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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2000)

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त्र्यशीतितमोऽध्यायः

दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पञ्चनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

मागधेनार्चितो राजन् पाण्डवः श्वेतवाहनः ।
दक्षिणां दिशमास्थाय चारयामास तं हयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मगधराजसे पूजित हो पाण्डुपुत्र श्वेतवाहन अर्जुनने दक्षिण दिशाका आश्रय ले उस घोड़ेको घुमाना आरम्भ किया ॥ १ ॥

ततः स पुनरावर्त्य हयः कामचरो बली ।
आससाद पुरीं रम्यां चेदीनां शुक्तिसाह्वयाम् ॥ २ ॥
वह इच्छानुसार विचरनेवाला अश्व पुनः उधरसे लौटकर चेदियोंकी रमणीय राजधानीमें जो शुक्तिपुरी (या माहिष्मतीपुरी)-के नामसे विख्यात थी, आया ॥ २ ॥

शरभेणार्चितस्तत्र शिशुपालसुतेन सः ।
युद्धपूर्वं तदा तेन पूजया च महाबलः ॥ ३ ॥
वहाँ शिशुपालके पुत्र शरभने पहले तो युद्ध किया और फिर स्वागत-सत्कारके द्वारा उस महाबली अश्वका पूजन किया ॥ ३ ॥

ततोऽर्चितो ययौ राजंस्तदा स तुरगोत्तमः ।
काशीनङ्गान् कोसलांश्च किरातानथ तङ्गणान् ॥ ४ ॥
राजन्! शरभसे पूजित हो वह उत्तम अश्व काशी, कोसल, किरात और तङ्गण आदि जनपदोंमें गया ॥ ४ ॥

पूजां तत्र यथान्यायं प्रतिगृह्य धनंजयः ।
पुनरावृत्य कौन्तेयो दशार्णानगमत् तदा ॥ ५ ॥
उन सभी राज्योंमें यथोचित पूजा ग्रहण करके कुन्तीनन्दन अर्जुन पुनः लौटकर दशार्ण देशमें आये ॥ ५ ॥

तत्र चित्राङ्गदी नाम बलवानरिमर्दनः ।
तेन युद्धमभूत् तस्य विजयस्यातिभैरवम् ॥ ६ ॥
वहाँ उस समय महाबली शत्रुमर्दन चित्रांगद नामक नरेश राज्य करते थे। उनके साथ अर्जुनका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ६ ॥

तं चापि वशमानीय किरीटी पुरुषर्षभः ।
निषादराज्ञो विषयमेकलव्यस्य जग्मिवान् ॥ ७ ॥

पुरुषप्रवर किरीटधारी अर्जुन दशार्णराज चित्रांगदको भी वशमें करके निषादराज एकलव्यके राज्यमें गये ॥ ७ ॥

एकलव्यसुतश्चैनं युद्धेन जगृहे तदा ।
तत्र चक्रे निषादैः स संग्रामं लोमहर्षणम् ॥ ८ ॥
वहाँ एकलव्यके पुत्रने युद्धके द्वारा उनका स्वागत किया। अर्जुनने निषादोंके साथ रोमांचकारी संग्राम किया ॥ ८ ॥

ततस्तमपि कौन्तेयः समरेष्वपराजितः ।
जिगाय युधि दुर्धर्षो यज्ञविघ्नार्थमागतम् ॥ ९ ॥
युद्धमें किसीसे परास्त न होनेवाले दुर्धर्ष वीर पार्थने यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हुए एकलव्य-कुमारको भी परास्त कर दिया ॥ ९ ॥

स तं जित्वा महाराज नैषादिं पाकशासनिः ।
अर्चितः प्रययौ भूयो दक्षिणं सलिलार्णवम् ॥ १० ॥
महाराज! एकलव्यके पुत्रको पराजित करके उसके द्वारा पूजित हुए इन्द्रकुमार अर्जुन फिर दक्षिण समुद्रके तटपर गये ॥ १० ॥

