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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

(व्रीहिद्रौणिकपर्व)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

(व्रीहिद्रौणिकपर्व)

एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाच

वने निवसतं तेषां पाण्डवानां महात्मनाम् ।
वर्षाण्येकादशातीयुः कृच्छ्रेण भरतर्षभ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार वनमें रहते हुए उन महात्मा पाण्डवोंके ग्यारह वर्ष बड़े कष्टसे बीते ॥ १ ॥

फलमूलाशनस्ते हि सुखार्हा दुःखमुत्तमम् ।
प्राप्तकालमनुध्यायन्तः सेहिरे वरपूरुषाः ॥ २ ॥
वे फल-मूल खाकर रहते थे। सुख भोगनेके योग्य होकर भी महान् कष्ट भोगते थे और यह सोचकर कि यह हमारे कष्टका समय है, इसे धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिये, चुपचाप सब दुःख झेलते थे। उनमें ऐसा विवेक इसलिये था कि वे सब-के-सब श्रेष्ठ पुरुष थे ॥ २ ॥

युधिष्ठिरस्तु राजर्षिरात्मकर्मापराधजम् ।
चिन्तयन् स महाबाहुर्भ्रातॄणां दुःखमुत्तमम् ॥ ३ ॥
महाबाहु राजर्षि युधिष्ठिर सदा यही सोचते रहते थे कि ‘मेरे भाइयोंपर जो यह महान् दुःख आ पड़ा है, मेरी ही करनीका फल है। मेरे ही अपराधसे इन्हें कष्ट भोगना पड़ रहा है’ ॥ ३ ॥

न सुष्वाप सुखं राजा हृदि शल्यैरिवार्पितैः ।
दौरात्म्यमनुपश्यंस्तत् काले द्यूतोद्भवस्य हि ॥ ४ ॥
संस्मरन् परुषा वाचः सूतपुत्रस्य पाण्डवः ।
निःश्वासपरमो दीनो बिभ्रत् कोपविषं महत् ॥ ५ ॥
इसी चिन्तामें पड़े-पड़े राजा युधिष्ठिर रातमें सुखकी नींद नहीं सो पाते थे। ये बातें उनके हृदयमें चुभे हुए काँटोंके समान दुःख दिया करती थीं। जूआ खेलनेके कारणभूत शकुनि आदिकी दुष्टतापर दृष्टिपात करके तथा सूतपुत्र कर्णकी कठोर बातोंको स्मरण करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर दीनभावसे लंबी साँसें लेते रहते और महान् क्रोधरूपी विषको अपने हृदयमें धारण करते थे ॥ ४-५ ॥

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अर्जुनों यमजौ चोभौ द्रौपदी च यशस्विनी ।
स च भीमो महातेजाः सर्वेषामुत्तमो बली ॥ ६ ॥
युधिष्ठिरमुदीक्षन्तः सेहुर्दुःखमनुत्तमम् ।
अर्जुन, दोनों भाई नकुल-सहदेव, यशस्विनी द्रौपदी तथा सर्वश्रेष्ठ बलवान् महातेजस्वी भीमसेन भी राजा युधिष्ठिरकी ओर देखते हुए महान्-से-महान् दुःखको चुपचाप सहते रहे ॥ ६ ½ ॥

अवशिष्टमल्पकालं मन्वानाः पुरुषर्षभाः ॥ ७ ॥
वपुरन्यदिवाकार्षुरुत्साहामर्षचेष्टितैः ।
‘अब तो वनवासका थोड़ा-सा ही समय शेष रह गया है, ऐसा समझकर नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने उत्साह एवं अमर्षयुक्त चेष्टाओंसे अपने शरीरको किसी और ही प्रकारका बना लिया था ॥ ७ ½ ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ ८ ॥
आजगाम महायोगी पाण्डवानवलोककः ।
तमागतमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
प्रत्युद्गम्य महात्मानं प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ।
तदनन्तर किसी समय महायोगी सत्यवतीनन्दन व्यास पाण्डवोंको देखनेके लिये वहाँ आये। उन महात्माको आया देख कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर उनकी अगवानीके लिये कुछ दूर आगे बढ़ गये और विधिपूर्वक स्वागत-सत्कारके साथ उन्हें अपने साथ लिवा लाये ॥ ८-९ ½ ॥

