महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुन युद्धके लिये उद्यत हो गये। वे शत्रुओंके लिये दुर्जय थे और युद्धभूमिमें हिमवान् पर्वतके
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति
वैशम्पायन उवाच
ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय समुपस्थितः ।
विबभौ युधि दुर्धर्षो हिमवानचलो यथा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुन युद्धके लिये उद्यत हो गये। वे शत्रुओंके लिये दुर्जय थे और युद्धभूमिमें हिमवान् पर्वतके समान अचल भावसे डटे रहकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १ ॥
ततस्ते सैन्धवा योधाः पुनरेव व्यवस्थिताः ।
व्यमुञ्चन्त सुसंरब्धा शरवर्षाणि भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! तदनन्तर सिन्धुदेशीय योद्धा फिरसे संगठित होकर खड़े हो गये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥
तान् प्रहस्य महाबाहुः पुनरेव व्यवस्थितान् ।
ततः प्रोवाच कौन्तेयो मुमूर्षून् श्लक्ष्णया गिरा ।
युध्यध्वं परया शक्त्या यतध्वं विजये मम ॥ ३ ॥
उस समय महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुन पुनः मरनेकी इच्छासे खड़े हुए सैन्धवोंको सम्बोधित करके हँसते हुए मधुर वाणीमें बोले—‘वीरो! तुम पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो और मुझपर विजय पानेका प्रयत्न करते रहो ॥ ३ ॥
कुरुध्वं सर्वकार्याणि महद् वो भयमागतम् ।
एष योत्स्यामि सर्वांस्तु निवार्य शरवागुराम् ॥ ४ ॥
‘तुम अपने सारे कार्य पूरे कर लो। तुमलोगोंपर महान् भय आ पहुँचा है। यह देखो—मैं तुम्हारे बाणोंका जाल छिन्न-भिन्न करके तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करनेको उद्यत हूँ ॥ ४ ॥
तिष्ठध्वं युद्धमनसो दर्पं शमयितास्मि वः ।
एतावदुक्त्वा कौरव्यो रोषाद् गाण्डीवभृत् तदा ॥ ५ ॥
ततोऽथ वचनं स्मृत्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ।
न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिया विजिगीषवः ॥ ६ ॥
जेतव्याश्चेति यत् प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना ।
चिन्तयामास स तदा फाल्गुनः पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥
'मनमें युद्धका हौसला लेकर खड़े रहो। मैं तुम्हारा घमण्ड चूर किये देता हूँ।' भारत! गाण्डीवधारी करुनन्दन अर्जुन शत्रुओंसे ऐसा वचन कहकर अपने बड़े भाईकी कही हुई बातें याद करने लगे। महात्मा धर्मराजने कहा था कि 'तात! रणभूमिमें विजयकी इच्छा रखनेवाले क्षत्रियोंका वध न करना। साथ ही उन्हें पराजित भी करना।' इस बातको याद करके पुरुषप्रवर अर्जुन इस प्रकार चिन्ता करने लगे ।। ५—७ ।।
इत्युक्तोऽहं नरेन्द्रेण न हन्तव्या नृपा इति ।
कथं तन्न मृषेदं स्याद् धर्मराजवचः शुभम् ।। ८ ।।
न हन्येरंश्च राजानो राज्ञश्चाज्ञा कृता भवेत् ।
इति संचिन्त्य स तदा फाल्गुनः पुरुषर्षभः ।। ९ ।।
प्रोवाच वाक्यं धर्मज्ञः सैन्धवान् युद्धदुर्मदान् ।
