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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

महर्षि लोमशका आगमन और युधिष्ठिरसे अर्जुनके पाशुपत आदि दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर्णन तथा इन्द्रका संदेश सुनाना

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एकनवतितमोऽध्यायः

महर्षि लोमशका आगमन और युधिष्ठिरसे अर्जुनके पाशुपत आदि दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर्णन तथा इन्द्रका संदेश सुनाना

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्भाषमाणे तु धौम्ये कौरवनन्दन ।
लोमशः स महातेजा ऋषिस्तत्राजगाम ह ॥ १ ॥
तं पाण्डवाग्रजो राजा सगणो ब्राह्मणाश्च ते ।
उपातिष्ठन्महाभागं दिवि शक्रमिवामराः ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कौरवनन्दन! जब धौम्य ऋषि इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय महातेजस्वी महर्षि लोमश वहाँ आये। जैसे स्वर्गमें इन्द्रके आनेपर समस्त देवता उठकर खड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार ज्येष्ठ पाण्डव राजा युधिष्ठिर, उनके समुदायके अन्य लोग तथा वे ब्राह्मण भी उन महाभाग लोमशको आया देख उनके स्वागतके लिये उठकर खड़े हो गये ॥ १-२ ॥

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समभ्यर्च्य यथान्यायं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
पप्रच्छागमने हेतुमटने च प्रयोजनम् ॥ ३ ॥
धर्मनन्दन युधिष्ठिरने यथायोग्य उनका पूजन करके उन्हें आसनपर बिठाया और वहाँ आने तथा वनमें घूमनेका प्रयोजन पूछा ॥ ३ ॥
स पृष्टः पाण्डुपुत्रेण प्रीयमाणो महामनाः ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा हर्षयन्निव पाण्डवान् ॥ ४ ॥
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर महामना महर्षि लोमश बड़े प्रसन्न हुए और अपनी मधुर वाणीद्वारा पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाते हुए-से बोले— ॥ ४ ॥
संचरन्नस्मि कौन्तेय सर्वाँल्लोकान् यदृच्छया ।
गतः शक्रस्य भवनं तत्रापश्यं सुरेश्वरम् ॥ ५ ॥
‘कुन्तीनन्दन! मैं यों ही इच्छानुसार सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करता हूँ। एक दिन मैं इन्द्रके भवनमें गया और वहाँ देवराज इन्द्रसे मिला ॥ ५ ॥
तव च भ्रातरं वीरमपश्यं सव्यसाचिनम् ।
शक्रस्यार्धासनगतं तत्र मे विस्मयो महान् ॥ ६ ॥
‘वहाँ मैंने तुम्हारे वीर भ्राता सव्यसाची अर्जुनको भी देखा, जो इन्द्रके आधे सिंहासनपर बैठे हुए थे। वहाँ उन्हें इस दशामें देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ६ ॥
आसीत् पुरुषशार्दूल दृष्ट्वा पार्थं तथागतम् ।
आह मां तत्र देवेशो गच्छ पाण्डुसुतान् प्रति ॥ ७ ॥
‘पुरुषसिंह युधिष्ठिर! तुम्हारे भाई अर्जुनको इन्द्रके सिंहासनपर बैठा देख जब मैं आश्चर्यचकित हो रहा था, उसी समय देवराज इन्द्रने मुझसे कहा—‘मुने! तुम पाण्डवोंके पास जाओ’ ॥ ७ ॥
सोऽहमभ्यागतः क्षिप्रं दिदृक्षुस्त्वां सहानुजम् ।
वचनात् पुरुहूतस्य पार्थस्य च महात्मनः ॥ ८ ॥
‘उन इन्द्रके आदेशसे मैं भाइयोंसहित तुम्हें देखनेके लिये शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ। इसके लिये इन्द्रने तो मुझसे कहा ही था, महात्मा अर्जुनने भी अनुरोध किया था ॥ ८ ॥
आख्यास्ये ते प्रियं तात महत् पाण्डवनन्दन ।
ऋषिभिः सहितो राजन् कृष्णया चैव तच्छृणु ॥ ९ ॥
यत् त्वयोक्तो महाबाहुरस्त्रार्थं भरतर्षभ ।
तदस्त्रमाप्तं पार्थेन रुद्रादप्रतिमं विभो ॥ १० ॥
‘तात! पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर! मैं तुम्हें बड़ा प्रिय समाचार सुनाऊँगा। राजन्! तुम इन महर्षियों और द्रौपदीके साथ मेरी बात सुनो। भरतकुलभूषण विभो! तुमने महाबाहु अर्जुनको दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये जो आदेश दिया था, उसके

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विषयमें यह निवेदन करना है कि अर्जुनने भगवान् शंकरसे उनका अनुपम अस्त्र (पाशुपत) प्राप्त कर लिया है ॥ ९-१० ॥
यत् तद् ब्रह्मशिरो नाम तपसा रुद्रमागमत् ।
अमृतादुत्थितं रौद्रं तल्लब्धं सव्यसाचिना ॥ ११ ॥
‘जो ब्रह्मशिर नामक अस्त्र अमृतसे प्रकट होकर तपस्याके प्रभावसे भगवान् शंकरको मिला था, वही पाशुपतास्त्र सव्यसाची अर्जुनने प्राप्त कर लिया है ॥ ११ ॥
तत् समन्त्रं ससंहारं सप्रायश्चित्तमङ्गलम् ।
वज्रमस्त्राणि चान्यानि दण्डादीनि युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
‘युधिष्ठिर! रुद्र देवताका वह वज्रके समान दुर्भेद्य अस्त्र मन्त्र, उपसंहार, प्रायश्चित्त और मङ्गलसहित अर्जुनने पा लिया है। साथ ही, दण्ड आदि अन्य अस्त्र भी उन्होंने हस्तगत कर लिये हैं ॥ १२ ॥
यमात् कुबेराद् वरुणादिन्द्राच्च कुरुनन्दन ।
अस्त्राण्यधीतवान् पार्थो दिव्यान्यमितविक्रमः ॥ १३ ॥
‘कुरुनन्दन! अमित पराक्रमी अर्जुनने यम, कुबेर, वरुण और इन्द्रसे दिव्यास्त्रोंका अध्ययन किया है ॥ १३ ॥
विश्वावसोस्तु तनयाद् गीतं नृत्यं च साम च ।
वादित्रं च यथान्यायं प्रत्यविन्दद् यथाविधि ॥ १४ ॥
‘इतना ही नहीं, उन्होंने विश्वावसुके पुत्रसे नृत्य, गीत, सामगान और वाद्यकलाकी भी विधिपूर्वक यथोचित शिक्षा प्राप्त कर ली है ॥ १४ ॥
एवं कृतास्त्रः कौन्तेयो गान्धर्वं वेदमाप्तवान् ।
सुखं वसति बीभत्सुरनुजस्यानुजस्तव ॥ १५ ॥
‘इस प्रकार अस्त्रविद्यामें निपुणता प्राप्त करके कुन्तीकुमारने गान्धर्ववेद (संगीतविद्या) को भी प्राप्त कर लिया है। अब तुम्हारे छोटे भाई भीमसेनके छोटे भाई अर्जुन वहाँ बड़े सुखसे रह रहे हैं ॥ १५ ॥
यदर्थं मां सुरश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ।
तच्च ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर निबोध मे ॥ १६ ॥
‘युधिष्ठिर! देवश्रेष्ठ इन्द्रने मुझसे तुम्हारे लिये जो संदेश कहा था, उसे अब तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ १६ ॥
भवान् मनुष्यलोकेऽपि गमिष्यति न संशयः ।
ब्रूयाद् युधिष्ठिरं तत्र वचनान्मे द्विजोत्तम ॥ १७ ॥
आगमिष्यति ते भ्राता कृतास्त्रः क्षिप्रमर्जुनः ।
सुरकार्यं महत् कृत्वा यदशक्यं दिवौकसाम् ॥ १८ ॥
तपसापि त्वमात्मानं योजय भ्रातृभिः सह ।

