महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 561)
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
जलाशय बनानेका तथा बगीचे लगानेका फल
युधिष्ठिर उवाच
आरामाणां तडागानां यत् फलं कुरुपुंगव ।
तदहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतोऽद्य भरतर्षभ ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— कुरुकुलपुंगव! भरतश्रेष्ठ! बगीचे लगाने और जलाशय बनवानेका जो फल होता है, उसीको अब मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सुप्रदर्शा बलवती चित्रा धातुविभूषिता ।
उपेता सर्वभूतैश्च श्रेष्ठा भूमिरिहोच्यते ॥ २ ॥
भीष्मजी बोले— राजन्! जो देखनेमें सुन्दर हो, जहाँकी मिट्टी प्रबल, अधिक अन्न उपजानेवाली हो, जो विचित्र एवं अनेक धातुओंसे विभूषित हो तथा समस्त प्राणी जहाँ निवास करते हों, वही भूमि यहाँ श्रेष्ठ बतायी जाती है ॥ २ ॥
तस्याः क्षेत्रविशेषांश्च तडागानां च बन्धनम् ।
औदकानि च सर्वाणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ३ ॥
उस भूमिसे सम्बन्ध रखनेवाले विशेष-विशेष क्षेत्र, उनमें पोखरोंके निर्माण तथा अन्य सब जलाशय—कूप आदि—इन सबके विषयमें मैं क्रमशः आवश्यक बातें बताऊँगा ॥ ३ ॥
तडागानां च वक्ष्यामि कृतानां चापि ये गुणाः ।
त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजनीयस्तडागवान् ॥ ४ ॥
पोखरे बनवानेसे जो लाभ होते हैं, उनका भी मैं वर्णन करूँगा। पोखरे बनवानेवाला मनुष्य तीनों लोकोंमें सर्वत्र पूजनीय होता है ॥ ४ ॥
अथवा मित्रसदनं मैत्रं मित्रविवर्धनम् ।
कीर्तिसंजननं श्रेष्ठं तडागानां निवेशनम् ॥ ५ ॥
अथवा पोखरोंका बनवाना मित्रके घरकी भाँति उपकारी, मित्रताका हेतु और मित्रोंकी वृद्धि करनेवाला तथा कीर्तिके विस्तारका सर्वोत्तम साधन है ॥ ५ ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिणः ।
तडागसुकृतं देशे क्षेत्रमेकं महाश्रयम् ॥ ६ ॥
मनीषी पुरुष कहते हैं कि देश या गाँवमें एक तालाबका निर्माण धर्म, अर्थ और काम तीनोंका फल देनेवाला है तथा पोखरेसे सुशोभित होनेवाला स्थान समस्त प्राणियोंके लिये
एक महान् आश्रय है ॥ ६ ॥
चतुर्विधानां भूतानां तडागमुपलक्षयेत् ।
तडागानि च सर्वाणि दिशन्ति श्रियमुत्तमाम् ॥ ७ ॥
तालाबको चारों प्रकारके प्राणियोंके लिये बहुत बड़ा आधार समझना चाहिये। सभी प्रकारके जलाशय उत्तम सम्पत्ति प्रदान करते हैं ॥ ७ ॥
देवा मनुष्यगन्धर्वाः पितरोरगराक्षसाः ।
स्थावराणि च भूतानि संश्रयन्ति जलाशयम् ॥ ८ ॥
देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा समस्त स्थावर प्राणी जलाशयका आश्रय लेते हैं ॥ ८ ॥
तस्मात् तांस्ते प्रवक्ष्यामि तडागे ये गुणाः स्मृताः ।
या च तत्र फलावाप्तिरृषिभिः समुदाहृता ॥ ९ ॥
अतः ऋषियोंने तालाब बनवानेसे जिन फलोंकी प्राप्ति बतलायी है तथा तालाबसे जो लाभ होते हैं, उन सबको मैं तुम्हें बताऊँगा ॥ ९ ॥
वर्षाकाले तडागे तु सलिलं यस्य तिष्ठति ।
अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः ॥ १० ॥
जिसके खोदवाये हुए तालाबमें बरसात भर पानी रहता है, उसके लिये मनीषी पुरुष अग्निहोत्रके फलकी प्राप्ति बताते हैं ॥ १० ॥
शरत्काले तु सलिलं तडागे यस्य तिष्ठति ।
गोसहस्रस्य स प्रेत्य लभते फलमुत्तमम् ॥ ११ ॥
जिसके तालाबमें शरत्कालतक पानी ठहरता है, वह मृत्युके पश्चात् एक हजार गोदानका उत्तम फल पाता है ॥ ११ ॥
हेमन्तकाले सलिलं तडागे यस्य तिष्ठति ।
स वै बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते फलम् ॥ १२ ॥
