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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

भीमसेन और द्रौपदीका संवाद

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एकविंशोऽध्यायः

भीमसेन और द्रौपदीका संवाद

भीमसेन उवाच

धिगस्तु मे बाहुबलं गाण्डीवं फाल्गुनस्य च ।
यत् ते रक्तौ पुरा भूत्वा पाणी कृतकिणाविमौ ॥ १ ॥
**भीमसेन बोले—**देवि! मेरे बाहुबलको तथा अर्जुनके गाण्डीव धनुषको भी धिक्कार है; क्योंकि तुम्हारे ये दोनों कोमल हाथ, जो पहले लाल थे, अब घट्टे पड़नेसे काले हो गये हैं ॥ १ ॥

सभायां तु विराटस्य करोमि कदनं महत् ।
तत्र मे कारणं भाति कौन्तेयो यत् प्रतीक्षते ॥ २ ॥
मैं तो उसी दिन विराटकी सभामें ही भारी संहार मचा देता, किंतु ऐसा न करनेमें कारण बन गये कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर। वे प्रकट हो जानेका भय सूचित करते हुए मेरी ओर देखने लगे ॥ २ ॥

अथवा कीचकस्याहं पोथयामि पदा शिरः ।
ऐश्वर्यमदमत्तस्य क्रीडन्निव महाद्विपः ॥ ३ ॥
अथवा ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हुए उस कीचकका मस्तक मैं उसी प्रकार पैरोंसे रौंद डालता जैसे क्रीडा करता हुआ महान् गजराज कीचक (बाँस)-के वृक्षको मसल डालता है ॥ ३ ॥

अपश्यं त्वां यदा कृष्णे कीचकेन पदा हताम् ।
तदैवाहं चिकीर्षामि मत्स्यानां कदनं महत् ॥ ४ ॥
कृष्णे! जब कीचकने तुम्हें लातसे मारा था, उस समय मैं वहीं था और अपनी आँखों यह घटना मैंने देखी थी। उसी क्षण मेरी इच्छा हुई कि आज इन मत्स्यदेशवासियोंका महासंहार कर डालूँ ॥ ४ ॥

तत्र मां धर्मराजस्तु कटाक्षेण न्यवारयत् ।
तदहं तस्य विज्ञाय स्थित एवास्मि भामिनि ॥ ५ ॥
किंतु धर्मराजने वहाँ नेत्रोंसे संकेत करके मुझे ऐसा करनेसे रोक दिया। भामिनि! उनके उस इशारेको समझकर ही मैं चुप रह गया ॥ ५ ॥

यच्च राष्ट्रात् प्रच्यवनं कुरूणामवधश्च यः ।
सुयोधनस्य कर्णस्य शकुनेः सौबलस्य च ॥ ६ ॥
दुःशासनस्य पापस्य यन्मया नाहृतं शिरः ।
तन्मे दहति गात्राणि हृदि शल्यमिवार्पितम् ।

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मा धर्मं जहि सुश्रोणि क्रोधं जहि महामते ॥ ७ ॥
जिस दिन हमें राज्यसे वञ्चित किया गया, उसी दिन जो कौरवोंका वध नहीं हुआ, दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा पापी दुःशासनके मस्तक मैंने नहीं काट डाले, यह सब सोचकर मेरे हृदयमें काँटा-सा चुभ जाता है और शरीरमें आग लग जाती है। सुश्रोणि! तुम बड़ी बुद्धिमती हो, धर्मको न छोड़ो; क्रोधका त्याग करो ॥ ६-७ ॥

इमं तु समुपालम्भं त्वत्तो राजा युधिष्ठिरः ।
शृणुयाद् वापि कल्याणि कृत्स्नं जह्यात् स जीवितम् ॥ ८ ॥
कल्याणी! यदि राजा युधिष्ठिर तुम्हारे मुखसे यह सारा उपालम्भ सुन लेंगे तो प्राण त्याग देंगे ॥ ८ ॥

धनंजयो वा सुश्रोणि यमौ वा तनुमध्यमे ।
लोकान्तरगतेष्वेषु नाहं शक्ष्यामि जीवितुम् ॥ ९ ॥
सुश्रोणि! तनुमध्यमे! धनंजय अथवा नकुल-सहदेव भी इसे सुनकर जीवित नहीं रह सकते। इन सबके परलोकवासी हो जानेपर मैं भी नहीं जी सकूँगा ॥

पुरा सुकन्या भार्या च भार्गवं च्यवनं वने ।
वल्मीकभूतं शाम्यन्तमन्वपद्यत भामिनी ॥ १० ॥
नारायणी चेन्द्रसेना रूपेण यदि ते श्रुता ।
पतिमन्वचरद् वृद्धं पुरा वर्षसहस्रिणम् ॥ ११ ॥
प्राचीन कालकी बात है, भृगुनन्दन महर्षि च्यवन तपस्या करते-करते बाँबीके समान हो गये थे, मानो अब उनका जीवनदीप बुझ जायगा; ऐसी दशा हो गयी थी, तो भी उनकी कल्याणमयी पत्नी सुकन्याने उन्हींका अनुसरण किया—वह उन्हींकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रही। नारायणी इन्द्रसेना भी अपने रूप-सौन्दर्यके कारण विख्यात थी। तुमने भी उसका नाम सुना होगा। पूर्वकालमें उसने अपने हजार वर्षके बूढ़े पति मुद्गल ऋषिकी निरन्तर सेवा की थी ॥ १०-११ ॥

दुहिता जनकस्यापि वैदेही यदि ते श्रुता ।
पतिमन्वचरत् सीता महारण्यनिवासिनम् ॥ १२ ॥
जनकनन्दिनी वैदेही सीताका नाम तो तुम्हारे कानोंमें पड़ा ही होगा। उन्होंने अत्यन्त घोर वनमें निवास करनेवाले अपने पति श्रीरामचन्द्रजीका अनुगमन किया था ॥ १२ ॥

रक्षसा निग्रहं प्राप्य रामस्य महिषी प्रिया ।
क्लिश्यमानापि सुश्रोणि राममेवान्वपद्यत ॥ १३ ॥
सुश्रोणि! जानकी श्रीरामकी प्यारी रानी थीं। वे राक्षसकी कैदमें पड़कर दीर्घकालतक क्लेश उठाती रहीं, तो भी उन्होंने श्रीरामको ही अपनाये रखा; अपना धर्म नहीं छोड़ा ॥ १३ ॥