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तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥ १९ ॥
‘उन्होंने मुझसे कहा—द्विजोत्तम! इसमें संदेह नहीं कि आप घूमते-घामते मनुष्यलोकमें भी जायँगे; अतः मेरे अनुरोधसे आप राजा युधिष्ठिरके पास जाकर यह बात कह दीजियेगा—‘राजन्! तुम्हारे भाई अर्जुन अस्त्र-विद्यामें निपुण हो चुके हैं। अब वे देवताओंका एक बहुत बड़ा कार्य, जिसे देवता स्वयं नहीं कर सकते, सिद्ध करके शीघ्र तुम्हारे पास आ जायँगे; तबतक तुम भी अपने भाइयोंके साथ स्वयंको तपस्यामें लगाओ; क्योंकि तपस्यासे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। तपस्यासे महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ १७—१९ ॥
अहं च कर्णं जानामि यथावद् भरतर्षभ ।
सत्यसंधं महोत्साहं महावीर्यं महाबलम् ॥ २० ॥
“भरतश्रेष्ठ! मैं कर्णको अच्छी तरह जानता हूँ। वह सत्यप्रतिज्ञ, अत्यन्त उत्साही, महापराक्रमी और महाबली है ॥ २० ॥
महाहवेष्वप्रतिमं महायुद्धविशारदम् ।
महाधनुर्धरं वीरं महास्त्रं वरवर्णिनम् ॥ २१ ॥
महेश्वरसुतप्रख्यमादित्यतनयं प्रभुम् ।
तथार्जुनमतिस्कन्दं सहजोलबणपौरुषम् ॥ २२ ॥
न स पार्थस्य संग्रामे कलामर्हति षोडशीम् ।
यच्चापि ते भयं कर्णान्मनसिस्थमरिंदम ॥ २३ ॥
तच्चाप्यपहरिष्यामि सव्यसाचिन्युपागते ।
यच्च ते मानसं वीर तीर्थयात्रामिमां प्रति ।
स महर्षिर्लोमशस्ते कथयिष्यत्यसंशयम् ॥ २४ ॥
“बड़े-बड़े संग्रामोंमें उसकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। वह महान् युद्धविशारद, महाधनुर्धर, अस्त्र-शस्त्रोंका महान् ज्ञाता, श्रेष्ठ, सुन्दर महेश्वरपुत्र कार्तिकेयके समान पराक्रमी, सूर्यदेवताका पुत्र और शक्तिशाली वीर है। इसी प्रकार मैं अर्जुनको भी जानता हूँ। वह कार्तिकेयसे भी बढ़कर है, उसमें स्वभावसे ही दुःसह पुरुषार्थ भरा हुआ है। युद्धमें कर्ण अर्जुनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। शत्रुदमन! तुम्हारे मनमें जिस बातको लेकर कर्णसे भय बना रहता है, मैं अर्जुनके लौटनेपर तुम्हारे उस भयको भी दूर कर दूँगा। वीरवर! तीर्थयात्राके विषयमें जो तुम्हारा मानसिक संकल्प है, उसके विषयमें महर्षि लोमश निश्चय ही तुमसे सब कुछ बतावेंगे ॥
यच्च किंचित् तपोयुक्तं फलं तीर्थेषु भारत ।
ब्रह्मर्षिरेष ब्रूयात् ते तच्छ्रद्धेयं न चान्यथा ॥ २५ ॥
“भरतनन्दन! तीर्थोंमें जो कुछ तपस्यायुक्त फल प्राप्त होता है, वह सब ये ब्रह्मर्षि लोमश तुम्हें बतायेंगे, तुम्हें उसपर विश्वास करना चाहिये। उसमें अन्यथाबुद्धि नहीं करनी चाहिये” ॥ २५ ॥

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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशसंवादे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें युधिष्ठिरलोमश-संवादविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 673)

