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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता

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नवतितमोऽध्यायः

उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता

भीष्म उवाच

यानङ्गिराः क्षत्रधर्मानुत्तथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
मान्धात्रे यौवनाश्वाय प्रीतिमानभ्यभाषत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अंगिरापुत्र उतथ्यने युवनाश्वके पुत्र मान्धातासे प्रसन्नतापूर्वक जिन क्षत्रिय-धर्मोंका वर्णन किया था, उन्हें सुनो ॥ १ ॥

स यथानुशशासैनमुत्तथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि निखिलेन युधिष्ठिर ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्मज्ञानियोंमें शिरोमणि उतथ्यने जिस प्रकार उन्हें उपदेश दिया था, वह सब प्रसंग पूरा-पूरा तुम्हें बता रहा हूँ, श्रवण करो ॥ २ ॥

उतथ्य उवाच

धर्माय राजा भवति न कामकरणाय तु ।
मान्धातरिति जानीहि राजा लोकस्य रक्षिता ॥ ३ ॥
**उतथ्य बोले—**मान्धाता! राजा धर्मका पालन और प्रचार करनेके लिये ही होता है, विषय-सुखोंका उपभोग करनेके लिये नहीं। तुम्हें यह जानना चाहिये कि राजा सम्पूर्ण जगत्का रक्षक है ॥ ३ ॥

राजा चरति चेद् धर्मं देवत्वायैव कल्पते ।
स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति ॥ ४ ॥
यदि राजा धर्माचरण करता है तो देवता बन जाता है, और यदि वह अधर्माचरण करता है तो नरकमें ही गिरता है ॥ ४ ॥

धर्मे तिष्ठन्ति भूतानि धर्मो राजनि तिष्ठति ।
तं राजा साधु यः शास्ति स राजा पृथिवीपतिः ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण प्राणी धर्मके ही आधारपर स्थित हैं और धर्म राजाके ऊपर प्रतिष्ठित है। जो राजा अच्छी तरह धर्मका पालन और उसके अनुकूल शासन करता है वही दीर्घकालतक इस पृथ्वीका स्वामी बना रहता है ॥

राजा परमधर्मात्मा लक्ष्मीवान् धर्म उच्यते ।
देवाश्च गर्हा गच्छन्ति धर्मो नास्तीति चोच्यते ॥ ६ ॥

परम धर्मात्मा और श्रीसम्पन्न राजा धर्मका साक्षात् स्वरूप कहलाता है। यदि वह धर्मका पालन नहीं करता तो लोग देवताओंकी भी निन्दा करते हैं और वह धर्मात्मा नहीं, पापात्मा कहलाता है ॥ ६ ॥

स्वधर्मे वर्तमानानामर्थसिद्धिः प्रदृश्यते ।
तदेव मङ्गलं लोकः सर्वः समनुवर्तते ॥ ७ ॥
जो अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन्हींसे अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती देखी जाती है। सारा संसार उसी मंगलमय धर्मका अनुसरण करता है ॥ ७ ॥

उच्छिद्यते धर्मवृत्तमधर्मो वर्तते महान् ।
भयमाहुर्दिवारात्रं यदा पापो न वार्यते ॥ ८ ॥
जब पापको रोका नहीं जाता, तब जगत्में धार्मिक बर्तावका उच्छेद हो जाता है और सब ओर महान् अधर्म फैल जाता है, जिससे प्रजाको दिन-रात भय बना रहता है ॥ ८ ॥

ममेदमिति नैवैतत् साधूनां तात धर्मतः ।
न वै व्यवस्था भवति यदा पापो न वार्यते ॥ ९ ॥
तात! यदि पापकी प्रवृत्तिका निवारण न किया जाय तो यह मेरी वस्तु है, ऐसा कहना श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये असम्भव हो जाता है और उस समय कोई भी धार्मिक व्यवस्था टिकने नहीं पाती है ॥ ९ ॥

नैव भार्या न पशवो न क्षेत्रं न निवेशनम् ।
संदृश्येत मनुष्याणां यदा पापबलं भवेत् ॥ १० ॥
जब जगत्में पापका बल बढ़ जाता है, तब मनुष्योंके लिये अपनी स्त्री, अपने पशु और अपने खेत या घरका भी कुछ ठिकाना दिखायी नहीं देता ॥ १० ॥

देवाः पूजां न जानन्ति न स्वधां पितरस्तदा ।
न पूज्यन्ते ह्यतिथयो यदा पापो न वार्यते ॥ ११ ॥
जब पापको रोका नहीं जाता, तब देवता पूजाको नहीं जानते हैं, पितरोंको स्वधा (श्राद्ध) का अनुभव नहीं होता है तथा अतिथियोंकी कहीं पूजा नहीं होती है ॥ ११ ॥