लोपामुद्रा तथा भीरु वयोरूपसमन्विता ।

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अगस्तिमन्वयाद्धित्वा कामान् सर्वान्मानुषान् ॥ १४ ॥
भीरु! नयी अवस्था और अनुपम रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न राजकुमारी लोपामुद्राने सम्पूर्ण अलौकिक सुख-भोगोंपर लात मारकर अपने पति महर्षि अगस्त्यका ही अनुसरण किया था ॥ १४ ॥
द्युमत्सेनसुतं वीरं सत्यवन्तमनिन्दिता ।
सावित्र्यनुचचारैका यमलोकं मनस्विनी ॥ १५ ॥
सती-साध्वी मनस्विनी सावित्री द्युमत्सेनके पुत्र वीरवर सत्यवान्‌के मर जानेपर उनके पीछे-पीछे अकेली ही यमलोककी ओर गयी थी ॥ १५ ॥
यथैताः कीर्तिता नार्यो रूपवत्यः पतिव्रताः ।
तथा त्वमपि कल्याणि सर्वैः समुदिता गुणैः ॥ १६ ॥
कल्याणि! इन रूपवती पतिव्रता नारियोंका जैसा आदर्श बताया गया है, उसी प्रकार तुम भी समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ १६ ॥
मादीर्घं क्षम कालं त्वं मासमर्धं च सम्मितम् ।
पूर्णे त्रयोदशे वर्षे राज्ञां राज्ञी भविष्यसि ॥ १७ ॥
अब तुम थोड़े दिनोंतक और ठहर जाओ। वर्ष पूरा होनेमें महीना—आध-महीना और रह गया है। तेरहवाँ वर्ष पूर्ण होते ही तुम राजरानी बनोगी ॥ १७ ॥
(सत्येन ते शपे चाहं भविता नान्यथेति ह ।
सर्वासां परमस्त्रीणां प्रामाण्यं कर्तुमर्हसि ।
देवि! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, ऐसा ही होगा; यह टल नहीं सकता। तुम्हें सभी श्रेष्ठ स्त्रियोंके समक्ष अपना आदर्श उपस्थित करना चाहिये।
सर्वेषां च नरेन्द्राणां मूर्ध्नि स्थास्यसि भामिनि ॥
भर्तृभक्त्या च वृत्तेन भोगान् प्राप्स्यसि दुर्लभान् ॥)
भामिनि! तुम अपनी पतिभक्ति तथा सदाचारसे सम्पूर्ण नरेशोंके मस्तकपर स्थान प्राप्त करोगी और तुम्हें दुर्लभ भोग सुलभ होंगे।

द्रौपद्युवाच
आर्तयैतन्मया भीम कृतं बाष्पप्रमोचनम् ।
अपारयन्त्या दुःखानि न राजानमुपालभे ॥ १८ ॥
द्रौपदीने कहा—प्राणनाथ भीम! इधर अनेक प्रकारके दुःखोंको सहन करनेमें असमर्थ एवं आर्त होकर ही मैंने ये आँसू बहाये हैं। मैं राजा युधिष्ठिरको उलाहना नहीं दूँगी ॥ १८ ॥
किमुक्तेन व्यतीतेन भीमसेन महाबल ।
प्रत्युपस्थितकालस्य कार्यस्यानन्तरो भव ॥ १९ ॥

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महाबली भीमसेन! अब बीती बातोंको दुहरानेसे क्या लाभ? इस समय जिसका अवसर उपस्थित है, उस कार्यके लिये तैयार हो जाओ ।। १९ ।।
ममेह भीम कैकेयी रूपाभिभवशङ्कया ।
नित्यमुद्विजते राजा कथं नेयादिमामिति ।। २० ।।
भीम! केकयकुमारी सुदेष्णा यहाँ मेरे रूपसे पराजित होनेके कारण सदा इस शंकासे उद्विग्न रहती है कि राजा विराट किसी प्रकार इसपर आसक्त न हो जायँ ।। २० ।।
तस्या विदित्वा तं भावं स्वयं चानृतदर्शनः ।
कीचकोऽयं सुदुष्टात्मा सदा प्रार्थयते हि माम् ।। २१ ।।
जिसका देखना भी अनृत (पापमय) है, वही यह परम दुष्टात्मा कीचक रानी सुदेष्णाके उक्त मनोभाव-को जानकर सदा स्वयं आकर मेरे आगे प्रार्थना किया करता है ।। २१ ।।
तमहं कुपिता भीम पुनः कोपं नियम्य च ।
अब्रुवं कामसम्मूढमात्मानं रक्ष कीचक ।। २२ ।।
भीम! पहले-पहल उसके ऐसा कहनेपर मैं कुपित हो उठी; किंतु पुनः क्रोधके वेगको रोककर बोली—'कीचक! तू कामसे मोहित हो रहा है। अरे! तू अपने-आपकी रक्षा कर ।। २२ ।।
गन्धर्वाणामहं भार्या पञ्चानां महिषी प्रिया ।
ते त्वां निहन्युः कुपिताः शूराः साहसकारिणः ।। २३ ।।
'मैं पाँच गन्धर्वोंकी पत्नी तथा प्यारी रानी हूँ। वे साहसी तथा शूरवीर गन्धर्व तुम्हें कुपित होकर मार डालेंगे' ।। २३ ।।
एवमुक्तः सुदुष्टात्मा कीचकः प्रत्युवाच ह ।
नाहं बिभेमि सैरन्ध्रि गन्धर्वाणां शुचिस्मिते ।। २४ ।।
मेरे ऐसा कहनेपर महा दुष्टात्मा कीचकने उत्तर दिया—'पवित्र मुसकानवाली सैरन्ध्री! मैं गन्धर्वोंसे नहीं डरता ।। २४ ।।
शतं शतसहस्राणि गन्धर्वाणामहं रणे ।
समागतं हनिष्यामि त्वं भीरु कुरु मे क्षणम् ।। २५ ।।
'भीरु! यदि युद्धमें मेरे सामने एक करोड़ गन्धर्व भी आ जायँ, तो मैं उन्हें मार डालूँगा; परंतु तुम मुझे स्वीकार कर लो' ।। २५ ।।
इत्युक्ते चाब्रुवं मत्तं कामातुरमहं पुनः ।
न त्वं प्रतिबलश्चैषां गन्धर्वाणां यशस्विनाम् ।। २६ ।।
उसके इस प्रकार उत्तर देनेपर मैंने पुनः उस कामातुर और मतवाले कीचकसे कहा—'कीचक! तू मेरे यशस्वी पति गन्धर्वोंके समान बलवान् नहीं है ।। २६ ।।
धर्मे स्थितास्मि सततं कुलशीलसमन्विता ।
नेच्छामि कंचिद् वध्यन्तं तेन जीवसि कीचक ।। २७ ।।

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'मैं सदा पातिव्रत्य-धर्ममें स्थित रहती हूँ एवं अपने उत्तम कुलकी मर्यादा और सदाचारसे सम्पन्न हूँ। मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण किसीका वध हो, इसीलिये तू अबतक जीवित है' ।। २७ ।।

एवमुक्तः स दुष्टात्मा प्राहसत् स्वनवत् तदा ।
अथ मां तत्र कैकेयी प्रैषयत् प्रणयेन तु ।। २८ ।।
तेनैव देशिता पूर्वं भ्रातृप्रियचिकीर्षया ।
सुरामानय कल्याणि कीचकस्य निवेशनात् ।। २९ ।।

मेरी यह बात सुनकर वह दुष्टात्मा ठहाका मारकर हँसने लगा। तदनन्तर केकयराजकुमारी सुदेष्णा, जैसा कीचकने पहले उसे सिखा रखा था, उसी योजनाके अनुसार अपने भाईका प्रिय करनेकी इच्छासे मुझे प्रेमपूर्वक कीचकके यहाँ भेजने लगी और बोली—'कल्याणि! तुम कीचकके महलसे मेरे लिये मदिरा ले आओ' ।। २८-२९ ।।

सूतपुत्रस्तु मां दृष्ट्वा महत् सान्त्वमवर्तयत् ।
सान्त्वे प्रतिहते क्रुद्धः परामर्शनमनाभवत् ।। ३० ।।

मैं वहाँ गयी। सूतपुत्रने मुझे देखकर पहले तो अपनी बात मान लेनेके लिये बड़े-बड़े आश्वासनोंके साथ समझाना आरम्भ किया; किंतु जब मैंने उसकी प्रार्थना ठुकरा दी, तब उसने क्रोधपूर्वक मेरे साथ बलात्कार करनेका विचार किया ।। ३० ।।

विदित्वा तस्य संकल्पं कीचकस्य दुरात्मनः ।
तथाहं राजशरणं जवेनैव प्रधाविता ।। ३१ ।।