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द्विनवतितमोऽध्यायः

महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना

लोमश उवाच

धनंजयेन चाप्युक्तं यत् तच्छृणु युधिष्ठिर ।
युधिष्ठिरं भ्रातरं मे योजयेर्धर्म्यया श्रिया ॥ १ ॥
त्वं हि धर्मान् परान् वेत्थ तपांसि च तपोधन ।
श्रीमतां चापि जानासि धर्मं राज्ञां सनातनम् ॥ २ ॥
लोमश मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! जब मैं आने लगा, तब अर्जुनने भी मुझसे जो बात कही थी, वह सुनो। वे बोले—'तपोधन! आप मेरे बड़े भैया युधिष्ठिरको धर्मानुकूल राजलक्ष्मीसे संयुक्त कीजिये। आप उत्कृष्ट धर्मों और तपस्याओंको जानते हैं। श्रीसम्पन्न राजाओंका जो सनातनधर्म है, उसका भी आपको पूर्ण ज्ञान है ॥ १-२ ॥
स भवान् परमं वेद पावनं पुरुषं प्रति ।
तेन संयोजयेथास्त्वं तीर्थपुण्येन पाण्डवान् ॥ ३ ॥
'पुरुषको पवित्र बनानेवाला जो उत्तम साधन है, उसे आप जानते हैं। अतः आप पाण्डवोंको तीर्थयात्रा-जनित पुण्यसे सम्पन्न कीजिये ॥ ३ ॥
यथा तीर्थानि गच्छेत गाश्च दद्यात् स पार्थिवः ।
तथा सर्वात्मना कार्यमिति मामर्जुनोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
'महाराज युधिष्ठिर जिस प्रकार तीर्थोंमें जायें और वहाँ गोदान करें, वैसा सब प्रकारसे प्रयत्न कीजियेगा।' यह बात अर्जुनने मुझसे कही थी ॥ ४ ॥
भवता चानुगुप्तोऽसौ चरेत् तीर्थानि सर्वशः ।
रक्षोभ्यो रक्षितव्यश्च दुर्गेषु विषमेषु च ॥ ५ ॥
उन्होंने यह भी कहा—'महाराज युधिष्ठिर आपसे सुरक्षित रहकर सब तीर्थोंमें विचरण करें। दुर्गम स्थानों और विषम अवसरोंमें आप राक्षसोंसे उनकी रक्षा करें ॥
दधीच इव देवेन्द्रं यथा चाप्यङ्गिरा रविम् ।
तथा रक्षस्व कौन्तेयान् राक्षसेभ्यो द्विजोत्तम ॥ ६ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! जैसे दधीचने देवराज इन्द्रकी और महर्षि अंगिराने सूर्यकी रक्षा की है, उसी प्रकार आप राक्षसोंसे कुन्तीकुमारोंकी रक्षा कीजिये' ॥ ६ ॥
यातुधाना हि बहवो राक्षसाः पर्वतोपमाः ।

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त्वयाभिगुप्तं कौन्तेयं न विवर्तेयुरन्तिकम् ॥ ७ ॥
‘बहुत-से पिशाच तथा राक्षस, जो पर्वतोंके समान विशालकाय हैं, आपसे सुरक्षित राजा युधिष्ठिरके पास नहीं आ सकेंगे’ ॥ ७ ॥
सोऽहमिन्द्रस्य वचनान्नियोगादर्जुनस्य च ।
रक्षमाणो भयेभ्यस्त्वां चरिष्यामि त्वया सह ॥ ८ ॥
राजन्! इस प्रकार मैं इन्द्रके कथन और अर्जुनके अनुरोधसे सब प्रकारके भयसे तुम्हारी रक्षा करते हुए तुम्हारे साथ-साथ तीर्थोंमें विचरण करूँगा ॥ ८ ॥
द्विस्तीर्थानि मया पूर्वं दृष्टानि कुरुनन्दन ।
इदं तृतीयं द्रक्ष्यामि तान्येव भवता सह ॥ ९ ॥
कुरुनन्दन! पहले दो बार मैंने सब तीर्थोंके दर्शन कर लिये; अब तीसरी बार तुम्हारे साथ पुनः उनका दर्शन करूँगा ॥ ९ ॥
इयं राजर्षिभिर्याता पुण्यकृद्भिर्युधिष्ठिर ।
मन्वादिभिर्महाराज तीर्थयात्रा भयापहा ॥ १० ॥
महाराज युधिष्ठिर! यह तीर्थयात्रा सब प्रकारके भयका नाश करनेवाली है। मनु आदि पुण्यात्मा राजर्षियोंने इस तीर्थयात्रारूपी धर्मका पालन किया है ॥ १० ॥
नानृजुर्नाकृतात्मा च नाविद्यो न च पापकृत् ।
स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! जो सरल नहीं है, जिसने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, जो विद्याहीन और पापात्मा है तथा जिसकी बुद्धि कुटिलतासे भरी हुई है, ऐसा मनुष्य (श्रद्धा न होनेके कारण) तीर्थोंमें स्नान नहीं करता ॥ ११ ॥
त्वं तु धर्ममतिर्नित्यं धर्मज्ञः सत्यसंगरः ।
विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो भूय एव भविष्यसि ॥ १२ ॥
तुम तो सदा धर्ममें मन लगाये रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सब प्रकारकी आसक्तियोंसे शून्य हो और आगे भी तुममें अधिकाधिक इन गुणोंका विकास होगा ॥
यथा भगीरथो राजा राजानश्च गयादयः ।
यथा ययातिः कौन्तेय तथा त्वमपि पाण्डव ॥ १३ ॥
कुन्तीकुमार पाण्डुनन्दन! जैसे राजा भगीरथ हो गये हैं, जैसे गय आदि राजर्षि हो चुके हैं तथा जैसे महाराज ययाति हुए हैं, वैसे ही तुम भी विख्यात हो ॥

युधिष्ठिर उवाच
न हर्षात् सम्प्रपश्यामि वाक्यस्यास्योत्तरं क्वचित् ।
स्मरेद्धि देवराजो यं को नामाभ्यधिकस्ततः ॥ १४ ॥

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युधिष्ठिर बोले— महर्षे! आपके दर्शन और आपकी बातोंके सुननेसे मुझे इतना अधिक हर्ष हुआ है कि मुझे इन वचनोंका कोई उत्तर नहीं सूझता। देवराज इन्द्र जिसका स्मरण करते हों उससे बढ़कर इस संसारमें कौन है? ।।
भवता संगमो यस्य भ्राता चैव धनंजयः ।
वासवः स्मरते यस्य को नामाभ्यधिकस्ततः ॥ १५ ॥
जिसे आपका संग प्राप्त हो, जिसके अर्जुन-जैसा भाई हो और जिसे इन्द्र याद करते हों, उससे बढ़कर सौभाग्यशाली और कौन है? ॥ १५ ॥
यच्च मां भगवानाह तीर्थानां दर्शनं प्रति ।
धौम्यस्य वचनादेषा बुद्धिः पूर्वं कृतैव मे ॥ १६ ॥
भगवन्! आपने मुझे तीर्थोंके दर्शनके लिये जो उत्साह प्रदान किया है, वह ठीक है। मैंने पहलेसे ही धौम्यजीके आदेशसे तीर्थोंमें जानेका विचार कर रखा है ।।
तद् यदा मन्यसे ब्रह्मन् गमनं तीर्थदर्शने ।
तदैव गन्तास्मि तीर्थान्येष मे निश्चयः परः ॥ १७ ॥
अतः ब्रह्मन्! आप जब ठीक समझें तभी मैं तीर्थोंके दर्शनके लिये चल दूँगा; यही मेरा अन्तिम निश्चय है ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच

गमने कृतबुद्धिं तु पाण्डवं लोमशोऽब्रवीत् ।
लघुर्भव महाराज लघुः स्वैरं गमिष्यसि ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तीर्थयात्राके लिये जिन्होंने निश्चित विचार कर लिया था, उन पाण्डु-नन्दन युधिष्ठिरसे महर्षि लोमशने कहा—'महाराज! लोकसमूहसे आप हलके हो जाइये—थोड़े ही लोगोंको साथ रखिये; क्योंकि थोड़े संगी-साथी होनेपर आप इच्छानुसार सर्वत्र जा सकेंगे ॥ १८ ॥

युधिष्ठिर उवाच

भिक्षाभुजो निवर्तन्तां ब्राह्मणा यतयश्च ये ।
क्षुत्तृडध्वश्रमायासाशीतार्तिमसहिष्णवः ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर बोले— जो भिक्षाभोजी ब्राह्मण और संन्यासी हैं तथा जो भूख-प्यास, परिश्रम-थकावट और सर्दीकी पीड़ा सहन न कर सकें, उन्हें लौट जाना चाहिये ॥ १९ ॥
ते सर्वे विनिवर्तन्तां ये च मिष्टभुजो द्विजाः ।
पक्वान्नलेह्यपानानां मांसानां च विकल्पकाः ॥ २० ॥
जो द्विज मिष्टान्नभोजी हैं वे भी लौट जायँ। जो पक्वान्न, चटनी, पेय पदार्थ और मांस आदि खानेवाले मनुष्य हों, वे भी लौट जायँ ॥ २० ॥
तेऽपि सर्वे निवर्तन्तां ये च सूदानुयायिनः ।

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मया यथोचिताजीव्यैः संविभक्ताश्च वृत्तिभिः ॥ २१ ॥
जो लोग रसोइयोंकी अपेक्षा रखनेवाले हैं तथा जिन्हें मैंने अलग-अलग बाँटकर उचित-उचित आजीविकाकी व्यवस्था कर दी है, वे सब लोग घर लौट जायँ ॥ २१ ॥
ये चाप्यनुरताः पौरा राजभक्तिपुरःसराः ।
धृतराष्ट्रं महाराजमभिगच्छन्तु ते च वै ॥ २२ ॥
स दास्यति यथाकालमुचिता यस्य या भृतिः ।
स चेद् यथोचितां वृत्तिं न दद्यान्मनुजेश्वरः ॥ २३ ॥
अस्मत्प्रियहितार्थाय पाञ्चाल्यो वः प्रदास्यति ॥ २४ ॥
जो पुरवासी राजभक्तिवश मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं, वे अब महाराज धृतराष्ट्रके पास चले जायँ। वे उनके लिये यथासमय समुचित आजीविका प्रदान करेंगे। यदि राजा धृतराष्ट्र उचित जीविकाकी व्यवस्था न करें तो पांचालनरेश द्रुपद हमारा प्रिय और हित करनेके लिये अवश्य आपलोगोंको जीविका देंगे ॥ २२—२४ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो भूयिष्ठशः पौरा गुरुभारप्रपीडिताः ।
विप्राश्च यतयो मुख्या जग्मुर्नागपुरं प्रति ॥ २५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब बहुत-से नागरिक, ब्राह्मण और यति मानसिक दुःखके भारी भारसे पीड़ित हो हस्तिनापुरको चले गये ॥ २५ ॥
तान् सर्वान् धर्मराजस्य प्रेम्णा राजाम्बिकासुतः ।
प्रतिजग्राह विधिवद् धनैश्च समतर्पयत् ॥ २६ ॥
अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने धर्मराज युधिष्ठिरके स्नेहवश उन सबको विधिपूर्वक अपनाया और उन्हें धन देकर तृप्त किया ॥ २६ ॥
ततः कुन्तीसुतो राजा लघुभिर्ब्राह्मणैः सह ।
लोमशेन च सुप्रीतस्त्रिरात्रं काम्यकेऽवसत् ॥ २७ ॥
तदनन्तर कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर थोड़े-से ब्राह्मणों और लोमशजीके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक तीन राततक काम्यक वनमें टिके रहे ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां
द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक
बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 677)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिनवतितमोऽध्यायः

ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रयान्तं कौन्तेयं ब्राह्मणा वनवासिनः ।
अभिगम्य तदा राजन्निदं वचनमब्रुवन् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको तीर्थयात्राके लिये उद्यत जान काम्य-कवनके निवासी ब्राह्मण उनके निकट आकर इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

राजंस्तीर्थानि गन्तासि पुण्यानि भ्रातृभिः सह ।
ऋषिणा चैव सहितो लोमशेन महात्मना ॥ २ ॥
‘महाराज! आप अपने भाइयों तथा महात्मा लोमश मुनिके साथ पुण्यतीर्थोंमें जानेवाले हैं ॥ २ ॥

अस्मानपि महाराज नेतुमर्हसि पाण्डव ।
अस्माभिर्हि न शक्यानि त्वदृते तानि कौरव ॥ ३ ॥
‘कुरुकुलतिलक पाण्डुनन्दन! हमें भी अपने साथ ले चलें। महाराज! आपके बिना हमलोग उन तीर्थोंकी यात्रा नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

श्वापदैरुपसृष्टानि दुर्गाणि विषमाणि च ।
अगम्यानि नरैरल्पैस्तीर्थानि मनुजेश्वर ॥ ४ ॥
‘मनुजेश्वर! वे सभी तीर्थ हिंसक जन्तुओंसे भरे पड़े हैं। दुर्गम और विषम भी हैं। थोड़े-से मनुष्य वहाँकी यात्रा नहीं कर सकते ॥ ४ ॥