तमासीनमुपासीनः शुश्रूषुर्नियतेन्द्रियः ॥ १० ॥
तोषयन् प्रणिपातेन व्यासं पाण्डवनन्दनः ।
जब वे आसनपर बैठ गये तब पाण्डवोंका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सेवाकी इच्छासे व्यासजीके पास ही बैठ गये और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उन्होंने महर्षिको संतुष्ट किया ॥ १० ½ ॥

तानवेक्ष्य कृशान् पौत्रान् वने वन्येन जीवतः ॥ ११ ॥
महर्षिरनुकम्पार्थमब्रवीद् बाष्पगद्गदम् ।
अपने पौत्रोंको वनवासके कष्टसे दुर्बल तथा जंगली फल-मूल खाकर जीवननिर्वाह करते देख महर्षि व्यासको बड़ी दया आयी। वे उनपर कृपा करनेके लिये नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गद्गद कण्ठसे बोले— ॥ ११ ½ ॥

युधिष्ठिर महाबाहो शृणु धर्मभृतां वर ॥ १२ ॥
नातप्ततपसो लोके प्राप्नुवन्ति महासुखम् ।
सुखदुःखे हि पुरुषः पर्यायेणोपसेवते ॥ १३ ॥

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‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो, संसारमें जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे महान् सुखकी उपलब्धि नहीं कर पाते हैं। मनुष्य बारी-बारीसे सुख और दुःख दोनोंका सेवन करता है।। १२-१३।।

न ह्यनन्तं सुखं कश्चित् प्राप्नोति पुरुषर्षभ।
प्रज्ञावांस्त्वेव पुरुषः संयुक्तः परया धिया।। १४।।
उदयास्तमनज्ञो हि न हृष्यति न शोचति।
‘नरश्रेष्ठ! कोई भी इस जगत्में ऐसा सुख नहीं पाता, जिसका कभी अन्त न हो। उत्तम बुद्धिसे युक्त ज्ञानवान् पुरुष ही उत्पत्ति, स्थिति और लयके अधिष्ठानरूप परमात्माको जानकर कभी हर्ष और शोक नहीं करता है।। १४ १/२।।
सुखमापतितं सेवेद् दुःखमापतितं वहेत्।। १५।।
कालप्राप्तमुपासीत सस्यानामिव कर्षकः।
‘अतः विवेकी पुरुषको उचित है कि प्राप्त हुए सुखका (त्यागपूर्वक) सेवन करे और स्वतः आये हुए दुःखका भार भी (धैर्यपूर्वक) वहन करे। जैसे किसान बीज बोकर समयके अनुसार प्रारब्धवश जितना अन्न मिलता है, उसे ग्रहण करता है; उसी प्रकार मनुष्य समय-समयपर दैववश प्राप्त हुए सुख तथा दुःखको स्वीकार करें।। १५ १/२।।
तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत्।। १६।।

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नासाध्यं तपसः किंचिदिति बुद्धयस्व भारत ।
‘भारत! तपसे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। तपसे मनुष्य महत्पद (परमात्मा)-को प्राप्त कर लेता है। तुम इस बातको अच्छी तरह जान लो कि तपस्यासे कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १६½ ॥

सत्यमार्जवमक्रोधः संविभागो दमः शमः ॥ १७ ॥
अनसूयाविहिंसा च शौचमिन्द्रियसंयमः ।
पावनानि महाराज नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥ १८ ॥
‘महाराज! सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, देवता और अतिथियोंको देकर अन्न आदि ग्रहण करना, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, दूसरोंके दोष न देखना, हिंसा न करना, बाहर-भीतरकी पवित्रता रखना तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखना—ये पुण्यात्मा पुरुषोंके सद्गुण सबको पवित्र करनेवाले हैं ॥ १७-१८ ॥

अधर्मरुचयो मूढास्तिर्यग्गतिपरायणाः ।
कृच्छ्रां योनिमनुप्राप्ता न सुखं विन्दते जनाः ॥ १९ ॥
‘जो लोग अधर्ममें रुचि रखनेवाले हैं, वे मूढ़ मानव पशु-पक्षी आदि तिर्यग्-योनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं। उन कष्टदायक योनियोंमें पड़कर वे कभी सुख नहीं पाते हैं ॥ १९ ॥

इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपयुज्यते ।
तस्माच्छरीरं युञ्जीत तपसा नियमेन च ॥ २० ॥
‘इस लोकमें जो कर्म किया जाता है, उसका फल परलोकमें भोगना पड़ता है। इसलिये अपने शरीरको तप और नियमोंके पालनमें लगावे ॥ २० ॥