जिसके तालाबमें हेमन्त (अगहन-पौष) तक पानी रुकता है, वह बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणासे युक्त महान् यज्ञके फलका भागी होता है ॥ १२ ॥
यस्य वै शैशिरे काले तडागे सलिलं भवेत् ।
तस्याग्निष्टोमयज्ञस्य फलमाहुर्मनीषिणः ॥ १३ ॥
जिसके जलाशयमें शिशिरकाल (माघ-फाल्गुन) तक जल रहता है, उसके लिये मनीषी पुरुषोंने अग्निष्टोम नामक यज्ञके फलकी प्राप्ति बतायी है ॥ १३ ॥
तडागं सुकृतं यस्य वसन्ते तु महाश्रयम् ।
अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं स समुपाश्नुते ॥ १४ ॥
जिसका खोदवाया हुआ पोखरा वसन्त ऋतुतक अपने भीतर जल रखनेके कारण प्यासे प्राणियोंके लिये महान् आश्रय बना रहता है, उसे 'अतिरात्र' यज्ञका फल प्राप्त होता
है ॥ १४ ॥
निदाघकाले पानीयं तडागे यस्य तिष्ठति ।
वाजिमेधफलं तस्य फलं वै मुनयो विदुः ॥ १५ ॥
जिसके तालाबमें ग्रीष्म ऋतुतक पानी रुका रहता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है—ऐसा मुनियोंका मत है ॥ १५ ॥
स कुलं तारयेत् सर्वं यस्य खाते जलाशये ।
गावः पिबन्ति सलिलं साधवश्च नराः सदा ॥ १६ ॥
जिसके खोदवाये हुए जलाशयमें सदा साधु पुरुष और गौएँ पानी पीती हैं, वह अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है ॥ १६ ॥
तडागे यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् ।
मृगपक्षिमुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ १७ ॥
जिसके तालाबमें प्यासी गौएँ पानी पीती हैं तथा मृग, पक्षी और मनुष्योंको भी जल सुलभ होता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥ १७ ॥
यत् पिबन्ति जलं तत्र स्नायन्ते विश्रमन्ति च ।
तडागे यस्य तत् सर्वं प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ॥ १८ ॥
यदि किसीके तालाबमें लोग स्नान करते, पानी पीते और विश्राम करते हैं तो इन सबका पुण्य उस पुरुषको मरनेके बाद अक्षय सुख प्रदान करता है ॥ १८ ॥
दुर्लभं सलिलं तात विशेषेण परत्र वै ।
पानीयस्य प्रदानेन प्रीतिर्भवति शाश्वती ॥ १९ ॥
तात! जल दुर्लभ पदार्थ है। परलोकमें तो उसका मिलना और भी कठिन है। जो जलका दान करते हैं, वे ही वहाँ जलदानके पुण्यसे सदा तृप्त रहते हैं ॥ १९ ॥
तिलान् ददत पानीयं दीपान् ददत जाग्रत ।
ज्ञातिभिः सह मोदध्वमेतत् प्रेत्य सुदुर्लभम् ॥ २० ॥
बन्धुओ! तिलका दान करो, जल-दान करो, दीप-दान करो, सदा धर्म करनेके लिये सजग रहो तथा कुटुम्बीजनोंके साथ सर्वदा धर्मपालनपूर्वक रहकर आनन्दका अनुभव करो। मृत्युके बाद इन सत्कर्मोंसे परलोकमें अत्यन्त दुर्लभ फलकी प्राप्ति होती है ॥
सर्वदानैर्गुरुतरं सर्वदानैर्विशिष्यते ।
पानीयं नरशार्दूल तस्माद् दातव्यमेव हि ॥ २१ ॥
पुरुषसिंह! जलदान सब दानोंसे महान् और समस्त दानोंसे बढ़कर है; अतः उसका दान अवश्य करना चाहिये ॥ २१ ॥
एवमेतत् तडागस्य कीर्तितं फलमुत्तमम् ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामवरोपणम् ॥ २२ ॥
इस प्रकार यह मैंने तालाब बनवानेके उत्तम फलका वर्णन किया है। इसके बाद वृक्ष लगानेका माहात्म्य बतलाऊँगा ॥ २२ ॥
स्थावराणां च भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः ।
वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातयः ॥ २३ ॥
स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं—वृक्ष (बड़-पीपल आदि), गुल्म (कुश आदि), लता (वृक्षपर फैलनेवाली बेल), वल्ली (जमीनपर फैलनेवाली बेल), त्वक्सार (बाँस आदि) और तृण (घास आदि) ॥ २३ ॥
एता जात्यस्तु वृक्षाणां तेषां रोपे गुणास्त्विमे ।