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भवतो भ्रातरः शूरा धनुर्धरवराः सदा ।
भवद्भिः पालिताः शूरैर्गच्छामो वयमप्युत ॥ ५ ॥
‘आपके भाई शूरवीर हैं और सदा श्रेष्ठ धनुष धारण किये रहते हैं। आप-जैसे शूरवीरोंसे सुरक्षित होकर हम भी उन तीर्थोंकी यात्रा पूरी कर लेंगे ।। ५ ।।
भवत्प्रसादाद्धि वयं प्राप्नुयाम सुखं फलम् ।
तीर्थानां पृथिवीपाल वनानां च विशाम्पते ॥ ६ ॥
‘भूपाल! प्रजानाथ! आपके प्रसादसे हमलोग भी उन तीर्थों और वनोंकी यात्राका फल अनायास ही पा लेंगे ।। ६ ।।
तव वीर्यपरित्राताः शुद्धास्तीर्थपरिप्लुताः ।
भवेम धूतपाप्मानस्तीर्थसंदर्शनान्नृप ॥ ७ ॥
‘नरेश्वर! आपके बल-पराक्रमसे सुरक्षित हो हम भी तीर्थोंमें स्नान करके शुद्ध हो जायँगे और उन तीर्थोंके दर्शनसे हमारे सब पाप धुल जायँगे ।। ७ ।।
भवानपि नरेन्द्रस्य कार्तवीर्यस्य भारत ।
अष्टकस्य च राजर्षेर्लोमपादस्य चैव ह ॥ ८ ॥
भरतस्य च वीरस्य सार्वभौमस्य पार्थिव ।

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ध्रुवं प्राप्स्यसि दुष्प्रापाँल्लोकांस्तीर्थपरिप्लुतः ॥ ९ ॥
‘भूपाल! भरतनन्दन! आप भी तीर्थोंमें नहाकर राजा कार्तवीर्य अर्जुन, राजर्षि अष्टक, लोमपाद और भूमण्डलमें सर्वत्र विदित सम्राट् वीरवर भरतको मिलनेवाले दुर्लभ लोकोंको अवश्य प्राप्त कर लेंगे ।। ८-९ ।।

प्रभासादीनि तीर्थानि महेन्द्रादींश्च पर्वतान् ।
गङ्गाद्याः सरितश्चैव प्लक्षादींश्च वनस्पतीन् ॥ १० ॥
त्वया सह महीपाल द्रष्टुमिच्छामहे वयम् ।
यदि ते ब्राह्मणेष्वस्ति काचित् प्रीतिर्जनाधिप ॥ ११ ॥
कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ।
‘महीपाल! प्रभास आदि तीर्थों, महेन्द्र आदि पर्वतों, गंगा आदि नदियों तथा प्लक्ष आदि वृक्षोंका हम आपके साथ दर्शन करना चाहते हैं। जनेश्वर! यदि आपके मनमें ब्राह्मणोंके प्रति कुछ प्रेम है तो आप हमारी बात शीघ्र मान लीजिये; इससे आपका कल्याण होगा ।। १०-११ १/२ ।।

तीर्थानि हि महाबाहो तपोविघ्नकरैः सदा ॥ १२ ॥
अनुकीर्णानि रक्षोभिस्तेभ्यो नस्त्रातुमर्हसि ।
‘महाबाहो! तपस्यामें विघ्न डालनेवाले बहुत-से राक्षस उन तीर्थोंमें भरे पड़े हैं, उनसे आप हमारी रक्षा करनेमें समर्थ हैं' ।। १२ १/२ ।।

तीर्थान्युक्तानि धौम्येन नारदेन च धीमता ॥ १३ ॥
यान्युवाच च देवर्षिर्लोमशः सुमहातपाः ।
विधिवत् तानि सर्वाणि पर्यटस्व नराधिप ॥ १४ ॥
धूतपाप्मा सहास्माभिर्लोमशेनाभिपालितः ।
‘नरेश्वर! आप पापरहित हैं, धौम्य मुनि, परम बुद्धिमान् नारदजी तथा महातपस्वी देवर्षि लोमशने जिन-जिन तीर्थोंका वर्णन किया है, उन सबमें आप महर्षि लोमशजीसे सुरक्षित हो हमारे साथ विधिपूर्वक भ्रमण करें' ।। १३-१४ १/२ ।।

स राजा पूज्यमानस्तैर्हर्षादश्रुपरिप्लुतः ॥ १५ ॥
भीमसेनादिभिर्वीरैर्भ्रातृभिः परिवारितः ।
बाढमित्यब्रवीत् सर्वांस्तानृषीन् पाण्डवर्षभः ॥ १६ ॥
लोमशं समनुज्ञाप्य धौम्यं चैव पुरोहितम् ।
पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने वीर भ्राता भीमसेन आदिसे घिरकर खड़े थे। उन ब्राह्मणोंद्वारा इस प्रकार सम्मानित होनेपर उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भर आये। उन्होंने देवर्षि लोमश तथा पुरोहित धौम्यजीकी आज्ञा लेकर उन सब ऋषियोंसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया ।। १५-१६ १/२ ।।

ततः स पाण्डवश्रेष्ठो भ्रातृभिः सहितो वशी ॥ १७ ॥

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द्रौपद्या चानवद्याङ्ग्या गमनाय मनो दधे ।
तदनन्तर मन-इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरने भाइयों तथा सुन्दर अंगोंवाली द्रौपदीके साथ यात्रा करनेका मन-ही-मन निश्चय किया ॥ १७ १/२ ॥
अथ व्यासो महाभागस्तथा पर्वतनारदौ ॥ १८ ॥
काम्यके पाण्डवं द्रष्टुं समाजग्मुर्मनीषिणः ।
तेषां युधिष्ठिरो राजा पूजां चक्रे यथाविधि ।
सत्कृतास्ते महाभाग युधिष्ठिरमथाब्रुवन् ॥ १९ ॥
इतनेहीमें महाभाग व्यास, पर्वत और नारद आदि मनीषीजन काम्यकवनमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरसे मिलनेके लिये आये। राजा युधिष्ठिरने उनकी विधिपूर्वक पूजा की। उनसे सत्कार पाकर वे महाभाग महर्षि महाराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले ॥ १८-१९ ॥

