महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1342, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकालशाकं गजच्छाया पवित्रं श्राद्धकर्मसु ॥
कुतप, खड्गपात्र, कुशा, दर्भ, तिल, मधु, कालशाक और गजच्छाया—ये वस्तुएँ श्राद्धकर्ममें पवित्र मानी गयी हैं ॥
तिलानवकिरेत् तत्र नानावर्णान् समन्ततः ।
अशुद्धमपवित्रं च तिलैः शुध्यति शोभने ॥
श्राद्धके स्थानमें चारों ओर अनेक वर्णवाले तिल बिखेरने चाहिये। शोभने! तिलोंसे अशुद्ध और अपवित्र स्थान शुद्ध हो जाता है ॥
नीलकाषायवस्त्रं च भिन्नवर्णं नवव्रणम् ।
हीनाङ्गमशुचिं वापि वर्जयेत् तत्र दूरतः ॥
श्राद्धमें नीला और गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले, विभिन्न वर्णवाले, नये घाववाले, किसी अंगसे हीन और अपवित्र मनुष्यको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥
उपकल्प्य तदाहारं ब्राह्मणानर्चयेत् ततः ॥
श्मश्रुकर्मशिरस्स्नातान् समारोप्यासनं क्रमात् ।
सुगन्धमाल्याभरणैः स्रग्भिरेतान् विभूषयेत् ॥
श्राद्धकी रसोई तैयार करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे। हजामत बनवाकर सिरसे नहाये हुए उन ब्राह्मणोंको क्रमशः आसनपर बिठाकर सुगन्ध, माला, आभूषणों तथा पुष्पहारोंसे विभूषित करे ॥
अलंकृत्योपविष्टांस्तान् पिण्डावापं निवेदयेत् ॥
ततः प्रस्तीर्य दर्भाणां प्रस्तरं दक्षिणामुखम् ।
तत्समीपेऽग्निमिद्ध्वा च स्वधां च जुहुयात् ततः ॥
अलंकृत होकर बैठे हुए उन ब्राह्मणोंको यह निवेदन करे कि अब मैं पिण्डदान करूँगा। तदनन्तर दक्षिणाभिमुख कुश बिछाकर उनके समीप अग्नि प्रज्वलित करके उसमें श्राद्धान्नकी आहुति दे (आहुतिके मन्त्र इस प्रकार हैं—अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृमते स्वाहा) ॥
समीपे त्वग्नीषोमाभ्यां पितृभ्यो जुहुयात् तदा ।
तथा दर्भेषु पिन्डांस्त्रीन् निर्वपेद् दक्षिणामुखः ।
अपसव्यमपाङ्गुष्ठं नामधेयपुरस्कृतम् ॥
इस प्रकार अग्नि और सोमके लिये आहुति देकर उनके समीप पितरोंके निमित्त होम करे तथा दक्षिणाभिमुख हो अपसव्य होकर अर्थात् जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर पितरोंके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर तीन पिण्ड दे। उन पिण्डोंका अंगुष्ठसे स्पर्श न हो ॥
एतेन विधिना दत्तं पितृणामक्षयं भवेत् ।
ततो विप्रान् यथाशक्ति पूजयेन्नियतः शुचिः ॥