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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2221)

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[विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त]

युधिष्ठिर उवाच

देव किं फलमाख्यातं विषुवेष्वमरेश्वर ।
सूर्येन्दूपप्लवे चैव वक्तुमर्हसि तत् फलम् ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! देवेश्वर! विषुव-योगमें तथा सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय दान देनेसे किस फलकी प्राप्ति बतायी गयी है, यह बतलानेकी कृपा करें ॥

श्रीभगवानुवाच

शृणुष्व राजन् विषुवे सोमार्कग्रहणेषु च ।
व्यतीपातेऽयने चैव दानं स्यादक्षयं फलम् ॥
श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्! विषुवयोगमें, सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय, व्यतीपातयोगमें तथा उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन जो दान दिया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है। इस विषयका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
राजनयनयोर्मध्ये विषुवं सम्प्रचक्षते ।
समे रात्रिदिने तत्र संध्यायां विषुवे नृप ॥
ब्रह्माहं शङ्करश्चापि तिष्ठामः सहिताः सकृत् ।
क्रियाकरणकार्याणामेकीभावत्वकारणात् ॥
महाराज युधिष्ठिर! उत्तरायण और दक्षिणायनके मध्य भागमें जब कि रात और दिन बराबर होते हैं, वह समय 'विषुवयोग' के नामसे पुकारा जाता है। उस दिन संध्याके समय मैं, ब्रह्मा और महादेवजी क्रिया, करण और कार्योंकी एकतापर विचार करनेके लिये एक बार एकत्रित होते हैं ॥
अस्माकमेकीभूतानां निष्कलं परमं पदम् ।
तन्मुहूर्तं परं पुण्यं राजन् विषुवसंज्ञितम् ॥
नरेश्वर! जिस मुहूर्तमें हम लोगोंका समागम होता है, वह कलारहित परम पद है। वह मुहूर्त परम पवित्र और विषुवपर्वके नामसे प्रसिद्ध है ॥
तदेवाद्यक्षरं ब्रह्म परं ब्रह्मेति कीर्तितम् ।
तस्मिन् मुहूर्ते सर्वे तु चिन्तयन्ति परं पदम् ॥
उसे अक्षर ब्रह्म और परब्रह्म भी कहते हैं। उस मुहूर्तमें सब लोग परम पदका चिन्तन करते हैं ॥
देवाश्च वसवो रुद्राः पितरश्चाश्विनौ तथा ।
साध्याश्च विश्वे गन्धर्वाः सिद्धा ब्रह्मर्षयस्तथा ॥
सोमादयो ग्रहाश्चैव सरितः सागरास्तथा ।

