महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश देवासुरनमस्कृत ।
धर्माधर्मौ नृणां देव ब्रूहि मेऽसंशयं विभो ॥ १ ॥
उमाने पूछा— भगवन्! सर्वभूतेश्वर देवासुरवन्दित देव! विभो! अब मुझे धर्म और अधर्मका स्वरूप बताइये; जिससे उनके विषयमें मेरा संदेह दूर हो जाय ॥ १ ॥
कर्मणा मनसा वाचा त्रिविधं हि नरः सदा ।
बध्यते बन्धनैः पाशैर्मुच्यतेऽप्यथवा पुनः ॥ २ ॥
मनुष्य मन, वाणी और क्रिया—इन तीन प्रकारके बन्धनोंसे सदा बँधता है और फिर उन बन्धनोंसे मुक्त होता है ॥ २ ॥
केन शीलेन वृत्तेन कर्मणा कीदृशेन वा ।
समाचारैर्गुणैः कैर्वा स्वर्गं यान्तीह मानवाः ॥ ३ ॥
प्रभो! किस शील-स्वभावसे, किस बर्तावसे, कैसे कर्मसे तथा किन सदाचारों अथवा गुणोंद्वारा मनुष्य बँधते, मुक्त होते एवं स्वर्गमें जाते हैं ॥ ३ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
देवि धर्मार्थतत्त्वज्ञे धर्मनित्ये दमे रते ।
सर्वप्राणिहितः प्रश्नः श्रूयतां बुद्धिवर्धनः ॥ ४ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाली, सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली, इन्द्रियसंयम-परायणे देवि! तुम्हारा प्रश्न समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा बुद्धिको बढ़ानेवाला है, इसका उत्तर सुनो ॥
सत्यधर्मरताः सन्तः सर्वलिङ्गविवर्जिताः ।
धर्मलब्धार्थभोक्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ५ ॥
जो मनुष्य धर्मसे उपार्जित किये हुए धनको भोगते हैं, सम्पूर्ण आश्रमसम्बन्धी चिह्नोंसे बिलग रहकर भी सत्य, धर्ममें तत्पर रहते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं ॥ ५ ॥
नाधर्मेण न धर्मेण बध्यन्ते छिन्नसंशयाः ।
प्रलयोत्पत्तितत्त्वज्ञाः सर्वज्ञाः सर्वदर्शिनः ॥ ६ ॥
जिनके सब प्रकारके संदेह दूर हो गये हैं, जो प्रलय और उत्पत्तिके तत्त्वको जाननेवाले, सर्वज्ञ और सर्वद्रष्टा हैं, वे महात्मा न तो धर्मसे बँधते हैं और न अधर्मसे ।। ६ ।।
वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषाः कर्मबन्धनैः ।
कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन ।। ७ ।।
जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसीकी हिंसा नहीं करते हैं और जिनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी है, वे पुरुष कर्मबन्धनोंसे मुक्ता हो जाते हैं ।। ७ ।।
ये न सज्जन्ति कस्मिंश्चित् ते न बध्यन्ति कर्मभिः ।
प्राणातिपाताद् विरताः शीलवन्तो दयान्विताः ।। ८ ।।
तुल्यद्वेष्यप्रिया दान्ता मुच्यन्ते कर्मबन्धनैः ।
जो कहीं आसक्त नहीं होते, किसीके प्राणोंकी हत्यासे दूर रहते हैं तथा जो सुशील और दयालु हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनोंमें नहीं पड़ते, जिनके लिये शत्रु और प्रिय मित्र दोनों समान हैं, वे जितेन्द्रिय पुरुष कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ।। ८ १/२ ।।
सर्वभूतदयावन्तो विश्वास्याः सर्वजन्तुषु ।। ९ ।।
त्यक्तहिंसासमाचारास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।
जो सब प्राणियोंपर दया करनेवाले, सब जीवोंके विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणोंको त्याग देनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।। ९ १/२ ।।