यथाशक्ति प्रयच्छेत सम्पूज्याभिप्रणम्य च ।
काले प्राप्ते च हृष्टात्मा राजन् विगतमत्सरः ॥ २१ ॥
‘राजन्! समयपर यदि कोई अतिथि आ जाय तो क्रोधरहित और प्रसन्नचित्त होकर अपनी शक्तिके अनुसार उसे दान दे; और विधिवत् पूजन करके उसे प्रणाम करे ॥ २१ ॥

सत्यवादी लभेतायुरनायासमथार्जवम् ।
अक्रोधनोऽनसूयश्च निर्वृतिं लभते पराम् ॥ २२ ॥
‘सत्यवादी मनुष्य दीर्घ आयु, क्लेशशून्यता (सुख) तथा सरलता प्राप्त करता है। जो क्रोध नहीं करता और दूसरोंके दोष नहीं देखता है, उसे परमानन्दपदकी प्राप्ति होती है ॥ २२ ॥

दान्तः शमपरः शश्वत् परिक्लेशं न विन्दति ।
न च तप्यति दान्तात्मा दृष्ट्वा परगतां श्रियम् ॥ २३ ॥
‘जो सदा अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर मनका निग्रह करता है, उसे कभी क्लेशका सामना नहीं करना पड़ता। जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, वह दूसरोंकी सम्पत्तिको देखकर संतप्त नहीं होता है' ॥ २३ ॥

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संविभक्ता च दाता च भोगवान् सुखवान् नरः ।
भवत्यहिंसकश्चैव परमारोग्यमश्नुते ॥ २४ ॥
'जो देवताओं और अतिथियोंको उनका भाग समर्पित करता है वह भोगसामग्रीसे सम्पन्न होता है। दान करनेवाला मनुष्य सुखी होता है। जो किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता उसे उत्तम आरोग्यकी प्राप्ति होती है ॥ २४ ॥
मान्यमानयिता जन्म कुले महति विन्दति ।
व्यसनैर्न तु संयोगं प्राप्नोति विजितेन्द्रियः ॥ २५ ॥
(विन्दते सुखमत्यन्तमिह लोके परत्र च ।)
'जो माननीय पुरुषोंका सम्मान करता है वह महान् कुलमें जन्म पाता है। जितेन्द्रिय पुरुष कभी दुर्व्यसनोंमें नहीं फँसता है। उसे इस लोक और परलोकमें भी अत्यन्त सुखकी प्राप्ति होती है ॥ २५ ॥
शुभानुशयबुद्धिर्हि संयुक्तः कालधर्मणा ।
प्रादुर्भवति तद्योगात् कल्याणमतिरेव सः ॥ २६ ॥
'जिसकी बुद्धि शुभमें ही आसक्त होती है, वह मनुष्य मृत्युको प्राप्त होनेपर उस शुभके संयोगसे कल्याणबुद्धि होकर ही उत्पन्न होता है' ॥ २६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

भगवन् दानधर्माणां तपसो वा महामुने ।
किंस्विद् बहुगुणं प्रेत्य किं वा दुष्करमुच्यते ॥ २७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! महामुने! दानधर्म एवं तपस्या—इनमेंसे किसका फल परलोकमें अधिक माना गया है? और इन दोनोंमें कौन दुष्कर बताया जाता है ॥ २७ ॥

व्यास उवाच

दानान्न दुष्करं तात पृथिव्यामस्ति किंचन ।
अर्थे च महती तृष्णा स च दुःखेन लभ्यते ॥ २८ ॥
व्यासजीने कहा—तात! दानसे बढ़कर दुष्कर कार्य इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है। लोगोंको धनका लोभ अधिक होता है और धन मिलता भी बड़े कष्टसे है ॥ २८ ॥
परित्यज्य प्रियान् प्राणान् धनार्थं हि महामते ।
प्रविशन्ति नरा वीराः समुद्रमटवीं तथा ॥ २९ ॥
महामते! कितने ही साहसी मनुष्य रत्नोंके लिये अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर समुद्रमें गोते लगाते हैं और धनके लिये घोर जंगलोंमें भटकते फिरते हैं ॥ २९ ॥
कृषिगोरक्ष्यमित्येके प्रतिपद्यन्ति मानवाः ।
पुरुषाः प्रेष्यतामेके निर्गच्छन्ति धनार्थिनः ॥ ३० ॥

