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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]

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[पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]

उमोवाच

त्रियक्ष त्रिदशश्रेष्ठ त्र्यम्बक त्रिदशाधिप ।
त्रिपुरान्तक कामाङ्गहर त्रिपथगाधर ।।
दक्षयज्ञप्रमथन शूलपाणेऽरिसूदन ।
नमस्ते लोकपालेश लोकपालवरप्रद ।।
उमाने पूछा— तीन नेत्रधारी! त्रिदशश्रेष्ठ! देवेश्वर! त्र्यम्बक! त्रिपुरोंका विनाश और कामदेवके शरीरको भस्म करनेवाले गंगाधर! दक्षयज्ञका नाश करनेवाले त्रिशूलधारी! शत्रुसूदन! लोकपालोंको भी वर देनेवाले लोकपालेश्वर! आपको नमस्कार है ।।
नैकशाखमपर्यन्तमध्यात्मज्ञानमुत्तमम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं सांख्ययोगसमन्वितम् ।।
भवता परिपृष्टेन शृण्वन्त्या मम भाषितम् ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि सायुज्यं त्वद्गतं विभो ।।
कथं परिचरन्त्येते भक्तास्त्वां परमेष्ठिनम् ।
आचारः कीदृशस्तेषां केन तुष्टो भवेद् भवान् ।।
वर्ण्यमानं त्वया साक्षात् प्रीणयत्यधिकं हि माम् ।।
आपने मेरे पूछनेपर सुननेके लिये उत्सुक हुई मुझ दासीको वह उत्तम अध्यात्मज्ञान बताया है, जो अनेक शाखाओंसे युक्त, अनन्त, अतर्क्य, अविज्ञेय और सांख्ययोगसे युक्त है। प्रभो! इस समय मैं आपसे आपका ही सायुज्य सुनना चाहती हूँ। ये भक्तजन आप परमेष्ठीकी परिचर्या कैसे करते हैं? उनका आचार कैसा होता है? किस साधनसे आप संतुष्ट होते हैं? साक्षात् आपके द्वारा प्रतिपादित होनेपर यह विषय मुझे अधिक प्रसन्नता प्रदान करता है ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि मम सायुज्यमद्भुतम् ।
येन ते न निवर्तन्ते युक्ताः परमयोगिनः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे अपने अद्भुत सायुज्यका वर्णन करता हूँ, जिससे युक्त हो वे परम योगी पुरुष फिर संसारमें नहीं लौटते हैं ।।
अव्यक्तोऽहमचिन्त्योऽहं पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
सांख्ययोगौ मया सृष्टौ सर्वं चापि चराचरम् ।।
पहलेके मुमुक्षुओंद्धारा भी मैं अव्यक्त और अचिन्त्य ही रहा हूँ। मैंने ही सांख्य और योगकी सृष्टि की है। समस्त चराचर जगत्को भी मैंने ही उत्पन्न किया है ।।
अर्चनीयोऽहमीशोऽहमव्ययोऽहं सनातनः ।

