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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपःसिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी

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विंशोऽध्यायः

नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपःसिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना

वैशम्पायन उवाच

ततस्तत्र मुनिश्रेष्ठा राजानं द्रष्टुमभ्ययुः ।
नारदः पर्वतश्चैव देवलश्च महातपाः ॥ १ ॥
द्वैपायनः सशिष्यश्च सिद्धाश्चान्ये मनीषिणः ।
शतयूपश्च राजर्षिर्वृद्धः परमधार्मिकः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर वहाँ राजा धृतराष्ट्रसे मिलनेके लिये नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, शिष्योंसहित महर्षि व्यास तथा अन्यान्य सिद्ध, मनीषी, श्रेष्ठ मुनिगण आये। उनके साथ परम धर्मात्मा वृद्ध राजर्षि शतयूप भी पधारे थे ॥ १-२ ॥

तेषां कुन्ती महाराज पूजां चक्रे यथाविधि ।
ते चापि तुतुषुस्तस्यास्तापसाः परिचर्यया ॥ ३ ॥
महाराज! कुन्तीदेवीने उन सबकी यथायोग्य पूजा की। वे तपस्वी ऋषि भी कुन्तीकी सेवासे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३ ॥

तत्र धर्म्याः कथास्तात चक्रुस्ते परमर्षयः ।
रमयन्तो महात्मानं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥ ४ ॥
तात! वहाँ उन महर्षियोंने महात्मा राजा धृतराष्ट्रका मन लगानेके लिये अनेक प्रकारकी धार्मिक कथाएँ कहीं ॥

कथान्तरे तु कस्मिंश्चिद् देवर्षिर्नारदस्ततः ।
कथामिमामकथयत् सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ५ ॥
सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले देवर्षि नारदने किसी कथाके प्रसंगमें यह कथा कहनी आरम्भ की ॥ ५ ॥

नारद उवाच

केकयाधिपतिः श्रीमान् राजाऽऽसीदकुतोभयः ।
सहस्रचित्य इत्युक्तः शतयूपपितामहः ॥ ६ ॥
**नारदजी बोले—**राजन्! पूर्वकालमें सहस्रचित्य नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा थे, जो केकयदेशकी प्रजाका पालन करते थे। उन्हें कभी किसीसे भय नहीं होता था। यहाँ जो ये राजर्षि शतयूप विराज रहे हैं, इनके वे पितामह थे ॥ ६ ॥

स पुत्रे राज्यमासज्य ज्येष्ठे परमधार्मिके ।
सहस्रचित्यो धर्मात्मा प्रविवेश वनं नृपः ॥ ७ ॥
धर्मात्मा राजा सहस्रचित्य अपने परम धर्मात्मा ज्येष्ठ पुत्रको राज्यका भार सौंपकर तपस्याके लिये इसी वनमें प्रविष्ट हुए ॥ ७ ॥

स गत्वा तपसः पारं दीप्तस्य वसुधाधिपः ।
पुरंदरस्य संस्थानं प्रतिपेदे महाद्युतिः ॥ ८ ॥
ये महातेजस्वी भूपाल अपनी उद्दीप्त तपस्या पूरी करके इन्द्रलोकको प्राप्त हुए ॥ ८ ॥

दृष्टपूर्वः स बहुशो राजन् सम्पतता मया ।
महेन्द्रसदने राजा तपसा दग्धकिल्बिषः ॥ ९ ॥
तपस्यासे उनके सारे पाप भस्म हो गये थे। राजन्! इन्द्रलोकमें आते-जाते समय मैंने उन राजर्षिको अनेक बार देखा है ॥ ९ ॥

तथा शैलालयो राजा भगदत्तपितामहः ।
तपोबलेनैव नृपो महेन्द्रसदनं गतः ॥ १० ॥
इसी प्रकार भगदत्तके पिता महाराजा शैलालय भी तपस्याके बलसे ही इन्द्रलोकको गये हैं ॥ १० ॥