परस्वे निर्ममा नित्यं परदारविवर्जकाः ।। १० ।।
धर्मलब्धान्नभोक्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः ।
जो दूसरोंके धनपर ममता नहीं रखते, परायी स्त्रीसे सदा दूर रहते और धर्मके द्वारा प्राप्त किये अन्नका ही भोजन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १० १/२ ।।
मातृवत् स्वसृवच्चैव नित्यं दुहितृवच्च ये ।। ११ ।।
परदारेषु वर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ।
जो मानव परायी स्त्रीको माता, बहिन और पुत्रीके समान समझकर तदनुरूप बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ११ १/२ ।।
स्तैन्यान्निवृत्ताः सततं संतुष्टाः स्वधनेन च ।। १२ ।।
स्वभाग्यान्युपजीवन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।
जो सदा अपने ही धनसे संतुष्ट रहकर चोरी-चमारीसे अलग रहते हैं तथा जो अपने भाग्यपर ही भरोसा रखकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। १२ १/२ ।।
स्वदारनिरता ये च ऋतुकालाभिगामिनः ।। १३ ।।
अग्राम्यसुखभोगाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ।
जो अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर ऋतुकालमें ही उसके साथ समागम करते हैं और ग्राम्य सुख-भोगोंमें आसक्त नहीं होते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १३ १/२ ।।
परदारेषु ये नित्यं चरित्रावृतलोचनाः ॥ १४ ॥
जितेन्द्रियाः शीलपरास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।
जो अपने सदाचारके द्वारा सदा ही परायी स्त्रियोंकी ओरसे अपनी आँखें बंद किये रहते हैं, वे जितेन्द्रिय और शीलपरायण मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ॥ १४ १/२ ॥
एष देवकृतो मार्गः सेवितव्यः सदा नरैः ॥ १५ ॥
अकषायकृतश्चैव मार्गः सेव्यः सदा बुधैः ।
यह देवताओंका बनाया हुआ मार्ग है। राग और द्वेषको दूर करनेके लिये इस मार्गकी प्रवृति हुई है। अतः साधारण मनुष्यों तथा विद्वान् पुरुषोंको भी सदा ही इसका सेवन करना चाहिये ॥ १५ १/२ ॥
दानधर्मतपोयुक्तः शीलशौचदयात्मकः ॥ १६ ॥
वृत्त्यर्थं धर्महेतोर्वा सेवितव्यः सदा नरैः ॥
स्वर्गवासमभीप्सद्भिर्न सेव्यस्त्वत उत्तरः ॥ १७ ॥
यह दान, धर्म और तपस्यासे युक्त तथा शील, शौच और दयामय मार्ग है। मनुष्यको जीविका एवं धर्मके लिये सदा ही इस मार्गका सेवन करना चाहिये। जो स्वर्गलोकमें निवास करना चाहता हो, उनके लिये सेवन करनेयोग्य इससे बढ़कर उत्कृष्ट मार्ग नहीं है ॥
उमोवाच
वाचा तु बध्यते येन मुच्यतेऽप्यथवा पुनः ।
तानि कर्माणि मे देव वद भूतपतेऽनघ ॥ १८ ॥
उमाने पूछा—निष्पाप भूतनाथ! महादेव! कैसी वाणी बोलने अथवा उस वाणीद्वारा कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य बन्धनमें पड़ता या उस बन्धनसे छुटकारा पा जाता है? उन वाचिक कर्मोंका मुझसे वर्णन कीजिये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
आत्महेतोः परार्थे वा नर्महास्याश्रयात् तथा ।
ये मृषा न वदन्तीह ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ १९ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—जो हँसी और परिहासका सहारा लेकर भी अपने या दूसरेके लिये कभी झूठ नहीं बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ १९ ॥
