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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2023)

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः

उलूपी और चित्राङ्गदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न-आभूषण आदिसे सत्कार तथा अश्वमेध-यज्ञका आरम्भ

वैशम्पायन उवाच
स प्रविश्य महाबाहुः पाण्डवानां निवेशनम् ।
पितामहीमभ्यवन्दत् साम्ना परमवल्गुना ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंके महलमें प्रवेश करके महाबाहु बभ्रुवाहनने अत्यन्त मधुर वचन बोलकर अपनी दादी कुन्तीके चरणोंमें प्रणाम किया ॥

ततश्चित्राङ्गदा देवी कौरव्यस्यात्मजापि च ।
पृथां कृष्णां च सहिते विनयेनोपजग्मतुः ॥ २ ॥
इसके बाद देवी चित्रांगदा और कौरव्यनागकी पुत्री उलूपीने भी एक साथ ही विनीत भावसे कुन्ती और द्रौपदीके चरण छुए ॥ २ ॥

सुभद्रां च यथान्यायं याश्चान्याः कुरुयोषितः ।

ददौ कुन्ती ततस्ताभ्यां रत्नानि विविधानि च ॥ ३ ॥
फिर सुभद्रा तथा कुरुकुलकी अन्य स्त्रियोंसे भी वे यथायोग्य मिलीं। उस समय कुन्तीने उन दोनोंको नाना प्रकारके रत्न भेंटमें दिये ॥ ३ ॥

द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चाप्यन्याऽददुः स्त्रियः ।
ऊषतुस्तत्र ते देव्यौ महार्हशयनासने ॥ ४ ॥
द्रौपदी, सुभद्रा तथा अन्य स्त्रियोंने भी अपनी ओरसे नाना प्रकारके उपहार दिये। तत्पश्चात् वे दोनों देवियाँ बहुमूल्य शय्याओंपर विराजमान हुईं ॥ ४ ॥

सुपूजिते स्वयं कुन्त्या पार्थस्य हितकाम्यया ।
स च राजा महातेजाः पूजितो बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्रं महीपालमुपतस्थे यथाविधि ।
अर्जुनके हितकी कामनासे कुन्तीदेवीने स्वयं ही उन दोनोंका बड़ा सत्कार किया। कुन्तीसे सत्कार पाकर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहन महाराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुआ और उसने विधिपूर्वक उनका चरण-स्पर्श किया ॥ ५ १/२ ॥

युधिष्ठिरं च राजानं भीमादींश्चापि पाण्डवान् ॥ ६ ॥
उपागम्य महातेजा विनयेनाभ्यवादयत् ।
इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमसेन आदि सभी पाण्डवोंके पास जाकर उस महातेजस्वी नरेशने विनयपूर्वक उनका अभिवादन किया ॥ ६ १/२ ॥

स तैः प्रेम्णा परिष्वक्तः पूजितश्च यथाविधि ॥ ७ ॥
धनं चास्मै ददुर्भूरि प्रीयमाणा महारथाः ।
उन सब लोगोंने प्रेमवश उसे छातीसे लगा लिया और उसका यथोचित सत्कार किया। इतना ही नहीं, बभ्रुवाहनपर प्रसन्न हुए उन पाण्डव महारथियोंने उसे बहुत धन दिया ॥ ७ १/२ ॥

तथैव च महीपालः कृष्णं चक्रगदाधरम् ॥ ८ ॥
प्रद्युम्न इव गोविन्दं विनयेनोपतस्थिवान् ।
इसी प्रकार वह भूपाल प्रद्युम्नकी भाँति विनीत भावसे शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ ८ १/२ ॥

तस्मै कृष्णो ददौ राज्ञे महार्हमतिपूजितम् ॥ ९ ॥
रथं हेमपरिष्कारं दिव्याश्वयुजमुत्तमम् ।
श्रीकृष्णने इस राजाको एक बहुमूल्य रथ प्रदान किया जो सुनहरी साजोंसे सुसज्जित, सबके द्वारा अत्यन्त प्रशंसित और उत्तम था। उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे ॥ ९ १/२ ॥