तथा पृषध्रो राजाऽऽसीद् राजन् वज्रधरोपमः ।
स चापि तपसा लेभे नाकपृष्ठमितो गतः ॥ ११ ॥
महाराज! राजा पृषध्र वज्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी थे। उन्होंने भी तपस्याके बलसे इस लोकसे जानेपर स्वर्गलोक प्राप्त किया था ॥ ११ ॥

अस्मिन्नरण्ये नृपते मान्धातुरपि चात्मजः ।
पुरुकुत्सो नृपः सिद्धिं महतीं समवाप्तवान् ॥ १२ ॥
भार्या समभवद् यस्य नर्मदा सरितां वरा ।
सोऽस्मिन्नरण्ये नृपतिस्तपस्तप्त्वा दिवं गतः ॥ १३ ॥
नरेश्वर! मान्धाताके पुत्र पुरुकुत्सने भी, सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा जिनकी पत्नी हुई थी, इसी वनमें तपस्या करके बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त की थी। यहीं तपस्या करके वे नरेश स्वर्गलोकमें गये थे ॥ १२-१३ ॥

शशलोमा च राजाऽऽसीद् राजन् परमधार्मिकः ।
सम्यगस्मिन् वने तप्त्वा ततो दिवमवाप्तवान् ॥ १४ ॥
राजन्! परम धर्मात्मा राजा शशलोमाने भी इसी वनमें उत्तम तपस्या करके स्वर्ग प्राप्त किया था ॥ १४ ॥

द्वैपायनप्रसादाच्च त्वमपीदं तपोवनम् ।
राजन्नवाप्य दुष्प्रापां गतिमग्र्यां गमिष्यसि ॥ १५ ॥

नरेश्वर! व्यासजीकी कृपासे तुम भी इसी तपोवनमें आ पहुँचे हो। अब यहाँ तपस्या करके दुर्लभ सिद्धिका आश्रय ले श्रेष्ठ गति प्राप्त कर लोगे ॥ १५ ॥
त्वं चापि राजशार्दूल तपसोऽन्ते श्रिया वृतः ।
गान्धारीसहितो गन्ता गतिं तेषां महात्मनाम् ॥ १६ ॥
नृपश्रेष्ठ! तुम भी तपस्याके अन्तमें तेजसे सम्पन्न हो गान्धारीके साथ उन्हीं महात्माओंकी गति प्राप्त करोगे ॥ १६ ॥
पाण्डुः स्मरति ते नित्यं बलहन्तुः समीपगः ।
त्वां सदैव महाराज श्रेयसा स च योक्ष्यति ॥ १७ ॥
महाराज! तुम्हारे छोटे भाई पाण्डु इन्द्रके पास ही रहते हैं। वे सदा तुम्हें याद करते रहते हैं। निश्चय ही वे तुम्हें कल्याणके भागी बनायेंगे ॥ १७ ॥
तव शुश्रूषया चैव गान्धार्याश्च यशस्विनी ।
भर्तुः सलोकतामेषा गमिष्यति वधूस्तव ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरस्य जननी स हि धर्मः सनातनः ।
तुम्हारी और गान्धारीदेवीकी सेवा करनेसे यह तुम्हारी यशस्विनी बहू युधिष्ठिरजननी कुन्ती अपने पतिके लोकमें पहुँच जायगी। युधिष्ठिर साक्षात् सनातन धर्मस्वरूप हैं (अतः उनकी माता कुन्तीकी सद्गतिमें कोई संदेह ही नहीं है) ॥ १८ १/२ ॥
वयमेतत् प्रपश्यामो नृपते दिव्यचक्षुषा ॥ १९ ॥
प्रवेक्ष्यति महात्मानं विदुरश्च युधिष्ठिरम् ।
संजयस्तदनुध्यानादितः स्वर्गमवाप्स्यति ॥ २० ॥
नरेश्वर! यह सब हम अपनी दिव्य दृष्टिसे देख रहे हैं। विदुर महात्मा युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश करेंगे और संजय उन्हींका चिन्तन करनेके कारण यहाँसे सीधे स्वर्गको जायँगे ॥ १९-२० ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा कौरवेन्द्रो महात्मा
सार्धं पत्न्या प्रीतिमान् सम्बभूव ।
विद्वान् वाक्यं नारदस्य प्रशस्य
चक्रे पूजां चातुलां नारदाय ॥ २१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर महात्मा कौरवराज धृतराष्ट्र अपनी पत्नीके साथ बहुत प्रसन्न हुए। उन विद्वान् नरेशने नारदजीके वचनोंकी प्रशंसा करके उनकी अनुपम पूजा की ॥ २१ ॥
ततः सर्वे नारदं विप्रसंघाः
सम्पूजयामासुरतीव राजन् ।