वृत्त्यर्थं धर्महेतोर्वा कामकारात् तथैव च ।
अनृतं ये न भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २० ॥
जो आजीविका अथवा धर्मके लिये तथा स्वेच्छाचारसे भी कभी असत्य भाषण नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ॥ २० ॥
श्लक्ष्णां वाणीं निराबाधां मधुरां पापवर्जिताम् ।
स्वागतेनाभिभाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २१ ॥
जो स्निग्ध, मधुर, बाधारहित और पापशून्य तथा स्वागत-सत्कारके भावसे युक्त वाणी बोलते हैं, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। २१ ।।
परुषं ये न भाषन्ते कटुकं निष्ठुरं तथा।
अपैशुन्यरताः सन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २२ ॥
जो किसीकी चुगली नहीं खाते और कभी किसीसे रूखी, कड़वी और निष्ठुरतापूर्ण बात मुँहसे नहीं निकालते, वे सज्जन पुरुष स्वर्गमें जाते हैं ।। २२ ।।
पिशुनां न प्रभाषन्ते मित्रभेदकरीं गिरम्।
ऋतं मैत्रं तु भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २३ ॥
जो दो मित्रोंमें फूट डालनेवाली चुगलीकी बातें नहीं करते हैं, सत्य और मैत्रीभावसे युक्त वचन बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। २३ ।।
ये वर्जयन्ति परुषं परद्रोहं च मानवाः।
सर्वभूतसमा दान्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २४ ॥
जो मानव दूसरोंसे तीखी बातें बोलना और द्रोह करना छोड़ देते हैं, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखने-वाले और जितेन्द्रिय होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
शठप्रलापाद् विरता विरुद्धपरिवर्जकाः।
सौम्यप्रलापिनो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २५ ॥
जिनके मुँहसे कभी शठतापूर्ण बात नहीं निकलती, जो विरोधयुक्त वाणीका त्याग करते हैं और सदा सौम्य (कोमल) वाणी बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
न कोपाद् व्याहरन्ते ये वाचं हृदयदारणीम्।
सान्त्वं वदन्ति क्रुद्धाऽपि ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ २६ ॥
जो क्रोधमें आकर भी हृदयको विदीर्ण करनेवाली बात मुँहसे नहीं निकालते हैं तथा क्रुद्ध होनेपर भी सान्त्वनापूर्ण वचन ही बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। २६ ।।
एष वाणीकृतो देवि धर्मः सेव्यः सदा नरैः।
शुभः सत्यगुणो नित्यं वर्जनीयो मृषा बुधैः ॥ २७ ॥
देवि! यह वाणीजनित धर्म बताया गया है। मनुष्योंको सदा इसका सेवन करना चाहिये। विद्वानोंको उचित है कि वे सदा शुभ और सत्य वचन बोलें तथा मिथ्याका परित्याग करें* ।। २७ ।।
उमोवाच
मनसा बध्यते येन कर्मणा पुरुषः सदा।
तन्मे ब्रूहि महाभाग देवदेव पिनाकधृत् ॥ २८ ॥
उमाने पूछा— महाभाग! पिनाकधारी देवदेव! जिस मानसिक कर्मसे मनुष्य सदा बन्धनमें पड़ता है, उसको मुझे बताइये ।। २८ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
मानसेनेह धर्मेण संयुक्ताः पुरुषाः सदा ।
स्वर्गं गच्छन्ति कल्याणि तन्मे कीर्तयतः शृणु ॥ २९ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! जो सदा मानसिक धर्मसे युक्त हैं अर्थात् मनसे धर्मका ही चिन्तन और आचरण करते हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं। मैं इस विषयमें जो बताता हूँ, उसे सुनो ॥ २९ ॥