न वेदानधिगच्छन्ति व्रतवन्तो द्विजातयः ।
न यज्ञांस्तन्वते विप्रा यदा पापो न वार्यते ॥ १२ ॥
जब पापका निवारण नहीं किया जाता है, तब ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले द्विज वेदोंका अध्ययन छोड़ देते हैं और ब्राह्मण यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं कर पाते हैं ॥ १२ ॥

वृद्धानामिव सत्त्वानां मनो भवति विह्वलम् ।
मनुष्याणां महाराज यदा पापो न वार्यते ॥ १३ ॥
महाराज! जब पापका निवारण नहीं किया जाता है, तब बूढ़े जन्तुओंकी भाँति मनुष्योंका मन घबराहटमें पड़ा रहता है ॥ १३ ॥

उभौ लोकावभिप्रेक्ष्य राजानमृषयः स्वयम् ।

असृजन् सुमहद् भूतमयं धर्मो भविष्यति ॥ १४ ॥
लोक और परलोक दोनोंको दृष्टिमें रखकर महर्षियोंने स्वयं ही राजा नामक एक महान् शक्तिशाली मनुष्यकी सृष्टि की। उन्होंने सोचा था कि 'यह साक्षात् धर्मस्वरूप होगा' ॥ १४ ॥

यस्मिन् धर्मो विराजेत तं राजानं प्रचक्षते ।
यस्मिन् विलीयते धर्मस्तं देवा वृषलं विदुः ॥ १५ ॥
अतः जिसमें धर्म विराज रहा हो, उसीको राजा कहते हैं और जिसमें धर्म (वृष) का लय हो गया हो, उसे देवतालोग 'वृषल' मानते हैं ॥ १५ ॥

वृषो हि भगवान् धर्मो यस्तस्य कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं विवर्धयेत् ॥ १६ ॥
वृष नाम है भगवान् धर्मका। जो धर्मके विषयमें 'अलम्' (बस) कह देता है, उसे देवता 'वृषल' समझते हैं; अतः धर्मकी सदा ही वृद्धि करनी चाहिये ॥ १६ ॥

धर्मे वर्धति वर्धन्ति सर्वभूतानि सर्वदा ।
तस्मिन् ह्रसति ह्रीयन्ते तस्माद् धर्मं न लोपयेत् ॥ १७ ॥
धर्मकी वृद्धि होनेपर सदा समस्त प्राणियोंका अभ्युदय होता है और उसका ह्रास होनेपर सबका ह्रास हो जाता है; अतः धर्मका कभी लोप नहीं होने देना चाहिये ॥ १७ ॥

धनात् स्रवति धर्मो हि धारणाद् वेति निश्चयः ।
अकार्याणां मनुष्येन्द्र स सीमान्तकरः स्मृतः ॥ १८ ॥
नरेन्द्र! धनसे धर्मकी उत्पत्ति होती है। सबको धारण करनेके कारण वह निश्चितरूपसे धर्म कहा गया है। वह धर्म अकर्तव्य (पाप) की सीमाका अन्त करनेवाला माना गया है ॥ १८ ॥

प्रभवार्थं हि भूतानां धर्मः सृष्टः स्वयम्भुवा ।
तस्मात् प्रवर्तयेद् धर्मं प्रजानुग्रहकारणात् ॥ १९ ॥
ब्रह्माजीने प्राणियोंके कल्याणार्थ ही धर्मकी सृष्टि की है, इसलिये राजाको चाहिये कि अपने देशमें प्रजा-जनोंपर अनुग्रह करनेके लिये धर्मका प्रचार करे ॥ १९ ॥

तस्माद्धि राजशार्दूल धर्मः श्रेष्ठतरः स्मृतः ।
स राजा यः प्रजाः शास्ति साधुकृत् पुरुषर्षभ ॥ २० ॥
राजसिंह! इसी कारणसे धर्मको सबसे श्रेष्ठ माना गया है। पुरुषप्रवर! जो सद्धर्मके पालनपूर्वक प्रजाका शासन करता है, वही राजा है ॥ २० ॥

कामक्रोधावनादृत्य धर्ममेवानुपालय ।
धर्मः श्रेयस्करतमो राज्ञां भरतसत्तम ॥ २१ ॥
भरतभूषण! तुम भी काम और क्रोधकी अवहेलना करके निरन्तर धर्मका ही पालन करो। धर्म ही राजाओंके लिये सबसे बढ़कर कल्याण करनेवाला है ॥ २१ ॥

धर्मस्य ब्राह्मणो योनिस्तस्मात् तान् पूजयेत् सदा ।
ब्राह्मणानां च मान्धातः कुर्यात् कामानमत्सरी ॥ २२ ॥
मान्धाता! धर्मका मूल है ब्राह्मण; इसलिये ब्राह्मणोंका सदा सम्मान करना चाहिये, ब्राह्मणोंकी प्रत्येक कामनाको ईर्ष्यारहित होकर पूर्ण करना उचित है ॥ २२ ॥
तेषां ह्यकामकरणाद् राज्ञः संजायते भयम् ।
मित्राणि न च वर्धन्ते तथामित्रीभवन्त्यपि ॥ २३ ॥
उनकी इच्छा पूर्ण न करनेसे राजाओंके ऊपर भय आता है। राजाके मित्रोंकी वृद्धि नहीं होती, उलटे शत्रु बनते जाते हैं ॥ २३ ॥
ब्राह्मणानां सदासूयाद् बाल्याद् वैरोचनो बलिः ।
अथास्माच्छ्रीरपाक्रामद् याऽस्मिन्नासीत् प्रतापिनी ॥ २४ ॥
विरोचनकुमार बलि बाल्यकालसे ही सदा ब्राह्मणोंपर दोषारोपण करते थे; इसलिये उनकी राजलक्ष्मी, जो शत्रुओंको संताप देनेवाली थी, उनके पाससे हट गयी ॥ २४ ॥
ततस्तस्मादपाक्रम्य सागच्छत् पाकशासनम् ।
अथ सोऽन्वतपत् पश्चाच्छ्रियं दृष्ट्वा पुरन्दरे ॥ २५ ॥
बलिसे हटकर वह राजलक्ष्मी देवराज इन्द्रके पास चली गयी। फिर इन्द्रके पास उस लक्ष्मीको देखकर राजा बलिको बड़ा पश्चात्ताप होने लगा ॥ २५ ॥
एतत् फलमसूयाया अभिमानस्य वा विभो ।
तस्माद् बुध्यस्व मान्धातर्मा त्वां जह्यात् प्रतापिनी ॥ २६ ॥
प्रभो! यह अभिमान और असूयाका फल है, अतः मान्धाता! तुम सचेत हो जाओ, कहीं तुम्हारी भी शत्रुतापिनी लक्ष्मी तुमको छोड़ न दे ॥ २६ ॥
दर्पो नाम श्रियः पुत्रो जज्ञेऽधर्मादिति श्रुतिः ।
तेन देवासुरा राजन् नीताः सुबहवो व्ययम् ॥ २७ ॥
राजर्षयश्च बहवस्तथा बुध्यस्व पार्थिव ।
राजा भवति तं जित्वा दासस्तेन पराजितः ॥ २८ ॥
राजन्! सम्पत्तिका पुत्र है दर्प, जो अधर्मके अंशसे उत्पन्न हुआ है, यह श्रुतिका कथन है। उस दर्पने बहुतसे देवताओं, असुरों और राजर्षियोंका विनाश कर डाला है। अतः भूपाल! अब भी चेतो। जो दर्पको जीत लेता है, वह राजा होता है और जो उससे पराजित हो जाता है, वह दास बन जाता है ॥ २७-२८ ॥
स यथा दर्पसहितमधर्मं नानुसेवते ।
तथा वर्तस्व मान्धातश्चिरं चेत् स्थातुमिच्छसि ॥ २९ ॥
मान्धाता! यदि तुम चिरकालतक राजसिंहासनपर विराजमान रहना चाहते हो तो ऐसा बर्ताव करो, जिससे तुम्हारे द्वारा दर्प और अधर्मका सेवन न हो ॥ २९ ॥
मत्तात्प्रमत्तात् पौगण्डादुन्मत्ताच्च विशेषतः ।