धर्मराजश्च भीमश्च फाल्गुनश्च यमौ तथा ॥ १० ॥
पृथक् पृथक् च ते चैनं मानार्थाभ्यामयोजयन् ।

तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवने अलग-अलग बभ्रुवाहनका सत्कार करके उसे बहुत धन दिया ॥ १० १/२ ॥
ततस्तृतीये दिवसे सत्यवत्यात्मजो मुनिः ॥ ११ ॥
युधिष्ठिरं समभेत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ।
उसके तीसरे दिन सत्यवतीनन्दन प्रवचनकुशल महर्षि व्यास युधिष्ठिरके पास आकर बोले— ॥ ११ १/२ ॥
अद्यप्रभृति कौन्तेय यजस्व समयो हि ते ।
मुहूर्तो यज्ञियः प्राप्तश्चोदयन्तीह याजकाः ॥ १२ ॥
‘कुन्तीनन्दन! तुम आजसे यज्ञ आरम्भ कर दो। उसका समय आ गया है। यज्ञका शुभ मुहूर्त उपस्थित है और याजकगण तुम्हें बुला रहे हैं ॥ १२ ॥
अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेऽयं च कल्पताम् ।
बहुत्वात् काञ्चनाख्यस्य ख्यातो बहुसुवर्णकः ॥ १३ ॥
‘राजेन्द्र! तुम्हारे इस यज्ञमें किसी बातकी कमी नहीं रहेगी। इसलिये यह किसी भी अंगसे हीन न होनेके कारण अहीन (सर्वांगपूर्ण) कहलायेगा। इसमें सुवर्ण नामक द्रव्यकी अधिकता होगी; इसलिये यह बहुसुवर्णक नामसे विख्यात होगा ॥ १३ ॥
एवमत्र महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु ।
त्रित्वं व्रजतु ते राजन् ब्राह्मणा ह्यत्र कारणम् ॥ १४ ॥
‘महाराज! यज्ञके प्रधान कारण ब्राह्मण ही हैं; इसलिये तुम उन्हें तिगुनी दक्षिणा देना। ऐसा करनेसे तुम्हारा यह एक ही यज्ञ तीन यज्ञोंके समान हो जायगा ॥ १४ ॥
त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्य बहुदक्षिणाम् ।
ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यसि नराधिप ॥ १५ ॥
‘नरेश्वर! यहाँ बहुत-सी दक्षिणावाले तीन अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाकर तुम ज्ञातिवधके पापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १५ ॥
पवित्रं परमं चैतत् पावनं चैतदुत्तमम् ।
यदाश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ॥ १६ ॥
‘कुरुनन्दन! तुम्हें जो अश्वमेध-यज्ञका अवभृथ-स्नान प्राप्त होगा, वह परम पवित्र, पावन और उत्तम है’ ॥ १६ ॥
इत्युक्तः स तु तेजस्वी व्यासेनामितबुद्धिना ।
दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तये ततः ॥ १७ ॥
परम बुद्धिमान् व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उसी दिन दीक्षा ग्रहण की ॥ १७ ॥
ततो यज्ञं महाबाहुर्वाजिमेधं महाक्रतुम् ।
बह्वन्नदक्षिणं राजा सर्वकामगुणान्वितम् ॥ १८ ॥

फिर उन महाबाहु नरेशने बहुत-से अन्नकी दक्षिणासे युक्त तथा सम्पूर्ण कामना और गुणोंसे सम्पन्न उस अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया ।। १८ ।।

तत्र वेदविदो राजंश्चक्रुः कर्माणि याजकाः ।
परिक्रमन्तः सर्वज्ञा विधिवत् साधुशिक्षितम् ।। १९ ।।
उसमें वेदोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ याजकोंने सम्पूर्ण कर्म किये-कराये। वे सब ओर घूम-घूमकर सत्पुरुषों-द्वारा शिक्षित कर्मका सम्पादन करते-कराते थे ।। १९ ।।