दुष्प्रणीतेन मनसा दुष्प्रणीततरा कृतिः ।
मनो बध्यति येनेह शृणु वाक्यं शुभानने ॥ ३० ॥
शुभानने! मनमें दुर्विचार आनेसे मनुष्यके कार्य भी दुर्नीतिपूर्ण एवं दूषित होते हैं, जिससे मन बन्धनमें पड़ जाता है। इस विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ३० ॥
अरण्ये विजने न्यस्तं परस्वं दृश्यते यदा ।
मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३१ ॥
जब दूसरेका धन निर्जन वनमें पड़ा हुआ दिखायी दे, उस समय भी जो उसकी ओर मन ललचाकर किसीकी हिंसा नहीं करते, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ॥
ग्रामे गृहे वा ये द्रव्यं पारक्यं विजने स्थितम् ।
नाभिनन्दन्ति वै नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३२ ॥
गाँव या घरके एकान्त स्थानमें पड़े हुए पराये धनका जो कभी अभिनन्दन नहीं करते हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३२ ॥
तथैव परदारान् ये कामवृत्तान् रहोगतान् ।
मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३३ ॥
इसी प्रकार जो मनुष्य एकान्तमें प्राप्त हुई कामासक्त परायी स्त्रियोंको मनसे भी उनके साथ अन्याय करनेका विचार नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३३ ॥
शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः ।
भजन्ति मैत्राः संगम्य ते नसः स्वर्गगामिनः ॥ ३४ ॥
जो सबके प्रति मैत्रीभाव रखकर सबसे मिलते तथा शत्रु और मित्रको भी सदा समान हृदयसे अपनाते हैं, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३४ ॥
श्रुतवन्तो दयावन्तः शुचयः सत्यसंगराः ।
स्वैरर्थैः परिसंतुष्टास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३५ ॥
जो शास्त्रज्ञ, दयालु पवित्र, सत्यप्रतिज्ञ और अपने ही धनसे संतुष्ट होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३५ ॥
अवैरा ये त्वनायासा मैत्रीचित्तरताः सदा ।
सर्वभूतदयावन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३६ ॥
जिनके मनमें किसीके प्रति वैर नहीं है, जो आयासरहित, मैत्रीभावसे पूर्ण हृदयवाले तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति सदा ही दयाभाव रखनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं॥ ३६ ॥
श्रद्धावन्तो दयावन्तश्चोक्षाश्चोक्षजनप्रियाः ।
धर्माधर्मविदो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३७ ॥
जो श्रद्धालु, दयालु, शुद्ध, शुद्धजनोंके प्रेमी तथा धर्म और अधर्मके ज्ञाता हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ॥
शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसंचये ।
विपाकज्ञाश्च ये देवि ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३८ ॥
देवि! जो शुभ और अशुभ कर्मोंके फल-संचयके विषयमें परिणामके ज्ञाता हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३८ ॥
न्यायोपेता गुणोपेता देवद्विजपराः सदा ।
समुत्थानमनुप्राप्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ३९ ॥
जो न्यायशील, गुणवान्, देवताओं और द्विजोंके भक्त तथा उत्थानको प्राप्त हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं ॥ ३९ ॥
