महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
गिरेर्हिमवतः पृष्ठे मुञ्जवान् नाम पर्वत: ।
अष्टमोऽध्यायः
संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना
संवर्त उवाच
गिरेर्हिमवतः पृष्ठे मुञ्जवान् नाम पर्वत: ।
तप्यते यत्र भगवांस्तपो नित्यमुमापतिः ॥ १ ॥
संवर्तने कहा— राजन! हिमालयके पृष्ठभागमें मुञ्जवान् नामक एक पर्वत है, जहाँ उमावल्लभ भगवान् शंकर सदा तपस्या किया करते हैं ॥ १ ॥
वनस्पतीनां मूलेषु शृङ्गेषु विषमेषु च ।
गुहासु शैलराजस्य यथाकामं यथासुखम् ॥ २ ॥
उमासहायो भगवान् यत्र नित्यं महेश्वरः ।
आस्ते शूली महातेजा नानाभूतगणावृतः ॥ ३ ॥
वहाँ वनस्पतियोंके मूलभागमें, दुर्गम शिखरोंपर तथा गिरिराजकी गुफाओंमें नाना प्रकारके भूतगणोंसे घिरे हुए महातेजस्वी त्रिशूलधारी भगवान् महेश्वर उमादेवीके साथ इच्छानुसार सुखपूर्वक सदा निवास करते हैं ॥ २-३ ॥
तत्र रुद्राश्च साध्याश्च विश्वेऽथ वसवस्तथा ।
यमश्च वरुणश्चैव कुबेरश्च सहानुगः ॥ ४ ॥
भूतानि च पिशाचाश्च नासत्यावपि चाश्विनौ ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव यक्षा देवर्षयस्तथा ॥ ५ ॥
आदित्या मरुतश्चैव यातुधानाश्च सर्वशः ।
उपासन्ते महात्मानं बहुरूपमुमापतिम् ॥ ६ ॥
उस पर्वतपर रुद्रगण, साध्यगण, विश्वेदेवगण, वसुगण, यमराज, वरुण, अनुचरोंसहित कुबेर, भूत, पिशाच, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, देवर्षि, आदित्यगण, मरुद्गण तथा यातुधानगण अनेक रूपधारी उमावल्लभ परमात्मा शिवकी सब प्रकारसे उपासना करते हैं ॥ ४—६ ॥
रमते भगवांस्तत्र कुबेरानुचरैः सह ।
विकृतैर्विकृताकारैः क्रीडद्भिः पृथिवीपते ॥ ७ ॥
पृथ्वीनाथ! वहाँ विकराल आकार और विकृत वेशवाले कुबेर-सेवक यक्ष भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते हैं और उनके साथ भगवान् शिव आनन्दपूर्वक रहते हैं ॥ ७ ॥
श्रिया ज्वलन् दृश्यते वै बालादित्यसमद्युतिः ।
न रूपं शक्यते तस्य संस्थानं वा कदाचन ॥ ८ ॥
निर्देष्टुं प्राणिभिः कैश्चित् प्राकृतैर्मांसलोचनैः ।
उनका श्रीविग्रह प्रभातकालके सूर्यकी भाँति तेजसे जाज्वल्यमान दिखायी देता है। संसारके कोई भी प्राकृत प्राणी अपने मांसमय नेत्रोंसे उनके रूप या आकारको कभी देख नहीं सकते ॥ ८ १/२ ॥
नोष्णं न शिशिरं तत्र न वायुर्न च भास्करः ॥ ९ ॥
न जरा क्षुत्पिपासे वा न मृत्युर्न भयं नृप ।
वहाँ न अधिक गर्मी पड़ती है न विशेष ठंडक, न वायुका प्रकोप होता है न सूर्यके प्रचण्ड तापका। नरेश्वर! उस पर्वतपर न तो भूख सताती है न प्यास, न बुढ़ापा आता है न मृत्यु। वहाँ दूसरा कोई भय भी नहीं प्राप्त होता है ॥ ९ १/२ ॥
तस्य शैलस्य पार्श्वेषु सर्वेषु जयतां वर ॥ १० ॥
धातवो जातरूपस्य रश्मयः सवितुर्यथा ।
रक्ष्यन्ते ते कुबेरस्य सहायैरुद्यतायुधैः ॥ ११ ॥
चिकीर्षद्भिः प्रियं राजन् कुबेरस्य महात्मनः ।