ऋषय ऊचुः
युधिष्ठिर यमौ भीम मनसा कुरुतार्जवम् ।
मनसा कृतशौचा वै शुद्धास्तीर्थानि यास्यथ ॥ २० ॥
ऋषियोंने कहा—युधिष्ठिर! भीमसेन! नकुल! और सहदेव! तुमलोग तीर्थोंके प्रति मनसे श्रद्धापूर्वक सरलभाव रखो। मनसे शुद्धिका सम्पादन करके शुद्धचित्त होकर तीर्थोंमें जाओ ॥ २० ॥
शरीरनियमं प्राहुर्ब्राह्मणा मानुषं व्रतम् ।
मनोविशुद्धां बुद्धिं च दैवमाहुर्व्रतं द्विजाः ॥ २१ ॥
ब्राह्मणलोग शरीर-शुद्धिके नियमको 'मानुषव्रत' बताते हैं और मनके द्वारा शुद्ध की हुई बुद्धिको 'दैवव्रत' कहते हैं ॥ २१ ॥
मनो ह्यदुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप ।
मैत्रीं बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि द्रक्ष्यथ ॥ २२ ॥
नरेश्वर! यदि मन राग-द्वेषसे दूषित न हो तो वह शुद्धिके लिये पर्याप्त माना गया है। सब प्राणियोंके प्रति मैत्री-बुद्धिका आश्रय ले शुद्धभावसे तीर्थोंका दर्शन करो ॥ २२ ॥
ते यूयं मानसैः शुद्धाः शरीरनियमव्रतैः ।
दैवं व्रतं समास्थाय यथोक्तं फलमाप्स्यथ ॥ २३ ॥
तुम मानसिक और शारीरिक नियमव्रतोंसे शुद्ध हो। दैवव्रतका आश्रय ले यात्रा करोगे तो तीर्थोंका तुम्हें यथावत् फल प्राप्त होगा ॥ २३ ॥
ते तथेति प्रतिज्ञाय कृष्णया सह पाण्डवाः ।
कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे मुनिभिर्दिव्यमानुषैः ॥ २४ ॥
महर्षियोंके ऐसा कहनेपर द्रौपदीसहित पाण्डवोंने 'बहुत अच्छा' कहकर (उनकी आज्ञाएँ शिरोधार्य कीं और उनके बताये हुए नियमोंका पालन करनेकी) प्रतिज्ञा की।

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तत्पश्चात् उन दिव्य और मानव महर्षियोंने उन सबके लिये स्वस्तिवाचन किया ॥ २४ ॥
लोमशस्योपसंगृह्य पादौ द्वैपायनस्य च ।
नारदस्य च राजेन्द्र देवर्षेः पर्वतस्य च ॥ २५ ॥
धौम्येन सहिता वीरास्तथा तैर्वनवासिभिः ।
मार्गशीर्ष्यामतीतायां पुष्येण प्रययुस्ततः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर महर्षि लोमश, द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और पर्वतके चरणोंका स्पर्श करके वनवासी ब्राह्मणों, पुरोहित धौम्य और लोमश आदिके साथ वीर पाण्डव तीर्थयात्राके लिये निकले। मार्गशीर्षकी पूर्णिमा व्यतीत होनेपर जब पुष्य नक्षत्र आया तब उसी नक्षत्रमें उन्होंने यात्रा प्रारम्भ की ॥ २५-२६ ॥
कठिनानि समादाय चीराजिनजटाधराः ।
अभेद्यैः कवचैर्युक्तास्तीर्थान्यन्वचरंस्ततः ॥ २७ ॥
उन सबने शरीरपर फटे-पुराने वस्त्र या मृगचर्म धारण कर रखे थे। उनके मस्तकपर जटाएँ थीं। उनके अंग अभेद्य कवचोंसे ढके हुए थे। वे सूर्यप्रदत्त बटलोई आदि पात्र लेकर वहाँ तीर्थोंमें विचरण करने लगे ॥ २७ ॥
इन्द्रसेनादिभिर्भृत्यै रथैः परिचतुर्दशैः ।
महानसव्यापृतैश्च तथान्यैः परिचारकैः ॥ २८ ॥
उनके साथ इन्द्रसेन आदि चौदहसे अधिक सेवक रथ लिये पीछे-पीछे जा रहे थे। रसोईके काममें संलग्न रहनेवाले अन्यान्य सेवक भी उनके साथ थे ॥ २८ ॥
सायुधा बद्धनिस्त्रिंशास्तूणवन्तः समार्गणाः ।
प्राङ्मुखाः प्रययुर्वीराः पाण्डवा जनमेजय ॥ २९ ॥
जनमेजय! वीर पाण्डव आवश्यक अस्त्र-शस्त्र ले कमरमें तलवार बाँधकर पीठपर तरकस कसे हुए हाथोंमें बाण लिये पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

देवताओं और धर्मात्मा राजाओंका उदाहरण देकर महर्षि लोमशका युधिष्ठिरको अधर्मसे हानि बताना और तीर्थयात्राजनित पुण्यकी महिमाका वर्णन करते हुए आश्वासन देना

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चतुर्नवतितमोऽध्यायः

देवताओं और धर्मात्मा राजाओंका उदाहरण देकर महर्षि लोमशका युधिष्ठिरको अधर्मसे हानि बताना और तीर्थयात्राजनित पुण्यकी महिमाका वर्णन करते हुए आश्वासन देना

युधिष्ठिर उवाच

न वै निर्गुणमात्मानं मन्ये देवर्षिसत्तम ।
तथास्मि दुःखसंतप्तो यथा नान्यो महीपतिः ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले— देवर्षिप्रवर लोमश! मेरी समझसे मैं अपनेको सात्त्विक गुणोंसे हीन नहीं मानता तो भी दुःखोंसे इतना संतप्त होता रहता हूँ जितना दूसरा कोई राजा नहीं हुआ होगा ॥ १ ॥

परांश्च निर्गुणान् मन्ये न च धर्मगतानपि ।
ते च लोमश लोकेऽस्मिन्नृध्यन्ते केन हेतुना ॥ २ ॥

इसके सिवा, दुर्योधनादि शत्रुओंको सात्त्विक गुणोंसे रहित समझता हूँ। साथ ही यह भी जानता हूँ कि वे धर्म-परायण नहीं हैं तो भी वे इस लोकमें उत्तरोत्तर समृद्धिशाली होते जा रहे हैं, इसका क्या कारण है? ॥ २ ॥

लोमश उवाच

नात्र दुःखं त्वया राजन् कार्यं पार्थ कथंचन ।
यदधर्मेण वर्धेयुरधर्मरुचयो जनाः ॥ ३ ॥

लोमशजीने कहा— राजन्! कुन्तीनन्दन! अधर्ममें रुचि रखनेवाले लोग यदि उस अधर्मके द्वारा बढ़ रहे हों तो इसके लिये तुम्हें किसी प्रकार दुःख नहीं मानना चाहिये ॥ ३ ॥

वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यति ।
ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ ४ ॥

पहले अधर्मद्वारा मनुष्य बढ़ सकता है, फिर अपने मनोऽनुकूल सुख-सम्पत्तिरूप अभ्युदयको देख सकता है, तत्पश्चात् वह शत्रुओंपर विजय पा सकता है और अन्तमें जड़-मूलसहित नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥

मया हि दृष्टा दैतेया दानवाश्च महीपते ।
वर्धमाना ह्यधर्मेण क्षयं चोपगताः पुनः ॥ ५ ॥

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महीपाल! मैंने दैत्यों और दानवोंको अधर्मके द्वारा बढ़ते और पुनः नष्ट होते भी देखा है॥ ५॥

पुरा देवयुगे चैव दृष्टं सर्वं मया विभो।
अरोचयन् सुरा धर्मं धर्मं तत्यजिरेऽसुराः ॥ ६॥
प्रभो! पहले देवयुगमें ही मैंने यह सब अपनी आँखों देखा है। देवताओंने धर्मके प्रति अनुराग किया और असुरोंने उसका परित्याग कर दिया॥ ६॥

तीर्थानि देवा विविशुर्नाविशन् भारतासुराः।
तानधर्मकृतो दर्पः पूर्वमेव समाविशत्॥ ७॥
भरतनन्दन! देवताओंने स्नानके लिये तीर्थोंमें प्रवेश किया, परंतु असुर उनमें नहीं गये। अधर्मजनित दर्प असुरोंमें पहलेसे ही समा गया था॥ ७॥

दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत।
क्रोधाद्ध्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत्॥ ८॥
दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ। क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया॥ ८॥

तानलज्जान् गतह्रीकान् हीनवृत्तान् वृथाव्रतान्।
क्षमा लक्ष्मीः स्वधर्मश्च न चिरात् प्रजहुस्ततः ॥ ९॥
लक्ष्मीस्तु देवानगमदलक्ष्मीरसुरान् नृप।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दर्पोपहतचेतसः ॥ १०॥
दैतेयान् दानवांश्चैव कलिरप्याविशत् ततः।
तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दानवान् कलिना हतान् ॥ ११॥
दर्पाभिभूतान् कौन्तेय क्रियाहीनानचेतसः।
मानाभिभूतानचिराद् विनाशः समपद्यत॥ १२॥
इस प्रकार लज्जा, संकोच और सदाचारसे हीन एवं निष्फल व्रतका आचरण करनेवाले उन असुरोंको क्षमा, लक्ष्मी और स्वधर्मने शीघ्र त्याग दिया। राजन्! लक्ष्मी देवताओंके पास चली गयी और अलक्ष्मी असुरोंके यहाँ। अलक्ष्मीके आवेशसे युक्त होनेपर उनका चित्त दर्प और अभिमानसे दूषित हो गया। उस दशामें उन दैत्यों और दानवोंमें कलिका भी प्रवेश हो गया। जब वे दानव अलक्ष्मीसे संयुक्त, कलिसे तिरस्कृत और अभिमानसे अभिभूत हो सत्कर्मोंसे शून्य, विवेकरहित और मानसे उन्मत्त हो गये, तब शीघ्र ही उनका विनाश हो गया॥ ९—१२॥

निर्यशस्कास्तथा दैत्याः कृत्स्नशो विलयं गताः।
देवास्तु सागरांश्चैव सरितश्च सरांसि च॥ १३॥
अभ्यगच्छन् धर्मशीलाः पुण्यान्यायतनानि च।
तपोभिः क्रतुभिर्दानैराशीर्वादैश्च पाण्डव॥ १४॥

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प्रजहुः सर्वपापानि श्रेयश्च प्रतिपेदिरे ।
एवमादानवन्तश्च निरादानाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥
तीर्थान्यगच्छन् विबुधास्तेनापुर्भूतिमुत्तमाम् ।
(यत्र धर्मेण वर्तन्ते राजानो राजसत्तम ।
सर्वान् सपत्नान् बाधन्ते राज्यं चैषां विवर्धते ॥)
तथा त्वमपि राजेन्द्र स्नात्वा तीर्थेषु सानुजः ॥ १६ ॥
पुनर्वेत्स्यसि तां लक्ष्मीमेष पन्थाः सनातनः ।
यशोहीन दैत्य पूर्णतः विनष्ट हो गये, किंतु धर्मशील देवताओंने पवित्र समुद्रों, सरिताओं, सरोवरों और पुण्यप्रद आश्रमोंकी यात्रा की। पाण्डुनन्दन! वहाँ तपस्या, यज्ञ और दान आदि करके महात्माओंके आशीर्वादसे वे सब पापोंसे मुक्त हो कल्याणके भागी हुए। इस प्रकार उत्तम नियम ग्रहण करके किसीसे भी कोई प्रतिग्रह न लेकर देवताओंने तीर्थोंमें विचरण किया; इससे उन्हें उत्तम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। नृपश्रेष्ठ! जहाँ राजा धर्मके अनुसार बर्ताव करते हैं वहाँ वे सब शत्रुओंको नष्ट कर देते हैं और उनका राज्य भी बढ़ता रहता है। राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भाइयोंसहित तीर्थोंमें स्नान करके खोयी हुई राजलक्ष्मी प्राप्त कर लोगे। यही सनातन मार्ग है ॥ १३—१६ १/२ ॥

यथैव हि नृगो राजा शिबिरौशीनरो यथा ॥ १७ ॥
भगीरथो वसुमना गयः पूरुः पुरूरवाः ।
चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते ॥ १८ ॥
तीर्थाभिगमनात् पूता दर्शनाच्च महात्मनाम् ।
अलभन्त यशः पुण्यं धनानि च विशाम्पते ॥ १९ ॥
तथा त्वमपि राजेन्द्र लब्धासि विपुलां श्रियम् ।
जैसे राजा नृग, उशीनरपुत्र शिबि, भगीरथ, वसुमना, गय, पूरु तथा पुरूरवा आदि नरेशोंने सदा तपस्यापूर्वक तीर्थयात्रा करके वहाँके जलके स्पर्श और महात्माओंके दर्शनसे पावन यश और प्रचुर धन प्राप्त किये थे; उसी प्रकार तुम भी तीर्थयात्राके पुण्यसे विपुल सम्पत्ति प्राप्त कर लोगे ॥ १७—१९ १/२ ॥

यथा चेक्ष्वाकुरभवत् सपुत्रजनबान्धवः ॥ २० ॥
मुचुकुन्दोऽथ मान्धाता मरुत्तश्च महीपतिः ।
कीर्तिं पुण्यामविन्दन्त यथा देवास्तपोबलात् ॥ २१ ॥
देवर्षयश्च कार्त्स्न्येन तथा त्वमपि वेत्स्यसि ।
धार्तराष्ट्रास्त्वधर्मेण मोहेन च वशीकृताः ।
न चिराद् वै विनङ्क्ष्यन्ति दैत्या इव न संशयः ॥ २२ ॥
जैसे पुत्र, सेवक तथा बन्धु-बान्धवोंसहित राजा इक्ष्वाकु, मुचुकुन्द, मान्धाता तथा महाराज मरुत्तने पुण्यकीर्ति प्राप्त की थी, जैसे देवताओं और देवर्षियोंने तपोबलसे यश