शुभैः कर्मफलैर्देवि मयैते परिकीर्तिताः ।
स्वर्गमार्गपरा भूयः किं त्वं श्रोतुमिहेच्छसि ॥ ४० ॥
देवि! जो शुभ कर्मोंके फलोंसे स्वर्गलोकके मार्गमें स्थित हैं, उनका वर्णन मैंने यहाँ किया है। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ॥ ४० ॥
उमोवाच
महान् मे संशयः कश्चिन्मर्त्यान् प्रति महेश्वर ।
तस्मात् त्वं नैपुणेनाद्य मम व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४१ ॥
**उमाने पूछा—**महेश्वर! मुझे मनुष्योंके विषयमें एक महान् संशय है। आप अच्छी तरह उस संशयका समाधान करें ॥ ४१ ॥
केनायुर्लभते दीर्घं कर्मणा पुरुषः प्रभो ।
तपसा वापि देवेश केनायुर्लभते महत् ॥ ४२ ॥
प्रभो! मनुष्य किस कर्मसे दीर्घायु प्राप्त करता है? तथा देवेश्वर! किस तपस्यासे मनुष्यको बड़ी आयु प्राप्त होती है? ॥ ४२ ॥
क्षीणायुः केन भवति कर्मणा भुवि मानवः ।
विपाकं कर्मणां देव वक्तुमर्हस्यनिन्दित ॥ ४३ ॥
अनिन्द्य महादेव! इस भूत़लपर कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण हो जाती है? आप मुझसे कर्म-विपाकका वर्णन करें ॥ ४३ ॥
अपरे च महाभाग्या मन्दभाग्यास्तथापरे ।
अकुलीनास्तथा चान्ये कुलीनाश्च तथापरे ॥ ४४ ॥
इस जगत्में कुछ लोग महान् भाग्यशाली हैं तो कुछ लोग मन्दभाग्य हैं, कुछ लोग निन्दित कुलमें उत्पन्न हैं तो दूसरे लोग उच्चकुलमें ॥ ४४ ॥
दुर्दर्शाः केचिदाभान्ति नराः काष्ठमया इव ।
प्रियदर्शास्तथा चान्ये दर्शनादेव मानवाः ॥ ४५ ॥
कुछ मनुष्य दुर्दशाके मारे काष्ठमय (जडवत्) प्रतीत हो रहे हैं, उनकी ओर देखना कठिन जान पड़ता है और दूसरे कितने ही मनुष्य दर्शनमात्रसे मन प्रसन्न कर देते हैं, उनकी ओर देखना प्रिय लगता है ॥ ४५ ॥
दुष्प्रज्ञाः केचिदाभान्ति केचिदाभान्ति पण्डिताः ।
महाप्राज्ञास्तथैवान्ये ज्ञानविज्ञानभाविनः ॥ ४६ ॥
कुछ लोग दुर्बुद्धि जान पड़ते हैं और कुछ विद्वान् तथा कितने ही ज्ञान-विज्ञानशाली महाप्राज्ञ प्रतीत होते हैं ॥ ४६ ॥
अल्पाबाधास्तथा केचिन्महाबाधास्तथापरे ।
दृश्यन्ते पुरुषा देव तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४७ ॥
देव! कुछ लोग साधारण एवं स्वल्प बाधाओंसे ग्रस्त होते हैं और कुछ लोगोंको बड़ी-बड़ी बाधाएँ घेरे रहती हैं। इस तरह जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी विषम अवस्थामें पड़े हुए पुरुष दिखायी देते हैं, उनकी इस विषमताका क्या कारण है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ४७ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि देवि कर्मफलोदयम् ।
मर्त्यलोके नरः सर्वो येन स्वफलमश्नुते ॥ ४८ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! अब मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें बता रहा हूँ कि कर्मके फलका उदय किस प्रकार होता है और मर्त्यलोकके सभी मनुष्य किस प्रकार अपनी-अपनी करनीका फल भोगते हैं ॥ ४८ ॥
प्राणातिपाते यो रौद्रो दण्डहस्तोद्यतः सदा ।
नित्यमुद्यतशस्त्रश्च हन्ति भूतगणान् नरः ॥ ४९ ॥
निर्दयः सर्वभूतानां नित्यमुद्वेगकारकः ।
अपि कीटपिपीलानामशरण्यः सुनिर्घृणः ॥ ५० ॥
एवंभूतो नरो देवि निरयं प्रतिपद्यते ।