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कुछ मनुष्य कृषि तथा गोरक्षाको अपनी जीविकाका साधन बनाते हैं, कुछ लोग धनकी इच्छासे नौकरी करनेके लिये दूर निकल जाते हैं॥ ३०॥

तस्माद् दुःखार्जितस्यैव परित्यागः सुदुष्करः।
न दुष्करतरं दानात् तस्माद् दानं मतं मम ॥ ३१ ॥
अतः दुःख सहकर कमाये हुए धनका परित्याग करना अत्यन्त कठिन है। दानसे बढ़कर दूसरा कोई दुष्कर कार्य नहीं है। इसलिये मेरे मतमें दान ही सर्वश्रेष्ठ है॥ ३१॥

विशेषस्त्वत्र विज्ञेयो न्यायेनोपार्जितं धनम्।
पात्रे काले च देशे च साधुभ्यः प्रतिपादयेत् ॥ ३२ ॥
यहाँ विशेष बात यह जाननी चाहिये कि मनुष्य न्यायसे कमाये गये धनको उत्तम देश, काल और पात्रका विचार करते हुए श्रेष्ठ पुरुषोंको दे॥ ३२॥

अन्यायात् समुपात्तेन दानधर्मो धनेन यः।
क्रियते न स कर्तारं त्रायते महतो भयात् ॥ ३३ ॥
अन्यायसे प्राप्त किये हुए धनके द्वारा जो दानधर्म किया जाता है वह कर्ताकी महान् भयसे रक्षा नहीं कर पाता ॥ ३३॥

पात्रे दानं स्वल्पमपि काले दत्तं युधिष्ठिर।
मनसा हि विशुद्धेन प्रेत्यानन्तफलं स्मृतम् ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर! यदि विशुद्ध मनसे उत्तम समयपर सत्पात्रको थोड़ा-सा भी दान दिया गया हो तो वह परलोकमें अनन्त फल देनेवाला माना गया है॥ ३४॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
व्रीहिद्रोणपरित्यागाद् यत् फलं प्राप मुद्गलः ॥ ३५ ॥
इस विषयमें जानकार लोग इस पुराने इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं कि मुद्गल ऋषिने एक द्रोण धानका दान करके महान् फल प्राप्त किया था॥ ३५॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि व्रीहिद्रौणिकपर्वणि दानदुष्करत्वकथने एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत व्रीहिद्रौणिकपर्वमें दानकी दुष्करताका प्रतिपादनविषय दो सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५९॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३/२ श्लोक मिलाकर कुल ३५ ३/२ श्लोक हैं)

२६०-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना

युधिष्ठिर उवाच

व्रीहिद्रोणः परित्यक्तः कथं तेन महात्मना ।
कस्मै दत्तश्च भगवन् विधिना केन चात्थ मे ।। १ ।।
युधिष्ठिरने पूछा— भगवान्! महात्मा मुद्गलने एक द्रोण३ धानका दान कैसे और किस विधिसे किया था तथा वह दान किसको दिया गया था? यह सब मुझे बताइये ।। १ ।।
प्रत्यक्षधर्मा भगवान् यस्य तुष्टो हि कर्मभिः ।
सफलं तस्य जन्माहं मन्ये सद्धर्मचारिणः ।। २ ।।
मनुष्योंके धर्मको प्रत्यक्ष देखने और जाननेवाले भगवान् जिसके कर्मोंसे संतुष्ट होते हैं, उसी श्रेष्ठ धर्मात्मा पुरुषका जन्म सफल है, ऐसा मैं मानता हूँ ।। २ ।।

