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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

दिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्य एवं प्रभाव

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द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

दिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्य एवं प्रभाव

भीष्म उवाच

ततः पद्मप्रतीकाशः पद्मोद्भूतः पितामहः ।
उवाच वचनं देवान् वासवं च शचीपतिम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर कमलके समान कान्तिमान् कमलोद्भव ब्रह्माजीने देवताओं तथा शचीपति इन्द्रसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
अयं महाबलो नागो रसातलचरो बली ।
तेजस्वी रेणुको नाम महासत्त्वपराक्रमः ॥ २ ॥
अतितेजस्विनः सर्वे महावीर्या महागजाः ।
धारयन्ति महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् ॥ ३ ॥
‘यह रसातलमें विचरनेवाला, महाबली, शक्ति-शाली, महान् सत्त्व और पराक्रमसे युक्त तेजस्वी रेणुक नामवाला नाग यहाँ उपस्थित है। सब-के-सब महान् गजराज (दिग्गज) अत्यन्त तेजस्वी और महापराक्रमी होते हैं। वे पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीको धारण करते हैं ॥ २-३ ॥
भवद्भिः समनुज्ञातो रेणुकस्तान् महागजान् ।
धर्मगुह्यानि सर्वाणि गत्वा पृच्छतु तत्र वै ॥ ४ ॥
‘यदि आपलोग आज्ञा दें तो रेणुक उन महान् गजोंके पास जाकर धर्मके समस्त गोपनीय रहस्योंको पूछे’ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा ते देवा रेणुकं तदा ।
प्रेषयामासुरव्यग्रा यत्र ते धरणीधराः ॥ ५ ॥
पितामह ब्रह्माजीकी बात सुनकर शान्त चित्तवाले देवताओंने उस समय रेणुकको उस स्थानपर भेजा, जहाँ पृथ्वीको धारण करनेवाले वे दिग्गज मौजूद थे ॥ ५ ॥

रेणुक उवाच

अनुज्ञातोऽस्मि देवैश्च पितृभिश्च महाबलाः ।
धर्मगुह्यानि युष्माकं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
कथयध्वं महाभागा यद् वस्तत्त्वं मनीषितम् ॥ ६ ॥
रेणुकने कहा— महाबली दिग्गजो! मुझे देवताओं और पितरोंने आज्ञा दी है, इसलिये यहाँ आया हूँ और आपलोगोंके जो धर्मविषयक गूढ़ विचार हैं, उन्हें मैं यथार्थरूपसे सुनना

चाहता हूँ। महाभाग दिग्गजो! आपकी बुद्धिमें जो धर्मका तत्त्व निहित हो, उसे कहिये॥ ६॥

दिग्गजा ऊचुः
कार्तिके मासि चाश्लेषा बहुलस्याष्टमी शिवा।
तेन नक्षत्रयोगेन यो ददाति गुडौदनम्॥ ७॥
इमं मन्त्रं जपन् श्राद्धे यताहारो ह्यकोपनः।
**दिग्गजोंने कहा—**कार्तिक मासके कृष्णपक्षमें आश्लेषा नक्षत्र और मंगलमयी अष्टमी तिथिका योग होनेपर जो मनुष्य आहार-संयमपूर्वक क्रोधशून्य हो निम्नांकित मन्त्रका पाठ करते हुए श्राद्धके अवसरपर हमारे लिये गुड़मिश्रित भात देता है (वह महान् फलका भागी होता है)॥

बलदेवप्रभृतयो ये नागा बलवत्तराः॥ ८॥
अनन्ता ह्याक्षया नित्यं भोगिनः सुमहाबलाः।
तेषां कुलोद्भवा ये च महाभूता भुजङ्गमाः॥ ९॥
ते मे बलिं प्रतीच्छन्तु बलतेजोऽभिवृद्धये।
यदा नारायणः श्रीमानुज्जहार वसुंधराम्॥ १०॥
तद् बलं तस्य देवस्य धरामुद्धरतस्तथा।
'बलदेव (शेष या अनन्त) आदि जो अत्यन्त बलशाली नाग हैं, वे अनन्त, अक्षय, नित्य फनधारी और महाबली हैं। वे तथा उनके कुलमें उत्पन्न हुए जो अन्य विशाल भुजंगम हों, वे भी मेरे तेज और बलकी वृद्धिके लिये मेरी दी हुई इस बलिको ग्रहण करें। जब श्रीमान् भगवान् नारायणने इस पृथ्वीका एकार्णवके जलसे उद्धार किया था, उस समय इस वसुन्धराका उद्धार करते हुए उन भगवान्‌के श्रीविग्रहमें जो बल था, वह मुझे प्राप्त हो'॥ ८—१० १/२॥

एवमुक्त्वा बलिं तत्र वल्मीके तु निवेदयेत्॥ ११॥
गजेन्द्रकुसुमाकीर्णं नीलवस्त्रानुलेपनम्।
निर्वपेत् तं तु वल्मीके अस्तं याते दिवाकरे॥ १२॥
इस प्रकार कहकर किसी बाँबीपर बलि निवेदन करे। उसपर नागकेसर बिखेर दे, चन्दन चढ़ा दे और उसे नीले कपड़ेसे ढक दे तथा सूर्यास्त होनेपर उस बलिको बाँबीके पास रख दे॥ ११-१२॥

एवं तृप्तास्ततः सर्वे अधस्ताद्भारपीडिताः।
श्रमं तं नावबुध्यामो धारयन्तो वसुंधराम्॥ १३॥
एवं मन्यामहे सर्वे भारार्ता निरपेक्षिणः।

इस प्रकार संतुष्ट होकर पृथ्वीके नीचे भारसे पीड़ित होनेपर भी हम सब लोगोंको वह परिश्रम प्रतीत नहीं होता है और हमलोग सुखपूर्वक वसुधाका भार वहन करते हैं। भारसे पीड़ित होनेपर भी किसीसे कुछ न चाहनेवाले हम सब लोग ऐसा ही मानते हैं ।। १३ १/२ ।।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा यद्युपोषितः ।। १४ ।।
एवं संवत्सरं कृत्वा दानं बहुफलं लभेत् ।
वल्मीके बलिमादाय तन्नो बहुफलं मतम् ।। १५ ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र यदि उपवासपूर्वक एक वर्षतक इस प्रकार हमारे लिये बलिदान करे तो उसका महान् फल होता है। बाँबीके निकट बलि अर्पित करनेपर वह हमारे लिये अधिक फल देनेवाला माना गया है ।।
ये च नागा महावीर्यास्त्रिषु लोकेषु कृत्स्नशः ।
कृतातिथ्या भवेयुस्ते शतं वर्षाणि तत्त्वतः ।। १६ ।।
तीनों लोकोंमें जो समस्त महापराक्रमी नाग हैं, वे इस बलिदानसे सौ वर्षोंके लिये यथार्थरूपसे सत्कृत हो जाते हैं ।। १६ ।।
दिग्गजानां च तच्छ्रुत्वा देवताः पितरस्तथा ।
ऋषयश्च महाभागाः पूजयन्ति स्म रेणुकम् ।। १७ ।।
दिग्गजोंके मुखसे यह बात सुनकर महाभाग देवता, पितर और ऋषि रेणुक नागकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दिग्गजानां रहस्ये
द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३२ ।।