मरुतोऽप्सरसो नागा यक्षराक्षसगुह्यकाः ।।
एते चान्ये च राजेन्द्र विषुवे संयतेन्द्रियाः ।
सोपवासाः प्रयत्नेन भवन्ति ध्यानतत्पराः ।।
राजेन्द्र! देवता, वसु, रुद्र, पितर, अश्विनीकुमार, साध्यगण, विश्वेदेव, गन्धर्व, सिद्ध, ब्रह्मर्षि, सोम आदि ग्रह, नदियाँ, समुद्र, मरुत्, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस और गुह्यक—ये तथा दूसरे देवता भी विषुवपर्वमें इन्द्रिय-संयमपूर्वक उपवास करते हैं और प्रयत्नपूर्वक परमात्माके ध्यानमें संलग्न होते हैं ।।
अन्नं गावस्तिलान् भूमिं कन्यादानं तथैव च ।
गृहमायतनं धान्यं वाहनं शयनं तथा ।।
यच्चान्यच्च मया प्रोक्तं तत् प्रयच्छ युधिष्ठिर ।
इसलिये युधिष्ठिर! तुम अन्न, गौ, तिल, भूमि, कन्या, घर, विश्रामस्थान, धान्य, वाहन, शय्या तथा और जो वस्तुएँ मेरे द्वारा दानके योग बतलायी गयी हैं, उन सबका विषुवपर्वमें दान करो ।।
दीयते विषुवेष्वेवं श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः ।।
तस्य दानस्य कौन्तेय क्षयं नैवोपपद्यते ।
वर्धतेऽहरहः पुण्यं तद् दानं कोटिसम्मितम् ।।
कुन्तीनन्दन! जो दान विषुवयोगमें विशेषतः श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दिया जाता है, उस दानका कभी नाश नहीं होता। उस दानका पुण्य प्रतिदिन बढ़ते-बढ़ते करोड़ गुना हो जाता है ।।
चन्द्रसूर्यग्रहे व्योम्नि मम वा शङ्करस्य वा ।
गायत्रीं मामिकां वापि जपेद् यः शङ्करस्य वा ।।
शङ्खतूर्यस्वनैश्चैव कांस्यघण्टास्वनैरपि ।
कारयेत् तु ध्वनिं भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ।।
आकाशमें जब चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण लगा हो, उस समय जो मेरी अथवा भगवान् शङ्करकी पूजा करता हुआ मेरी या शङ्करकी गायत्रीका जप करता है तथा भक्तिके साथ शंख, तूर्य, झाँझ और घंटा बजाकर उनकी ध्वनि करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो ।।
गान्धर्वैर्होमजप्यैस्तु जप्तैरुत्कृष्टनामभिः ।
दुर्बलोऽपि भवेद् राहुः सोमश्च बलवान् भवेत् ।।
मेरे सामने गीत गाने, होम और जप करने तथा मेरे उत्तम नामोंका कीर्तन करनेसे राहु दुर्बल और चन्द्रमा बलवान् होते हैं ।।
सूर्येन्दूपप्लवे चैव श्रोत्रियेभ्यः प्रदीयते ।
तत्सहस्रगुणं भूत्वा दातारमुपतिष्ठति ।।

सूर्य और चन्द्रमाके ग्रहणकालमें श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको जो दान दिया जाता है, वह हजार गुना होकर दाताको मिलता है ।।
महापातकयुक्तोऽपि यद्यपि स्यान्नरोत्तमः ।
निष्पापस्तत्क्षणादेव तेन दानेन जायते ।।
महान् पातकी मनुष्य भी उस दानसे तत्काल पापरहित होकर पुरुषश्रेष्ठ हो जाता है ।।
चन्द्रसूर्यप्रकाशेन विमानेन विराजता ।
याति सोमपुरं रम्यं सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ।।
वह चन्द्रमा और सूर्यके प्रकाशसे प्रकाशित सुन्दर विमानपर बैठकर रमणीय चन्द्रलोकमें गमन करता है और वहाँ अप्सरागणोंसे उसकी सेवा की जाती है ।।
यावदृक्षाणि तिष्ठन्ति गगने शशिना सह ।
तावत् कालं स राजेन्द्र सोमलोके महीयते ।।
राजेन्द्र! जबतक आकाशमें चन्द्रमाके साथ तारे मौजूद रहते हैं, तबतक चन्द्रलोकमें वह सम्मानके साथ निवास करता है ।।
ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके युधिष्ठिर ।
वेदवेदाङ्गविद् विप्रः कोटीधनपतिर्भवेत् ।।
युधिष्ठिर! फिर समयानुसार वहाँसे लौटनेपर इस संसारमें वह वेद-वेदांगोंका विद्वान् और करोड़पति ब्राह्मण होता है ।।

युधिष्ठिर उवाच
भगवंस्तव गायत्री जप्यते च कथं विभो ।
किं वा तस्य फलं देव ममाचक्ष्व सुरेश्वर ।।
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! विभो! आपकी गायत्रीका जप किस तरह किया जाता है? देवदेवेश्वर! उसका क्या फल होता है—यह बतानेकी कृपा कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच
द्वादश्यां विषुवं चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ।
अयने श्रवणे चैव व्यतीपाते तथैव च ।।
अश्वत्थदर्शने चैव तथा मद्दर्शनेऽपि च ।
जप्या तु मम गायत्री चाथवाष्टाक्षरं नृप ।
अर्जितं दुष्कृतं तस्य नाशयेन्नात्र संशयः ।।
श्रीभगवान्‌ने कहा— राजन्! द्वादशी तिथिको, विषुवपर्वमें, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय, उत्तरायण तथा दक्षिणायनके आरम्भके दिन, श्रवण-नक्षत्रमें तथा व्यतीपात योगमें पीपलका या मेरा दर्शन होनेपर मेरी गायत्रीका अथवा अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ

नमो नारायणाय)-का जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यके पूर्वकृत् पापोंका निःसंदेह नाश हो जाता है ।।

युधिष्ठिर उवाच

अश्वत्थदर्शनं चैव किं त्वद्दर्शनसम्मितम् ।
एतत् कथय मे देव परं कौतूहलं हि मे ।।
युधिष्ठिरने पूछा—देव! अब यह बतलाइये कि पीपलका दर्शन आपके दर्शनके समान क्यों माना जाता है। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ।।

श्रीभगवानुवाच

अहमश्वत्थरूपेण पालयामि जगत्त्रयम् ।
अश्वत्थो न स्थितो यत्र नाहं तत्र प्रतिष्ठितः ।।
श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्! मैं ही पीपलके वृक्षके रूपमें रहकर तीनों लोकोंका पालन करता हूँ। जहाँ पीपलका वृक्ष नहीं है, वहाँ मेरा वास नहीं है ।।
यत्राहं संस्थितो राजन्नश्वत्थश्चापि तिष्ठति ।
यस्त्वेनमर्चयेद् भक्त्या स मां साक्षात् समर्चति ।।
राजन्! जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ पीपल भी रहता है। जो मनुष्य भक्तिभावसे पीपल-वृक्षकी पूजा करता है, वह साक्षात् मेरी ही पूजा करता है ।।
यस्त्वेनं प्रहरेत् कोपान्मामेव प्रहरेत् तु सः ।
तस्मात् प्रदक्षिणं कुर्यान्न छिन्द्यादेनमन्वहम् ।।
जो क्रोध करके पीपलपर प्रहार करता है, वह वास्तवमें मुझपर ही प्रहार करता है। इसलिये पीपलकी सदा प्रदक्षिणा करनी चाहिये, उसको काटना नहीं चाहिये ।।
व्रतस्य पारणं तीर्थमार्जवं तीर्थमुच्यते ।
देवशुश्रूषणं तीर्थं गुरुशुश्रूषणं तथा ।।
व्रतका पारण, सरलता, देवताओंकी सेवा और गुरुशुश्रूषा—ये सब तीर्थ कहे जाते हैं ।।
पितृशुश्रूषणं तीर्थं मातृशुश्रूषणं तथा ।
दाराणां तोषणं तीर्थं गार्हस्थ्यं तीर्थमुच्यते ।।
माता-पिताकी सेवा, स्त्रियोंको संतुष्ट रखना और गृहस्थ-धर्मका पालन करना—ये सब तीर्थ कहे गये हैं ।।
आतिथेयः परं तीर्थं ब्रह्मतीर्थं सनातनम् ।
ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं त्रेताग्निस्तीर्थमुच्यते ।।
अतिथि-सेवामें लगे रहना परम तीर्थ है। वेदका अध्ययन सनातन तीर्थ है। ब्रह्मचर्यका पालन करना परम तीर्थ है। आहवनीयादि तीन प्रकारकी अग्नियाँ—ये तीर्थ कहे जाते हैं ।।

मूलं धर्मं तु विज्ञाय मनस्तत्रावधार्यताम् ।
गच्छ तीर्थानि कौन्तेय धर्मो धर्मेण वर्धते ॥
कुन्तीनन्दन! इन सबका मूल है 'धर्म'—ऐसा जानकर इनमें मन लगाओ तथा तीर्थोंमें जाओ; क्योंकि धर्म करनेसे धर्मकी वृद्धि होती है ॥