दुरात्मा कीचकके उस संकल्पको मैं जान गयी और राजाकी शरणमें पहुँचनेके लिये बड़े वेगसे भागी ।।

संदर्शने तु मां राज्ञः सूतपुत्रः परामृशत् ।
पातयित्वा तु दुष्टात्मा पदाहं तेन ताडिता ।। ३२ ।।

किंतु वहाँ भी दुष्टात्मा सूतपुत्रने राजाके सामने मुझे पकड़ लिया और पृथ्वीपर गिराकर लातसे मारा ।।

प्रेक्षते स्म विराटस्तु कङ्कस्तु बहवो जनाः ।
रथिनः पीठमर्दश्च हस्त्यारोहाश्च नैगमाः ।। ३३ ।।

राजा विराट देखते रह गये। कंक तथा अन्य लोगोंने भी यह सब देखा। रथी, पीठमर्द (राजाके प्रियव्यक्ति), महावत, वैदिक विद्वान् तथा नागरिक—सबकी दृष्टिमें यह बात आयी थी ।। ३३ ।।

उपालब्धो मया राजा कङ्कश्चापि पुनः पुनः ।
ततो न वारितो राज्ञा न तस्याविनयः कृतः ।। ३४ ।।

मैंने राजा विराट और कंकको बार-बार फटकारा, तो भी राजाने न तो उसे मना किया और न उसकी उद्दण्डताका दमन ही किया ।। ३४ ।।

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योऽयं राज्ञो विराटस्थ कीचको नाम सारथिः ।
त्यक्तधर्मा नृशंसश्च नरस्त्रीसम्मतः प्रियः ॥ ३५ ॥
राजा विराटका यह जो कीचक नामवाला सारथि है, इसने धर्मको त्याग दिया है। यह अत्यन्त क्रूर है, तो भी विराट और सुदेष्णा दोनों पति-पत्नी उसे बहुत मानते हैं। यह उनका प्रिय सेनापति है ॥ ३५ ॥

शूरोऽभिमानी पापात्मा सर्वार्थेषु च मुग्धवान् ।
दारमर्शी महाभाग लभतेऽर्थान् बहूनपि ॥ ३६ ॥
इसे अपनी शूरवीरताका बड़ा अभिमान है। यह पापात्मा सब बातोंमें मूर्ख है। महाभाग! यह परायी स्त्रियोंपर बलात्कार करता और लोगोंसे बहुत धन हड़पता रहता है ॥ ३६ ॥

आहरेदपि वित्तानि परेषां क्रोशतामपि ।
न तिष्ठति स्म सन्मार्गे न च धर्मं बुभूषति ॥ ३७ ॥
लोग रोते-चिल्लाते रह जाते हैं; किंतु यह उनका सारा धन हड़प लेता है। यह सन्मार्गमें स्थिर नहीं रहता तथा धर्मोपार्जन भी नहीं करना चाहता है ॥ ३७ ॥

पापात्मा पापभावश्च कामबाणवशानुगः ।
अविनीतश्च दुष्टात्मा प्रत्याख्यातः पुनः पुनः ॥ ३८ ॥
यह पापात्मा है; इसके मनमें पापकी ही वासना है। यह कामदेवके बाणोंसे विवश हो रहा है। उद्धण्ड और दुष्टात्मा तो है ही। मैंने बार-बार इसकी प्रार्थना ठुकरायी है ॥ ३८ ॥

दर्शने दर्शने हन्याद् यदि जह्यां च जीवितम् ।
तद् धर्मे यतमानानां महान् धर्मो नशिष्यति ॥ ३९ ॥
अतः यह जब-जब सामने आयेगा, मुझे मारेगा। सम्भव है, किसी दिन मुझे जीवनसे भी हाथ धोना पड़े। उस दशामें धर्मके लिये प्रयत्न करनेवाले तुम सब लोगोंका सबसे महान् धर्म नष्ट हो जायगा ॥ ३९ ॥

समयं रक्षमाणानां भार्या वो न भविष्यति ।
भार्यायां रक्ष्यमाणायां प्रजा भवति रक्षिता ॥ ४० ॥
यदि तुमलोग प्रतिज्ञाके अनुसार तेरह वर्षकी अवधिका पालन करते रहोगे, तो तुम्हारी यह भार्या जीवित न रहेगी। भार्याकी रक्षा करनेपर संतानकी रक्षा होती है ॥ ४० ॥

प्रजायां रक्ष्यमाणायामात्मा भवति रक्षितः ।
आत्मा हि जायते तस्यां तेन जायां विदुर्बुधाः ॥ ४१ ॥
संतानकी रक्षा होनेपर अपना आत्मा सुरक्षित होता है। आत्मा ही पत्नीके गर्भसे पुत्ररूपमें जन्म लेता है। इसीलिये विद्वान् पुरुष पत्नीको 'जाया' कहते हैं ॥ ४१ ॥

भर्ता तु भार्यया रक्ष्यः कथं जायान्ममोदरे ।
वदतां वर्णधर्मांश्च ब्राह्मणानामिति श्रुतः ॥ ४२ ॥

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मैंने वर्णधर्मका उपदेश देनेवाले ब्राह्मणोंके मुँहसे सुना है, पत्नीको पतिकी रक्षा इसलिये करनी चाहिये कि यह किसी दिन मेरे पेटसे पुत्ररूपमें जन्म लेगा ॥ ४२ ॥

क्षत्रियस्य सदा धर्मो नान्यः शत्रुनिबर्हणात् ।
पश्यतो धर्मराजस्य कीचको मां पदावधीत् ॥ ४३ ॥
तव चैव समक्षं वै भीमसेन महाबल ।
त्वया ह्याहं परित्राता तस्माद् घोराज्जटासुरात् ॥ ४४ ॥
महाबली भीमसेन! क्षत्रियके लिये सदा शत्रुओंका संहार करनेके सिवा और कोई धर्म नहीं है। कीचकने धर्मराज युधिष्ठिरके देखते-देखते और तुम्हारी आँखोंके सामने मुझे लात मारी है। तुमने उस भयंकर राक्षस जटासुरसे मेरी रक्षा की है ॥ ४३-४४ ॥

जयद्रथं तथैव त्वमजैषीर्भ्रातृभिः सह ।
जहीममपि पापिष्ठं योऽयं मामवमन्यते ॥ ४५ ॥
भाइयोंसहित तुमने जयद्रथको भी परास्त किया है। अतः अब इस महापापी कीचकको भी मार डालो, जो मेरा अपमान कर रहा है ॥ ४५ ॥

कीचको राजवाल्लभ्याच्छोककृन्मम भारत ।
तमेवं कामसम्मतं भिन्धि कुम्भमिवाश्मनि ॥ ४६ ॥
भारत! राजाका प्रिय होनेके कारण ही कीचक मेरे लिये शोककारक हो रहा है। अतः ऐसे कामोन्मत्त पापीको तुम उसी तरह विदीर्ण कर डालो, जैसे पत्थर-पर पटककर घड़ेको फोड़ दिया जाता है ॥ ४६ ॥

यो निमित्तमनर्थानां बहूनां मम भारत ।
तं चेज्जीवन्तमादित्यः प्रातरभ्युदयिष्यति ॥ ४७ ॥
विषमालोड्य पास्यामि मा कीचकवशं गमम् ।
श्रेयो हि मरणं मह्यं भीमसेन तवाग्रतः ॥ ४८ ॥
भारत! जो मेरे लिये बहुत-से अनर्थोंका कारण बना हुआ है, उसके जीते-जी यदि कल सूर्योदय हो जायगा, तो मैं विष घोलकर पी लूँगी; किंतु कीचकके अधीन नहीं होऊँगी। भीमसेन! कीचकके वशमें पड़नेकी अपेक्षा तुम्हारे सामने प्राण त्याग देना मेरे लिये कल्याणकारी होगा ॥ ४७-४८ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा प्रारुदत् कृष्णा भीमस्योरःसमाश्रिता ।
भीमश्च तां परिष्वज्य महत् सान्त्वं प्रयुज्य च ॥ ४९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर द्रौपदी भीमके वक्षःस्थलपर माथा टेककर फूट-फूटकर रोने लगी। भीमसेनने उसको हृदयसे लगाकर बहुत सान्त्वना दी ॥ ४९ ॥