राज्ञः प्रीत्या धृतराष्ट्रस्य ते वै
पुनः पुनः सम्प्रहृष्टास्तदानीम् ॥ २२ ॥
राजन्! तदनन्तर समस्त ब्राह्मण-समुदायने नारदजीका विशेष पूजन किया। राजा धृतराष्ट्रकी प्रसन्नतासे उस समय उन सब लोगोंको बारंबार हर्ष हो रहा था ॥ २२ ॥
नारदस्य तु तद् वाक्यं शशंसुर्द्विजसत्तमाः ।
शतयूपस्तु राजर्षिर्नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २३ ॥
उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने नारदजीके पूर्वोक्त वचनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। तत्पश्चात् राजर्षि शतयूपने नारदजीसे इस प्रकार कहा— ॥ २३ ॥
अहो भगवता श्रद्धा कुरुराजस्य वर्धिता ।
सर्वस्य च जनस्यास्य मम चैव महाद्युते ॥ २४ ॥
‘महातेजस्वी देवर्षे! बड़े हर्षकी बात है कि आपने कुरुराज धृतराष्ट्रकी, यहाँ आये हुए सब लोगोंकी और मेरी भी तपस्याविषयक श्रद्धाको अधिक बढ़ा दिया है ॥ २४ ॥
अस्ति काचिद् विवक्षा तु तां मे निगदतः शृणु ।
धृतराष्ट्रं प्रति नृपं देवर्षे लोकपूजित ॥ २५ ॥
‘लोकपूजित देवर्षे! राजा धृतराष्ट्रके विषयमें मुझे कुछ कहने या पूछनेकी इच्छा हो रही है। अपनी उस इच्छाको मैं बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २५ ॥
सर्ववृत्तान्ततत्त्वज्ञो भवान् दिव्येन चक्षुषा ।
युक्तः पश्यसि विप्रर्षे गतिर्या विविधा नृणाम् ॥ २६ ॥
‘ब्रह्मर्षे! आप सम्पूर्ण वृत्तान्तोंके तत्त्वज्ञ हैं। आप योगयुक्त होकर अपनी दिव्य दृष्टिसे मनुष्योंको जो नाना प्रकारकी गति प्राप्त होती है, उसे प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ २६ ॥
उक्तवान् नृपतीनां त्वं महेन्द्रस्य सलोकताम् ।
न त्वस्य नृपतेर्लोकाः कथितास्ते महामुने ॥ २७ ॥
‘महामुने! आपने अनेक राजाओंकी इन्द्रलोक-प्राप्तिका वर्णन किया; किंतु यह नहीं बताया कि ये राजा धृतराष्ट्र किस लोकको जायँगे ॥ २७ ॥
स्थानमप्यस्य नृपतेः श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो ।
त्वत्तः कीदृक् कदा चेति तन्ममाख्याहि तत्त्वतः ॥ २८ ॥
‘प्रभो! इन नरेशको जो स्थान प्राप्त होनेवाला है, उसे भी मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। वह स्थान कैसा होगा और कब प्राप्त होगा—यह मुझे ठीक-ठीक बताइये’ ॥ २८ ॥
इत्युक्तो नारदस्तेन वाक्यं सर्वमनोऽनुगम् ।
व्याजहार सभामध्ये दिव्यदर्शी महातपाः ॥ २९ ॥
शतयूपके इस प्रकार प्रश्न करनेपर दिव्यदर्शी महातपस्वी देवर्षि नारदने उस सभामें सबके मनको प्रिय लगनेवाली यह बात कही ॥ २९ ॥