द्विविधं तीर्थमित्याहुः स्थावरं जङ्गमं तथा ।
स्थावराज्जङ्गमं तीर्थं ततो ज्ञानपरिग्रहः ॥
दो प्रकारके तीर्थ बताये जाते हैं—स्थावर और जंगम। स्थावर तीर्थसे जंगम तीर्थ श्रेष्ठ है; क्योंकि उससे ज्ञानकी प्राप्ति होती है ॥

कर्मणापि विशुद्धस्य पुरुषस्येह भारत ।
हृदये सर्वतीर्थानि तीर्थभूतः स उच्यते ॥
भारत! इस लोकमें पुण्यकर्मके अनुष्ठानसे विशुद्ध हुए पुरुषके हृदयमें सब तीर्थ वास करते हैं, इसलिये वह तीर्थस्वरूप कहलाता है ॥

गुरुतीर्थं परं ज्ञानमतस्तीर्थं न विद्यते ।
ज्ञानतीर्थं परं तीर्थं ब्रह्मतीर्थं सनातनम् ॥
गुरुरूपी तीर्थसे परमात्माका ज्ञान प्राप्त होता है, इसलिये उससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है। ज्ञानतीर्थ सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है और ब्रह्मतीर्थ सनातन है ॥

क्षमा तु परमं तीर्थं सर्वतीर्थेषु पाण्डव ।
क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥
पाण्डुनन्दन! समस्त तीर्थोंमें भी क्षमा सबसे बड़ा तीर्थ है। क्षमाशील मनुष्योंको इस लोक और परलोकमें भी सुख मिलता है ॥

मानितोऽमानितो वापि पूजितोऽपूजितोऽपि वा ।
आक्रुष्टस्तर्जितो वापि क्षमावांस्तीर्थमुच्यते ॥
कोई मान करे या अपमान, पूजा करे या तिरस्कार, अथवा गाली दे या डाँट बतावे, इन सभी परिस्थितियोंमें जो क्षमाशील बना रहता है, वह तीर्थ कहलाता है ॥

क्षमा यशः क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा दमः ।
क्षमा हिंसा क्षमा धर्मः क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ॥
क्षमा ही यश, दान, यज्ञ और मनोनिग्रह है। अहिंसा, धर्म और इन्द्रियोंका संयम क्षमाके ही स्वरूप हैं ॥

क्षमा दया क्षमा यज्ञः क्षमयैव धृतं जगत् ।
क्षमावान् ब्राह्मणो देवः क्षमावान् ब्राह्मणो वरः ॥
क्षमा ही दया और क्षमा ही यज्ञ है। क्षमासे ही सारा जगत् टिका हुआ है; अतः जो ब्राह्मण क्षमावान् है, वह देवता कहलाता है, वही सबसे श्रेष्ठ है ॥

क्षमावान् प्राप्नुयात् स्वर्गं क्षमावानाप्नुयाद् यशः ।

क्षमावान् प्राप्नुयान्मोक्षं तस्मात् साधुः स उच्यते ॥
क्षमाशील मनुष्यको स्वर्ग, यश और मोक्षकी प्राप्ति होती है; इसलिये क्षमावान् पुरुष साधु कहलाता है ॥
आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्थ-
मात्मा तीर्थं सर्वतीर्थप्रधानम् ।
आत्मा यज्ञः सततं मन्यते वै
स्वर्गो मोक्षः सर्वमात्मन्यधीनम् ॥
राजन्! आत्मारूप नदी परम पावन तीर्थ है, यह सब तीर्थोंमें प्रधान है। आत्माको सदा यज्ञरूप माना गया है। स्वर्ग, मोक्ष—सब आत्माके ही अधीन हैं ॥
आचारनैर्मल्यमुपागतेन
सत्यक्षमानिस्तुलशीतलेन ।
ज्ञानाम्बुना स्नाति हि नित्यमेवं
किं तस्य भूयः सलिलेन तीर्थम् ॥
जो सदाचारके पालनसे अत्यन्त निर्मल हो गया है तथा सत्य और क्षमाके द्वारा जिसमें अतुलनीय शीतलता आ गयी है—ऐसे ज्ञानरूपी जलमें निरन्तर स्नान करनेवाले पुरुषको केवल पानीसे भरे हुए तीर्थकी क्या आवश्यकता है? ॥