'अहो! महाराजने कहा था कि क्षत्रियोंका वध न करना। धर्मराजका वह मंगलमय वचन कैसे मिथ्या न हो। राजालोग मारे न जायँ और राजा युधिष्ठिरकी आज्ञाका पालन हो जाय, इसके लिये क्या करना चाहिये।' ऐसा सोचकर धर्मके ज्ञाता पुरुषप्रवर अर्जुनने रणोन्मत्त सैन्धवोंसे इस प्रकार कहा— ।। ८-९ ½ ।।
श्रेयो वदामि युष्माकं न हिंसेयमवस्थितान् ।। १० ।।
यश्च वक्ष्यति संग्रामे तवास्मीति पराजितः ।
एतच्छ्रुत्वा वचो मह्यं कुरुध्वं हितमात्मनः ।। ११ ।।
'योद्धाओ! मैं तुम्हारे कल्याणकी बात बता रहा हूँ। तुममेंसे जो कोई अपनी पराजय स्वीकार करते हुए रणभूमिमें यह कहेगा कि मैं आपका हूँ, आपने मुझे युद्धमें जीत लिया है, वह सामने खड़ा रहे तो भी मैं उसका वध नहीं करूँगा। मेरी यह बात सुनकर तुम्हें जिसमें अपना हित दिखायी पड़े, वह करो ।। १०-११ ।।
ततोऽन्यथा कृच्छ्रगता भविष्यथ मयार्दिताः ।
एवमुक्त्वा तु तान् वीरान् युयुधे कुरुपुङ्गवः ।। १२ ।।
अर्जुनोऽतीव संक्रुद्धः संक्रुद्धैर्विजिगीषुभिः ।
'यदि मेरे कथनके विपरीत तुमलोग युद्धके लिये उद्यत हुए तो मुझसे पीड़ित होकर भारी संकटमें पड़ जाओगे।' उन वीरोंसे ऐसा कहकर कुरुकुलतिलक अर्जुन अत्यन्त कुपित हो क्रोधमें भरे हुए विजयाभिलाषी सैन्धवोंके साथ युद्ध करने लगे ।। १२ ½ ।।
शतं शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ।। १३ ।।
मुमुचुः सैन्धवा राजंस्तदा गाण्डीवधन्वनि ।
राजन्! उस समय सैन्धवोंने गाण्डीवधारी अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक करोड़ बाणोंका प्रहार किया ।। १३ ½ ।।
शरानापततः क्रूरानाशीविषविषोपमान् ।। १४ ।।
चिच्छेद निशितैर्बाणैरन्तरा स धनंजयः ।
विषधर सर्पोंके समान उन कठोर बाणोंको अपनी ओर आते देख अर्जुनने तीखे सायकोंद्वारा उन सबको बीचसे काट डाला ।। १४ १/२ ।।
छित्त्वा तु तानाशु चैव कङ्कपत्राञ् शिलाशितान् ।। १५ ।।
एकैकमेषां समरे बिभेद निशितैः शरैः ।
सानपर चढ़ाकर तेज किये गये उन कंकपत्रयुक्त बाणोंके तुरन्त ही टुकड़े-टुकड़े करके समरांगणमें अर्जुनने सैन्धव वीरोंमेंसे प्रत्येकको पैने बाण मारकर घायल कर दिया ।। १५ १/२ ।।
ततः प्रासांश्च शक्तीश्च पुनरेव धनंजयम् ।। १६ ।।
जयद्रथं हतं स्मृत्वा चिक्षिपुः सैन्धवा नृपाः ।
तदनन्तर जयद्रथ-वधका स्मरण करके सैन्धवोंने अर्जुनपर पुनः बहुत-से प्रासों और शक्तियोंका प्रहार किया ।। १६ १/२ ।।
तेषां किरीटी संकल्पं मोघं चक्रे महाबलः ।। १७ ।।
सर्वांस्तानन्तराच्छित्त्वा तदा चुक्रोश पाण्डवः ।
परंतु महाबली किरीटधारी पाण्डुकुमार अर्जुनने उनका सारा मनसूबा व्यर्थ कर दिया। उन्होंने उन सभी प्रासों और शक्तियोंको बीचसे ही काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ।। १७ १/२ ।।
तथैवापततां तेषां योधानां जयगृद्धिनाम् ।। १८ ।।
शिरांसि पातयामास भल्लैः संनतपर्वभिः ।
साथ ही विजयकी अभिलाषा लेकर आक्रमण करनेवाले उन सैन्धव योद्धाओंके मस्तकोंको वे झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा काट-काटकर गिराने लगे ।। १८ १/२ ।।