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आश्वासयित्वा बहुशो भृशमार्तां सुमध्यमाम् ।
हेतुतत्त्वार्थसंयुक्तैर्वचोभिर्द्रुपदात्मजाम् ॥ ५० ॥
प्रमृज्य वदनं तस्याः पाणिनाश्रुसमाकुलम् ।
कीचकं मनसागच्छत् सृक्किणी परिसंलिहन् ।
उवाच चैनां दुःखार्तां भीमः क्रोधसमन्वितः ॥ ५१ ॥

वह बहुत आर्त हो रही थी, अतः उन्होंने सुन्दर कटिभागवाली द्रुपदकुमारीको युक्तियुक्त तात्त्विक वचनोंसे अनेक बार आश्वासन देकर अपने हाथसे उसके आँसूभरे मुँहको पोंछा और क्रोधसे जबड़े चाटते हुए मन-ही-मन कीचकका स्मरण किया। तदनन्तर भीमने दुःखपीड़ित द्रौपदीसे इस प्रकार कहा॥ ५०-५१ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीसान्त्वने एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीको आश्वासनविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2279)

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द्वाविंशोऽध्यायः

कीचक और भीमसेनका युद्ध तथा कीचकवध

भीमसेन उवाच

तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे ।
अद्य तं सूदयिष्यामि कीचकं सहबान्धवम् ॥ १ ॥
भीमसेन बोले—भद्रे! तू जैसा कह रही है, वैसा ही करूँगा। भीरु! मैं आज कीचकको उसके भाई-बन्धुओंसहित मार डालूँगा ॥ १ ॥
अस्याः प्रदोषे शर्वर्याः कुरुष्वानेन संगतम् ।
दुःखं शोकं च निर्धूय याज्ञसेनि शुचिस्मिते ॥ २ ॥
पवित्र मुसकानवाली द्रौपदी! तुम दुःख-शोक भुलाकर आगामी रात्रिके प्रदोषकालमें कीचकसे मिलो और उसे नृत्यशालामें आनेके लिये कह दो ॥ २ ॥
यैषा नर्तनशालेह मत्स्यराजेन कारिता ।
दिवात्र कन्या नृत्यन्ति रात्रौ यान्ति यथागृहम् ॥ ३ ॥
मत्स्यराज विराट्ने जो यहाँ नृत्यशाला बनवायी है, उसमें दिनके समय तो कन्याएँ नाचती हैं तथा रातको अपने-अपने घर चली जाती हैं ॥ ३ ॥
तत्रास्ति शयनं दिव्यं दृढाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् ।
तत्रास्य दर्शयिष्यामि पूर्वप्रेतान् पितामहान् ॥ ४ ॥
उस नृत्यशालामें एक बहुत सुन्दर मजबूत पलंग बिछा हुआ है। वहीं आनेपर उस कीचकको मैं उसके मरे हुए बाप-दादोंका दर्शन कराऊँगा ॥ ४ ॥
यथा च त्वां न पश्येयुः कुर्वाणां तेन संविदम् ।
कुर्यास्तथा त्वं कल्याणि यथा संनिहितो भवेत् ॥ ५ ॥
तुम ऐसी चेष्टा करना, जिससे उसके साथ गुप्त वार्तालाप करते समय कोई तुम्हें देख न ले। कल्याणी! तुम ऐसी बात करना, जिससे वहाँ दिये हुए संकेतके अनुसार वह अवश्य मेरे पास आ जाय ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तथा तौ कथयित्वा तु बाष्पमुत्सृज्य दुःखितौ ।
रात्रिशेषं तमत्युग्रं धारयामासतुर्हृदि ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार बातचीत करके वे दोनों दुःखी दम्पति आँसू बहाकर अलग हुए तथा रात्रिके शेषभागको उन्होंने बड़ी व्याकुलतासे बिताया और आपसकी बातचीतको मनमें ही गुप्त रखा ॥ ६ ॥

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तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरुत्थाय कीचकः ।
गत्वा राजकुलायैव द्रौपदीमिदमब्रवीत् ॥ ७ ॥
वह रात बीत जानेपर कीचक सबेरे उठा और राजमहलमें जाकर द्रौपदीसे इस प्रकार बोला— ॥ ७ ॥

सभायां पश्यतो राज्ञः पातयित्वा पदाहनम् ।
न चैवालभसे त्राणमभिपन्ना बलीयसा ॥ ८ ॥
‘सैरन्ध्री! मैंने राजसभामें तुम्हारे महाराजके देखते-देखते तुम्हें पृथ्वीपर गिराकर लातोंसे मारा था। तुम मुझ-जैसे महाबलवान् पुरुषके पाले पड़ी हो; तुम्हें कोई बचा नहीं सकता ॥ ८ ॥

प्रवादेनेह मत्स्यानां राजा नाम्नायमुच्यते ।
अहमेव हि मत्स्यानां राजा वै वाहिनीपतिः ॥ ९ ॥
‘राजा विराट तो कहनेके लिये ही मत्स्यदेशका नाममात्रका राजा है। वास्तवमें मैं ही यहाँका राजा हूँ; क्योंकि सेनाका मालिक मैं हूँ ॥ ९ ॥

मां सुखं प्रतिपद्यस्व दासो भीरु भवामि ते ।
अह्नाय तव सुश्रोणि शतं निष्कान् ददाम्यहम् ॥ १० ॥
‘भीरु! सुखपूर्वक मुझे स्वीकार कर लो, फिर तो मैं तुम्हारा दास बन जाऊँगा। सुश्रोणि! मैं तुम्हारे दैनिक खर्चके लिये प्रतिदिन सौ मोहरें देता रहूँगा ॥ १० ॥

दासीशतं च ते दद्यां दासानामपि चापरम् ।
रथं चाश्वतरीयुक्तमस्तु नौ भीरु संगमः ॥ ११ ॥
‘तुम्हारी सेवाके लिये सौ दासियाँ और उतने ही दास दूँगा। तुम्हारी सवारीके लिये खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ प्रस्तुत रहेगा। भीरु! अब हम दोनोंका परस्पर समागम होना चाहिये ॥ ११ ॥

द्रौपद्युवाच

एवं मे समयं त्वद्य प्रतिपद्यस्व कीचक ।
न त्वां सखा वा भ्राता वा जानीयात् संगतं मया ॥ १२ ॥
द्रौपदीने कहा—कीचक! यदि ऐसी बात है, तो आज मेरी एक शर्त स्वीकार करो। तुम मुझसे मिलने आते हो—यह बात तुम्हारा मित्र अथवा भाई कोई भी न जाने ॥ १२ ॥

अनुप्रवादाद् भीतास्मि गन्धर्वाणां यशस्विनाम् ।
एवं मे प्रतिजानीहि ततोऽहं वशगा तव ॥ १३ ॥
क्योंकि मैं यशस्वी गन्धर्वोंके अपवादसे डरती हूँ। यदि इस बातके लिये मुझसे प्रतिज्ञा करो, तो मैं तुम्हारे अधीन हो सकती हूँ ॥ १३ ॥