युधिष्ठिर उवाच

भगवन् सर्वपापघ्नं प्रायश्चित्तमदुष्करम् ।
त्वद्भक्तस्य सुरश्रेष्ठ मम त्वं वक्तुमर्हसि ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**देवश्रेष्ठ भगवन्! मैं आपका भक्त हूँ। अब मुझे कोई ऐसा प्रायश्चित्त बतलाइये, जो करनेमें सरल और समस्त पापोंका नाश करनेवाला हो ॥

श्रीभगवानुवाच

रहस्यमिदमत्यर्थमश्राव्यं पापकर्मणाम् ।
अधार्मिकाणामश्राव्यं प्रायश्चित्तं ब्रवीमि ते ॥
**श्रीभगवान् बोले—**राजन्! मैं तुम्हें अत्यन्त गोपनीय प्रायश्चित्त बता रहा हूँ। यह अधर्ममें रुचि रखनेवाले पापाचारी मनुष्योंको सुनाने योग्य नहीं है ॥
पावनं ब्राह्मणं दृष्ट्वा मद्गतेनान्तरात्मना ।
नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्यभिवादनमाचरेत् ॥
किसी पवित्र ब्राह्मणको सामने देखनेपर सहसा मेरा स्मरण करे और ‘नमो ब्रह्मण्यदेवाय’ कहकर भगवद्-बुद्धिसे उन्हें प्रणाम करे ॥
प्रदक्षिणं च यः कुर्यात् पुनरष्टाक्षरेण तु ।
तेन तुष्टेन विप्रेण तत्पापं क्षपयाम्यहम् ॥

इसके बाद अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए ब्राह्मणदेवताकी परिक्रमा करे। ऐसा करनेसे ब्राह्मण संतुष्ट होते हैं और मैं उस प्रणाम करनेवाले मनुष्यके पापोंका नाश कर देता हूँ॥

यत्र कृष्टां वराहस्य मृत्तिकां शिरसा वहन् ।
प्राणायामशतं कृत्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ॥
जहाँ वराहद्वारा उखाड़ी हुई मृत्तिका हो, उसको सिरपर धारण करके मनुष्य सौ प्राणायाम करता है तो वह पापोंसे छूट जाता है॥

दक्षिणावर्तशङ्खाद् वा कपिलाशृङ्गतोऽपि वा ।
प्राक्स्रोतसं नदीं गत्वा ममायतनसंनिधौ ॥
सलिलेन तु यः स्नायात् सकृदेव रविग्रहे ।
तस्य यत् संचितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥
जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय पूर्ववाहिनी नदीके तटपर जाकर मेरे मन्दिरके निकट दक्षिणावर्त शंखके जलसे अथवा कपिला गायके सींगका स्पर्श कराये हुए जलसे एक बार भी स्नान कर लेता है, उसके समस्त संचित पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं॥

पिबेत् तु पञ्चगव्यं यः पौर्णमास्यामुपोष्य तु ।
तस्य नश्यति तत् पापं यत् पापं पूर्वसंचितम् ॥
जो पूर्णिमाको उपवास करके पञ्चगव्यका पान करता है, उसके भी पूर्वसंचित पाप नष्ट हो जाते हैं॥

तथैव ब्रह्मकूर्चं तु समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।
मासि मासि पिबेद् यस्तु तस्य पापं प्रणश्यति ॥
इसी प्रकार जो प्रतिमास अलग-अलग मन्त्र पढ़कर संग्रह किये हुए ब्रह्मकूर्चका पान करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं॥