न तेषां स्खलितं किंचिदासीच्चाप्यकृतं तथा ।
क्रममुक्तं च युक्तं च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभाः ।। २० ।।
उनके द्वारा उस यज्ञमें कहीं भी कोई भूल या त्रुटि नहीं होने पायी। कोई भी कर्म न तो छूटा और न अधूरा रहा। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने प्रत्येक कार्यको क्रमके अनुसार उचित रीतिसे पूरा किया ।। २० ।।

कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्माख्यं यथावद् द्विजसत्तमाः ।
चक्रुस्ते विधिवद् राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ।। २१ ।।
राजन्! वहाँ ब्राह्मणशिरोमणियोंने प्रवर्ग्य नामक धर्मानुकूल कर्मको यथोचित रीतिसे सम्पन्न करके विधिपूर्वक सोमाभिषव—सोमलताका रस निकालनेका कार्य किया ।। २१ ।।

अभिषूय ततो राजन् सोमं सोमपसत्तमाः ।
सवनान्यानुपूर्व्येण चक्रुः शास्त्रानुसारिणः ।। २२ ।।
महाराज! सोमपान करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले विद्वानोंने सोमरस निकालकर उसके द्वारा क्रमशः तीनों समयके सवन कर्म किये ।। २२ ।।

न तत्र कृपणः कश्चिन्न दरिद्रो बभूव ह ।
क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानवः ।। २३ ।।
उस यज्ञमें आया हुआ कोई भी मनुष्य, चाहे वह निम्न-से-निम्न श्रेणीका क्यों न हो, दीन-दरिद्र, भूखा अथवा दुखिया नहीं रह गया था ।। २३ ।।

भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास शत्रुहा ।
भीमसेनो महातेजाः सततं राजशासनात् ।। २४ ।।
शत्रुसूदन महातेजस्वी भीमसेन महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको भोजन दिलानेके कामपर सदा डटे रहते थे ।। २४ ।।

संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकार्याणि याजकाः ।
दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रानुदर्शनात् ।। २५ ।।
यज्ञकी वेदी बनानेमें निपुण याजकगण प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सब कार्य सम्पन्न किया करते थे ।। २५ ।।

नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यस्तस्य धीमतः ।
नाव्रतो नानुपाध्यायो न च वादाविचक्षणः ।। २६ ।।

बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरके यज्ञका कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था जो छहों अंगोंका
विद्वान्, ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाला, अध्यापनकर्ममें कुशल तथा वाद-विवादमें
प्रवीण न हो ॥ २६ ॥
ततो यूपोच्छ्रये प्राप्ते षड् बैल्वान् भरतर्षभ ।
खादिरान् बिल्वसंमितांस्तावत्ः सर्ववर्णिनः ॥ २७ ॥
देवदारुमयी द्वौ तु यूपौ कुरुपतेर्मखे ।
श्लेष्मातकमयं चैकं याजकाः समकल्पयन् ॥ २८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जब यूपकी स्थापनाका समय आया, तब याजकोंने यज्ञभूमिमें
बेलके छः, खैरके छः, पलाशके भी छः, देवदारुके दो और लसोड़ेका एक—इस प्रकार
इक्कीस यूप कुरुराज युधिष्ठिरके यज्ञमें खड़े किये ॥ २७-२८ ॥
शोभार्थं चापरान् यूपान् काञ्चनान् भरतर्षभ ।
स भीमः कारयामास धर्मराजस्य शासनात् ॥ २९ ॥
भरतभूषण! इनके सिवा धर्मराजकी आज्ञासे भीमसेनने यज्ञकी शोभाके लिये और भी
बहुत-से सुवर्णमय यूप खड़े कराये ॥ २९ ॥
ते व्यराजन्त राजर्षेर्वासोभिरुपशोभिताः ।
महेन्द्रानुगता देवा यथा सप्तर्षिभिर्दिवि ॥ ३० ॥
वस्त्रोंद्वारा अलंकृत किये गये वे राजर्षि युधिष्ठिरके यज्ञ सम्बन्धी यूप आकाशमें
सप्तर्षियोंसे घिरे हुए इन्द्रके अनुगामी देवताओंके समान शोभा पाते थे ॥ ३० ॥
इष्टकाः काञ्चनीश्चात्र चयनार्थं कृताऽभवन् ।
शुशुभे चयनं तच्च दक्षस्येव प्रजापतेः ॥ ३१ ॥
यज्ञकी वेदी बनानेके लिये वहाँ सोनेकी ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उनके द्वारा जब
वेदी बनकर तैयार हुई तब वह दक्षप्रजापतिकी यज्ञवेदीके समान शोभा पाने लगी ॥ ३१ ॥
चतुश्चित्यश्च तस्यासीदष्टादशकरात्मकः ।
स रुक्मपक्षो निचितस्त्रिकोणो गरुडाकृतिः ॥ ३२ ॥
उस यज्ञमण्डपमें अग्निचयनके लिये चार स्थान बने थे। उनमेंसे प्रत्येककी लम्बाई-
चौड़ाई अठारह हाथकी थी। प्रत्येक वेदी सुवर्णमय पंखसे युक्त एवं गरुड़के समान
आकारवाली थी। वह त्रिकोणाकार बनायी गयी थी ॥ ३२ ॥
ततो नियुक्ताः पशवो यथाशास्त्रं मनीषिभिः ।
तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिणः पशवश्च ये ॥ ३३ ॥
ऋषभाः शास्त्रपठितास्तथा जलचराश्च ये ।
सर्वांस्तानभ्ययुञ्जंस्ते तत्राग्निचयकर्मणि ॥ ३४ ॥
तदनन्तर मनीषी पुरुषोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पशुओंको नियुक्त किया। भिन्न-
भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे पशु-पक्षी, शास्त्रकथित वृषभ और जलचर जन्तु—इन सबका