कीर्तिंश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव फलं शुभम् ॥ २४ ॥
ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं। अब इनके लगानेसे जो लाभ हैं, वे यहाँ बताये जाते हैं। वृक्ष लगानेवाले मनुष्यकी इस लोकमें कीर्ति बनी रहती है और मरनेके बाद उसे उत्तम शुभ फलकी प्राप्ति होती है ॥ २४ ॥
लभते नाम लोके च पितृभिश्च महीयते ।
देवलोके गतस्यापि नाम तस्य न नश्यति ॥ २५ ॥
संसारमें उसका नाम होता है, परलोकमें पितर उसका सम्मान करते हैं तथा देवलोकमें चले जानेपर भी यहाँ उसका नाम नष्ट नहीं होता ॥ २५ ॥
अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत ।
तारयेद् वृक्षरोपी च तस्माद् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥ २६ ॥
भरतनन्दन! वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपने मरे हुए पूर्वजों और भविष्यमें होनेवाली संतानोंका तथा पितृकुलका भी उद्धार कर देता है, इसलिये वृक्षोंको अवश्य लगाना चाहिये ॥ २६ ॥
तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः ।
परलोकगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ॥ २७ ॥
जो वृक्ष लगाता है, उसके लिये ये वृक्ष पुत्ररूप होते हैं, इसमें संशय नहीं है। उन्हींके कारण परलोकमें जानेपर उसे स्वर्ग तथा अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ॥ २७ ॥
पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् ।
छायया चातिथिं तात पूजयन्ति महीरुहः ॥ २८ ॥
तात! वृक्षगण अपने फूलोंसे देवताओंकी, फलोंसे पितरोंकी और छायासे अतिथियोंकी पूजा करते हैं ॥ २८ ॥
किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः ।
तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ति महीरुहान् ॥ २९ ॥
किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मनुष्य और ऋषियोंके समुदाय—ये सभी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ॥
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ।
वृक्षदं पुत्रवद् वृक्षास्तारयन्ति परत्र तु ॥ ३० ॥
फूले-फले वृक्ष इस जगत्में मनुष्योंको तृप्त करते हैं। जो वृक्षका दान करता है, उसको वे वृक्ष पुत्रकी भाँति परलोकमें तार देते हैं ॥ ३० ॥
तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ।
पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥ ३१ ॥
इसलिये अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही उचित है कि वह अपने खुदवाये हुए तालाबके किनारे अच्छे-अच्छे वृक्ष लगाये और उनका पुत्रोंके समान पालन करे; क्योंकि वे वृक्ष धर्मकी दृष्टिसे पुत्र ही माने गये हैं ॥ ३१ ॥
तडागकृद् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः ।
एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ॥ ३२ ॥
जो तालाब बनवाता, वृक्ष लगाता, यज्ञोंका अनुष्ठान करता तथा सत्य बोलता है, ये सभी द्विज स्वर्गलोकमें सम्मानित होते हैं ॥ ३२ ॥
तस्मात् तडागं कुर्वीत आरामांश्चैव रोपयेत् ।
यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च सततं वदेत् ॥ ३३ ॥
इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह तालाब खुदवाये, बगीचे लगाये, भाँति-भाँतिके यज्ञोंका अनुष्ठान करे तथा सदा सत्य बोले ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आरामतडागवर्णनं नाम अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बगीचा लगाने और तालाब बनानेका वर्णन नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