महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2511)
द्वितीयोऽध्यायः
देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना
युधिष्ठिर उवाच
नेह पश्यामि विबुधा राधेयममितौजसम् ।
भ्रातरौ च महात्मानौ युधामन्यूत्तमौजसौ ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—देवताओ! मैं यहाँ अमित-तेजस्वी राधानन्दन कर्णको क्यों नहीं देख रहा हूँ? दोनों भाई महामनस्वी युधामन्यु और उत्तमौजा कहाँ हैं? वे भी नहीं दिखायी देते ॥ १ ॥
जुहुवुर्ये शरीराणि रणवह्नौ महारथाः ।
राजानो राजपुत्राश्च ये मदर्थे हता रणे ॥ २ ॥
क्व ते महारथाः सर्वे शार्दूलसमविक्रमाः ।
तैरप्ययं जितो लोकः कच्चित् पुरुषसत्तमैः ॥ ३ ॥
जिन महारथियोंने समराग्निमें अपने शरीरोंकी आहुति दे दी, जो राजा और राजकुमार रणभूमिमें मेरे लिये मारे गये वे सिंहके समान पराक्रमी समस्त महारथी वीर कहाँ हैं? क्या उन पुरुषप्रवर वीरोंने भी इस स्वर्गलोकपर विजय पायी है? ॥ २-३ ॥
यदि लोकानिमान् प्राप्तास्ते च सर्वे महारथाः ।
स्थितं वित्त हि मां देवाः सहितं तैर्महात्मभिः ॥ ४ ॥
देवताओ! यदि वे सम्पूर्ण महारथी इन लोकोंमें आये हैं तो आप समझ लें कि मैं उन महात्माओंके साथ रहूँगा ॥
कच्चिन्न तैरवाप्तोऽयं नृपैर्लोकोऽक्षयः शुभः ।
न तैरहं विना रंस्ये भ्रातृभिर्ज्ञातिभिस्तथा ॥ ५ ॥
परंतु यदि उन नरेशोंने यह शुभ एवं अक्षयलोक नहीं प्राप्त किया है तो मैं उन जाति-भाइयोंके बिना यहाँ नहीं रहूँगा ॥ ५ ॥
मातुर्हि वचनं श्रुत्वा तदा सलिलकर्मणि ।
कर्णस्य क्रियतां तोयमिति तप्यामि तेन वै ॥ ६ ॥
युद्धके बाद जब मैं अपने मृत सम्बन्धियोंको जलाञ्जलि दे रहा था उस समय मेरी माता कुन्तीने कहा था—'बेटा! कर्णको भी जलाञ्जलि देना।' माताकी यह बात सुनकर
मुझे मालूम हुआ कि महात्मा कर्ण मेरे ही भाई थे। तबसे मुझे उनके लिये बड़ा दुःख होता है॥
इदं च परितप्यामि पुनः पुनरहं सुराः ।
यन्मातुः सदृशौ पादौ तस्याहममितात्मनः ॥ ७ ॥
दृष्ट्वैव तौ नानुगतः कर्णं परबलार्दनम् ।
न ह्यस्मान् कर्णसहितान् जयेच्छक्रोऽपि संयुगे ॥ ८ ॥
देवताओ! यह सोचकर तो मैं और भी पश्चात्ताप करता रहता हूँ कि ‘महामना कर्णके दोनों चरणोंको माता कुन्तीके चरणोंके समान देखकर भी मैं क्यों नहीं शत्रुदलमर्दन कर्णका अनुगामी हो गया?’ यदि कर्ण हमारे साथ होते तो हमें इन्द्र भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते ॥ ७-८ ॥
तमहं यत्र तत्रस्थं द्रष्टुमिच्छामि सूर्यजम् ।
अविज्ञातो मया योऽसौ घातितः सव्यसाचिना ॥ ९ ॥
ये सूर्यनन्दन कर्ण जहाँ कहीं भी हों मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ; जिन्हें न जाननेके कारण मैंने अर्जुनद्वारा उनका वध करवा दिया ॥ ९ ॥
भीमं च भीमविक्रान्तं प्राणेभ्योऽपि प्रियं मम ।
अर्जुनं चेन्द्रसंकाशं यमौ चैव यमोपमौ ॥ १० ॥
द्रष्टुमिच्छामि तां चाहं पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् ।
न चेह स्थातुमिच्छामि सत्यमेवं ब्रवीमि वः ॥ ११ ॥
मैं अपने प्राणोंसे भी प्रियतम भयंकर पराक्रमी भाई भीमसेनको, इन्द्रतुल्य तेजस्वी अर्जुनको, यमराजके समान अजेय नकुल-सहदेवको तथा धर्मपरायणा देवी द्रौपदीको भी देखना चाहता हूँ। यहाँ रहनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं आप लोगोंसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ १०-११ ॥
किं मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमाः ।
यत्र ते मम स स्वर्गो नायं स्वर्गो मतो मम ॥ १२ ॥
सुरश्रेष्ठगण! अपने भाइयोंसे अलग रहकर इस स्वर्गसे भी मुझे क्या लेना है? जहाँ मेरे भाई हैं वहीं मेरा स्वर्ग है। उनके बिना मैं इस लोकको स्वर्ग नहीं मानता ॥ १२ ॥
देवा ऊचुः
यदि वै तत्र ते श्रद्धा गम्यतां पुत्र मा चिरम् ।
प्रिये हि तव वर्तामो देवराजस्य शासनात् ॥ १३ ॥