कीचक उवाच

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एवमेतत् करिष्यामि यथा सुश्रोणि भाषसे ।
एको भद्रे गमिष्यामि शून्यमावसथं तव ॥ १४ ॥
कीचक बोला—ठीक है। सुश्रोणि! तुम जैसा कहती हो, वैसा ही करूँगा। भद्रे! तुम्हारे सूने घरमें मैं अकेला ही जाऊँगा ॥ १४ ॥
समागमार्थं रम्भोरु त्वया मदनमोहितः ।
यथा त्वां नैव पश्येयुर्गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः ॥ १५ ॥
रम्भोरु! मैं कामसे मोहित होकर तुम्हारे साथ समागमके लिये इस प्रकार आऊँगा, जिससे सूर्यके समान तेजस्वी गन्धर्व तुम्हें उस समय मेरे साथ न देख सकें ॥ १५ ॥

द्रौपद्युवाच

यदेतन्नर्तनागारं मत्स्यराजेन कारितम् ।
दिवात्र कन्या नृत्यन्ति रात्रौ यान्ति यथागृहम् ॥ १६ ॥
द्रौपदीने कहा—कीचक! मत्स्यराजाने यह जो नृत्यशाला बनवायी है, उसमें दिनके समय कन्याएँ नृत्य करती हैं तथा रातमें अपने-अपने घर चली जाती हैं ॥
तमित्रे तत्र गच्छेथा गन्धर्वास्तन्न जानते ।
तत्र दोषः परिहृतो भविष्यति न संशयः ॥ १७ ॥
वहाँ अँधेरा रहता है, अतः मुझसे मिलनेके लिये वहीं जाना। उस स्थानको गन्धर्व नहीं जानते। वहाँ मिलनेसे सब दोष दूर हो जायगा; इसमें संशय नहीं है ॥ १७ ॥

(कीचक उवाच

तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु मन्यसे ।
एकः सन् नर्तनागारमागमिष्यामि शोभने ॥
समागमार्थं सुश्रोणि शपे च सुकृतेन मे ।
कीचक बोला—भद्रे! भीरु! तुम जैसा ठीक समझती हो, वैसा ही करूँगा। शोभने! मैं तुमसे मिलनेके लिये अकेला ही नृत्यशालामें आऊँगा। सुश्रोणि! यह बात मैं अपने पुण्यकी शपथ खाकर कहता हूँ।
यथा त्वां नावबुध्यन्ते गन्धर्वा वरवर्णिनि ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि गन्धर्वेभ्यो न ते भयम् ।)
वरवर्णिनी! मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे गन्धर्वोंको तुम्हारे विषयमें कुछ भी पता न लगे। मैं सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि तुम्हें गन्धर्वोंसे कोई भय नहीं है।

वैशम्पायन उवाच

तमर्थमपि जल्पन्याः कृष्णायाः कीचकेन ह ।
दिवसार्धं समभवन्मासेनेव समं नृप ॥ १८ ॥

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**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार कीचकके साथ बात करनेके बाद द्रौपदीको अवशिष्ट आधा दिन (भीमसेनसे यह बात निवेदन करनेकी प्रतीक्षामें) एक महीनेके समान भारी मालूम हुआ ।। १८ ।।
कीचकोऽथ गृहं गत्वा भृशं हर्षपरिप्लुतः ।
सैरन्ध्रीरूपिणं मूढो मृत्युं तं नावबुद्धवान् ।। १९ ।।
इधर कीचक महान् हर्षमें भरा हुआ अपने घरको गया। उस मूर्खको यह पता नहीं था कि सैरन्ध्रीके रूपमें मेरी मृत्यु आ रही है ।। १९ ।।
गन्धाभरणमाल्येषु व्यासक्तः सविशेषतः ।
अलंचक्रे तदाऽऽत्मानं सत्वरः काममोहितः ।। २० ।।
वह तो कामसे मोहित हो रहा था, अतः घर जाकर शीघ्र ही अपने-आपको (गहने-कपड़ोंसे) सजाने लगा। वह विशेषतः सुगन्धित पदार्थों, आभूषणों तथा मालाओंके सेवनमें संलग्न रहा ।। २० ।।
तस्य तत् कुर्वतः कर्म कालो दीर्घ इवाभवत् ।
अनुचिन्तयतश्चापि तामेवायतलोचनाम् ।। २१ ।।
मन-ही-मन विशाल नेत्रोंवाली द्रौपदीका बारंबार चिन्तन करते हुए शृंगार धारण करते समय कीचकको वह थोड़ा-सा समय भी उत्कण्ठावश बहुत बड़ा-सा प्रतीत हुआ ।। २१ ।।
आसीदभ्यधिका चापि श्रीः श्रियं प्रमुमुक्षतः ।
निर्वाणकाले दीपस्य वर्तीमिव दिधक्षतः ।। २२ ।।
वास्तवमें जो सदाके लिये राजलक्ष्मीसे वियुक्त होनेवाला है, उस कीचककी भी उस समय शृंगार आदि धारण करनेसे श्री (शोभा) बहुत बढ़ गयी थी। ठीक उसी तरह जैसे बुझनेके समय बत्तीको भी जला देनेकी इच्छावाले दीपककी प्रभा विशेष बढ़ जाती है ।। २२ ।।
कृतसम्प्रत्ययस्तस्याः कीचकः काममोहितः ।
नाजानाद् दिवसं यान्तं चिन्तयानः समागमम् ।। २३ ।।
काममोहित कीचकने द्रौपदीकी बातपर पूरा विश्वास कर लिया था; अतः उसके समागम-सुखका चिन्तन करते-करते उसे यह भी पता न चला कि दिन कब बीत गया ।। २३ ।।
ततस्तु द्रौपदी गत्वा तदा भीमं महानसे ।
उपातिष्ठत कल्याणी कौरव्यं पतिमन्तिकम् ।। २४ ।।
तदनन्तर कल्याणस्वरूपा द्रौपदी पाकशालामें अपने पति कुरुनन्दन भीमसेनके पास गयी ।। २४ ।।
तमुवाच सुकेशान्ता कीचकस्य मया कृतः ।
संगमो नर्तनागारे यथावोचः परंतप ।। २५ ।।

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वहाँ सुन्दर लटोंवाली कृष्णाने कहा—'शत्रुतापन! जैसा तुमने कहा था, उसके अनुसार मैंने कीचकको नृत्यशालामें मिलनेका संकेत कर दिया है ॥ २५ ॥
शून्यं स नर्तनागारमागमिष्यति कीचकः ।
एको निशि महाबाहो कीचकं तं निष्पूदय ॥ २६ ॥
'अतः महाबाहो! कीचक रातके समय उस सूनी नृत्यशालामें अकेला आवेगा। तुम वहीं उसे मार डालना ॥
तं सूतपुत्रं कौन्तेय कीचकं मददर्पितम् ।
गत्वा त्वं नर्तनागारं निर्जीवं कुरु पाण्डव ॥ २७ ॥
'कुन्तीकुमार! पाण्डुनन्दन! तुम नृत्यगृहमें जाकर उस मदोन्मत्त सूतपुत्र कीचकको प्राणशून्य कर दो ॥ २७ ॥
दर्पाच्च सूतपुत्रोऽसौ गन्धर्वानवमन्यते ।
तं त्वं प्रहरतां श्रेष्ठ ह्रदान्नागमिवोद्धर ॥ २८ ॥
'प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ वीर! वह सूतपुत्र अपनी वीरताके घमंडमें आकर गन्धर्वोंकी अवहेलना करता है; अतः जलाशयसे सर्पकी भाँति उसे तुम इस जगत्‌से निकाल फेंको ॥ २८ ॥
अश्रु दुःखाभिभूताया मम मार्जस्व भारत ।
आत्मनश्चैव भद्रं ते कुरु मानं कुलस्य च ॥ २९ ॥
'भारत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कीचकको मारकर मुझ दुःखपीड़ित अबलाके आँसू पोंछो तथा अपना और अपने कुलका सम्मान बढ़ाओ' ॥ २९ ॥

