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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 613, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 613

तदभ्यासादुपावर्त संहितानां च सेवनात् ॥ ३० ॥
मतवाले, प्रमादी, बालक तथा विशेषतः पागलोंसे बचो। उनके निकट-सम्पर्कसे भी दूर रहो और यदि वे एक साथ रहकर सेवा करना चाहें तो उनकी उस सेवासे भी सर्वथा बचे रहो ॥ ३० ॥
निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः ।
पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् ॥ ३१ ॥
एतेभ्यो नित्ययत्तः स्यान्नक्तंचर्यां च वर्जयेत् ।
अत्यागं चाभिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जयेत् ॥ ३२ ॥
इसी तरह जिसको एक बार कैद किया हो, उस मन्त्रीसे, विशेषतः परायी स्त्रियोंसे, ऊँचे-नीचे और दुर्गम पर्वतसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पसे राजाको बचकर रहना चाहिये। इनकी ओरसे सदा सावधान रहे और रातमें घूमना-फिरना छोड़ दे। कृपणता, अभिमान, दम्भ और क्रोधका भी सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ३१-३२ ॥
अविज्ञातासु च स्त्रीषु क्लीबासु स्वैरिणीषु च ।
परभार्यासु कन्यासु नाचरेन्मैथुनं नृपः ॥ ३३ ॥
अपरिचित स्त्रियों, बाँझ स्त्रियों, वेश्याओं, परायी स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंके साथ राजा मैथुन न करे ॥
कुलेषु पापरक्षांसि जायन्ते वर्णसंकरात् ।
अपुमांसोऽङ्गहीनाश्च स्थूलजिह्वा विचेतसः ॥ ३४ ॥
एते चान्ये च जायन्ते यदा राजा प्रमाद्यति ।
तस्माद् राज्ञा विशेषेण वर्तितव्यं प्रजाहिते ॥ ३५ ॥
जब राजा धर्मकी ओरसे प्रमाद करता है, तब वर्णसंकरताके कारण उत्तम कुलोंमें पापी और राक्षस जन्म लेते हैं। नपुंसक, काने, लँगड़े, लूले, गूँगे तथा बुद्धिहीन बालकोंकी उत्पत्ति होती है। ये तथा और भी बहुत-सी कुत्सित संतानें जन्म लेती हैं। इसलिये राजाको विशेषरूपसे धर्मपरायण एवं सावधान होकर प्रजाके हितसाधनमें तत्पर रहना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥
क्षत्रियस्य प्रमत्तस्य दोषः संजायते महान् ।
अधर्माः सम्प्रवर्धन्ते प्रजासंकरकारकाः ॥ ३६ ॥
क्षत्रियके प्रमादसे बड़े-बड़े दोष प्रकट होते हैं। वर्णसंकरोंको जन्म देनेवाले पापकर्मोंकी वृद्धि होती है ॥
अशीते विद्यते शीतं शीते शीतं न विद्यते ।
अवृष्टिरतिवृष्टिश्च व्याधिश्चाप्याविशेत् प्रजाः ॥ ३७ ॥
गर्मीके मौसममें सर्दी और सर्दीके मौसममें गर्मी पड़ने लगती है। कभी सूखा पड़ जाता है, कभी अधिक वर्षा होती है तथा प्रजामें नाना प्रकारके रोग फैल जाते हैं ॥ ३७ ॥