तेषां प्रद्रवतां चापि पुनरेवाभिधावताम् ।। १९ ।।
निवर्ततां च शब्दोऽभूत् पूर्णस्येव महोदधेः ।
उनमेंसे कुछ लोग भागने लगे, कुछ लोग फिरसे धावा करने लगे और कुछ लोग युद्धसे निवृत्त होने लगे। उन सबका कोलाहल जलसे भरे हुए महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान हो रहा था ।। १९ १/२ ।।
ते वध्यमानास्तु तदा पार्थेनामिततेजसा ।। २० ।।
यथाप्राणं यथोत्साहं योधयामासुरर्जुनम् ।
अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा मारे जानेपर भी सैन्धव योद्धा बल और उत्साहपूर्वक उनके साथ जूझते ही रहे ।। २० १/२ ।।
ततस्ते फाल्गुनेनाजौ शरैः संनतपर्वभिः ।। २१ ।।
कृता विसंज्ञा भूयिष्ठाः क्लान्तवाहनसैनिकाः ।
थोड़ी ही देरमें अर्जुनने युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा अधिकांश सैन्धव वीरोंको संज्ञाशून्य कर दिया। उनके वाहन और सैनिक भी थकावटसे खिन्न हो रहे थे ॥ २१ १/२ ॥
तांस्तु सर्वान् परिग्लानान् विदित्वा धृतराष्ट्रजा ॥ २२ ॥
दुःशला बालमादाय नप्तारं प्रययौ तदा ।
सुरथस्य सुतं वीरं रथेनाथागमत् तदा ॥ २३ ॥
शान्त्यर्थं सर्वयोधानामभ्यगच्छत पाण्डवम् ।
समस्त सैन्धव वीरोंको कष्ट पाते जान धृतराष्ट्रकी पुत्री दुःशला अपने बेटे सुरथके वीर बालकको जो उसका पौत्र था, साथ ले रथपर सवार हो रणभूमिमें पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आयी। उसके आनेका उद्देश्य यह था कि सब योद्धा युद्ध छोड़कर शान्त हो जायँ ॥ २२-२३ १/२ ॥
सा धनंजयमासाद्य रुरोदार्तस्वरं तदा ॥ २४ ॥
धनंजयोऽपि तां दृष्ट्वा धनुर्विससृजे प्रभुः ।
वह अर्जुनके पास आकर आर्तस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगी। शक्तिशाली अर्जुनने भी उसे सामने देख अपना धनुष नीचे डाल दिया ॥ २४ १/२ ॥
समुत्सृज्य धनुः पार्थो विधिवद् भगिनीं तदा ॥ २५ ॥
प्राह किं करवाणीति सा च तं प्रत्युवाच ह ।
धनुष त्यागकर कुन्तीकुमारने विधिपूर्वक बहिनका सत्कार किया और पूछा—'बहिन! बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ?' तब दुःशलाने उत्तर दिया— ॥
एष ते भरतश्रेष्ठ स्वस्रीयस्यात्मजः शिशुः ॥ २६ ॥
अभिवादयते पार्थ तं पश्य पुरुषर्षभ ।
‘भैया! भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हारे भानजे सुरथका औरस पुत्र है। पुरुषप्रवर पार्थ! इसकी ओर देखो, यह तुम्हें प्रणाम करता है’ ।। २६ १/२ ।।
इत्युक्तस्तस्य पितरं स पप्रच्छार्जुनस्तथा ।। २७ ।।
क्वासाविति ततो राजन् दुःशला वाक्यमब्रवीत् ।
राजन्! दुःशलाके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उस बालकके पिताके विषयमें जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा—‘बहिन! सुरथ कहाँ है?’ तब दुःशला बोली— ।। २७ १/२ ।।
पितृशोकाभिसंतप्तो विषादार्तोऽस्य वै पिता ।। २८ ।।
पञ्चत्वमगमद् वीरो यथा तन्मे निशामय ।
‘भैया! इस बालकका पिता वीर सुरथ पितृशोकसे संतप्त और विषादसे पीड़ित हो जिस प्रकार मृत्युको प्राप्त हुआ है, वह मुझसे सुनो ।। २८ १/२ ।।
स पूर्वं पितरं श्रुत्वा हतं युद्धे त्वयानघ ।। २९ ।।
त्वामागतं च संश्रुत्य युद्धाय हयसारिणम् ।
पितुश्च मृत्युदुःखार्तोऽजहात् प्राणान् धनंजय ।। ३० ।।
‘निष्पाप अर्जुन! मेरे पुत्र सुरथने पहलेसे सुन रखा था कि अर्जुनके हाथसे ही मेरे पिताकी मृत्यु हुई है। इसके बाद जब उसके कानोंमें यह समाचार पड़ा है कि तुम घोड़ेके
पीछे-पीछे युद्धके लिये यहाँतक आ पहुँचे हो तो वह पिताकी मृत्युके दुःखसे आतुर हो अपने प्राणोंका परित्याग कर बैठा है ।। २९-३० ।।
प्राप्तो बीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेऽनघ ।
विषादार्तः पपातोर्व्यां ममार च ममात्मजः ।। ३१ ।।
‘अनघ! ‘अर्जुन आये’ इन शब्दोंके साथ तुम्हारा नाममात्र सुनकर ही मेरा बेटा विषादसे पीड़ित हो पृथ्वीपर गिरा और मर गया ।। ३१ ।।
तं दृष्ट्वा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो ।
गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी ।। ३२ ।।
‘प्रभो! उसको ऐसी अवस्थामें पड़ा हुआ देख उसके पुत्रको साथ ले मैं शरण खोजती हुई आज तुम्हारे पास आयी हूँ’ ।। ३२ ।।
इत्युक्त्वाऽऽर्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा ।
दीना दीनं स्थितं पार्थमब्रवीच्चाप्यधोमुखम् ।। ३३ ।।
ऐसा कहकर धृतराष्ट्र-पुत्री दुःशला दीन होकर आर्तस्वरसे विलाप करने लगी। उसकी दीनदशा देख अर्जुन भी दीन भावसे अपना मुँह नीचे किये खड़े रहे। उस समय दुःशला उनसे फिर बोली— ।। ३३ ।।
स्वसारं समवेक्षस्व स्वस्त्रीयात्मजमेव च ।
कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दयां कुरु कुलोद्वह ।। ३४ ।।
‘भैया! तुम कुरुकुलमें श्रेष्ठ और धर्मको जाननेवाले हो, अतः दया करो। अपनी इस दुखिया बहिनकी ओर देखो और भानजेके बेटेपर भी कृपादृष्टि करो ।। ३४ ।।
विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जयद्रथम् ।
अभिमन्योर्यथा जातः परिक्षित् परवीरहा ।। ३५ ।।
तथायं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुजः ।
‘मन्दबुद्धि दुर्योधन और जयद्रथको भूलकर हमें अपनाओ। जैसे अभिमन्युसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परीक्षित्का जन्म हुआ है, उसी प्रकार सुरथसे यह मेरा महाबाहु पौत्र उत्पन्न हुआ है ।। ३५ १/२ ।।
तमादाय नरव्याघ्र सम्प्राप्तास्मि तवान्तिकम् ।। ३६ ।।
शमार्थं सर्वयोधानां शृणु चेदं वचो मम ।
‘पुरुषसिंह! मैं इसीको लेकर समस्त योद्धाओंको शान्त करनेके लिये आज तुम्हारे पास आयी हूँ। तुम मेरी यह बात सुनो ।। ३६ १/२ ।।
आगतोऽयं महाबाहो तस्य मन्दस्य पुत्रकः ।। ३७ ।।
प्रसादमस्य बालस्य तस्मात् त्वं कर्तुमर्हसि ।
‘महाबाहो! यह उस मन्दबुद्धि जयद्रथका पौत्र तुम्हारी शरणमें आया है। अतः इस बालकपर तुम्हें कृपा करनी चाहिये ।। ३७ १/२ ।।
एष प्रसाद्य शिरसा प्रशमार्थमरिंदम ।। ३८ ।।
याचते त्वां महाबाहो शमं गच्छ धनंजय ।
‘शत्रुदमन महाबाहु धनंजय! यह तुम्हारे चरणोंमें सिर रखकर तुम्हें प्रसन्न करके तुमसे शान्तिके लिये याचना करता है। अब तुम शान्त हो जाओ ।। ३८ १/२ ।।
बालस्य हतबन्धोश्च पार्थ किंचिदजानतः ।। ३९ ।।
प्रसादं कुरु धर्मज्ञ मा मन्युवशमन्वगाः ।
‘यह अबोध बालक है, कुछ नहीं जानता है। इसके भाई-बन्धु नष्ट हो चुके हैं। अतः धर्मज्ञ अर्जुन! तुम इसके ऊपर कृपा करो। क्रोधके वशीभूत न होओ ।। ३९ १/२ ।।
तमनार्यं नृशंसं च विस्मृत्यास्य पितामहम् ।। ४० ।।
आगस्कारिणमत्यर्थं प्रसादं कर्तुमर्हसि ।
‘इस बालकका पितामह (जयद्रथ) अनार्य, नृशंस और तुम्हारा अपराधी था। उसको भूल जाओ और इस बालकपर कृपा करो’ ।। ४० १/२ ।।
एवं ब्रुवत्यां करुणं दुःशलायां धनंजयः ।। ४१ ।।
संस्मृत्य देवीं गान्धारीं धृतराष्ट्रं च पार्थिवम् ।
उवाच दुःखशोकार्तः क्षत्रधर्मं व्यगर्हयत् ।। ४२ ।।
जब दुःशला इस प्रकार करुणायुक्त वचन कहने लगी, तब अर्जुन राजा धृतराष्ट्र और गान्धारी देवीको याद करके दुःख और शोकसे पीड़ित हो क्षत्रिय-धर्मकी निन्दा करने लगे — ।। ४१-४२ ।।
यस्कृते बान्धवाः सर्वे मया नीता यमक्षयम् ।
इत्युक्त्वा बहु सान्त्वादिप्रसादमकरोज्जयः ।। ४३ ।।
परिष्वज्य च तां प्रीतो विससर्ज गृहान् प्रति ।। ४४ ।।
‘उस क्षात्र-धर्मको धिक्कार है, जिसके लिये मैंने अपने सारे बान्धवजनोंको यमलोक पहुँचा दिया।’ ऐसा कहकर अर्जुनने दुःशलाको बहुत सान्त्वना दी और उसके प्रति अपने कृपाप्रसादका परिचय दिया। फिर प्रसन्नतापूर्वक उससे गले मिलकर उसे घरकी ओर विदा किया ।। ४३-४४ ।।
दुःशला चापि तान् योधान् निवार्य महतो रणात् ।
सम्पूज्य पार्थं प्रययौ गृहानेव शुभानना ।। ४५ ।।
तदनन्तर सुमुखी दुःशलाने उस महान् समरसे अपने समस्त योद्धाओंको पीछे लौटाया और अर्जुनकी प्रशंसा करती हुई वह अपने घरको लौट गयी ।। ४५ ।।
एवं निर्जित्य तान् वीरान् सैन्धवान् स धनंजयः ।
अन्वधावत धावन्तं हयं कामविचारिणम् ।। ४६ ।।
इस प्रकार सैन्धव वीरोंको परास्त करके अर्जुन इच्छानुसार विचरने और दौड़नेवाले उस घोड़ेके पीछे-पीछे स्वयं भी दौड़ने लगे ।। ४६ ।।
ततो मृगमिवाकाशे यथा देवः पिनाकधृक् ।
ससार तं तथा वीरो विधिवद् यज्ञियं हयम् ॥ ४७ ॥
जैसे पिनाकधारी महादेवजी आकाशमें मृगके पीछे दौड़े थे, उसी प्रकार वीर अर्जुनने उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ४७ ॥
स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान् देशान् यथाक्रमम् ।
विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन् ॥ ४८ ॥
वह अश्व यथेष्टगतिसे क्रमशः सभी देशोंमें घूमता और अर्जुनके पराक्रमका विस्तार करता हुआ इच्छानुसार विचरने लगा ॥ ४८ ॥
क्रमेण स हयस्त्वेवं विचरन् पुरुषर्षभ ।
मणिपूरपतेर्देशमुपायात् सहपाण्डवः ॥ ४९ ॥
पुरुषप्रवर जनमेजय! इस प्रकार क्रमशः विचरण करता हुआ वह अश्व अर्जुनसहित मणिपुर-नरेशके राज्यमें जा पहुँचा ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवपराजये
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंकी पराजयविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