भीमसेन उवाच

स्वागतं ते वरारोहे यन्मां वेदयसे प्रियम् ।
न ह्यन्यं कञ्चिदिच्छामि सहायं वरवर्णिनि ॥ ३० ॥
**भीमसेन बोले—**वरारोहे! तुम्हारा स्वागत है; क्योंकि तुमने मुझे प्रिय संवाद सुनाया है। सुन्दरी! मैं इस कार्यमें दूसरे किसीको सहायक बनाना नहीं चाहता ॥
या मे प्रीतिस्त्वयाऽऽख्याता कीचकस्य समागमे ।
हत्वा हिडिम्बं सा प्रीतिर्ममासीद् वरवर्णिनि ॥ ३१ ॥
वरवर्णिनि! कीचकसे मिलनेके लिये तुमने जो शुभ संवाद दिया है और इसे सुनकर मुझे जितनी प्रसन्नता हुई है, ऐसी प्रसन्नता मुझे हिडिम्बासुरको मारकर प्राप्त हुई थी ॥ ३१ ॥
सत्यं भ्रातृंश्च धर्मं च पुरस्कृत्य ब्रवीमि ते ।
कीचकं निहनिष्यामि वृत्रं देवपतिर्यथा ॥ ३२ ॥

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मैं सत्य, धर्म और भाइयोंको आगे करके—उनकी शपथ खाकर तुमसे कहता हूँ, जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था, उसी प्रकार मैं भी कीचकका वध कर डालूँगा ॥ ३२ ॥
तं गह्वरे प्रकाशे वा पोथयिष्यामि कीचकम् ।
अथ चेदपि योत्स्यन्ति हिंसे मत्स्यान्पि ध्रुवम् ॥ ३३ ॥
एकान्तमें या जन-समुदायमें जहाँ भी वह मिलेगा, कीचकको मैं कुचल डालूँगा और यदि मत्स्यदेशके लोग उसकी ओरसे युद्ध करेंगे, तो उन्हें भी निश्चय ही मार डालूँगा ॥ ३३ ॥
ततो दुर्योधनं हत्वा प्रतिपत्स्ये वसुन्धराम् ।
कामं मत्स्यमुपास्तां हि कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३४ ॥
तदनन्तर दुर्योधनको मारकर समूची पृथ्वीका राज्य ले लूँगा। भले ही कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर यहाँ बैठकर मत्स्यराज विराटकी उपासना करते रहें ॥ ३४ ॥

द्रौपद्युवाच
यथा न संत्यजेथास्त्वं सत्यं वै मत्कृते विभो ।
निगूढस्त्वं तथा पार्थ कीचकं तं निष्षूदय ॥ ३५ ॥
द्रौपदीने कहा—प्रभो! तुम वही करो, जिससे मेरे लिये तुम्हें सत्यका परित्याग न करना पड़े। कुन्तीनन्दन! तुम अपनेको गुप्त रखकर ही उस कीचकका संहार करो ॥ ३५ ॥

भीमसेन उवाच
एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे ।
अद्य तं सूदयिष्यामि कीचकं सह बान्धवैः ॥ ३६ ॥
भीमसेन बोले—ठीक है, भीरु! तुम जैसा कहती हो, वही करूँगा। आज मैं उस कीचकको उसके भाई-बन्धुओंसहित मार डालूँगा ॥ ३६ ॥
अदृश्यमानस्तस्याथ तमस्विन्यामनिन्दिते ।
नागो बिल्वमिवाक्रम्य पोथयिष्याम्यहं शिरः ।
अलभ्यामिच्छतस्तस्य कीचकस्य दुरात्मनः ॥ ३७ ॥
अनिन्दिते! गजराज जैसे बेलके फलपर पैर रखकर उसे कुचल दे, उसी प्रकार मैं अँधेरी रातमें उससे अदृश्य रहकर तुझ-जैसी अलभ्य नारीको प्राप्त करनेकी इच्छावाले दुरात्मा कीचकके मस्तकको कुचल डालूँगा ॥ ३७ ॥

वैशम्पायन उवाच
भीमोऽथ प्रथमं गत्वा रात्रौ छन्न उपाविशत् ।
मृगं हरिरिवादृश्यः प्रत्याकाङ्क्षत कीचकम् ॥ ३८ ॥

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**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर भीमसेन रातके समय पहले ही जाकर नृत्यशालामें छिपकर बैठ गये और कीचककी इस प्रकार प्रतीक्षा करने लगे, जैसे सिंह अदृश्य रहकर मृगकी घातमें बैठा रहता है ॥ ३८ ॥

कीचकश्चाप्यलंकृत्य यथाकाममुपागमत् ।
तां वेलां नर्तनागारं पाञ्चालीसंगमाशया ॥ ३९ ॥
इधर कीचक भी इच्छानुसार वस्त्राभूषणोंसे सज-धजकर द्रौपदीके साथ समागमकी अभिलाषासे उसी समय नृत्यशालाके समीप आया ॥ ३९ ॥

मन्यमानः स संकेतमागारं प्राविशच्च तत् ।
प्रविश्य च स तद् वेश्म तमसा संवृतं महत् ॥ ४० ॥
उस गृहको संकेत-स्थान मानकर उसने भीतर प्रवेश किया। वह विशाल भवन सब ओरसे अन्धकारसे आच्छन्न हो रहा था ॥ ४० ॥

पूर्वागतं ततस्तत्र भीममप्रतिमौजसम् ।
एकान्तावस्थितं चैनमाससाद स दुर्मतिः ॥ ४१ ॥
शयानं शयने तत्र सूतपुत्रः परामृशत् ।
जाज्वल्यमानं कोपेन कृष्णाधर्षणजेन ह ॥ ४२ ॥
अतुलितपराक्रमी भीमसेन तो वहाँ पहलेसे ही आकर एकान्तमें एक शय्यापर लेटे हुए थे। खोटी बुद्धिवाला सूतपुत्र कीचक वहीं पहुँच गया और उन्हें हाथसे टटोलने लगा। उस समय भीमसेन कीचकद्वारा द्रौपदीके अपमानके कारण क्रोधसे जल रहे थे ॥ ४१-४२ ॥

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उपसंगम्य चैवैनं कीचकः काममोहितः ।
हर्षोन्मथितचित्तात्मा स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ ४३ ॥
उनके पास पहुँचते ही काममोहित कीचक हर्षसे उन्मत्तचित्त हो मुसकराते हुए बोला— ॥ ४३ ॥
प्रापितं ते मया वित्तं बहुरूपमनन्तकम् ।
यत् कृतं धनरत्नाढ्यं दासीशतपरिच्छदम् ॥ ४४ ॥
रूपलावण्ययुक्ताभिर्युवतीभिरलंकृतम् ।
गृहं चान्तःपुरं सुभ्रु क्रीडारतिविराजितम् ।
तत् सर्वं त्वां समुद्दिश्य सहसाहमुपागतः ॥ ४५ ॥
‘सुभ्रु! मैंने अनेक प्रकारका जो अनन्त धन संचित किया है, वह सब तुम्हें भेंट कर दिया तथा मेरा जो धन-रत्नादिसे सम्पन्न, सैकड़ों दासी आदि उपकरणोंसे युक्त, रूप-लावण्यवती युवतियोंसे अलंकृत तथा क्रीडा-विलाससे सुशोभित गृह एवं अन्तःपुर है, वह सब तुम्हारे लिये ही निछावर करके मैं सहसा तुम्हारे पास चला आया हूँ ॥ ४४-४५ ॥
अकस्मान्मां प्रशंसन्ति सदा गृहगताः स्त्रियः ।
सुवासा दर्शनीयश्च नान्योऽस्ति त्वादृशः पुमान् ॥ ४६ ॥
मेरे घरकी स्त्रियाँ अकस्मात् मेरी प्रशंसा करने लगती हैं और कहती हैं—‘आपके समान सुन्दर वस्त्रधारी और दर्शनीय दूसरा कोई पुरुष नहीं है’ ॥ ४६ ॥