व्यास उवाच

शिलोञ्छवृत्तिर्धर्मात्मा मुद्गलः संयतेन्द्रियः ।
आसीद् राजन् कुरुक्षेत्रे सत्यवागनसूयकः ।। ३ ।।
व्यासजी बोले— राजन्! कुरुक्षेत्रमें मुद्गलनामक एक ऋषि रहते थे। वे बड़े धर्मात्मा और जितेन्द्रिय थे। शिल३ तथा उञ्छवृत्तिसे ही वे जीविका चलाते थे तथा सदा सत्य बोलते और किसीकी भी निन्दा नहीं करते थे ।। ३ ।।
अतिथिव्रती क्रियावांश्च कापोतीं वृत्तिमास्थितः ।
सत्रमिष्टीकृतं नाम समुपास्ते महातपाः ।। ४ ।।
सपुत्रदारो हि मुनिः पक्षाहारो बभूव ह ।
कपोतवृत्त्या पक्षेण व्रीहिद्रोणमुपार्जयत् ।। ५ ।।
उन्होंने अतिथियोंकी सेवाका व्रत ले रखा था। वे बड़े कर्मनिष्ठ और तपस्वी थे तथा कापोती वृत्तिका आश्रय ले आवश्यकताके अनुरूप थोड़े-से ही अन्नका संग्रह करते थे। वे मुनि स्त्री और पुत्रके साथ रहकर पंद्रह दिनमें जैसे कबूतर दाने चुगता है, उसी प्रकार चुनकर एक द्रोण धानका संग्रह कर पाते थे और उसके द्वारा इष्टीकृत नामक यज्ञका अनुष्ठान करते थे। इस प्रकार परिवारसहित उन्हें पंद्रह दिनपर भोजन प्राप्त होता था ।। ४-५ ।।
दर्शं च पौर्णमासं च कुर्वन् विगतमत्सरः ।
देवतातिथिशेषेण कुरुते देहयापनम् ।। ६ ।।

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उनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्याका भाव नहीं था। वे प्रत्येक पक्षमें दर्श एवं पौर्णमास यज्ञ करते हुए देवताओं और अतिथियोंको उनका भाग अर्पित करके शेष अन्नसे जीवन-यापन करते थे ।। ६ ।।
तस्येन्द्रः सहितो देवैः साक्षात् त्रिभुवनेश्वरः ।
प्रत्यगृह्णान्महाराज भागं पर्वणि पर्वणि ।। ७ ।।
महाराज! प्रत्येक पर्वपर तीनों लोकोंके स्वामी साक्षात् इन्द्र देवताओंसहित पधारकर उनके यज्ञमें भाग ग्रहण करते थे ।। ७ ।।
स पर्वकालं कृत्वा तु मुनिवृत्त्या समन्वितः ।
अतिथिभ्यो ददावन्नं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।। ८ ।।
मुद्गल ऋषि मुनिवृत्तिसे रहते हुए पर्वकालोचित कर्मदर्श और पौर्णमास यज्ञ करके हर्षोल्लासपूर्ण हृदयसे अतिथियोंको भोजन देते थे ।। ८ ।।
व्रीहिद्रोणस्य तद्ध्यास्य ददतोऽन्नं महात्मनः ।
शिष्टं मात्सर्यहीनस्य वर्धतेऽतिथिदर्शनात् ।। ९ ।।
ईर्ष्यासे रहित महात्मा मुद्गल एक द्रोण धानसे तैयार किये हुए अन्नमेंसे जब-जब दान करते थे, तब-तब देनेसे बचा हुआ अन्न मुद्गलके द्वारा दूसरे अतिथियोंका दर्शन करनेसे बढ़ जाया करता था ।। ९ ।।
तच्छतान्यपि भुञ्जन्ति ब्राह्मणानां मनीषिणाम् ।
मुनेस्त्यागविशुद्ध्या तु तदन्नं वृद्धिम्ऋच्छति ।। १० ।।
इस प्रकार उसमें सैकड़ों मनीषी ब्राह्मण एक साथ भोजन कर लेते थे। मुद्गल मुनिके विशुद्ध त्यागके प्रभावसे वह अन्न निश्चय ही बढ़ जाता था ।। १० ।।
तं तु शुश्राव धर्मिष्ठं मुद्गलं संशितव्रतम् ।
दुर्वासा नृप दिग्वासास्तमथाभ्याजगाम ह ।। ११ ।।
राजन्! एक दिन दिगम्बर वेषमें भ्रमण करनेवाले महर्षि दुर्वासाने उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मिष्ठ महात्मा मुद्गलका नाम सुना। उनके व्रतकी ख्याति सुनकर वे वहाँ आ पहुँचे ।। ११ ।।
बिभ्रच्चानियतं वेषमुन्मत्त इव पाण्डव ।
विकचः परुषा वाचो व्याहरन् विविधा मुनिः ।। १२ ।।
पाण्डुनन्दन! दुर्वासा मुनि पागलोंकी तरह अटपटा वेष धारण किये, मूँड़ मुड़ाये और नाना प्रकारके कटु वचन बोलते हुए उस आश्रममें पधारे ।। १२ ।।
अभिगम्याथ तं विप्रमुवाच मुनिसत्तमः ।
अन्नार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम ।। १३ ।।
ब्रह्मर्षि मुद्गलके पास पहुँचकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाने कहा—'विप्रवर! तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि मैं भोजनकी इच्छासे यहाँ आया हूँ' ।। १३ ।।