अहं प्रसन्नो भक्तानां ददाम्यमरतामपि ।।
मैं पूजनीय ईश्वर हूँ। मैं ही अविनाशी सनातन पुरुष हूँ। मैं प्रसन्न होकर अपने भक्तोंको अमरत्व भी देता हूँ।।
न मां विदुः सुरगणा मुनयश्च तपोधनाः ।
त्वत्प्रियार्थमहं देवि मद्दिभूतिं ब्रवीमि ते ।।
आश्रमेभ्यश्चतुर्भ्योऽहं चतुरो ब्राह्मणान् शुभे ।
मद्भक्तान् निर्मलान् पुण्यान् समानीय तपस्विनः ।।
व्याचख्येऽहं तथा देवि योगं पाशुपतं महत् ।।
देवता तथा तपोधन मुनि भी मुझे अच्छी तरह नहीं जानते हैं। देवि! तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं अपनी विभूति बतलाता हूँ। शुभे! देवि! मैंने चारों आश्रमोंसे चार पुण्यात्मा तपस्वी ब्राह्मणोंको, जो मेरे भक्त और निर्मलचित्त थे, लाकर उनके समक्ष महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की थी।।
गृहीतं तच्च तैः सर्वं मुखाच्च मम दक्षिणात् ।
श्रुत्वा तत् त्रिषु लोकेषु स्थापितं चापि तैः पुनः ।।
इदानीं च त्वया पृष्टो वदाम्येकमनाः शृणु ।।
अहं पशुपतिर्नाम मद्भक्ता ये च मानवाः ।
सर्वे पाशुपता ज्ञेया भस्मदिग्धतनूरुहाः ।।
मेरे दक्षिणवर्ती मुखसे वह सब उपदेश सुनकर उन्होंने ग्रहण किया और पुनः उसकी तीनों लोकोंमें स्थापना की। इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैं उसी पाशुपत योगका वर्णन करता हूँ, एकचित्त होकर सुनो। मेरा ही नाम पशुपति है। अपने रोम-रोममें भस्म रमाये रहनेवाले जो मेरे भक्त मनुष्य हैं, उन्हें पाशुपत जानना चाहिये ।।
रक्षार्थं मङ्गलार्थं च पवित्रार्थं च भामिनि ।
लिङ्गार्थं चैव भक्तानां भस्म दत्तं मया पुरा ।।
तेन संदिग्धसर्वाङ्गा भस्मना ब्रह्मचारिणः ।
जटिला मुण्डिता वापि नानाकारशिखण्डिनः ।।
विकृताः पिङ्गलाभाश्च नग्ना नानाप्रकारिणः ।
भैक्षं चरन्तः सर्वत्र निःस्पृहा निष्परिग्रहाः ।।
मृत्पात्रहस्ता मद्भक्ता मन्निवेशितबुद्धयः ।
चरन्तो निखिलं लोकं मम हर्षविवर्धनाः ।।
भामिनि! पूर्वकालमें मैंने रक्षाके लिये, मंगलके लिये, पवित्रताके लिये और पहचानके लिये भी अपने भक्तोंको भस्म प्रदान किया था। उस भस्मसे सम्पूर्ण अंगोंको लिप्त करके ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले जटाधारी, मुण्डित अथवा नाना प्रकारकी शिखा धारण करनेवाले, विकृत वेश, पिंगलवर्ण, नग्न देह और नाना वेश धारण किये मेरे निःस्पृह और

परिग्रहशून्य भक्त मुझमें ही मन-बुद्धि लगाये, मिट्टीका पात्र हाथमें लिये सब ओर भिक्षाके लिये विचरते रहते हैं। समस्त लोकमें विचरते हुए वे भक्तजन मेरे हर्षकी वृद्धि करते हैं ।।
मम पाशुपतं दिव्यं योगशास्त्रमनुत्तमम् ।
सूक्ष्मं सर्वेषु लोकेषु विमृशन्तश्चरन्ति ते ।।
सभी लोकोंमें मेरे परम उत्तम सूक्ष्म एवं दिव्य पाशुपत योगशास्त्रका विचार करते हुए वे विचरण करते हैं ।।
एवं नित्याभियुक्तानां मद्भक्तानां तपस्विनाम् ।
उपायं चिन्तयाम्य़ाशु येन मामुपयान्ति ते ।।
इस तरह नित्य मेरे ही चिन्तनमें संलग्न रहनेवाले अपने तपस्वी भक्तोंके लिये मैं ऐसा उपाय सोचता रहता हूँ, जिससे वे शीघ्र मुझे प्राप्त हो जाते हैं ।।
स्थापितं त्रिषु लोकेषु शिवलिङ्गं मया मम ।
नमस्कारेण वा तस्य मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।।
इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः ।
शिवलिङ्गप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।।
तीनों लोकोंमें मैंने अपने स्वरूपभूत शिवलिङ्गोंकी स्थापना की है, जिनको नमस्कारमात्र करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। होम, दान, अध्ययन और बहुत-सी दक्षिणावाले यज्ञ भी शिवलिङ्गको प्रणाम करनेसे मिले हुए पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ।।
अर्चया शिवलिङ्गस्य परितुष्याम्यहं प्रिये ।
शिवलिङ्गार्चनायां तु विधानमपि मे शृणु ।।
प्रिये! शिवलिङ्गकी पूजासे मैं बहुत संतुष्ट होता हूँ। तुम शिवलिङ्ग-पूजनका विधान मुझसे सुनो ।।
गोक्षीरनवनीताभ्यामर्चयेद् यः शिवं मम ।
इष्टस्य हयमेधस्य यत् फलं तत् फलं भवेत् ।।
घृतमण्डेन यो नित्यमर्चयेद् यः शिवं मम ।
स फलं प्राप्नुयान्मर्त्यो ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः ।।
केवलेनापि तोयेन स्नापयेद् यः शिवं मम ।
स चापि लभते पुण्यं प्रियं च लभते नरः ।।
जो गोदुग्ध और माखनसे मेरे शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उसे वही फल प्राप्त होता है जो कि अश्वमेध यज्ञ करनेसे मिलता है। जो प्रतिदिन घृतमण्डसे मेरे शिवलिङ्गका पूजन करता है, वह मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणके समान पुण्यफलका भागी होता है। जो केवल जलसे भी मेरे शिवलिङ्गको नहलाता है, वह भी पुण्यका भागी होता और अभीष्ट फल पा लेता है ।।