भीमसेन उवाच

दिष्ट्या त्वं दर्शनीयोऽथ दिष्ट्याऽऽत्मानं प्रशंससि ।
ईदृशस्तु त्वया स्पर्शः स्पृष्टपूर्वो न कर्हिचित् ॥ ४७ ॥
**भीमसेन बोले—**सौभाग्यकी बात है कि तुम ऐसे दर्शनीय हो और यह भी भाग्यकी ही बात है कि तुम स्वयं ही अपनी प्रशंसा कर रहे हो। परंतु ऐसा कोमल स्पर्श भी तुम्हें पहले कभी नहीं प्राप्त हुआ होगा ॥
स्पर्शं वेत्सि विदग्धस्त्वं कामधर्मविचक्षणः ।
स्त्रीणां प्रीतिकरो नान्यस्त्वत्समः पुरुषस्त्विह ॥ ४८ ॥
स्पर्शको तो तुम खूब पहचानते हो। इस कलामें बड़े चतुर हो। कामधर्मके विलक्षण ज्ञाता जान पड़ते हो। इस संसारमें स्त्रियोंको प्रसन्न करनेवाला तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं है ॥ ४८ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा तं महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः ।
सहसोत्पत्य कौन्तेयः प्रहस्येदमुवाच ह ॥ ४९ ॥

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**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कीचकसे ऐसा कहकर भयंकरपराक्रमी कुन्तीपुत्र महाबाहु भीमसेन सहसा उछलकर खड़े हो गये और हँसते हुए इस प्रकार बोले—॥ ४९ ॥
अद्य त्वां भगिनी पापं कृष्यमाणं मया भुवि ।
द्रक्ष्यतेऽद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महाग़जम् ॥ ५० ॥
'अरे! तू पर्वतके समान विशालकाय है, तो भी जैसे सिंह महान् गजराजको घसीटता है, उसी प्रकार आज मैं तुझ पापीको पृथ्वीपर पटककर घसीटूंगा और तेरी बहिन यह सब देखेगी ॥ ५० ॥
निराबाधा त्वयि हते सैरन्ध्री विचरिष्यति ।
सुखमेव चरिष्यन्ति सैरन्ध्र्याः पतयः सदा ॥ ५१ ॥
'इस प्रकार तेरे मारे जानेपर सैरन्ध्री बेखटके विचरेगी और उसके पति भी सदा सुखसे ही रहेंगे' ॥ ५१ ॥
ततो जग्राह केशेषु माल्यवत्सु महाबलः ।
स केशेषु परामृष्टो बलेन बलिनां वरः ॥ ५२ ॥
आक्षिप्य केशान् वेगेन बाह्वोर्जग्राह पाण्डवम् ।
बाहुयुद्धं तयोरासीत् क्रुद्धयोर्नरसिंहयोः ॥ ५३ ॥
वसन्ते वासिताहेतोर्बलवद्द्वजयोरिव ।
ऐसा कहकर महाबली भीमसेनने उसके पुष्पहार-विभूषित केश पकड़ लिये। कीचक भी बलवानोंमें श्रेष्ठ था। सिरके बाल पकड़ लिये जानेपर उसने बलपूर्वक झटका देकर उन्हें छुड़ा लिया और बड़ी फुर्तीसे पाण्डुनन्दन भीमको दोनों भुजाओंमें भर लिया। तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए उन दोनों पुरुषसिंहोंमें बाहुयुद्ध होने लगा, मानो वसन्त-ऋतुमें हथिनीके लिये दो बलवान् गजराज एक-दूसरेसे जूझ रहे हों ॥ ५२-५३ १/२ ॥
कीचकानां तु मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ॥ ५४ ॥
वालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोः पुरेव कपिसिंहयोः ।
अन्योन्यमपि संरब्धौ परस्परजयैषिणौ ॥ ५५ ॥
एक ओर कीचकोंका प्रधान कीचक था, तो दूसरी ओर मनुष्योंमें श्रेष्ठ भीमसेन। जैसे पूर्वकालमें कपिश्रेष्ठ वाली और सुग्रीव दोनों भाइयोंमें घोर युद्ध हुआ था, वैसा ही इन दोनोंमें भी होने लगा। दोनों एक-दूसरेपर कुपित थे और परस्पर विजय पानेकी इच्छासे लड़ रहे थे ॥ ५४-५५ ॥
ततः समुद्यम्य भुजौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ ।
नखदंष्ट्राभिरन्योन्यं घ्नतः क्रोधविषोद्धतौ ॥ ५६ ॥
फिर दोनों क्रोधरूपी विषसे उद्धत हुए पाँच मस्तकोंवाले सर्पोंकी भाँति अपनी-अपनी (पाँच अंगुलियोंसे युक्त) भुजाओंको ऊपर उठाकर एक-दूसरेपर नखों और दाँतोंसे प्रहार

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करने लगे ॥ ५६ ॥
वेगेनाभिहतो भीमः कीचकेन बलीयसा ।
स्थिरप्रतिज्ञः स रणे पदान्न चलितः पदम् ॥ ५७ ॥
बलिष्ठ कीचकने बड़े वेगसे आघात किया, तो भी दृढ़प्रतिज्ञ भीम उस युद्धमें स्थिर रहे; एक पग भी पीछे नहीं हटे ॥ ५७ ॥
तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम् ।
उभावपि प्रकाशेते प्रवृद्धौ वृषभाविव ॥ ५८ ॥
फिर दोनों आपसमें गुँथ गये और एक-दूसरेको खींचने लगे। उस समय वे दो हृष्ट-पुष्ट साँड़ोंकी भाँति सुशोभित होते थे ॥ ५८ ॥
तयोर्ह्यासीत् सुतुमुलः सम्प्रहारः सुदारुणः ।
नखदन्तायुधवतोर्व्याघ्रयोरिव दृप्तयोः ॥ ५९ ॥
नख और दाँत ही उनके आयुध थे। जैसे दो मतवाले व्याघ्र परस्पर लड़ रहे हों, उसी प्रकार उनमें अत्यन्त भयंकर तुमुल युद्ध होने लगा ॥ ५९ ॥
अभिपत्याथ बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्षितः ।
मातङ्ग इव मातङ्गं प्रभिन्नकरटामुखम् ॥ ६० ॥
जैसे क्रोधमें भरा हुआ एक हाथी गण्डस्थलसे मद टपकाते हुए दूसरे हाथीको सूँड़से पकड़ ले, उसी प्रकार रोषयुक्त कीचकने सहसा झपटकर दोनों हाथोंसे भीमसेनको पकड़ लिया ॥ ६० ॥
स चाप्येनं तदा भीमः प्रतिजग्राह वीर्यवान् ।
तमाक्षिपत् कीचकोऽथ बलेन बलिनां वरः ॥ ६१ ॥
तब पराक्रमी भीमने भी झपटकर उसे पकड़ा, किंतु बलवानोंमें श्रेष्ठ कीचकने बलपूर्वक उन्हें झटक दिया ॥ ६१ ॥
तयोर्भुजविनिष्पेषामुभयोर्बलिनोस्तदा ।
शब्दः समभवद् घोरो वेणुस्फोटसमो युधि ॥ ६२ ॥
उस समय उस युद्धमें उन दोनों बलवानोंकी भुजाओंकी रगड़से बाँस फटनेका-सा भयानक शब्द होने लगा ॥ ६२ ॥
अथैनमाक्षिप्य बलाद् गृहमध्ये वृकोदरः ।
धूनयामास वेगेन वायुश्चण्ड इव द्रुमम् ॥ ६३ ॥
फिर जिस प्रकार प्रचण्ड आँधी वृक्षको झकझोर डालती है, उसी प्रकार भीमसेन कीचकको बलपूर्वक धक्के दे-देकर उसे नृत्यशालामें वेगसे घुमाने लगे ॥ ६३ ॥
भीमेन च परामृष्टो दुर्बलो बलिना रणे ।
प्रास्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् ॥ ६४ ॥