तदभ्यासादुपावर्त संहितानां च सेवनात् ॥ ३० ॥
मतवाले, प्रमादी, बालक तथा विशेषतः पागलोंसे बचो। उनके निकट-सम्पर्कसे भी दूर रहो और यदि वे एक साथ रहकर सेवा करना चाहें तो उनकी उस सेवासे भी सर्वथा बचे रहो ॥ ३० ॥
निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः ।
पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् ॥ ३१ ॥
एतेभ्यो नित्ययत्तः स्यान्नक्तंचर्यां च वर्जयेत् ।
अत्यागं चाभिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जयेत् ॥ ३२ ॥
इसी तरह जिसको एक बार कैद किया हो, उस मन्त्रीसे, विशेषतः परायी स्त्रियोंसे, ऊँचे-नीचे और दुर्गम पर्वतसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पसे राजाको बचकर रहना चाहिये। इनकी ओरसे सदा सावधान रहे और रातमें घूमना-फिरना छोड़ दे। कृपणता, अभिमान, दम्भ और क्रोधका भी सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ३१-३२ ॥
अविज्ञातासु च स्त्रीषु क्लीबासु स्वैरिणीषु च ।
परभार्यासु कन्यासु नाचरेन्मैथुनं नृपः ॥ ३३ ॥
अपरिचित स्त्रियों, बाँझ स्त्रियों, वेश्याओं, परायी स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंके साथ राजा मैथुन न करे ॥
कुलेषु पापरक्षांसि जायन्ते वर्णसंकरात् ।
अपुमांसोऽङ्गहीनाश्च स्थूलजिह्वा विचेतसः ॥ ३४ ॥
एते चान्ये च जायन्ते यदा राजा प्रमाद्यति ।
तस्माद् राज्ञा विशेषेण वर्तितव्यं प्रजाहिते ॥ ३५ ॥
जब राजा धर्मकी ओरसे प्रमाद करता है, तब वर्णसंकरताके कारण उत्तम कुलोंमें पापी और राक्षस जन्म लेते हैं। नपुंसक, काने, लँगड़े, लूले, गूँगे तथा बुद्धिहीन बालकोंकी उत्पत्ति होती है। ये तथा और भी बहुत-सी कुत्सित संतानें जन्म लेती हैं। इसलिये राजाको विशेषरूपसे धर्मपरायण एवं सावधान होकर प्रजाके हितसाधनमें तत्पर रहना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥
क्षत्रियस्य प्रमत्तस्य दोषः संजायते महान् ।
अधर्माः सम्प्रवर्धन्ते प्रजासंकरकारकाः ॥ ३६ ॥
क्षत्रियके प्रमादसे बड़े-बड़े दोष प्रकट होते हैं। वर्णसंकरोंको जन्म देनेवाले पापकर्मोंकी वृद्धि होती है ॥
अशीते विद्यते शीतं शीते शीतं न विद्यते ।
अवृष्टिरतिवृष्टिश्च व्याधिश्चाप्याविशेत् प्रजाः ॥ ३७ ॥
गर्मीके मौसममें सर्दी और सर्दीके मौसममें गर्मी पड़ने लगती है। कभी सूखा पड़ जाता है, कभी अधिक वर्षा होती है तथा प्रजामें नाना प्रकारके रोग फैल जाते हैं ॥ ३७ ॥

नक्षत्राण्युपतिष्ठन्ति ग्रहा घोरास्तथागते ।
उत्पाताश्चात्र दृश्यन्ते बहवो राजनाशनाः ॥ ३८ ॥
आकाशमें भयानक ग्रह और धूमकेतु आदि तारे उगते हैं तथा राष्ट्रके विनाशकी सूचना देनेवाले बहुतसे उत्पात दिखायी देने लगते हैं ॥ ३८ ॥
अरक्षितात्मा यो राजा प्रजाश्चापि न रक्षति ।
प्रजाश्च तस्य क्षीयन्ते ततः सोऽनुविनश्यति ॥ ३९ ॥
जो राजा अपनी रक्षा नहीं करता, वह प्रजाकी भी रक्षा नहीं कर सकता। पहले उसकी प्रजाएँ क्षीण होती हैं; फिर वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ॥ ३९ ॥
द्वावाददाते ह्येकस्य द्वयोः सुबहवोऽपरे ।
कुमार्यः सम्प्रलुप्यन्ते तदाहुर्नृपदूषणम् ॥ ४० ॥
जब दो मनुष्य मिलकर एककी वस्तु छीन लेते हैं, बहुत-से मिलकर दोको लूटते हैं तथा कुमारी कन्याओंपर बलात्कार होने लगता है, उस समय इन सारे अपराधोंका कारण राजाको ही बताया जाता है ॥ ४० ॥
ममेदमिति नैकस्य मनुष्येष्ववतिष्ठति ।
त्यक्त्वा धर्मं यदा राजा प्रमादमनुतिष्ठति ॥ ४१ ॥
जब राजा धर्म छोड़कर प्रमादमें पड़ जाता है, तब मनुष्योंमेंसे एक भी अपने धनको ‘यह मेरा है’ ऐसा समझकर स्थिर नहीं रह सकता ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उतथ्यगीतासु
नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उतथ्यगीताविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