महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
[आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन]
[आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन]
युधिष्ठिर उवाच
समुच्चयं च धर्माणां भोज्याभोज्यं तथैव च ।
श्रुतं मया त्वत्प्रसादादापद्धर्मं वदस्व मे ।।
युधिष्ठिरने कहा— भगवन्! आपकी कृपासे मैंने सब धर्मोंके संग्रहका एवं भोजनके योग्य और भोजनके अयोग्य अन्नका विषय भी सुन लिया। अब कृपा करके आपद्धर्मका वर्णन कीजिये ।।
श्रीभगवानुवाच
दुर्भिक्षे राष्ट्रसम्बाधेऽप्याशौचे मृतसूतके ।
धर्मकालेऽध्वनि तथा नियमो येन लुप्यते ।।
दूराध्वगमनात् खिन्नो द्विजालाभेऽथ शूद्रतः ।
अकृतान्नं तु यत् किंचिद् गृह्णीयादात्मवृत्तये ।।
श्रीभगवान् बोले— राजन्! जब देशमें अकाल पड़ा हो, राष्ट्रके ऊपर कोई आपत्ति आयी हो, जन्म या मृत्युका सूतक हो तथा कड़ी धूपमें रास्ता चलना पड़ा हो और इन सब कारणोंसे नियमका निर्वाह न हो सके तथा दूरका मार्ग तै करनेके कारण विशेष थकावट आ गयी हो, उस अवस्थामें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके न मिलनेपर शूद्रसे भी जीवन-निर्वाहके लिये थोड़ा-सा कच्चा अन्न लिया जा सकता है ।।
आतुरो दुःखितो वापि तथार्तो वा बुभुक्षितः ।
भुञ्जन्नविधिना विप्रः प्रायश्चित्तायते न च ।।
रोगी, दुखी, पीड़ित और भूखा ब्राह्मण यदि विधि-विधानके बिना भोजन कर ले तो भी उसे प्रायश्चित्त नहीं लगता ।।
अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं घृतं पयः ।
हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ।।
जल, मूल, घी, दूध, हवि, ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करना, गुरुकी आज्ञाका पालन और ओषधि—इन आठोंके सेवनसे व्रतका भंग नहीं होता ।।
अशक्तो विधिवत् कर्तुं प्रायश्चित्तानि यो नरः ।
विदुषां वचनेनापि दानेनापि विशुद्ध्यति ।।
जो मनुष्य विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करनेमें असमर्थ हो, वह विद्वानोंके वचनसे तथा दानके द्वारा भी शुद्ध हो सकता है ।।
अनृतावृतुकाले वा दिवा रात्रौ तथापि वा ।
प्रोषितस्तु स्त्रियं गच्छेत् प्रायश्चित्तीयते न च ।।
परदेशमें रहनेवाला पुरुष यदि कुछ कालके लिये घर आवे तो वह ऋतुकालमें तथा उससे भिन्न समयमें भी, रातमें या दिनमें भी अपनी स्त्रीके साथ समागम करनेपर प्रायश्चित्तका भागी नहीं होता ।।
युधिष्ठिर उवाच
प्रशस्याः कीदृशा विप्रा निन्द्याश्चापि सुरेश्वर ।
अष्टकायाश्च कः कालस्तन्मे कथय सुव्रत ।।
युधिष्ठिरने पूछा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवेश्वर! कैसे ब्राह्मण प्रशंसाके योग्य होते हैं और कैसे निन्दाके योग्य? तथा अष्टका-श्राद्धका कौन-सा समय है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीभगवानुवाच
कुलीनः कर्मकृद् वैद्यस्तथा चाप्यानृशंस्यवान् ।
श्रीमानृजुः सत्यवादी पात्राः सर्व इमे द्विजाः ।।
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न, शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले, विद्वान्, दयालु, श्रीसम्पन्न, सरल और सत्यवादी—ये सभी ब्राह्मण सुपात्र (प्रशंसाके योग्य) माने जाते हैं ।।
एते चाग्रासनस्थास्ते भुञ्जानाः प्रथमं द्विजाः ।
तस्यां पङ्क्तयां तु ये चान्ये तान् पुनन्त्येव दर्शनात् ।।
ये आगेके आसनपर बैठकर सबसे पहले भोजन करनेके अधिकारी हैं तथा उस पंक्तिमें जितने लोग बैठे होते हैं, उन सबको ये अपने दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं ।।
मद्भक्ता ये द्विजश्रेष्ठा मद्गता मत्परायणाः ।
तान् पङ्क्तिपावनान् विद्धि पूज्यांश्चैव विशेषतः ।।
जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझमें मन लगानेवाले और मेरे शरणागत भक्त हों, उन्हें पङ्क्तिपावन समझो। वे विशेषरूपसे पूजा करनेके योग्य हैं ।।
निन्द्यान् शृणु द्विजान् राजन्नपि वा वेदपारगान् ।।
ब्राह्मणच्छद्मना लोके चरतः पापकारिणः ।
राजन्! अब निन्दाके योग्य ब्राह्मणोंका वर्णन सुनो। जो ब्राह्मण संसारमें कपटपूर्ण बर्ताव करते हैं, वे वेदोंके पारगामी विद्वान् होनेपर भी पापाचारी ही माने जाते हैं ।।
अनग्निरनधीयानः प्रतिग्रहरुचिस्तु यः ।।
यतस्ततस्तु भुञ्जानस्तं विद्याद् ब्रह्मदूषकम् ।
जो अग्निहोत्र और स्वाध्याय न करता हो, सदा दान लेनेकी ही रुचि रखता हो और जहाँ-कहीं भी भोजन कर लेता हो, उसको ब्राह्मणजातिका कलंक समझना चाहिये ।।
मृतसूतकपुष्टाङ्गो यश्च शूद्रान्नभुग् द्विजः ।
अहं चापि न जानामि गतिं तस्य नराधिप ।।
शूद्रान्नपुष्टाङ्गोऽप्यधीयानो हि नित्यशः ।
जपतो जुह्वतो वापि गतिरूर्ध्वं न विद्यते ।।
नरेश्वर! जिसका शरीर मरणाशौचका अन्न खाकर मोटा हुआ हो, जो शूद्रका अन्न भोजन करता हो और शूद्रके ही अन्नके रससे पुष्ट हुआ हो, उस ब्राह्मणकी किस प्रकार गति होती है, मैं नहीं जानता; क्योंकि प्रतिदिन स्वाध्याय, जप और होम करनेपर भी उसकी उत्तम गति नहीं होती ।।
आहिताग्निश्च यो विप्रः शूद्रान्नान्न निवर्तते ।
पञ्च तस्य प्रणश्यन्ति आत्मा ब्रह्म त्रयोऽग्नयः ।।
जो ब्राह्मण प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेपर भी शूद्रके अन्नसे बचा न रहता हो, उसके आत्मा, वेदाध्ययन और तीनों अग्नि—इन पाँचोंका नाश हो जाता है ।।
शूद्रप्रेषणकर्तुश्च ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
भूमावन्नं प्रदातव्यं श्वशृगालसमो हि सः ।।
शूद्रकी सेवा करनेवाले ब्राह्मणको खानेके लिये विशेषतः जमीनपर ही अन्न डाल देना चाहिये; क्योंकि वह कुत्ते और गीदड़के ही समान होता है ।।
प्रेतभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।।
जो ब्राह्मण मूर्खतावश मरे हुए शूद्रके शवके पीछे-पीछे श्मशानभूमिमें जाता है, उसको तीन रातका अशौच लगता है ।।
त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् ।
प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति ।।
तीन रात पूर्ण होनेपर किसी समुद्रमें मिलनेवाली नदीके भीतर स्नान करके सौ बार प्राणायाम करे और घी पीवे तो वह शुद्ध होता है ।।
अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजोत्तमाः ।
पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं ते प्राप्नुवन्ति हि ।।
जो श्रेष्ठ द्विज किसी अनाथ ब्राह्मणके शवको श्मशानमें ले जाते हैं, उन्हें पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है ।।
न तेषामशुभं किंचित् पापं वा शुभकर्मणाम् ।
जलावगाहनादेव सद्यः शौचं विधीयते ।।
उन शुभ कर्म करनेवालोंको किसी प्रकारका अशुभ या पाप नहीं लगता। वे जलमें स्नान करनेमात्रसे तत्काल शुद्ध हो जाते हैं ।।
शूद्रवेश्मनि विप्रेण क्षीरं वा यदि वा दधि ।
निवृत्तेन न भोक्तव्यं विद्धि शूद्रान्नमेव तत् ।।
निवृत्तिमार्गपरायण ब्राह्मणको शूद्रके घरमें दूध या दही भी नहीं खाना चाहिये। उसे भी शूद्रान्न ही समझना चाहिये ।।
विप्राणां भोक्तुकामानामत्यन्तं चान्नकाङ्क्षिणाम् ।
यो विघ्नं कुरुते मर्त्यस्ततो नान्योऽस्ति पापकृत् ॥
अत्यन्त भूखे होनेके कारण अन्नकी इच्छावाले ब्राह्मणोंके भोजनमें जो मनुष्य विघ्न डालता है, उससे बढ़कर पापी दूसरा कोई नहीं है ।।
सर्वे च वेदाः सह षड्भिरङ्गैः
सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म ।
नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति
शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ॥
राजन्! यदि ब्राह्मण शील एवं सदाचारसे रहित हो जाय तो छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद, सांख्य, पुराण और उत्तम कुलका जन्म—ये सब मिलकर भी उसे सद्गति नहीं दे सकते ।।
ग्रहोपरागे विषुवेऽयनान्ते
पित्र्ये मघासु स्वसुते च जाते ।
गयेषु पिण्डेषु च पाण्डुपुत्र
दत्तं भवेन्निष्क्सहस्रतुल्यम् ॥
पाण्डुनन्दन! ग्रहणके समय, विषुवयोगमें, अयन समाप्त होनेपर, पितृकर्म (श्राद्ध आदि)-में, मघा-नक्षत्रमें, अपने यहाँ पुत्रका जन्म होनेपर तथा गयामें पिण्डदान करते समय जो दान दिया जाता है, वह एक हजार स्वर्णमुद्राके दान देनेके समान होता है ।।
वैशाखमासस्य तु या तृतीया-
नवद्यासौ कार्तिकशुक्लपक्षे ।
नभस्यमासस्य च कृष्णपक्षे
त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे ॥
उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च
श्राद्धस्य कालो ह्ययनद्वये च ।
पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं
दद्यात् पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः ।
श्राद्धं कृतं तेन समा सहस्रं
रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति ॥
वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्लपक्षकी तृतीया, भाद्रपद मासकी कृष्णा त्रयोदशी, माघकी अमावास्या, चन्द्रमा और सूर्यका ग्रहण तथा उत्तरायण और दक्षिणायनके प्रारम्भिक दिन—ये श्राद्धके उत्तम काल हैं। इन दिनोंमें मनुष्य पवित्रचित्त होकर यदि
पितरोंके लिये तिलमिश्रित जलका भी दान कर दे तो उसके द्वारा एक हजार वर्षतक श्राद्ध किया हुआ हो जाता है। यह रहस्य स्वयं पितरोंका बतलाया हुआ है।।
यस्त्वेकपङ्क्त्यां विषमं ददाति
स्नेहाद् भयाद् वा यदि वार्थहेतोः।
क्रूरं दुराचारमनात्मवन्तं
ब्रह्मघ्नमेनं कवयो वदन्ति ॥
जो मनुष्य स्नेह या भयके कारण अथवा धन पानेकी इच्छासे एक पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंको भोजन परोसनेमें भेद करता है, उसे विद्वान् पुरुष क्रूर, दुराचारी, अजितात्मा और ब्रह्महत्यारा बतलाते हैं।।
धनानि येषां विपुलानि सन्ति
नित्यं रमन्ते परलोकमूढाः।
तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको
नान्यत् सुखं देहसुखे रतानाम् ॥
शत्रुसूदन! जिनके पास धनका भण्डार भरा हुआ है और जो परलोकके विषयमें कुछ भी न जाननेके कारण सदा भोग-विलासमें ही रम रहे हैं, वे केवल दैहिक सुखमें ही आसक्त हैं। अतः उनके लिये इस लोकका ही सुख सुलभ है; पारलौकिक सुख तो उन्हें कभी नहीं मिलता।।
ये चैव मुक्तास्तपसि प्रयुक्ताः
स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहम्।
जितेन्द्रिया भूतहिते निविष्टा-
स्तेषामसौ चापि परश्च लोकः ॥
जो विषयोंकी आसक्तिसे मुक्त होकर तपस्यामें संलग्न रहते हों, जिन्होंने नित्य स्वाध्याय करते हुए अपने शरीरको दुर्बल कर दिया हो, जो इन्द्रियोंको वशमें रखते हों और समस्त प्राणियोंके हित-साधनमें लगे रहते हों, उनके लिये इस लोकका भी सुख सुलभ है और परलोकका भी।।
ये चैव विद्यां न तपो न दानं
न चापि मूढाः प्रजने यतन्ते।
न चापि गच्छन्ति सुखानि भोगां-
स्तेषामयं चापि परश्च नास्ति ॥
परंतु जो मूर्ख न विद्या पढ़ते हैं, न तप करते हैं, न दान देते हैं, न शास्त्रानुसार संतानोत्पादनका प्रयत्न करते हैं और न अन्य सुख-भोगोंका ही अनुभव कर पाते हैं, उनके लिये न इस लोकमें सुख है न परलोकमें।।
युधिष्ठिर उवाच
नारायण पुराणेश लोकावास नमोऽस्तु ते ।
श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन धर्मसारसमुच्चयम् ॥
युधिष्ठिरने कहा— भगवान्! आप साक्षात् नारायण, पुरातन ईश्वर और सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं। आपको नमस्कार है। अब मैं सम्पूर्ण धर्मोंका सार पूर्णतया श्रवण करना चाहता हूँ ॥
श्रीभगवानुवाच
धर्मसारं महाप्राज्ञ मनुना प्रोक्तमादितः ।
प्रवक्ष्यामि मनुप्रोक्तं पौराणं श्रुतिसंहितम् ॥
श्रीभगवान् बोले— महाप्राज्ञ! मनुजीने सृष्टिके आदिकालमें जो धर्मके सार-तत्त्वका वर्णन किया है, वह पुराणोंके अनुकूल और वेदके द्वारा समर्थित है। उसी मनुप्रोक्त धर्मका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः ।
दृष्टमात्रात् पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत तान् सदा ॥
अग्निहोत्री द्विज, कपिला गौ, यज्ञ करनेवाला पुरुष, राजा, संन्यासी और महासागर—ये दर्शनमात्रसे मनुष्यको पवित्र कर देते हैं, इसलिये सदा इनका दर्शन करना चाहिये ॥
बहुनां न प्रदातव्या गौर्वस्त्रं शयनं स्त्रियः ।
तादृग्भूतं तु तद् दानं दातारं नोपतिष्ठति ॥
एक गौ, एक वस्त्र, एक शय्या और एक स्त्रीको कभी अनेक मनुष्योंके अधिकारमें नहीं देना चाहिये; क्योंकि वैसा करनेपर उस दानका फल दाताको नहीं मिलता ॥
मा ददात्विति यो ब्रूयाद् ब्राह्मणेषु च गोषु च ।
तिर्यग्योनिशतं गत्वा चण्डालेषूपजायते ॥
जो ब्राह्मणको और गौको आहार देते समय 'मत दो' कहकर मना करता है, वह सौ बार पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेकर अन्तमें चाण्डाल होता है ॥
ब्राह्मणस्वं च यद् दैवं दरिद्रस्यैव यद् धनम् ।
गुरोश्चापि हृतं राजन् स्वर्गस्थानपि पातयेत् ॥
राजन्! ब्राह्मणका, देवताका, दरिद्रका और गुरुका धन यदि चुरा लिया जाय तो वह स्वर्गवासियोंको भी नीचे गिरा देता है ॥
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ।
द्वितीयं धर्मशास्त्राणि तृतीयं लोकसंग्रहः ॥
जो धर्मका तत्त्व जानना चाहते हैं, उनके लिये वेद मुख्य प्रमाण हैं, धर्मशास्त्र दूसरा प्रमाण है और लोकाचार तीसरा प्रमाण है ॥
आसमुद्राच्च यत् पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् ।
हिमाद्रिविन्ध्ययोर्मध्यमार्यावर्तं प्रचक्षते ।।
पूर्व समुद्रसे लेकर पश्चिम समुद्रतक और हिमालय तथा विन्ध्याचलके बीचका जो देश है, उसे आर्यावर्त कहते हैं ।।
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तद् देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त्तं प्रचक्षते ।।
सरस्वती और दृषद्वती—इन दोनों देवनदियोंके बीचका जो देवताओंद्धारा रचा हुआ देश है, उसे ब्रह्मावर्त कहते हैं ।।
यस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः ।
वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।।
जिस देशमें चारों वर्णों तथा उनके अवान्तर भेदोंका जो आचार पूर्वपरम्परासे चला आता है, वही उनके लिये सदाचार कहलाता है ।।
कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनयः ।
एते ब्रह्मर्षिदेशास्तु ब्रह्मावर्तादनन्तराः ।।
कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल और शूरसेन—ये ब्रह्मर्षियोंके देश हैं और ब्रह्मावर्तके समीप हैं ।।
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं चरित्रं च गृह्णीयुः पृथिव्यां सर्वमानवाः ।।
इस देशमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंके पास जाकर भूमण्डलके सम्पूर्ण मनुष्योंको अपने-अपने आचरणकी शिक्षा लेनी चाहिये ।।
हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विशसनादपि ।
प्रत्यगेव प्रयागात् तु मध्यदेशः प्रकीर्तितः ।।
हिमालय और विन्ध्याचलके बीचमें कुरुक्षेत्रसे पूर्व और प्रयागसे पश्चिमका जो देश है, वह मध्यदेश कहलाता है ।।
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।
स ज्ञेयो याज्ञिको देशो म्लेच्छदेशस्ततः परम् ।।
जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग स्वभावतः विचरा करता है, वही यज्ञके लिये उपयोगी देश है; उससे भिन्न म्लेच्छोंका देश है ।।
एतान् विज्ञाय देशांस्तु संश्रयेरन् द्विजातयः ।
शूद्रस्तु यस्मिन् कस्मिन् वा निवसेद् वृत्तिकर्शितः ।।
इन देशोंका परिचय प्राप्त करके द्विजातियोंको इन्हींमें निवास करना चाहिये; किंतु शूद्र जीविका न मिलनेपर निर्वाहके लिये किसी भी देशमें निवास कर सकता है ।।
आचारः प्रथमो धर्मो ह्यहिंसा सत्यमेव च ।
दानं चैव यथाशक्ति नियमाश्च यमैः सह ।।
सदाचार, अहिंसा, सत्य, शक्तिके अनुसार दान तथा यम और नियमोंका पालन—ये मुख्य धर्म हैं ॥
वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टिपर्यन्त सब संस्कार वेदोक्त पवित्र विधियों और मन्त्रोंके अनुसार कराना चाहिये; क्योंकि संस्कार इहलोक और परलोकमें भी पवित्र करनेवाला है ॥
गर्भहोमैर्जातकर्मनामचौलोपनायनैः ।
स्वाध्यायैस्तद् व्रतैश्चैव विवाहस्नातकव्रतैः ॥
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥
गर्भाधान-संस्कारमें किये जानेवाले हवनके द्वारा और जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, वेदोक्त व्रतोंके पालन, स्नातकके पालनेयोग्य व्रत, विवाह, पञ्चमहायज्ञोंके अनुष्ठान तथा अन्यान्य यज्ञोंके द्वारा इस शरीरको परब्रह्मकी प्राप्तिके योग्य बनाया जाता है ॥
धर्मार्थौ यदि न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा ।
विद्या तस्मिन् न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ॥
जिससे न धर्मका लाभ होता हो, न अर्थका तथा विद्याप्राप्तिके अनुकूल जो सेवा भी नहीं करता हो, उस शिष्यको विद्या नहीं पढ़नी चाहिये, ठीक उसी तरह जैसे ऊसर खेतमें उत्तम बीज नहीं बोया जाता ॥
लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽऽध्यात्मिकमेव वा ।
यस्माज्ज्ञानमिदं प्राप्तं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥
जिस पुरुषसे लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उस गुरुको पहले प्रणाम करना चाहिये ॥
सव्येन सव्यं संगृह्य दक्षिणेन तु दक्षिणम् ।
न कुर्यादेकहस्तेन गुरोः पादाभिवादनम् ॥
अपने दाहिने हाथसे गुरुका दाहिना चरण और बायें हाथसे उनका बायाँ चरण पकड़कर प्रणाम करना चाहिये। गुरुको एक हाथसे कभी प्रणाम नहीं करना चाहिये ॥
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ।
अध्यापयति चैवैनं स विप्रो गुरुरुच्यते ॥
जो गर्भाधान आदि सब संस्कार विधिवत् कराता है और वेद पढ़ाता है, वह ब्राह्मण गुरु कहलाता है ॥
कृत्वोपनयनं वेदान् योऽध्यापयति नित्यशः ।
सकल्पान् सरहस्यांश्च स चोपाध्याय उच्यते ॥
जो उपनयन-संस्कार कराकर कल्प और रहस्यों-सहित वेदोंका नित्य अध्ययन कराता है, उसे उपाध्याय कहते हैं ।।
साङ्गांश्च वेदानध्याप्य शिक्षयित्वा व्रतानि च ।
विवृणोति च मन्त्रार्थानाचार्यः सोऽभिधीयते ।।
जो षडङ्गयुक्त वेदोंको पढ़ाकर वैदिक व्रतोंकी शिक्षा देता है और मन्त्रार्थोंकी व्याख्या करता है, वह आचार्य कहलाता है ।।
उपाध्यायाद् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।
पितुः शतगुणं माता गौरवेणातिरिच्यते ।।
गौरवमें दस उपाध्यायोंसे बढ़कर एक आचार्य, सौ आचार्योंसे बढ़कर पिता और सौ पितासे भी बढ़कर माता है ।।
एतेषामपि सर्वेषां गरीयान् ज्ञानदो गुरुः ।
गुरोः परतरं किंचिन्न भूतं न भविष्यति ।।
किंतु जो ज्ञान देनेवाले गुरु हैं, वे इन सबकी अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं। गुरुसे बढ़कर न कोई हुआ, न होगा ।।
तस्मात् तेषां वशे तिष्ठेच्छुश्रूषापरमो भवेत् ।
अवमानाद्धि तेषां तु नरकं स्यान्न संशयः ।।
इसलिये मनुष्यको उपर्युक्त गुरुजनोंके अधीन रहकर उनकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहना चाहिये। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि गुरुजनोंके अपमानसे नरकमें गिरना पड़ता है ।।
हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान् विद्याहीनान् वयोऽधिकान् ।
रूपद्रविणहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत् ।।
जो लोग किसी अंगसे हीन हों, जिनका कोई अंग अधिक हो, जो विद्यासे हीन, अवस्थाके बूढ़े, रूप और धनसे रहित तथा जातिसे भी नीच हों, उनपर आक्षेप नहीं करना चाहिये ।।
शपता यत् कृतं पुण्यं शप्यमानं तु गच्छति ।
शप्यमानस्य यत् पापं शपन्तमनुगच्छति ।।
क्योंकि आक्षेप करनेवाले मनुष्यका पुण्य, जिसका आक्षेप किया जाता है, उसके पास चला जाता है और उसका पाप आक्षेप करनेवालेके पास चला आता है ।।
नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् ।
द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं विवर्जयेत् ।।
नास्तिकता, वेदोंकी निन्दा, देवताओंपर दोषारोपण, द्वेष, दम्भ, अभिमान, क्रोध तथा कठोरता—इनका परित्याग कर देना चाहिये ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)