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! उस पर्वतके चारों ओर सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशमान सुवर्णकी खानें हैं। राजन्! अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित कुबेरके अनुचर अपने स्वामी महात्मा कुबेरका प्रिय करनेकी इच्छासे उन खानोंकी रक्षा करते हैं ॥ १०-११ १/२ ॥
(तत्र गत्वा त्वमन्वास्य महायोगेश्वरं शिवम् ।
कुरु प्रणामं राजर्षे भक्त्या परमया युतः ॥)
राजर्षे! वहाँ जाकर तुम परम भक्तिभावसे युक्त हो महायोगेश्वर शिवको प्रणाम करो ॥
तस्मै भगवते कृत्वा नमः शर्वाय वेधसे ॥ १२ ॥
(एभिस्तं नामभिर्देवं सर्वविद्याधरं स्तुहि)
जगत्स्रष्टा भगवान् शंकरको नमस्कार करके समस्त विद्याओंको धारण करनेवाले उन महादेवजीकी तुम इन निम्नांकित नामोंद्वारा स्तुति करो ॥ १२ ॥
रुद्राय शितिकण्ठाय पुरुषाय सुवर्चसे ।
कपर्दिने करालाय हर्यक्षणे वरदाय च ॥ १३ ॥
त्र्यक्षणे पूष्णो दन्तभिदे वामनाय शिवाय च ।
याम्यायाव्यक्तरूपाय सद्वृत्ते शङ्कराय च ॥ १४ ॥
क्षेम्याय हरिकेशाय स्थाणवे पुरुषाय च ।
हरिनेत्राय मुण्डाय क्रुद्धायोत्तरणाय च ॥ १५ ॥
भास्कराय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे ।
उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे ॥ १६ ॥
गिरिशाय प्रशान्ताय यतये चीरवाससे ।
बिल्वदण्डाय सिद्धाय सर्वदण्डधराय च ॥ १७ ॥
मृगव्याधाय महते धन्विनेऽथ भवाय च ।
वराय सोमवक्त्राय सिद्धमन्त्राय चक्षुषे ॥ १८ ॥
हिरण्यबाहवे राजन्नुग्राय पतये दिशाम् ।
लेलिहानाय गोष्ठाय सिद्धमन्त्राय वृष्णये ॥ १९ ॥
पशूनां पतये चैव भूतानां पतये नमः ।
वृषाय मातृभक्ताय सेनान्ये मध्यमाय च ॥ २० ॥
सुहस्ताय पतये धन्विने भार्गवाय च ।
अजाय कृष्णनेत्राय विरूपाक्षाय चैव ह ॥ २१ ॥
तीक्ष्णदंष्ट्राय तीक्ष्णाय वैश्वानरमुखाय च ।
महाद्युतयेऽनङ्गाय सर्वाय पतये विशाम् ॥ २२ ॥
विलोहिताय दीप्ताय दीप्ताक्षाय महौजसे ।
वसुरेतःसुवपुषे पृथवे कृत्तिवाससे ॥ २३ ॥
कपालमालिने चैव सुवर्णमुकुटाय च ।
महादेवाय कृष्णाय त्र्यम्बकायानघाय च ॥ २४ ॥
क्रोधनायानृशंसाय मृदवे बाहुशालिने ।
दण्डिने तप्ततपसे तथैवाक्रूरकर्मणे ॥ २५ ॥
सहस्रशिरसे चैव सहस्रचरणाय च ।
नमः स्वधास्वरूपाय बहुरूपाय दंष्ट्रिणे ॥ २६ ॥
‘भगवन्! आप रुद्र (दुःखके कारणको दूर करनेवाले), शितिकण्ठ (गलेमें नील चिह्न धारण करनेवाले), पुरुष (अन्तर्यामी), सुवर्चा (अत्यन्त तेजस्वी), कपर्दी (जटा-जूटधारी), कराल (भयंकर रूपवाले), हर्यक्ष (हरे नेत्रोंवाले), वरद (भक्तोंको अभीष्ट वर प्रदान करनेवाले), त्र्यक्ष (त्रिनेत्रधारी), पूषाके दाँत उखाड़नेवाले, वामन, शिव, याम्य (यमराजके गणस्वरूप), अव्यक्तरूप, सद्वृत्त (सदाचारी), शंकर, क्षेम्य (कल्याणकारी), हरिकेश (भूरे केशोंवाले), स्थाणु (स्थिर), पुरुष, हरिनेत्र, मुण्ड, क्रुद्ध, उत्तरण (संसार-सागरसे पार उतरनेवाले), भास्कर (सूर्यरूप), सुतीर्थ (पवित्र तीर्थरूप), देवदेव, रंहस (वेगवान्), उष्णीषी (सिरपर पगड़ी धारण करनेवाले), सुवक्त्र (सुन्दर मुखवाले), सहस्राक्ष (हजारों नेत्रोंवाले), मीढ्वान् (कामपूरक), गिरिश (पर्वतपर शयन करनेवाले), प्रशान्त, यति (संयमी), चीरवासा (चीरवस्त्र धारण करनेवाले), विल्वदण्ड (बेलका डंडा धारण करनेवाले), सिद्ध, सर्वदण्डधर (सबको दण्ड देनेवाले), मृगव्याध (आर्द्रा-नक्षत्रस्वरूप), महान्, धन्वी (पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले), भव (संसारकी उत्पत्ति करनेवाले), वर (श्रेष्ठ), सोमवक्त्र (चन्द्रमाके समान मुखवाले), सिद्धमन्त्र (जिन्होंने सभी मन्त्र सिद्ध
कर लिया है ऐसे), चक्षुष (नेत्ररूप), हिरण्यबाहु (सुवर्णके समान सुन्दर भुजाओंवाले), उग्र (भयंकर), दिशाओंके पति, लेलिहान (अग्निरूपसे अपनी जिह्वाओंके द्वारा हविष्यका आस्वादन करनेवाले), गोष्ठ (वाणीके निवासस्थान), सिद्धमन्त्र, वृष्णि (कामनाओंकी वृष्टि करनेवाले), पशुपति, भूतपति, वृष (धर्मस्वरूप), मातृभक्त, सेनानी (कार्तिकेय रूप), मध्यम, सुवहस्त (हाथमें सुवा ग्रहण करनेवाले ऋत्विज्रूप), पति (सबका पालन करनेवाले), धन्वी, भार्गव, अज (जन्मरहित), कृष्णनेत्र, विरूपाक्ष, तीक्ष्णदंष्ट्र, तीक्ष्ण, वैश्वानरमुख (अग्निरूप मुखवाले), महाद्युति, अनंग (निराकार), सर्व, विशाम्पति (सबके स्वामी), विलोहित (रक्तवर्ण), दीप्त (तेजस्वी), दीप्ताक्ष (देदीप्यमान नेत्रोंवाले), महौजा (महाबली), वसुरेता (हिरण्यवीर्य अग्निरूप), सुवपुष् (सुन्दर शरीरवाले), पृथु (स्थूल), कृत्तिवासा (मृगचर्म धारण करनेवाले), कपालमाली (मुण्डमाला धारण करनेवाले), सुवर्णमुकुट, महादेव, कृष्ण (सच्चिदानन्दस्वरूप), त्र्यम्बक (त्रिनेत्रधारी), अनघ (निष्पाप), क्रोधन (दुष्टोंपर क्रोध करनेवाले), अनृशंस (कोमल स्वभाववाले), मृदु, बाहुशाली, दण्डी, तेज तप करनेवाले, कोमल कर्म करनेवाले, सहस्रशिरा (हजारों मस्तकवाले), सहस्रचरण, स्वधास्वरूप, बहुरूप और दंष्ट्री नाम धारण करनेवाले हैं। आपको मेरा प्रणाम है ॥ १३—२६ ॥
पिनाकिनं महादेवं महायोगिनमव्ययम् ।
त्रिशूलहस्तं वरदं त्र्यम्बकं भुवनेश्वरम् ॥ २७ ॥
त्रिपुरघ्नं त्रिनयनं त्रिलोकेशं महौजसम् ।
प्रभवं सर्वभूतानां धारणं धरणीधरम् ॥ २८ ॥
ईशानं शङ्करं सर्वं शिवं विश्वेश्वरं भवम् ।
उमापतिं पशुपतिं विश्वरूपं महेश्वरम् ॥ २९ ॥
विरूपाक्षं दशभुजं दिव्यगोवृषभध्वजम् ।
उग्रं स्थाणुं शिवं रौद्रं शर्वं गौरीशमीश्वरम् ॥ ३० ॥
शितिकण्ठमजं शुक्लं पृथुं पृथुहरं वरम् ।
विश्वरूपं विरूपाक्षं बहुरूपमुमापतिम् ॥ ३१ ॥
प्रणम्य शिरसा देवमनङ्गाङ्गहरं हरम् ।