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स्वागतं तेऽस्त्विति मुनिं मुद्गलः प्रत्यभाषत ।
पाद्यमाचमनीयं च प्रतिपाद्यार्घ्यमुत्तमम् ॥ १४ ॥
प्रादात् स तापसायान्नं क्षुधितायातिथिव्रती ।
उन्मत्ताय परां श्रद्धामास्थाय स धृतव्रतः ॥ १५ ॥
ततस्तदन्नं रसवत् स एव क्षुधयान्वितः ।
बुभुजे कृत्स्नमुन्मत्तः प्रादात् तस्मै च मुद्गलः ॥ १६ ॥
मुद्गलने उनसे कहा—'महर्षे!' आपका स्वागत है, ऐसा कहकर उन्होंने पाद्य, उत्तम अर्घ्य तथा आचमनीय आदि पूजनकी सामग्री भेंट की। तत्पश्चात् उन व्रतधारी अतिथिसेवी महर्षि मुद्गलने बड़ी श्रद्धाके साथ उन्मत्त-वेशधारी भूखे तपस्वी दुर्वासाको भोजन अर्पित किया। वह अन्न बड़ा स्वादिष्ट था। वे उन्मत्त मुनि भूखे तो थे ही, परोसी हुई सारी रसोई खा गये। तब महर्षि मुद्गलने उन्हें और भोजन दिया ॥ १४—१६ ॥

भुक्त्वा चान्नं ततः सर्वमुच्छिष्टेनात्मनस्ततः ।
अथाङ्गं लिलिपेऽन्नेन यथागतमगाच्च सः ॥ १७ ॥
इस तरह सारा भोजन उदरस्थ करके दुर्वासाजीने जूठन लेकर अपने सारे अंगोंमें लपेट ली और फिर जैसे आये थे, वैसे ही चल दिये ॥ १७ ॥

एवं द्वितीये सम्प्राप्ते यथाकाले मनीषिणः ।
आगम्य बुभुजे सर्वमन्नमुञ्छोपजीविनः ॥ १८ ॥
इसी प्रकार दूसरा पर्वकाल आनेपर दुर्वासा ऋषिने पुनः आकर उञ्छवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करनेवाले उन मनीषी महात्मा मुद्गलके यहाँका सारा अन्न खा लिया ॥ १८ ॥

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निराहारस्तु स मुनिरुञ्छमार्जायते पुनः ।
न चैनं विक्रियां नेतुमशकन्मुद्गलं क्षुधा ॥ १९ ॥
मुनि निराहार रहकर पुनः अन्नके दाने बीनने लगे। भूखका कष्ट उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेमें समर्थ न हो सका ॥ १९ ॥

न क्रोधो न च मात्सर्यं नावमानो न सम्भ्रमः ।
सपुत्रदारमुञ्छन्तमाविवेश द्विजोत्तमम् ॥ २० ॥
स्त्री-पुत्रसहित अन्नके दाने चुनते हुए विप्रवर मुद्गलके हृदयमें क्रोध, द्वेष, घबराहट तथा अपमान प्रवेश नहीं कर सके ॥ २० ॥

तथा तमुञ्छधर्माणं दुर्वासा मुनिसत्तमम् ।
उपतस्थे यथाकालं षट्कृत्वः कृतनिश्चयः ॥ २१ ॥
इस प्रकार उञ्छधर्मका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ मुद्गलके घरपर महर्षि दुर्वासा उनका धैर्य छुड़ानेका दृढ़ निश्चय लेकर लगातार छः बार ठीक पर्वके समय उपस्थित हुए ॥ २१ ॥

न चास्य मनसा कंचिद् विकारं ददृशे मुनिः ।
शुद्धसत्त्वस्य शुद्धं स ददृशे निर्मलं मनः ॥ २२ ॥

