सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1808)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

आत्मा और परमात्माके स्वरूपका विवेचन

ब्रह्मोवाच

केचिद् ब्रह्ममयं वृक्षं केचिद् ब्रह्मवनं महत् ।
केचित्तु ब्रह्म चाव्यक्तं केचित् परमनामयम् ।
मन्यन्ते सर्वमप्येतदव्यक्तप्रभवाव्ययम् ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षिगण! इस अव्यक्त, उत्पत्तिशील, अविनाशी सम्पूर्ण वृक्षको कोई ब्रह्म-स्वरूप मानते हैं और कोई महान् ब्रह्मवन मानते हैं। कितने ही इसे अव्यक्त ब्रह्म और कितने ही परम अनामय मानते हैं ॥ १ ॥

उच्छ्वासमात्रमपि चेद् योऽन्तकाले समो भवेत् ।
आत्मानमुपसङ्गम्य सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ २ ॥
जो मनुष्य अन्तकालमें आत्माका ध्यान करके, साँस लेनेमें जितनी देर लगती है, उतनी देर भी, समभावमें स्थित होता है, वह अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है ॥ २ ॥

निमेषमात्रमपि चेत् संयम्यात्मानमात्मनि ।
गच्छत्यात्मप्रसादेन विदुषां प्राप्तिमव्ययाम् ॥ ३ ॥
जो एक निमेष भी अपने मनको आत्मामें एकाग्र कर लेता है, वह अन्तःकरणकी प्रसन्नताको पाकर विद्वानोंको प्राप्त होनेवाली अक्षय गतिको पा जाता है ॥ ३ ॥

प्राणायामैरथ प्राणान् संयम्य स पुनः पुनः ।
दशद्वादशभिर्वापि चतुर्विंशात् परं ततः ॥ ४ ॥
दस अथवा बारह प्राणायामोंके द्वारा पुनः-पुनः प्राणोंका संयम करनेवाला पुरुष भी चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवें तत्त्व परमात्माको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥

एवं पूर्वं प्रसन्नात्मा लभते यद् यदिच्छति ।
अव्यक्तात् सत्त्वमुद्रिक्तममृतत्वाय कल्पते ॥ ५ ॥
सत्त्वात् परतरं नान्यत् प्रशंसन्तीह तद्विदः ।
इस प्रकार जो पहले अपने अन्तःकरणको शुद्ध कर लेता है, वह जो-जो चाहता है उसी-उसी वस्तुको पा जाता है। अव्यक्तसे उत्कृष्ट जो सत्-स्वरूप आत्मा है, वह अमर होनेमें समर्थ है। अतः सत्त्वस्वरूप आत्माके महत्त्वको जाननेवाले विद्वान् इस जगत्में सत्त्वसे बढ़कर और किसी वस्तुकी प्रशंसा नहीं करते ॥ ५ १/२ ॥

अनुमानाद् विजानीमः पुरुषं सत्त्वसंश्रयम् ।
न शक्यमन्यथा गन्तुं पुरुषं द्विजसत्तमाः ॥ ६ ॥

द्विजवरो! इस अनुमान-प्रमाणके द्वारा इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि अन्तर्यामी परमात्मा सत्त्वस्वरूप आत्मामें स्थित हैं। इस तत्त्वको समझे बिना परम पुरुषको प्राप्त करना सम्भव नहीं है ॥ ६ ॥
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।
ज्ञानं त्यागोऽथ संन्यासः सात्त्विकं वृत्तमिष्यते ॥ ७ ॥
क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, ज्ञान, त्याग तथा संन्यास—ये सात्त्विक बर्ताव बताये गये हैं ॥ ७ ॥
एतेनैवानुमानेन मन्यन्ते वै मनीषिणः ।
सत्त्वं च पुरुषश्चैव तत्र नास्ति विचारणा ॥ ८ ॥
मनीषी पुरुष इसी अनुमानसे उस सत्त्वस्वरूप आत्माका और परमात्माका मनन करते हैं। इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है ॥ ८ ॥
आहुरेके च विद्वांसो ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः ।
क्षेत्रज्ञसत्त्वयोरैक्यमित्येतन्नोपपद्यते ॥ ९ ॥
ज्ञानमें भलीभाँति स्थित कितने ही विद्वान् कहते हैं कि क्षेत्रज्ञ और सत्त्वकी एकता युक्तिसंगत नहीं है ॥ ९ ॥
पृथग्भूतं ततः सत्त्वमित्येतदविचारितम् ।
पृथग्भावश्च विज्ञेयः सहजश्चापि तत्त्वतः ॥ १० ॥
उनका कहना है कि उस क्षेत्रज्ञसे सत्त्व पृथक् है, क्योंकि यह सत्त्व अविचारसिद्ध है। ये दोनों एक साथ रहनेवाले होनेपर भी तत्त्वतः अलग-अलग हैं—ऐसा समझना चाहिये ॥ १० ॥
तथैकत्वनानात्वमिष्यते विदुषां नयः ।
मशकोडुम्बरे चैक्यं पृथक्त्वमपि दृश्यते ॥ ११ ॥
इसी प्रकार दूसरे विद्वानोंका निर्णय दोनोंके एकत्व और नानात्वको स्वीकार करता है; क्योंकि मशक और उदुम्बरकी एकता और पृथक्ता देखी जाती है ॥ ११ ॥
मत्स्यो यथान्यः स्यादप्सु सम्प्रयोगस्तथा तयोः ।
सम्बन्धस्तोयबिन्दूनां पर्णे कोकनदस्य च ॥ १२ ॥
जैसे जलसे मछली भिन्न है तो भी मछली और जल—दोनोंका संयोग देखा जाता है एवं जलकी बूँदोंका कमलके पत्तेसे सम्बन्ध देखा जाता है ॥ १२ ॥

गुरुरुवाच

इत्युक्तवन्तस्ते विप्रास्तदा लोकपितामहम् ।
पुनः संशयमापन्नाः पप्रच्छुर्मु निसत्तमाः ॥ १३ ॥

गुरुने कहा— इस प्रकार कहनेपर उन मुनिश्रेष्ठ ब्राह्मणोंने पुनः संशयमें पड़कर उस समय लोकपितामह ब्रह्माजीसे पूछा ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-
संवादविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