नारद उवाच

यदृच्छया शक्रसदो गत्वा शक्रं शचीपतिम्।
दृष्टवानस्मि राजर्षे तत्र पाण्डुं नराधिपम्॥ ३०॥
नारदजी बोले— राजर्षे! एक दिन मैं दैवेच्छासे घूमता-फिरता इन्द्रलोकमें चला गया और वहाँ जाकर शचीपति इन्द्रसे मिला। वहीं मैंने राजा पाण्डुको भी देखा था॥ ३०॥

तत्रेयं धृतराष्ट्रस्य कथा समरभवन्नृप।
तपसो दुष्करस्यास्य यदयं तपते नृपः॥ ३१॥
नरेश्वर! वहाँ राजा धृतराष्ट्रकी ही बातचीत चल रही थी। वे जो तपस्या करते हैं, इनके इस दुष्कर तपकी ही चर्चा हो रही थी॥ ३१॥

तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम्।
वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोऽस्य परमायुषः॥ ३२॥
उस सभामें साक्षात् इन्द्रके मुखसे मैंने सुना था कि इन राजा धृतराष्ट्रकी आयुकी जो अन्तिम सीमा है, उसके पूर्ण होनेमें अब केवल तीन वर्ष ही शेष रह गये हैं॥ ३२॥

ततः कुबेरभवनं गान्धारीसहितो नृपः।
प्रयाता धृतराष्ट्रोऽयं राजराजाभिसत्कृतः॥ ३३॥
कामगेन विमानेन दिव्याभरणभूषितः।
ऋषिपुत्रो महाभागस्तपसा दग्धकिल्बिषः॥ ३४॥
संचरिष्यति लोकांश्च देवगन्धर्वरक्षसाम्।
स्वच्छन्देनेति धर्मात्मा यन्मां त्वमनुपृच्छसि॥ ३५॥
उसके समाप्त होनेपर ये राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके साथ कुबेरके लोकमें जायँगे और वहाँ राजाधिराज कुबेरसे सम्मानित हो इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो देव, गन्धर्व तथा राक्षसोंके लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरते रहेंगे। ऋषिपुत्र महाभाग धर्मात्मा धृतराष्ट्रके सारे पाप इनकी तपस्याके प्रभावसे भस्म हो जायँगे। राजन्! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, उसका उत्तर यही है॥ ३३—३५॥

देवगुह्यमिदं प्रीत्या मया वः कथितं महत्।
भवन्तो हि श्रुतधनास्तपसा दग्धकिल्बिषाः॥ ३६॥
यह देवताओंका अन्यन्त गुप्त विचार है। परंतु आप लोगोंपर प्रेम होनेके कारण मैंने इसे आपके सामने प्रकट कर दिया है। आपलोग वेदके धनी हैं और तपस्यासे निष्पाप हो चुके हैं (अतः आपके सामने इस रहस्यको प्रकट करनेमें कोई हर्ज नहीं है)॥ ३६॥

वैशम्पायन उवाच

इति ते तस्य तच्छ्रुत्वा देवर्षेर्मधुरं वचः।
सर्वे सुमनसः प्रीता बभूवुः स च पार्थिवः॥ ३७॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! देवर्षिके ये मधुर वचन सुनकर वे सब लोग बहुत प्रसन्न हुए और राजा धृतराष्ट्रको भी इससे बड़ा हर्ष हुआ।। ३७।।
एवं कथाभिरन्वास्य धृतराष्ट्रं मनीषिणः।
विप्रजग्मुर्यथाकामं ते सिद्धगतिमास्थिताः।। ३८।।
इस प्रकार वे मनीषी महर्षिगण अपनी कथाओंसे धृतराष्ट्रको संतुष्ट करके सिद्ध गतिका आश्रय ले इच्छानुसार विभिन्न स्थानोंको चले गये।। ३८।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि नारदवाक्ये
विंशोऽध्यायः।। २०।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।। २०।।