीकृष्ण मेरे पास आये और इस प्रकार बोले— ।। १७-१८ ।।

सम्प्राप्तोऽद्यायमस्यान्तः कुलस्य पुरुषर्षभ ।
आगमिष्यति बीभत्सुरिमां द्वारवतीं पुरीम् ।। १९ ।।
आख्येयं तस्य यद् वृत्तं वृष्णीनां वैशसं महत् ।
‘पुरुषप्रवर पिताजी! आज इस कुलका संहार हो गया। अर्जुन द्वारकापुरीमें आनेवाले हैं। आनेपर उनसे वृष्णिवंशियोंके इस महान् विनाशका वृत्तान्त कहियेगा ।।

स तु श्रुत्वा महातेजा यदूनां निधनं प्रभो ।। २० ।।
आगन्ता क्षिप्रमेवेह न मेऽत्रास्ति विचारणा ।
‘प्रभो! अर्जुनके पास संदेश भी पहुँचा होगा। वे महातेजस्वी कुन्तीकुमार यदुवंशियोंके विनाशका यह समाचार सुनकर शीघ्र ही यहाँ आ पहुँचेंगे। इस विषयमें मेरा कोई अन्यथा विचार नहीं है ।। २० १/२ ।।

योऽहं तमर्जुनं विद्धि योऽर्जुनः सोऽहमेव तु ।। २१ ।।
यद् ब्रूयात् तत् तथा कार्यमिति बुद्ध्यस्व माधव ।
‘जो मैं हूँ उसे अर्जुन समझिये, जो अर्जुन हैं वह मैं ही हूँ। माधव! अर्जुन जो कुछ भी कहें वैसा ही आपलोगोंको करना चाहिये। इस बातको अच्छी तरह समझ लें ।। २१ १/२ ।।

स स्त्रीषु प्राप्तकालासु पाण्डवो बालकेषु च ।। २२ ।।
प्रतिपत्स्यति बीभत्सुर्भवतश्चौर्ध्वदेहिकम् ।
‘जिन स्त्रियोंका प्रसवकाल समीप हो, उनपर और छोटे बालकोंपर अर्जुन विशेषरूपसे ध्यान देंगे और वे ही आपका और्ध्वदेहिक संस्कार भी करेंगे ।। २२ १/२ ।।

इमां च नगरीं सद्यः प्रतियाते धनंजये ।। २३ ।।
प्राकाराट्टालकोपेतां समुद्रः प्लावयिष्यति ।
‘अर्जुनके चले जानेपर चहारदीवारी और अट्टालिकाओं सहित इस नगरीको समुद्र तत्काल डुबो देगा ।। २३ १/२ ।।

अहं देशे तु कस्मिंश्चित् पुण्ये नियममास्थितः ।। २४ ।।
कालं काङ्क्षे सद्य एव रामेण सह धीमता ।
‘मैं किसी पवित्र स्थानमें रहकर शौच-संतोषादि नियमोंका आश्रय ले बुद्धिमान् बलरामजीके साथ शीघ्र ही कालकी प्रतीक्षा करूँगा’ ।। २४ १/२ ।।

एवमुक्त्वा हृषीकेशो मामचिन्त्यपराक्रमः ।। २५ ।।
हित्वा मां बालकैः सार्धं दिशं कामप्यगात् प्रभुः ।
ऐसा कहकर अचित्य पराक्रमी प्रभावशाली श्रीकृष्ण बालकोंके साथ मुझे छोड़कर किसी अज्ञात दिशाको चले गये है ।। २५ १/२ ।।

सोऽहं तौ च महात्मानौ चिन्तयन् भ्रातरौ तव ॥ २६ ॥
घोरं ज्ञातिवधं चैव न भुञ्जे शोककर्शितः ।
न भोक्ष्ये न च जीविष्ये दिष्ट्या प्राप्तोऽसि पाण्डव ॥ २७ ॥

तबसे मैं तुम्हारे दोनों भाई महात्मा बलराम और श्रीकृष्णका तथा कुटुम्बीजनोंके इस घोर संहारका चिन्तन करके शोकसे गलता जा रहा हूँ। मुझसे भोजन नहीं किया जाता। अब मैं न तो भोजन करूँगा और न इस जीवनको ही रखूँगा। पाण्डुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि तुम यहाँ आ गये ॥ २६-२७ ॥