शरण्यं शरणं याहि महादेवं चतुर्मुखम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार उन पिनाकधारी, महादेव, महायोगी, अविनाशी, हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले, वरदायक, त्र्यम्बक, भुवनेश्वर, त्रिपुरासुरको मारनेवाले, त्रिनेत्रधारी, त्रिभुवनके स्वामी, महान् बलवान्, सब जीवोंकी उत्पत्तिके कारण, सबको धारण करनेवाले, पृथ्वीका भार सँभालनेवाले, जगत्के शासक, कल्याणकारी, सर्वरूप, शिव, विश्वेश्वर, जगत्को उत्पन्न करनेवाले, पार्वतीके पति, पशुओंके पालक, विश्वरूप, महेश्वर, विरूपाक्ष, दस भुजाधारी, अपनी ध्वजामें दिव्य वृषभका चिह्न धारण करनेवाले, उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र,
शर्व, गौरीश, ईश्वर, शितिकण्ठ, अजन्मा, शुक्र, पृथु, पृथुहर, वर, विश्वरूप, विरूपाक्ष, बहुरूप, उमापति, कामदेवको भस्म करनेवाले, हर, चतुर्मुख एवं शरणागतवत्सल महादेवजीको सिरसे प्रणाम करके उनके शरणापन्न हो जाना ॥ २७—३२ ॥
(विरोचमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् ।
अनाद्यन्तमजं शम्भुं सर्वव्यापिनमीश्वरम् ॥
निस्त्रैगुण्यं निरुद्वेगं निर्मलं निधिमोजसाम् ।
प्रणम्य प्राञ्जलिः शर्वं प्रयामि शरणं हरम् ॥
(और इस प्रकार स्तुति करना)—जो अपने तेजस्वी श्रीविग्रहसे प्रकाशित हो रहे हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं, आदि-अन्तसे रहित, अजन्मा, शम्भु, सर्वव्यापी, ईश्वर, त्रिगुणरहित, उद्वेगशून्य, निर्मल, ओज एवं तेजकी निधि एवं सबके पाप और दुःखको हर लेनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको हाथ जोड़ प्रणाम करके मैं उनकी शरणमें जाता हूँ ॥
सम्मान्यं निश्चलं नित्यमकारणमलेपनम् ।
अध्यात्मवेदमासाद्य प्रयामि शरणं मुहुः ॥
जो सम्माननीय, निश्चल, नित्य, कारणरहित, निर्लेप और अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता हैं, उन भगवान् शिवके निकट पहुँचकर मैं बारंबार उन्हींकी शरणमें जाता हूँ ॥
यस्य नित्यं विदुः स्थानं मोक्षमध्यात्मचिन्तकाः ।
योगिनस्तत्त्वमार्गस्थाः कैवल्यं पदमक्षरम् ॥
यं विदुः सङ्गनिर्मुक्ताः सामान्यं समदर्शिनः ।
तं प्रपद्ये जगद्योनिमयोनिं निर्गुणात्मकम् ॥
अध्यात्मतत्त्वका विचार करनेवाले ज्ञानी पुरुष मोक्षतत्त्वमें जिनकी स्थिति मानते हैं तथा तत्त्वमार्गमें परिनिष्ठित योगीजन अविनाशी कैवल्य पदको जिनका स्वरूप समझते हैं और आसक्तिशून्य समदर्शी महात्मा जिन्हें सर्वत्र समानरूपसे स्थित समझते हैं, उन योनिरहित जगत्कारणभूत निर्गुण परमात्मा शिवकी मैं शरण लेता हूँ ॥
असृजद् यस्तु भूरादीन् सप्तलोकान् सनातनान् ।
स्थितः सत्योपरि स्थाणुं तं प्रपद्ये सनातनम् ॥
जिन्होंने सत्यलोकके ऊपर स्थित होकर भू आदि सात सनातन लोकोंकी सृष्टि की है, उन स्थाणुरूप सनातन शिवकी मैं शरण लेता हूँ ॥
भक्तानां सुलभं तं हि दुर्लभं दूरपातिनाम् ।
अदूरस्थममुं देवं प्रकृतेः परतः स्थितम् ॥