अग्निस्थापन-कर्ममें याजकोंने उपयोग किया ॥
यूपेषु नियता चासीत् पशूनां त्रिशती तथा ।
अश्वरत्नोत्तरा यज्ञे कौन्तेयस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥
कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके उस यज्ञमें जो यूप खड़े किये गये थे, उनमें तीन सौ पशु बाँधे गये थे। उन सबमें प्रधान वही अश्वरत्न था ॥ ३५ ॥
स यज्ञः शुशुभे तस्य साक्षाद् देवर्षिसंकुलः ।
गन्धर्वगणसंगीतः प्रनृत्तोऽप्सरसां गणैः ॥ ३६ ॥
साक्षात् देवर्षियोंसे भरा हुआ युधिष्ठिरका वह यज्ञ बड़ी शोभा पा रहा था। गन्धर्वोंके मधुर संगीत और अप्सराओंके नृत्यसे उसकी शोभा और बढ़ गयी थी ॥ ३६ ॥
स किंपुरुषसंकीर्णः किन्नरैश्चोपशोभितः ।
सिद्धविप्रनिवासैश्च समन्तादभिसंवृतः ॥ ३७ ॥
वह यज्ञमण्डप किम्पुरुषोंसे भरा-पूरा था। किन्नर भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके चारों ओर सिद्धों और ब्राह्मणोंके निवासस्थान बने थे, जिनसे वह यज्ञ-मण्डप घिरा था ॥ ३७ ॥
तस्मिन् सदसि नित्यास्तु व्यासशिष्या द्विजर्षभाः ।
सर्वशास्त्रप्रणेतारः कुशला यज्ञसंस्तरे ॥ ३८ ॥
व्यासजीके शिष्य श्रेष्ठ ब्राह्मण उस यज्ञसभामें सदा उपस्थित रहते थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके प्रणेता और यज्ञकर्ममें कुशल थे ॥ ३८ ॥
नारदश्च बभूवात्र तुम्बुरुश्च महाद्युतिः ।
विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदाः ॥ ३९ ॥
गन्धर्वा गीतकुशला नृत्येषु च विशारदाः ।
रमयन्ति स्म तान् विप्रान् यज्ञकर्मान्तरेषु वै ॥ ४० ॥
नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा अन्य संगीतकलाकोविद, गाननिपुण एवं नृत्यविशारद गन्धर्व प्रतिदिन यज्ञकार्यके बीच-बीचमें समय मिलनेपर अपनी नाच-गानकी कलाओंद्वारा उन ब्राह्मणोंका मनोरंजन करते थे ॥ ३९-४० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे
अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