देवता बोले—वत्स! यदि उन लोगोंमें तुम्हारी श्रद्धा है तो चलो, विलम्ब न करो। हम लोग देवराजकी आज्ञासे सर्वथा तुम्हारा प्रिय करना चाहते हैं ॥ १३ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं ततो देवा देवदूतमुपादिशन् ।
युधिष्ठिरस्य सुहृदो दर्शयेति परंतप ॥ १४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर देवताओंने देवदूतको आज्ञा दी—'तुम युधिष्ठिरको इनके सुहृदोंका दर्शन कराओ' ॥ १४ ॥
ततः कुन्तीसुतो राजा देवदूतश्च जग्मतुः ।
सहितौ राजशार्दूल यत्र ते पुरुषर्षभाः ॥ १५ ॥
नृपश्रेष्ठ! तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर और देवदूत दोनों साथ-साथ उस स्थानकी ओर चले जहाँ वे पुरुषप्रवर भीमसेन आदि थे ॥ १५ ॥
अग्रतो देवदूतश्च ययौ राजा च पृष्ठतः ।
पन्थानमशुभं दुर्गं सेवितं पापकर्मभिः ॥ १६ ॥
आगे-आगे देवदूत जा रहा था और पीछे-पीछे राजा युधिष्ठिर। दोनों ऐसे दुर्गम मार्गपर जा पहुँचे जो बहुत ही अशुभ था। पापाचारी मनुष्य ही यातना भोगनेके लिये उसपर आते-जाते थे ॥ १६ ॥
तमसा संवृतं घोरं केशशैवलशाद्वलम् ।
युक्तं पापकृतां गन्धैर्मांसशोणितकर्दमम् ॥ १७ ॥
वहाँ घोर अन्धकार छा रहा था। केश, सेवार और घास इन्हींसे वह मार्ग भरा हुआ था। वह पापियोंके ही योग्य था। वहाँ दुर्गन्ध फैल रही थी। मांस और रक्तकी कीच जमी हुई थी ॥ १७ ॥
दंशोत्पातकभल्लूकमक्षिकामशकावृतम् ।
इतश्चेतश्च कुणपैः समन्तात् परिवारितम् ॥ १८ ॥
उस रास्तेपर डाँस, मच्छर, मक्खी, उत्पाती जीवजन्तु और भालू आदि फैले हुए थे। इधर-उधर सब ओर सड़े मुर्दे पड़े हुए थे ॥ १८ ॥
अस्थिकेशसमाकीर्णं कृमिकीटसमाकुलम् ।
ज्वलनेन प्रदीप्तेन समन्तात् परिवेष्टितम् ॥ १९ ॥
हड्डियाँ और केश चारों ओर फैले हुए थे। कृमि और कीटोंसे वह मार्ग भरा हुआ था। उसे चारों ओरसे जलती आगने घेर रखा था ॥ १९ ॥
अयोमुखैश्च काकाद्यैर्गृध्रैश्च समभिद्रुतम् ।
सूचीमुखैस्तथा प्रेतैर्विन्ध्यशैलोपमैर्वृतम् ॥ २० ॥
लोहेकी-सी चोंचवाले कौए और गीध आदि पक्षी मँडरा रहे थे। सूईके समान चुभते हुए मुखोंवाले और विन्ध्यपर्वतके समान विशालकाय प्रेत वहाँ सब ओर घूम रहे थे ॥ २० ॥
मेदोरुधिरयुक्तैश्च छिन्नबाहूरुपाणिभिः ।
निकृत्तोदरपादैश्च तत्र तत्र प्रवेरितैः ॥ २१ ॥
वहाँ यत्र-तत्र बहुत-से मुर्दे बिखरे पड़े थे, उनमेंसे किसीके शरीरसे रुधिर और मेद बहते
थे, किसीके बाहु, ऊरु, पेट और हाथ-पैर कट गये थे ।।
स तत्कुणपदुर्गन्धमशिवं लोमहर्षणम् ।
जगाम राजा धर्मात्मा मध्ये बहु विचिन्तयन् ॥ २२ ॥
धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन बहुत चिन्ता करते हुए उसी मार्गके बीचसे होकर
निकले जहाँ सड़े मुर्दोंकी बदबू फैल रही थी और अमंगलकारी बीभत्स दृश्य दिखायी देता
था। वह भयंकर मार्ग रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।। २२ ।।
ददर्शोष्णोदकैः पूर्णां नदीं चापि सुदुर्गमाम् ।
असिपत्रवनं चैव निशितं क्षुरसंवृतम् ॥ २३ ॥
आगे जाकर उन्होंने देखा, खौलते हुए पानीसे भरी हुई एक नदी बह रही है, जिसके
पार जाना बहुत ही कठिन है। दूसरी ओर तीखी तलवारों या छूरोंके-से पत्तोंसे परिपूर्ण तेज
धारवाला असिपत्र नामक वन है ।। २३ ।।
करम्भवालुकास्तप्ता आयसीश्च शिलाःपृथक् ।
लोहकुम्भीश्च तैलस्य क्वाथ्यमानाः समन्ततः ॥ २४ ॥
कहीं गरम-गरम बालू बिछी है तो कहीं तपाये हुए लोहेकी बड़ी-बड़ी चट्टानें रखी गयी हैं। चारों ओर लोहेके कलशोंमें तेल खौलाया जा रहा है ॥ २४ ॥
कूटशाल्मलिकं चापि दुःस्पर्शं तीक्ष्णकण्टकम् ।
ददर्श चापि कौन्तेयो यातनाः पापकर्मिणाम् ॥ २५ ॥
जहाँ-तहाँ पैने काँटोंसे भरे हुए सेमलके वृक्ष हैं, जिनको हाथसे छूना भी कठिन है। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने यह भी देखा कि वहाँ पापाचारी जीवोंको बड़ी कठोर यातनाएँ दी जा रही हैं ॥ २५ ॥