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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]

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[श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]

उमोवाच

पितृमेधः कथं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ।
सर्वेषां पितरः पूज्याः सर्वसम्पत्प्रदायिनः ॥
उमाने पूछा— देव! पितृमेध (श्राद्ध) कैसे किया जाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता पितर सभीके लिये पूजनीय होते हैं ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

पितृमेधं प्रवक्ष्यामि यथावत् तन्मनाः शृणु ।
देशकालौ विधानं च तत्क्रियायाः शुभाशुभम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं पितृमेधका यथावद्रूपसे वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। देश, काल, विधान तथा क्रियाके शुभाशुभ फलका भी वर्णन करूँगा ॥

लोकेषु पितरः पूज्या देवतानां च देवताः ।
शुचयो निर्मलाः पुण्या दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥
सभी लोकोंमें पितर पूजनीय होते हैं। वे देवताओंके भी देवता हैं। उनका स्वरूप शुद्ध, निर्मल एवं पवित्र है। वे दक्षिणदिशामें निवास करते हैं ॥

यथा वृष्टिं प्रतीक्षन्ते भूमिष्ठाः सर्वजन्तवः ।
पितरश्च तथा लोके पितृमेधं शुभेक्षणे ॥
शुभेक्षणे! जैसे भूमिपर रहनेवाले सभी प्राणी वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार पितृलोकमें रहनेवाले पितर श्राद्धकी प्रतीक्षा करते रहते हैं ॥

तस्य देशाः कुरुक्षेत्रं गया गङ्गा सरस्वती ।
प्रभासं पुष्करं चेति तेषु दत्तं महाफलम् ॥
श्राद्धके लिये पवित्र देश हैं—कुरुक्षेत्र, गया, गङ्गा, सरस्वती, प्रभास और पुष्कर—इन तीर्थस्थानोंमें दिया गया श्राद्धका दान महान् फलदायक होता है ॥

तीर्थानि सरितः पुण्या विविक्तानि वनानि च ।
नदीनां पुलिनानीति देशाः श्राद्धस्य पूजिताः ॥
तीर्थ, पवित्र नदियाँ, एकान्त वन तथा नदियोंके तट—ये श्राद्धके लिये प्रशंसित देश हैं ॥

माघप्रोष्ठपदौ मासौ श्राद्धकर्मणि पूजितौ ।
पक्षयोः कृष्णपक्षश्च पूर्वपक्षात् प्रशस्यते ॥

श्राद्ध-कर्ममें माघ और भाद्रपदमास प्रशंसित हैं। दोनों पक्षोंमें पूर्वपक्ष (शुक्ल) की अपेक्षा कृष्णपक्ष उत्तम बताया जाता है ॥

अमावास्यां त्रयोदश्यां नवम्यां प्रतिपत्सु च ।
तिथिष्वेतासु तुष्यन्ति दत्तेनेह पितामहाः ॥
अमावास्या, त्रयोदशी, नवमी और प्रतिपदा—इन तिथियोंमें यहाँ श्राद्धका दान करनेसे पितृगण संतुष्ट होते हैं ॥

पूर्वाह्ने शुक्लपक्षे च रात्रौ जन्मदिनेषु वा ।
युग्मेष्वहस्सु च श्राद्धं न च कुर्वीत पण्डितः ॥
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पूर्वाह्नमें, शुक्ल-पक्षमें, रात्रिमें अपने जन्मके दिनमें और युग्म दिनोंमें श्राद्ध न करे ॥

एष कालो मया प्रोक्तः पितृमेधस्य पूजितः ।
यस्मिंश्च ब्राह्मणं पात्रं पश्येत् कालः स च स्मृतः ॥
यह मैंने श्राद्धका प्रशस्त समय बताया है। जिस दिन सुपात्र ब्राह्मणका दर्शन हो, वह भी श्राद्धका उत्तम समय माना गया है ॥

अपाङ्क्तेया द्विजा वर्ज्या ग्राह्यास्ते पङ्क्तिपावनाः ।
भोजयेद् यदि पापिष्ठान् श्राद्धेषु नरकं व्रजेत् ॥
श्राद्धमें अपांक्तेय ब्राह्मणोंका त्याग और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंको ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई श्राद्धमें पापिष्ठोंको भोजन कराता है तो वह नरकमें पड़ता है ॥

वृत्तश्रुतकुलोपेतान् सकलत्रान् गुणान्वितान् ।
तदर्हान् श्रोत्रियान् विद्धि ब्राह्मणान्युजः शुभे ॥
शुभे! जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न, सपत्नीक तथा सद्गुणी हों, ऐसे श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको तुम श्राद्धके योग्य समझो। श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी संख्या विषम होनी चाहिये ॥