नमामि सर्वलोकस्थं व्रजामि शरणं शिवम् ।)
जो भक्तोंके लिये सुलभ और दूर (विमुख) रहनेवाले लोगोंके लिये दुर्लभ हैं, जो सबके निकट और प्रकृतिसे परे विराजमान हैं, उन सर्वलोकव्यापी महादेव शिवको मैं नमस्कार करता और उनकी शरण लेता हूँ ॥
एवं कृत्वा नमस्तस्मै महादेवाय रंहसे ।
महात्मने क्षितिपते तत्सुवर्णमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥
पृथ्वीनाथ! इस प्रकार वेगशाली महात्मा महादेवजीको नमस्कार करके तुम वह सुवर्ण-राशि प्राप्त कर लोगे ॥ ३३ ॥
(लभन्ते गाणपत्यं च तदेकाग्रा हि मानवाः ।
किं पुनः स्वर्णभाण्डानि तस्मात् त्वं गच्छ मा चिरम् ॥
महत्तरं हि ते लाभं हस्त्यश्वोष्ट्रादिभिः सह ।)
जो लोग भगवान् शंकरमें अपने मनको एकाग्र करते हैं, वे तो गणपति-पदको भी प्राप्त कर लेते हैं, फिर सुवर्णमय पात्र पा लेना कौन बड़ी बात है। अतः तुम शीघ्र वहाँ जाओ, विलम्ब न करो। हाथी, घोड़े और ऊँट आदिके साथ तुम्हें वहाँ महान् लाभ प्राप्त होगा ।।
सुवर्णमाहरिष्यन्तस्तत्र गच्छन्तु ते नराः ।
इत्युक्तः स वचस्तेन चक्रे कारन्धमात्मजः ॥ ३४ ॥
तुम्हारे सेवकलोग सुवर्ण लानेके लिये वहाँ जायँ। उनके ऐसा कहनेपर करन्धमके पौत्र मरुत्तने वैसा ही किया ॥ ३४ ॥
(गङ्गाधरं नमस्कृत्य लब्धवान् धनमुत्तमम् ।
कुबेर इव तत् प्राप्य महादेवप्रसादतः ॥
शालाश्च सर्वसम्भारस्ततः संवर्तशासनात् ।)
उन्होंने गंगाधर महादेवजीको नमस्कार करके उनकी कृपासे कुबेरकी भाँति उत्तम धन प्राप्त कर लिया। उस धनको पाकर संवर्तकी आज्ञासे उन्होंने यज्ञशालाओं तथा अन्य सब सम्भारोंका आयोजन किया ॥
ततोऽतिमानुषं सर्वं चक्रे यज्ञस्य संविधिम् ।
सौवर्णानि च भाण्डानि संचक्रुस्तत्र शिल्पिनः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर राजाने अलौकिकरूपसे यज्ञकी सारी तैयारी आरम्भ की। उनके कारीगरोंने वहाँ रहकर सोनेके बहुत-से पात्र तैयार किये ॥ ३५ ॥
बृहस्पतिस्तु तां श्रुत्वा मरुत्तस्य महीपतेः ।
समृद्धिमतिदेवेभ्यः संतापमकरोद् भृशम् ॥ ३६ ॥
उधर बृहस्पतिने जब सुना कि राजा मरुत्तको देवताओंसे भी बढ़कर सम्पत्ति प्राप्त हुई है, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ ॥ ३६ ॥
स तप्यमानो वैवर्ण्यं कृशत्वं चागमत् परम् ।
भविष्यति हि मे शत्रुः संवर्तो वसुमानिति ॥ ३७ ॥
वे चिन्ताके मारे पीले पड़ गये और यह सोचकर कि 'मेरा शत्रु संवर्त बहुत धनी हो जायगा' उनका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया ॥ ३७ ॥
तं श्रुत्वा भृशसंतप्तं देवराजो बृहस्पतिम् ।
अधिगम्यामरवृतः प्रोवाचेदं वचस्तदा ॥ ३८ ॥
देवराज इन्द्रने जब सुना कि बृहस्पतिजी अत्यन्त संतप्त हो रहे हैं, तब वे देवताओंको साथ लेकर उनके पास गये और इस प्रकार पूछने लगे ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं)