महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2195, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिमाद्रिविन्ध्ययोर्मध्यमार्यावर्तं प्रचक्षते ।।
पूर्व समुद्रसे लेकर पश्चिम समुद्रतक और हिमालय तथा विन्ध्याचलके बीचका जो देश है, उसे आर्यावर्त कहते हैं ।।
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तद् देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त्तं प्रचक्षते ।।
सरस्वती और दृषद्वती—इन दोनों देवनदियोंके बीचका जो देवताओंद्धारा रचा हुआ देश है, उसे ब्रह्मावर्त कहते हैं ।।
यस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः ।
वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।।
जिस देशमें चारों वर्णों तथा उनके अवान्तर भेदोंका जो आचार पूर्वपरम्परासे चला आता है, वही उनके लिये सदाचार कहलाता है ।।
कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनयः ।
एते ब्रह्मर्षिदेशास्तु ब्रह्मावर्तादनन्तराः ।।
कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पाञ्चाल और शूरसेन—ये ब्रह्मर्षियोंके देश हैं और ब्रह्मावर्तके समीप हैं ।।
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं चरित्रं च गृह्णीयुः पृथिव्यां सर्वमानवाः ।।
इस देशमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंके पास जाकर भूमण्डलके सम्पूर्ण मनुष्योंको अपने-अपने आचरणकी शिक्षा लेनी चाहिये ।।
हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विशसनादपि ।
प्रत्यगेव प्रयागात् तु मध्यदेशः प्रकीर्तितः ।।
हिमालय और विन्ध्याचलके बीचमें कुरुक्षेत्रसे पूर्व और प्रयागसे पश्चिमका जो देश है, वह मध्यदेश कहलाता है ।।
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।
स ज्ञेयो याज्ञिको देशो म्लेच्छदेशस्ततः परम् ।।
जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग स्वभावतः विचरा करता है, वही यज्ञके लिये उपयोगी देश है; उससे भिन्न म्लेच्छोंका देश है ।।
एतान् विज्ञाय देशांस्तु संश्रयेरन् द्विजातयः ।
शूद्रस्तु यस्मिन् कस्मिन् वा निवसेद् वृत्तिकर्शितः ।।
इन देशोंका परिचय प्राप्त करके द्विजातियोंको इन्हींमें निवास करना चाहिये; किंतु शूद्र जीविका न मिलनेपर निर्वाहके लिये किसी भी देशमें निवास कर सकता है ।।
आचारः प्रथमो धर्मो ह्यहिंसा सत्यमेव च ।
दानं चैव यथाशक्ति नियमाश्च यमैः सह ।।