तत्रापि द्रविडैरान्ध्रै रौद्रैर्माहिषकैरपि ।
तथा कोल्लगिरेयैश्च युद्धमासीत् किरीटिनः ॥ ११ ॥
वहाँ भी द्रविड, आन्ध्र, रौद्र, माहिषक और कोलाचलके प्रान्तोंमें रहनेवाले वीरोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका खूब युद्ध हुआ ॥ ११ ॥

तांश्चापि विजयो जित्वा नातितीव्रेण कर्मणा ।
तुरङ्गमवशेनाथ सुराष्ट्रानभितो ययौ ॥ १२ ॥
गोकर्णमथ चासाद्य प्रभासमपि जग्मिवान् ।
उन सबको मृदुल पराक्रमसे ही जीतकर वे घोड़ेकी इच्छानुसार उसके पीछे चलनेमें विवश हुए सौराष्ट्र, गोकर्ण और प्रभासक्षेत्रोंमें गये ॥ १२ १/२ ॥

ततो द्वारवतीं रम्यां वृष्णिवीराभिपालिताम् ॥ १३ ॥
आससाद हयः श्रीमान् कुरुराजस्य यज्ञियः ।
तत्पश्चात् कुरुराज युधिष्ठिरका वह यज्ञसम्बन्धी कान्तिमान् अश्व वृष्णिवीरोंद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें जा पहुँचा ॥ १३ १/२ ॥

तमुन्मथ्य हयश्रेष्ठं यादवानां कुमारकाः ॥ १४ ॥
प्रययुस्तांस्तदा राजन्नुग्रसेनो न्यवारयत् ।
राजन्! वहाँ यदुवंशी वीरोंके बालकोंने उस उत्तम अश्वको बलपूर्वक पकड़कर युद्धके लिये उद्योग किया; परंतु महाराज उग्रसेनने उन्हें रोक दिया ॥ १४ १/२ ॥

ततः पुराद् विनिष्क्रम्य वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा ॥ १५ ॥
सहितो वसुदेवेन मातुलेन किरीटिनः ।

तौ समेत्य कुरुश्रेष्ठं विधिवत् प्रीतिपूर्वकम् ।। १६ ।।
परया भारतश्रेष्ठं पूजया समवस्थितौ ।
ततस्ताभ्यामनुज्ञातो ययौ येन हयो गतः ।। १७ ।।
तदनन्तर अर्जुनके मामा वसुदेवको साथ ले वृष्णि और अन्धककुलके राजा उग्रसेन नगरसे बाहर निकले। वे दोनों बड़ी प्रसन्नताके साथ कुरुश्रेष्ठ अर्जुनसे विधिपूर्वक मिले। उन्होंने भरतकुलके उस श्रेष्ठ वीरका बड़ा आदर-सत्कार किया। फिर उन दोनोंकी आज्ञा ले अर्जुन उसी ओर चल दिये, जिधर वह अश्व गया था ।।

ततः स पश्चिमं देशं समुद्रस्य तदा हयः ।
क्रमेण व्यचरत् स्फीतं ततः पञ्चनदं ययौ ।। १८ ।।
वहाँसे पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें विचरता हुआ वह घोड़ा क्रमशः आगे बढ़ने लगा और समृद्धिशाली पञ्चनद प्रदेशमें जा पहुँचा ।। १८ ।।
तस्मादपि स कौरव्य गन्धारविषयं हयः ।
विचचार यथाकामं कौन्तेयानुगतस्तदा ।। १९ ।।
कुरुनन्दन! वहाँसे भी वह घोड़ा गान्धारदेशमें जाकर इच्छानुसार विचरने लगा। कुन्तीनन्दन अर्जुन भी उसके पीछे-पीछे वहीं जा पहुँचे ।। १९ ।।
ततो गान्धारराजेन युद्धमासीत् किरीटिनः ।

घोरं शकुनिपुत्रेण पूर्ववैरानुसारिणा ॥ २० ॥

फिर तो पूर्व वैरका अनुसरण करनेवाले गान्धारराज शकुनिपुत्रके साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर युद्ध हुआ ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें यज्ञसम्बन्धी अश्वका अनुसरणविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