देवि! जो मनुष्य दूसरोंका प्राण लेनेके लिये हाथमें डंडा लेकर सदा भयंकर रूप धारण किये रहता है, जो प्रतिदिन हथियार उठाये जगत्के प्राणियोंकी हत्या किया करता है, जिसके भीतर किसीके प्रति दया नहीं होती, जो समस्त प्राणियोंको सदा उद्वेगमें डाले रहता है और जो अत्यन्त क्रूर होनेके कारण चींटी और कीड़ोंको भी शरण नहीं देता, ऐसा मानव घोर नरकमें पड़ता है ॥ ४९-५० १/२ ॥
विपरीतस्तु धर्मात्मा रूपवानभिजायते ॥ ५१ ॥
पापेन कर्मणा देवि वध्यो हिंसारतिर्नरः ।
अप्रियः सर्वभूतानां हीनायुरुपजायते ॥ ५२ ॥
जिसका स्वभाव इसके विपरीत है, वह धर्मात्मा और रूपवान् होता है। देवि! हिंसाप्रेमी मनुष्य अपने पापकर्मके कारण दूसरोंका वध्य, सब प्राणियोंका अप्रिय तथा अल्पायु होता है ॥ ५१-५२ ॥
निरयं याति हिंसात्मा याति स्वर्गमहिंसकः ।
यातनां निरये रौद्रां स कृच्छ्रां लभते नरः ॥ ५३ ॥
जिसका चित्त हिंसामें लगा होता है, वह नरकमें गिरता है और जो किसीकी हिंसा नहीं करता, वह स्वर्गमें जाता है। नरकमें पड़े हुए जीवको बड़ी कष्टदायक और भयंकर यातना भोगनी पड़ती है ॥ ५३ ॥
यः कश्चिन्निरयात् तस्मात् समुत्तरति कर्हिचित् ।
मानुष्यं लभते चापि हीनायुस्तत्र जायते ॥ ५४ ॥
यदि कभी कोई उस नरकसे छुटकारा पाता है तो मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है, किंतु वहाँ उसकी आयु बहुत थोड़ी होती है ॥ ५४ ॥
पापेन कर्मणा देवि बद्धो हिंसारतिर्नरः ।
अप्रियः सर्वभूतानां हीनायुरुपजायते ॥ ५५ ॥
देवि! पापकर्मसे बँधा हुआ हिंसापरायण मनुष्य समस्त प्राणियोंका अप्रिय होनेके कारण अल्पायु हो जाता है ॥ ५५ ॥
यस्तु शुक्लाभिजातीयः प्राणिघातविवर्जकः ।
निक्षिप्तशस्त्रो निर्दण्डो न हिंसति कदाचन ॥ ५६ ॥
न घातयति नो हन्ति घ्नन्तं नैवानुमोदते ।
सर्वभूतेषु सस्नेही यथाऽऽत्मनि तथापरे ॥ ५७ ॥
ईदृशः पुरुषोत्कर्षो देवि देवत्वमश्रुते ।
उपपन्नान् सुखान् भोगानुपाश्नाति मुदा युतः ॥ ५८ ॥
इसके विपरीत जो शुद्ध कुलमें उत्पन्न और जीवहिंसासे अलग रहनेवाला है, जिसने शस्त्र और दण्डका परित्याग कर दिया है, जिसके द्वारा कभी किसीकी हिंसा नहीं होती, जो न मारता है, न मारनेकी आज्ञा देता है और न मारनेवालेका अनुमोदन ही करता है। जिसके
मनमें सब प्राणियोंके प्रति स्नेह बना रहता है तथा जो अपने ही समान दूसरोंपर भी दयादृष्टि रखता है। देवि! ऐसा श्रेष्ठ पुरुष देवत्वको प्राप्त होता है और देवलोकमें प्रसन्नतापूर्वक स्वतः उपलब्ध हुए सुखद भोगोंका अनुभव करता है ॥ ५६—५८ ॥
अथ चेन्मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते ।
तत्र दीर्घायुरुत्पन्नः स नरः सुखमेधते ॥ ५९ ॥
अथवा यदि कदाचित् वह मनुष्यलोकमें जन्म लेता है तो वह मनुष्य दीर्घायु और सुखी होता है ॥ ५९ ॥
एष दीर्घायुषां मार्गः सुवृत्तानां सुकर्मिणाम् ।
प्राणिहिंसाविमोक्षेण ब्रह्मणा समुदीरितः ॥ ६० ॥
यह सत्कर्मका अनुष्ठान करनेवाले सदाचारी एवं दीर्घजीवी मनुष्योंका लक्षण है। स्वयं ब्रह्माजीने इस मार्गका उपदेश किया है। समस्त प्राणियोंकी हिंसाका परित्याग करनेसे ही इसकी उपलब्धि होती है ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४४ ॥
* उपर्युक्त कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले पुरुषको परमात्मपदकी प्राप्ति हो जाती है।