एतान् निमन्त्रयेद् विद्वान् पूर्वेद्युः प्रातरेव वा ।
ततः श्राद्धक्रियां पश्चादारभेत यथाविधि ॥
विद्वान् पुरुष इन ब्राह्मणोंको श्राद्धके पहले ही दिन अथवा श्राद्धके ही दिन प्रातःकाल निमन्त्रण दे। तत्पश्चात् विधिपूर्वक श्राद्धकर्म आरम्भ करे ॥

त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः ।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥
श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र हैं—दौहित्र, कुतपकाल (दिनके पन्द्रह भागमेंसे आठवाँ भाग) तथा तिल। इस कार्यमें तीन गुणोंकी प्रशंसा की जाती है। पवित्रता, क्रोधहीनता और अत्वरा (जल्दीबाजी न करना) ॥

कुतपः खड्गपात्रं च कुशा दर्भास्तिला मधु ।

कालशाकं गजच्छाया पवित्रं श्राद्धकर्मसु ॥
कुतप, खड्गपात्र, कुशा, दर्भ, तिल, मधु, कालशाक और गजच्छाया—ये वस्तुएँ श्राद्धकर्ममें पवित्र मानी गयी हैं ॥
तिलानवकिरेत् तत्र नानावर्णान् समन्ततः ।
अशुद्धमपवित्रं च तिलैः शुध्यति शोभने ॥
श्राद्धके स्थानमें चारों ओर अनेक वर्णवाले तिल बिखेरने चाहिये। शोभने! तिलोंसे अशुद्ध और अपवित्र स्थान शुद्ध हो जाता है ॥
नीलकाषायवस्त्रं च भिन्नवर्णं नवव्रणम् ।
हीनाङ्गमशुचिं वापि वर्जयेत् तत्र दूरतः ॥
श्राद्धमें नीला और गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले, विभिन्न वर्णवाले, नये घाववाले, किसी अंगसे हीन और अपवित्र मनुष्यको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥
उपकल्प्य तदाहारं ब्राह्मणानर्चयेत् ततः ॥
श्मश्रुकर्मशिरस्स्नातान् समारोप्यासनं क्रमात् ।
सुगन्धमाल्याभरणैः स्रग्भिरेतान् विभूषयेत् ॥
श्राद्धकी रसोई तैयार करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे। हजामत बनवाकर सिरसे नहाये हुए उन ब्राह्मणोंको क्रमशः आसनपर बिठाकर सुगन्ध, माला, आभूषणों तथा पुष्पहारोंसे विभूषित करे ॥
अलंकृत्योपविष्टांस्तान् पिण्डावापं निवेदयेत् ॥
ततः प्रस्तीर्य दर्भाणां प्रस्तरं दक्षिणामुखम् ।
तत्समीपेऽग्निमिद्ध्वा च स्वधां च जुहुयात् ततः ॥
अलंकृत होकर बैठे हुए उन ब्राह्मणोंको यह निवेदन करे कि अब मैं पिण्डदान करूँगा। तदनन्तर दक्षिणाभिमुख कुश बिछाकर उनके समीप अग्नि प्रज्वलित करके उसमें श्राद्धान्नकी आहुति दे (आहुतिके मन्त्र इस प्रकार हैं—अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृमते स्वाहा) ॥
समीपे त्वग्नीषोमाभ्यां पितृभ्यो जुहुयात् तदा ।
तथा दर्भेषु पिन्डांस्त्रीन् निर्वपेद् दक्षिणामुखः ।
अपसव्यमपाङ्गुष्ठं नामधेयपुरस्कृतम् ॥
इस प्रकार अग्नि और सोमके लिये आहुति देकर उनके समीप पितरोंके निमित्त होम करे तथा दक्षिणाभिमुख हो अपसव्य होकर अर्थात् जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर पितरोंके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर तीन पिण्ड दे। उन पिण्डोंका अंगुष्ठसे स्पर्श न हो ॥
एतेन विधिना दत्तं पितृणामक्षयं भवेत् ।
ततो विप्रान् यथाशक्ति पूजयेन्नियतः शुचिः ॥

सदक्षिणं ससम्भारं यथा तुष्यन्ति ते द्विजाः ।।
इस विधिसे दिया हुआ पिण्डदान पितरोंके लिये अक्षय होता है। तत्पश्चात् मनको वशमें रखकर पवित्र हो यथाशक्ति दक्षिणा और सामग्री देकर ब्राह्मणोंकी यथाशक्ति पूजा करे। जिससे वे संतुष्ट हो जायें ।।

यत्र तत् क्रियते तत्र न जल्पेन्न जपेन्मिथः ।
नियम्य वाचं देहं च श्राद्धकर्म समारभेत् ।।
जहाँ यह श्राद्ध या पूजन किया जाता है, वहाँ न तो कुछ बोले और न आपसमें ही कुछ दूसरी बात करे। वाणी और शरीरको संयममें रखकर श्राद्धकर्म आरम्भ करे ।।

ततो निर्वपने वृत्ते तान् पिण्डांस्तदनन्तरम् ।
ब्राह्मणोऽग्निरजो गौर्वा भक्षयेदप्सु वा क्षिपेत् ।।
पिण्डदानका कार्य पूर्ण हो जानेपर उन पिण्डोंको ब्राह्मण, अग्नि, बकरा अथवा गौ भक्षण कर ले या उन्हें जलमें डाल दिया जाय ।।

पत्नीं वा मध्यमं पिण्डं पुत्रकामा हि प्राशयेत् ।
आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम् ।।
यदि श्राद्धकर्ताकी पत्नीको पुत्रकी कामना हो, तो वह मध्यम पिण्ड अर्थात् पितामहको अर्पित किये हुए पिण्डको खा ले और प्रार्थना करे कि 'पितरो! आपलोग मेरे गर्भमें कमलोंकी मालासे अलंकृत एक सुन्दर कुमारकी स्थापना करें' ।।

तृप्तानुत्थाप्य तान् विप्रानन्नशेषं निवेदयेत् ।
तच्छेषं बहुभिः पश्चात् सभृत्यो भक्षयेन्नरः ।।
जब ब्राह्मणलोग भोजन करके तृप्त हो जायें, तब उन्हें उठाकर शेष अन्न दूसरोंको निवेदन करे। तत्पश्चात् बहुत-से लोगोंके साथ मनुष्य भृत्यवर्गसहित शेष अन्नका स्वयं भोजन करे ।।

एष प्रोक्तः समासेन पितृयज्ञः सनातनः ।
पितरस्तेन तुष्यन्ति कर्ता च फलमाप्नुयात् ।।
यह सनातन पितृयज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया गया। इससे पितर संतुष्ट होते हैं और श्राद्धकर्ताको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ।।

अहन्यहनि वा कुर्यान्मासे मासेऽथवा पुनः ।
संवत्सरं द्विः कुर्याच्च चतुर्वापि स्वशक्तितः ।।
मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन, प्रतिमास, सालमें दो बार अथवा चार बार भी श्राद्ध करे ।।

दीर्घायुश्च भवेत् स्वस्थः पितृमेधेन वा पुनः ।
सपुत्रो बहुभृत्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् ।।

श्राद्ध करनेसे मनुष्य दीर्घायु एवं स्वस्थ होता है। वह बहुतसे पुत्र, सेवक तथा धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ।।
श्राद्धदः स्वर्गमाप्नोति निर्मलं विविधात्मकम् ।
अप्सरोगणसंघुष्टं विरजस्कमनन्तरम् ।।
श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष विविध आकृतियोंवाले, निर्मल, रजोगुणरहित और अप्सराओंसे सेवित स्वर्गलोकमें निरन्तर निवास पाता है ।।
श्राद्धानि पुष्टिकामा वै ये प्रकुर्वन्ति पण्डिताः ।
तेषां पुष्टिं प्रजां चैव दास्यन्ति पितरः सदा ।।
जो पुष्टिकी इच्छा रखनेवाले पण्डित श्राद्ध करते हैं, उन्हें पितर सदा पुष्टि एवं संतान प्रदान करते हैं ।।
धन्य यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुविनाशनम् ।
कुलसंधारकं चेति श्राद्धमाहुर्मनीषिणः ।।
मनीषी पुरुष श्राद्धको धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, शत्रुनाशक एवं कुलधारक बताते हैं ।।
प्रमाणकल्पनां देवि दानस्य शृणु भामिनि ।।
यत्सारस्तु नरो लोके तद् दानं चोत्तमं स्मृतम् ।
सर्वदानविधिं प्राहुस्तदेव भुवि शोभने ।।
देवि! भामिनि! दानके फलका जो प्रमाण माना गया है, उसे सुनो। जगत्में मनुष्यके पास जो सार वस्तु है, उसका दान उसके लिये उत्तम माना गया है। शोभने! इस पृथ्वीपर उसीको सम्पूर्ण दानकी विधि कही गयी है ।।
प्रस्थं सारं दरिद्रस्य सारं कोटिधनस्य च ।
प्रस्थसारस्तु तत् प्रस्थं ददन्महदवाप्नुयात् ।।
कोटिसारस्तु तां कोटिं ददन्महदवाप्नुयात् ।
उभयं तन्महत् तच्च फलेनैव समं स्मृतम् ।।
दरिद्रका सार है सेरभर अन्न और जो करोड़पति है उसका सार है करोड़। जिसका सेरभर अनाज ही सार है, वह उसीका दान करके महान् फल प्राप्त कर लेता है और जिसका सार एक करोड़ मुद्रा है, वह उसीका दान कर दे तो महान् फलका भागी होता है। ये दोनों ही महत्त्वपूर्ण दान हैं और दोनोंका फल महान् माना गया है ।।
धर्मार्थकामभोगेषु शक्त्यभावस्तु मध्यमम् ।
स्वद्रव्यादतिहीनं तु तद् दानमधमं स्मृतम् ।।
धर्म, अर्थ और काम-भोगमें शक्तिका अभाव हो जाय और उस अवस्थामें कुछ दान किया जाय तो वह दान मध्यम कोटिका है और अपने धन एवं शक्तिसे अत्यन्त हीन कोटिका दान अधम माना गया है ।।

शृणु दत्तस्य वै देवि पञ्चधा फलकल्पनाम् ।
आनन्त्यं च महच्चैव समं हीनं हि पातकम् ॥
देवि! दानके फलकी पाँच प्रकारसे कल्पना की गयी है, उसको सुनो। अनन्त, महान्, सम, हीन और पाप—ये पाँच तरहके फल होते हैं।।
तेषां विशेषं वक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता ।
दुस्त्यजस्य च वै दानं पात्र आनन्त्यमुच्यते ॥
देवि! इन पाँचोंकी जो विशेषता है, उसे बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जिस धनका त्याग करना अत्यन्त कठिन हो, उसे सुपात्रको देना 'आनन्त्य' कहलाता है अर्थात् उस दानका फल अनन्त—अक्षय होता है।।
दानं षड्गुणयुक्तं तु महदित्यभिधीयते ।
यथाश्रद्धं तु वै दानं यथार्हं सममुच्यते ॥
पूर्वोक्त छः गुणोंसे युक्त जो दान है, उसीको 'महान्' कहा गया है। जैसी अपनी श्रद्धा हो उसीके अनुसार यथायोग्य दान देना 'सम' कहलाता है।।
गुणतस्तु तथा हीनं दानं हीनमिति स्मृतम् ।
दानं पातकमित्याहुः षड्गुणानां विपर्यये ॥
गुणहीन दानको 'हीन' कहा गया है। यदि पूर्वोक्त छः गुणोंके विपरीत दान किया जाय तो वह 'पातक' रूप कहा गया है।।
देवलोके महत् कालमानन्त्यस्य फलं विदुः ।
महत्तस्तु तथा कालं स्वर्गलोके तु पूज्यते ॥
आनन्त्य या 'अनन्त' नामक दानका फल देव-लोकमें दीर्घ कालतक भोगा जाता है। महद् दानका फल यह है कि मनुष्य स्वर्गलोकमें अधिक कालतक पूजित होता है।।
समस्य तु तदा दानं मानुष्यं भोगमावहेत् ।
दानं निष्फलमित्याहुर्विहीनं क्रियया शुभे ॥
सम-दान मनुष्यलोकका भोग प्रस्तुत करता है। शुभे! क्रियासे हीन दान निष्फल बताया गया है।।
अथवा म्लेच्छदेशेषु तत्र तत्फलतां व्रजेत् ।
नरकं प्रेत्य तिर्यक्षु गच्छेदशुभदानतः ॥
अथवा म्लेच्छ देशोंमें जन्म लेकर मनुष्य वहाँ उसका फल पाता है। अशुभदानसे पाप लगता है और उसका फल भोगनेके लिये वह दाता मृत्युके पश्चात् नरक या तिर्यक् योनियोंमें जाता है।।

उमोवाच

अशुभस्यापि दानस्य शुभं स्याच्च फलं कथम् ।

उमाने पूछा- भगवन्! अशुभदानका भी फल शुभ कैसे होता है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

मनसा तत्त्वतः शुद्धमानृशंस्यपुरस्सरम् ।

प्रीत्या तु सर्वदानानि दत्त्वा फलमवाप्नुयात् ।।

श्रीमहेश्वरने कहा- प्रिये! जो दान शुद्ध हृदयसे अर्थात् निष्काम भावसे दिये जानेके

कारण तत्त्वतः शुद्ध हो, जिसमें क्रूरताका अभाव हो, जो दयापूर्वक दिया गया हो, वह शुभ

फल देनेवाला है। सभी प्रकारके दानोंको प्रसन्नताके साथ देकर दाता शुभ फलका भागी

होता है ।।

रहस्यं सर्वदानानामेतद् विद्धि शुभेक्षणे ।

अन्यानि धर्मकार्याणि शृणु सद्भिः कृतानि च ।।

शुभेक्षणे! इसीको तुम सम्पूर्ण दानोंका रहस्य समझो। अब सत्पुरुषोंद्वारा किये गये

अन्य धर्म-कार्योंका वर्णन सुनो ।।

आरामदेवगोष्ठानि संक्रमाः कूप एव च ।

गोवाटश्च तटाकश्च सभा शाला च सर्वशः ।।

पाषण्डावसथश्चैव पानीयं गोतृणानि च ।

व्याधितानां च भैषज्यमनाथानां च पोषणम् ।।

अनाथशवसंस्कारस्तीर्थमार्गविशोधनम् ।

व्यसनाभ्यवपत्तिश्च सर्वेषां च स्वशक्तितः ।।

एतत् सर्वं समासेन धर्मकार्यमिति स्मृतम् ।

तत् कर्तव्यं मनुष्येण स्वशक्त्या श्रद्धया शुभे ।।

बगीचा लगाना, देवस्थान बनाना, पुल और कुआँका निर्माण करना, गोशाला, पोखरा,

धर्मशाला, सबके लिये घर, पाखण्डीतकको भी आश्रय देना, पानी पिलाना, गौओंको घास

देना, रोगियोंके लिये दवा और पथ्यकी व्यवस्था करना, अनाथ बालकोंका पालन-पोषण

करना, अनाथ मुर्दोंका दाह-संस्कार कराना, तीर्थ-मार्गका शोधन करना, अपनी शक्तिके

अनुसार सभीके संकटोंको दूर करनेका प्रयत्न करना-यह सब संक्षेपसे धर्मकार्य बताया

गया। शुभे! मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक यह धर्मकार्य करना चाहिये ।।

प्रेत्यभावे लभेत् पुण्यं नास्ति तत्र विचारणा ।

रूपं सौभाग्यमारोग्यं बलं सौख्यं लभेन्नरः ।।

स्वर्गे वा मानुषे वापि तैस्तैराप्यायते हि सः ।।

यह सब करनेसे मृत्युके पश्चात् मनुष्यको पुण्य प्राप्त होता है, इसमें विचार करनेकी

आवश्यकता नहीं है। वह धर्मात्मा पुरुष रूप, सौभाग्य, आरोग्य, बल और सुख पाता है।

वह स्वर्गलोकमें रहे या मनुष्यलोकमें, उन-उन पुण्यफलोंसे तृप्त होता रहता है ।।

उमोवाच
भगवल्लोँकपालेश धर्मस्तु कतिभेदकः ।
दृश्यते परितः सद्भिस्तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने कहा— भगवन्! लोकपालेश्वर! धर्मके कितने भेद हैं? साधु पुरुष सब ओर उसके कितने भेद देखते हैं? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच
स्मृतिधर्मश्च बहुधा सद्भिदाचार इष्यते ॥
देशधर्माश्च दृश्यन्ते कुलधर्मास्तथैव च ।
जातिधर्माश्च वै धर्मा गणधर्माश्च शोभने ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— स्मृतिकथित धर्म अनेक प्रकारका है। श्रेष्ठ पुरुषोंको आचार-धर्म अभीष्ट होता है। शोभने! देश-धर्म, कुल-धर्म, जाति-धर्म तथा समुदाय-धर्म भी दृष्टिगोचर होते हैं ॥
शरीरकालवैषम्यादापद्धर्मश्च दृश्यते ।
एतद् धर्मस्य नानात्वं क्रियते लोकवासिभिः ॥
शरीर और कालकी विषमतासे आपद्धर्म भी देखा जाता है। इस जगत्में रहनेवाले मनुष्य ही धर्मके ये नाना भेद करते हैं ॥
तत्कारणसमायोगे लभेत् कुर्वन् फलं नरः ॥
कारणका संयोग होनेपर धर्माचरण करनेवाला मनुष्य उस धर्मके फलको प्राप्त करता है ॥
श्रौतस्मार्तस्तु धर्माणां प्रकृतो धर्म उच्यते ।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
धर्मोंमें जो श्रौत (वेद-कथित) और स्मार्त (स्मृति-कथित) धर्म है, उसे प्रकृत धर्म कहते हैं। देवि! इस प्रकार तुम्हें धर्मकी बात बतायी गयी है। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)