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और ऐश्वर्य प्राप्त किया था; उसी प्रकार तुम भी पूर्णरूपसे यश और धन-सम्पत्ति प्राप्त करोगे। धृतराष्ट्रके पुत्र पाप और मोहके वशीभूत हैं; अतः वे दैत्योंकी भाँति शीघ्र नष्ट हो जायँगे; इसमें संशय नहीं है ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां
चतुर्नवतितमोऽध्यायः ।। ९४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 686)

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पञ्चनवतितमोऽध्यायः

पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना

वैशम्पायन उवाच

ते तथा सहिता वीरा वसन्तस्तत्र तत्र ह ।
क्रमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यमागताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार वे वीर पाण्डव विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हुए क्रमशः नैमिषारण्यतीर्थमें आये ॥ १ ॥
ततस्तीर्थेषु पुण्येषु गोमत्याः पाण्डवा नृप ।
कृताभिषेकाः प्रददुर्गाश्च वित्तं च भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! नरेश्वर! तदनन्तर गोमतीके पुण्य तीर्थोंमें स्नान करके पाण्डवोंने वहाँ गोदान और धनदान किया* ॥ २ ॥
तत्र देवान् पितॄन् विप्रांस्तर्पयित्वा पुनः पुनः ।
कन्यातीर्थेऽश्वतीर्थे च गवां तीर्थे च भारत ।
कालकोट्यां वृषप्रस्थे गिरावुष्य च पाण्डवाः ॥ ३ ॥
बाहुदायां महीपाल चक्रुः सर्वेऽभिषेचनम् ।
प्रयागे देवयजने देवानां पृथिवीपते ॥ ४ ॥
ऊषुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चातस्थुरुत्तमम् ।
गङ्गायमुनयोश्चैव संगमे सत्यसंगराः ॥ ५ ॥
भारत! भूपाल! वहाँ देवताओं, पितरों तथा ब्राह्मणोंको बार-बार तृप्त करके कन्यातीर्थ, अश्वतीर्थ, गोतीर्थ, कालकोटि तथा वृषप्रस्थगिरिमें निवास करते हुए उन सब पाण्डवोंने बाहुदा नदीमें स्नान किया। पृथ्वीपते! तदनन्तर उन्होंने देवताओंकी यज्ञभूमि प्रयागमें पहुँचकर वहाँ गंगा-यमुनाके संगममें स्नान किया। सत्यप्रतिज्ञ पाण्डव वहाँ स्नान करके कुछ दिनोंतक उत्तम तपस्यामें लगे रहे ॥ ३—५ ॥
विपाप्मानो महात्मानो विप्रेभ्यः प्रददुर्वसु ।
तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदीं प्रजापतेः ॥ ६ ॥
जग्मुः पाण्डुसुता राजन् ब्राह्मणैः सह भारत ।
तत्र ते न्यवसन् वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम् ॥ ७ ॥
संतर्पयन्तः सततं वन्येन हविषा द्विजान् ।

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उन पापरहित महात्माओंने (त्रिवेणीतटपर) ब्राह्मणोंको धन दान किया। भरतनन्दन! तत्पश्चात् पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीकी वेदीपर गये, जो तपस्वीजनोंसे सेवित है। वहाँ उन वीरोंने उत्तम तपस्या करते हुए निवास किया। वे सदा कन्द-मूल-फल आदि वन्य हविष्यद्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करते रहते थे ।। ६-७१/२ ।।

ततो महीधरं जग्मुर्धर्मज्ञेनाभिसंस्कृतम् ।। ८ ।।
राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते ।
अनुपम तेजस्वी जनमेजय! प्रयागसे चलकर पाण्डव पुण्यात्मा एवं धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा यज्ञ करके शुद्ध किये हुए उत्तम पर्वतसे उपलक्षित गयातीर्थमें गये ।। ८१/२ ।।

नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी ।। ९ ।।
वानीरमालिनी रम्या नदी पुलिनशोभिता ।
जहाँ गयशिर नामक पर्वत और बेंतकी पंक्तियोंसे घिरी हुई रमणीय महानदी है, जो अपने दोनों तटोंसे विशेष शोभा पाती है ।। ९१/२ ।।

दिव्यं पवित्रकूटं च पवित्रं धरणीधरम् ।। १० ।।
ऋषिजुष्टं सुपुण्यं तत् तीर्थं ब्रह्मसरोत्तमम् ।
अगस्त्यो भगवान् यत्र गतो वैवस्वतं प्रति ।। ११ ।।
वहाँ महर्षियोंसे सेवित, पावन शिखरोंवाला, दिव्य एवं पवित्र दूसरा पर्वत भी है जो अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ है। वहीं उत्तम ब्रह्मसरोवर है जहाँ भगवान् अगस्त्यमुनि वैवस्वत यमसे मिलनेके लिये पधारे थे ।। १०-११ ।।

उवास च स्वयं तत्र धर्मराजः सनातनः ।
सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशाम्पते ।। १२ ।।
क्योंकि सनातन धर्मराज वहाँ स्वयं निवास करते हैं। राजन्! वहाँ सम्पूर्ण नदियोंका प्राकट्य हुआ है ।।

यत्र संनिहितो नित्यं महादेवः पिनाकधृक् ।
तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे ।। १३ ।।
ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान् ।
पिनाकपाणि भगवान् महादेव उस तीर्थमें नित्य निवास करते हैं। वहाँ वीर पाण्डवोंने उन दिनों चातुर्मास्यव्रत ग्रहण करके महान् ऋषियज्ञ अर्थात् वेदादि सत्शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा भगवान्‌की आराधना की। वहीं महान् अक्षयवट है ।। १३१/२ ।।

अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम् ।। १४ ।।
देवताओंकी वह यज्ञभूमि अक्षय है और वहाँ किये हुए प्रत्येक सत्कर्मका फल अक्षय होता है ।। १४ ।।

ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नि Schweit...
ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नेश्चितमानसाः ।
ब्राह्मणास्तत्र शतशः समाजग्मुस्तपोधनाः ।। १५ ।।