सघृतं गुग्गुलं सम्यग् धूपयेद् यः शिवान्तिके ।
गोसवस्य तु यज्ञस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥
यस्तु गुग्गुलपिण्डेन केवलेनापि धूपयेत् ।
तस्य रुक्मप्रदानस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥
यस्तु नानाविधैः पुष्पैर्मम लिङ्गं समर्चयेत् ।
स हि धेनुसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥
यस्तु देशान्तरं गत्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत् ।
तस्मात् सर्वमनुष्येषु नास्ति मे प्रियकृत्तमः ॥
जो शिवलिङ्गके निकट घृतमिश्रित गुग्गुलका उत्तम धूप निवेदन करता है, उसे गोसव नामक यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो केवल गुग्गुलके पिण्डसे धूप देता है, उसे सुवर्णदानका फल मिलता है। जो नाना प्रकारके फूलोंसे मेरे लिङ्गकी पूजा करता है, उसे सहस्र धेनुदानका फल प्राप्त होता है। जो देशान्तरमें जाकर शिवलिङ्गकी पूजा करता है, उससे बढ़कर समस्त मनुष्योंमें मेरा प्रिय करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ।।

एवं नानाविधैर्द्रव्यैः शिवलिङ्गं समर्चयेत् ।
मत्समानो मनुष्येषु न पुनर्जायते नरः ॥
अर्चनाभिर्नमस्कारैरुपहारैः स्तवैरपि ।
भक्तो मामर्चयेन्नित्यं शिवलिङ्गेष्वतन्द्रितः ॥
पलाशबिल्वपत्राणि राजवृक्षस्रजस्तथा ।
अर्कपुष्पाणि मेध्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः ॥
इस प्रकार भाँति-भाँतिके द्रव्योंद्वारा जो शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह मनुष्योंमें मेरे समान है। वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता है। अतः भक्त पुरुष अर्चनाओं, नमस्कारों, उपहारों और स्तोत्रोंद्वारा प्रतिदिन आलस्य छोड़कर शिवलिङ्गोंके रूपमें मेरी पूजा करे। पलाश और बेलके पत्ते, राजवृक्षके फूलोंकी मालाएँ तथा आकके पवित्र फूल मुझे विशेष प्रिय हैं ।।

फलं वा यदि वा शाकं पुष्पं वा यदि वा जलम् ।
दत्तं सम्प्रीणयेद् देवि भक्तैर्मद्गतमानसैः ।
ममापि परितुष्टस्य नास्ति लोकेषु दुर्लभम् ।
तस्मात् ते सततं भक्ता मामेवाभ्यर्चयन्त्युत ॥
देवि! मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्तोंका दिया हुआ फल, फूल, साग अथवा जल भी मुझे विशेष प्रिय लगता है। मेरे संतुष्ट हो जानेपर लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है; इसलिये भक्तजन सदा मेरी ही पूजा किया करते हैं ।।

मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः ।
मद्भक्ताः सर्वलोकेषु पूजनीया विशेषतः ॥

मद्द्वेषिणश्च ये मर्त्या मद्भक्तद्वेषिणोऽपि वा ।
यान्ति ते नरकं घोरमिष्ट्वा क्रतुशतैरपि ॥
मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते। उनके सारे पाप दूर हो जाते हैं तथा मेरे भक्त तीनों लोकोंमें विशेषरूपसे पूजनीय हैं। जो मनुष्य मुझसे या मेरे भक्तोंसे द्वेष करते हैं, वे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लें तो भी घोर नरकमें पड़ते हैं ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं योगं पाशुपतं महत् ।
मद्भक्तैर्मनुजैर्देवि श्राव्यमेतद् दिने दिने ॥
शृणुयाद् यः पठेद् वापि ममेदं धर्मनिश्चयम् ।
स्वर्गं कीर्तिं धनं धान्यं लभते स नरोत्तमः ॥
देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की है। मुझमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको प्रतिदिन इसका श्रवण करना चाहिये। जो श्रेष्ठ मानव मेरे इस धर्मनिश्चयका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह इस लोकमें धनधान्य और कीर्ति तथा परलोकमें स्वर्ग पाता है ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२०९ श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं)