महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रमथगणोंके द्वारा धर्माधर्मसम्बन्धी रहस्यका कथन
एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
प्रमथगणोंके द्वारा धर्माधर्मसम्बन्धी रहस्यका कथन
भीष्म उवाच
ततः सर्वे महाभागा देवाश्च पितरश्च ह ।
ऋषयश्च महाभागाः प्रमथान् वाक्यमब्रुवन् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर सभी महाभाग देवता, पितर तथा महान् भाग्यशाली महर्षि प्रमथगणोंसे बोले— ॥ १ ॥
भवन्तो वै महाभागा अपरोक्षनिशाचराः ।
उच्छिष्टानशुचीन् क्षुद्रान् कथं हिंसथ मानवान् ॥ २ ॥
'महाभागगण! आपलोग प्रत्यक्ष निशाचर हैं। बताइये, अपवित्र, उच्छिष्ट और शूद्र मनुष्योंकी किस तरह और क्यों हिंसा करते हैं? ॥ २ ॥
के च स्मृताः प्रतीघाता येन मर्त्यान् न हिंसथ ।
रक्षोघ्नानि च कानि स्युर्येर्गृहेषु प्रणश्यथ ।
श्रोतुमिच्छाम युष्माकं सर्वमेतन्निशाचराः ॥ ३ ॥
'वे कौन-से प्रतिघात (शत्रुके आघातोंको रोक देनेवाले उपाय) हैं, जिनका आश्रय लेनेसे आपलोग उन मनुष्योंकी हिंसा नहीं करते। वे रक्षोघ्न मन्त्र कौन-से हैं, जिनका उच्चारण करनेसे आपलोग घरमें ही नष्ट हो जायँ या भाग जायँ? निशाचरो! ये सारी बातें हम आपके मुखसे सुनना चाहते हैं' ॥ ३ ॥
प्रमथा ऊचुः
मैथुनेन सदोच्छिष्टाः कृते चैवाधरोत्तरे ।
मोहान्मांसानि खादेत वृक्षमूले च यः स्वपेत् ॥ ४ ॥
आमिषं शीर्षतो यस्य पादतो यश्च संविशेत् ।
तत उच्छिष्टकाः सर्वे बहुच्छिद्राश्च मानवाः ॥ ५ ॥
उदके चाप्यमेध्यानि श्लेष्माणं च प्रमुञ्चति ।
एते भक्ष्याश्च वध्याश्च मानुषा नात्र संशयः ॥ ६ ॥
**प्रमथ बोले—**जो मनुष्य सदा स्त्री-सहवासके कारण दूषित रहते, बड़ोंका अपमान करते, मूर्खतावश मांस खाते, वृक्षकी जड़में सोते, सिरपर मांसका बोझा ढोते, बिछौनोंपर पैर रखनेकी जगह सिर रखकर सोते, वे सब-के-सब मनुष्य उच्छिष्ट (अपवित्र) तथा बहुत-से छिद्रोंवाले माने गये हैं। जो पानीमें मल-मूत्र एवं थूक फेंकते हैं, वे भी उच्छिष्टकी ही
कोटिमें आते हैं। ये सभी मानव हमारी दृष्टिमें भक्षण और वधके योग्य हैं। इसमें संशय नहीं है॥ ४—६॥
एवंशीलसमाचारान् धर्षयामो हि मानवान्।
श्रूयतां च प्रतीघातान् यैर्न शक्नुम हिंसितुम् ॥ ७॥
जिनके ऐसे शील और आचार हैं, उन मनुष्योंको हम धर दबाते हैं। अब उन प्रतिरोधक उपायोंको सुनिये, जिनके कारण हम मनुष्योंकी हिंसा नहीं कर पाते॥ ७॥
गोरोचनासमालम्भो वचाहस्तश्च यो भवेत्।
घृताक्षतं च यो दद्यान्मस्तके तत्परायणः ॥ ८॥
ये च मांसं न खादन्ति तान् न शक्नुम हिंसितुम्।
जो अपने शरीरमें गोरोचन लगाता, हाथमें वच नामक औषध लिये रहता, ललाटमें घी और अक्षत धारण करता तथा मांस नहीं खाता—ऐसे मनुष्योंकी हिंसा हम नहीं कर सकते॥ ८ ½ ॥
यस्य चाग्निर्गृहे नित्यं दिवारात्रौ च दीप्यते ॥ ९॥
तरक्षोश्चर्म दंष्ट्राश्च तथैव गिरिकच्छपः।
आज्यधूमो बिडालश्चागः कृष्णोऽथ पिङ्गलः ॥ १०॥
येषामेतानि तिष्ठन्ति गृहेषु गृहमेधिनाम्।
तान्यधृष्याण्यगाराणि पिशिताशैः सुदारुणैः ॥ ११॥
जिसके घरमें अग्निहोत्रकी अग्नि नित्य—दिन-रात देदीप्यमान रहती है, छोटे जातिके बाघ (जरख) का चर्म, उसीकी दाढ़ें तथा पहाड़ी कछुआ मौजूद रहता है, घीकी आहुतिसे सुगन्धित धूम निकलता रहता है, बिलाव तथा काला या पीला बकरा रहता है, जिन गृहस्थोंके घरोंमें ये सभी वस्तुएँ स्थित होती हैं, उन घरोंपर भयंकर मांसभक्षी निशाचर आक्रमण नहीं करते हैं॥ ९—११॥
लोकानस्मद्विधा ये च विचरन्ति यथासुखम्।
तस्मादेतानि गेहेषु रक्षोघ्नानि विशाम्पते।
एतद् वः कथितं सर्वं यत्र वः संशयो महान् ॥ १२॥
हमारे-जैसे जो भी निशाचर अपनी मौजसे सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते हैं, वे उपर्युक्त घरोंको कोई हानि नहीं पहुँचा सकते; अतः प्रजानाथ! अपने घरोंमें इन रक्षोघ्न वस्तुओंको अवश्य रखना चाहिये। यह सब विषय, जिसमें आपलोगोंको महान् संदेह था, मैंने कह सुनाया॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि प्रमथरहस्ये
एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें प्रमथगणोंका धर्मसम्बन्धी
रहस्यविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३१ ।।