पात्रं च ब्रह्मकूर्चं च शृणु तत्र च भारत ।
पलाशं पद्मपत्रं च ताम्रं वाथ हिरण्मयम् ।
सादयित्वा तु गृह्णीयात् तत् तु पात्रमुदाहृतम् ॥
भरतनन्दन! अब मैं ब्रह्मकूर्च और उसके पात्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। पलाश या कमलके पत्तेमें अथवा ताँबे या सोनेके बने हुए बर्तनमें ब्रह्मकूर्च रखकर पीना चाहिये। ये ही उसके उपयुक्त पात्र कहे गये हैं॥

गायत्र्या गृह्णते मूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् ।
आप्यायस्वेति च क्षीरं दधि क्राव्णेति वै दधि ॥
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् ।
आपो हिष्ठेत्यृचा गृह्य यवचूर्णं यथाविधि ॥
ब्रह्मणे च यथा हुत्वा समिद्धे च हुताशने ।

आलोड्य प्रणवेनैव निर्मथ्य प्रणवेन तु ।।
(ब्रह्मकूर्चकी विधि इस प्रकार है—) गायत्री<sup>१</sup> मन्त्र पढ़कर गौका मूत्र, ‘गन्धद्वार०’<sup>२</sup> इत्यादि मन्त्रसे गौका गोबर, ‘आप्यायस्व०’<sup>३</sup> इस मन्त्रसे गायका दूध, ‘दधि क्राव्ण०’<sup>४</sup> इस मन्त्रसे दही, ‘तेजोऽसि शुक्रम०’<sup>५</sup> इस मन्त्रसे घी, ‘देवस्य त्वा०’<sup>६</sup> आदि मन्त्रके द्वारा कुशका जल तथा ‘आपो हिष्ठा मयो०’ इस ऋचाके द्वारा जौका आटा लेकर सबको एकमें मिला दे और प्रज्वलित अग्निमें ब्रह्माके उद्देश्यसे विधिपूर्वक हवन करके प्रणवका उच्चारण करते हुए उपर्युक्त वस्तुओंका आलोडन और मन्थन करे ।।

उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेत् तु प्रणवेन तु ।
महतापि स पापेन त्वचेवाहिर्विमुच्यते ।।
फिर प्रणवका उच्चारण करके उसे पात्रमेंसे निकालकर हाथमें ले और प्रणवका पाठ करते हुए ही उसे पी जाय। इस प्रकार ब्रह्मकूर्चका पान करनेसे मनुष्य बड़े-से-बड़े पापसे भी उसी प्रकार छुटकारा पा जाता है, जैसे साँप अपनी केंचुलसे पृथक् हो जाता है ।।

भद्रं न इति यः पादं पठन् ऋक् संहितां तदा ।
अन्तर्जले वाभ्यादित्ये तस्य पापं प्रणश्यति ।।
जो मनुष्य जलके भीतर बैठकर अथवा सूर्यके सामने दृष्टि रखकर ‘भद्रं नः०’<sup>७</sup> इस ऋचाके एक चरणका या ऋक्संहिताका पाठ करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं ।।

मम सूक्तं जपेद् यस्तु नित्यं मद्गतमानसः ।
न पापेन स लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा ।।
जो मुझमें चित्त लगाकर प्रतिदिन मेरे सूक्त (पुरुषसूक्त)-का पाठ करता है, वह जलसे निर्लिप्त रहनेवाले कमलके पत्तेकी तरह कभी भी पापसे लिप्त नहीं होता ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)


१. तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।
२. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ।।
३. आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोमवृष्ण्यम् । भवाव्वाजस्य सङ्गथे ।। (यजु० अ० १२ मं० ११२)
४. दधि क्राव्णोऽकारिषञ्जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखाकरत्प्रणऽआयूँषि तारिषत् ।। (यजु० अ० २३।३२)
५. ॐ तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि । धामनामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि ।। (यजु० १।३१)
६. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् आददे। (यजु० अ० ३८।१)
७. भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमृत क्रतुम् । अध ते सख्ये अन्धसो विवो मदे रणान्गावो न यवसे विवक्षसे ।। (ऋ० मं० १० अ० २ सू० २६ मन्त्र १)