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उस युद्धमें बलवान् भीमकी पकड़में आकर यद्यपि कीचक अपना बल खो रहा था, तथापि वह यथाशक्ति उन्हें परास्त करनेकी चेष्टा करता रहा और भीमसेनको अपनी ओर खींचने लगा ।। ६४ ।।
ईषदाकलितं चापि क्रोधाद् द्रुतपदं स्थितम् ।
कीचको बलवान् भीमं जानुभ्यामाक्षिपद् भुवि ॥ ६५ ॥
जब वे कुछ-कुछ वशमें आ गये और उनका पैर कुछ लड़खड़ाने लगा, तब उस दशामें खड़े हुए भीमसेनको बलवान् कीचकने क्रोधपूर्वक दोनों घुटनोंसे मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया ।। ६५ ।।
पातितो भुवि भीमस्तु कीचकेन बलीयसा ।
उत्पपाताथ वेगेन दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ६६ ॥
अत्यन्त बलशाली कीचकद्वारा इस प्रकार भूमिपर गिराये हुए भीमसेन हाथमें दण्ड धारण करनेवाले यमराजकी भाँति बड़े वेगसे उछलकर खड़े हो गये ।। ६६ ।।
स्पर्धया च बलोन्मत्तौ तावुभौ सूतपाण्डवौ ।
निशीथे पर्यकर्षेतां बलिनौ निर्जने स्थले ॥ ६७ ॥
सूतपुत्र और पाण्डुनन्दन दोनों बलसे उन्मत्त हो रहे थे। वे दोनों बलवान् वीर स्पर्धाके कारण उस निर्जन स्थानमें आधी रातके समय एक-दूसरेको खींचते और धक्के देते रहे ।। ६७ ।।
ततस्तद् भवनं श्रेष्ठं प्राकम्पत मुहुर्मुहुः ।
बलवच्चापि संक्रुद्धावन्योन्यं प्रति गर्जतः ॥ ६८ ॥
इससे वह विशाल भवन बार-बार हिल उठता था। दोनों योद्धा बड़े क्रोधमें भरकर एक-दूसरेके सामने जोर-जोरसे गरज रहे थे ।। ६८ ।।
तलाभ्यां स तु भीमेन वक्षस्यभिहतो बली ।
कीचको रोषसंतप्तः पदान्न चलितः पदम् ॥ ६९ ॥
इतनेमें ही भीमने दोनों हथेलियोंसे कीचककी छातीपर प्रहार किया। चोट खाकर बलवान् कीचक क्रोधसे जल उठा, किंतु अपने स्थानसे एक पग भी विचलित नहीं हुआ ।। ६९ ।।
मुहूर्तं तु स तं वेगं सहित्वा भुवि दुःसहम् ।
बलादहीयत तदा सूतो भीमबलार्दितः ॥ ७० ॥
भूमिपर खड़े रहकर दो घड़ीतक उस दुःसह वेगको सह लेनेके पश्चात् भीमसेनके बलसे पीड़ित हो सूतपुत्र कीचक अपनी शक्ति खो बैठा ।। ७० ।।
तं हीयमानं विज्ञाय भीमसेनो महाबलः ।
वक्षस्यानीय वेगेन ममर्देनं विचेतसम् ॥ ७१ ॥

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महाबली भीमसेन उसे निर्बल एवं अचेत होते देख उसकी छातीपर चढ़ बैठे और बड़े वेगसे उसे रौंदने लगे ॥ ७१ ॥
क्रोधाविष्टो विनिःश्वस्य पुनश्चैनं वृकोदरः ।
जग्राह जयतां श्रेष्ठः केशेष्वेव तदा भृशम् ॥ ७२ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ भीमसेनका क्रोधावेश अभी उतरा नहीं था। उन्होंने पुनः बारंबार उच्छ्वास लेकर कीचकके केश पकड़ लिये ॥ ७२ ॥
गृहीत्वा कीचकं भीमो विरराज महाबलः ।
शार्दूलः पिशिताकाङ्क्षी गृहीत्वेव महामृगम् ॥ ७३ ॥
जैसे कच्चे मांसकी अभिलाषा रखनेवाला सिंह महान् मृगको पकड़ ले, उसी प्रकार महाबली भीम कीचकको पकड़कर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७३ ॥
तत एनं परिश्रान्तमुपलभ्य वृकोदरः ।
योक्त्रयामास बाहुभ्यां पशुं रशनया यथा ॥ ७४ ॥
तदनन्तर उसे अत्यन्त थका जानकर भीमने अपनी भुजाओंमें इस प्रकार कस लिया, जैसे पशुको रस्सीसे बाँध दिया गया हो ॥ ७४ ॥
नदन्तं च महानादं भिन्नभेरीसमस्वनम् ।
भ्रामयामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ॥ ७५ ॥
अब वह फूटे नगारेके समान विकृत स्वरमें जोर-जोरसे सिंहनाद करने तथा बन्धनसे छूटनेके लिये छटपटाने लगा। उसकी चेतना लुप्त हो रही थी। उसी दशामें भीमसेनने बहुत देरतक उसे घुमाया ॥ ७५ ॥
प्रगृह्य तरसा दोर्भ्यां कण्ठं तस्य वृकोदरः ।
अपीडयत् कृष्णायास्तदा कोपोपशान्तये ॥ ७६ ॥
फिर द्रौपदीका क्रोध शान्त करनेके लिये उन्होंने दोनों हाथोंसे उसका गला पकड़कर बड़े वेगसे दबाया ॥
अथ तं भग्नसर्वाङ्गं व्याविद्धनयनाम्बरम् ।
आक्रम्य च कटीदेशे जानुना कीचकाधमम् ।
अपीडयत् बाहुभ्यां पशुमारममारयत् ॥ ७७ ॥
इस प्रकार जब उसके सब अंग भग्न हो गये, आँखकी पुतलियाँ बाहर निकल आयीं और वस्त्र फट गये, तब उन्होंने उस कीचकाधमकी कमरको अपने घुटनोंसे दबाकर दोनों भुजाओंद्वारा उसका गला घोंट दिया और उसे पशुकी तरह मारने लगे ॥ ७७ ॥
तं विषीदन्तमाज्ञाय कीचकं पाण्डुनन्दनः ।
भूतले भ्रामयामास वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ७८ ॥
मृत्युके समय कीचकको विषाद करते देख पाण्डुनन्दन भीमने उसे धरतीपर घसीटा और इस प्रकार कहा— ॥ ७८ ॥