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किंतु उन्होंने उनके मनमें कभी कोई विकार नहीं देखा। शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि मुद्गलके मनको दुर्वासाने सदा शुद्ध और निर्मल ही पाया॥ २२॥
तमुवाच ततः प्रीतः स मुनिर्मुद्गलं ततः।
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन् दाता मात्सर्यवर्जितः॥ २३॥
तब वे प्रसन्न होकर मुद्गलसे बोले—'ब्रह्मन्! इस संसारमें ईर्ष्यासे रहित होकर दान देनेवाला मनुष्य तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है॥ २३॥
क्षुद् धर्मसंज्ञां प्रणुदत्यादत्ते धैर्यमेव च।
रसानुसारिणी जिह्वा कर्षत्येव रसान् प्रति ॥ २४ ॥
'भूख (बड़े-बड़े लोगोंके) धर्मज्ञानको विलुप्त कर देती है, धैर्य हर लेती है तथा रसका अनुसरण करनेवाली रसना सदा रसीले पदार्थोंकी ओर मनुष्यको खींचती रहती है॥ २४॥
आहारप्रभवाः प्राणा मनो दुर्निग्रहं चलम्।
मनसश्चेन्द्रियाणां चाप्यैकाग्र्यं निश्चितं तपः॥ २५॥
'भोजनसे ही प्राणोंकी रक्षा होती है। चंचल मनको रोकना अत्यन्त कठिन होता है। मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रताको ही निश्चितरूपसे तप कहा गया है'॥ २५॥
श्रमेणोपार्जितं त्यक्तुं दुःखं शुद्धेन चेतसा।
तत् सर्वं भवता साधो यथावदुपपादितम्॥ २६॥
'परिश्रमसे उपार्जित किये हुए धनका शुद्ध हृदयसे दान करना अत्यन्त दुष्कर है। परंतु श्रेष्ठ पुरुष! तुमने यह सब कुछ यथार्थरूपसे सिद्ध कर लिया है॥ २६॥
प्रीताः स्मोऽनुगृहीताश्च समेत्य भवता सह।
इन्द्रियाभिजयो धैर्यं संविभागो दमः शमः॥ २७॥
दया सत्यं च धर्मश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
(विशुद्धसत्त्वसम्पन्नो न त्वदन्योऽस्ति कश्चन।)
जितास्ते कर्मभिर्लोकाः प्राप्तोऽसि परमां गतिम्॥ २८॥
'तुमसे मिलकर हम बहुत प्रसन्न हैं और अपने ऊपर तुम्हारा अनुग्रह मानते हैं। इन्द्रियसंयम, धैर्य, संविभाग (दान), शम, दम, दया, सत्य और धर्म—ये सब गुण तुममें पूर्णरूपसे विद्यमान हैं। तुम्हारे-जैसा पवित्र अन्तःकरणवाला दूसरा कोई नहीं है। तुमने अपने शुभ कर्मोंसे सभी लोकोंको जीत लिया; परमपदको प्राप्त कर लिया॥ २७-२८॥
अहो दानं विघुष्टं ते सुमहत् स्वर्गवासिभिः।
सशरीरो भवान् गन्ता स्वर्गं सुचरितव्रत॥ २९॥
'अहो! स्वर्गवासी देवताओंने भी तुम्हारे महान् दानकी सर्वत्र घोषणा की है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! तुम सदेह स्वर्गलोकको जाओगे'॥ २९॥
इत्येवं वदतस्तस्य तदा दुर्वाससो मुनेः।

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देवदूतो विमानेन मुद्गलं प्रत्युपस्थितः ॥ ३० ॥
दुर्वासा मुनि इस प्रकार कह ही रहे थे कि एक देवदूत विमानके साथ मुद्गल ऋषिके पास आ पहुँचा ॥

हंससारसयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ।
कामगेन विचित्रेण दिव्यगन्धवता तथा ॥ ३१ ॥
उस विमानमें हंस एवं सारस जुते हुए थे। क्षुद्र-घण्टिकाओंकी जालीसे उसे सुसज्जित किया गया था तथा उससे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी। वह विमान देखनेमें बड़ा विचित्र और इच्छानुसार चलनेवाला था ॥ ३१ ॥

उवाच चैनं विप्रर्षिं विमानं कर्मभिर्जितम् ।
समुपारोह संसिद्धिं प्राप्तोऽसि परमां मुने ॥ ३२ ॥
देवदूतने ब्रह्मर्षि मुद्गलसे कहा—‘मुने! यह विमान आपको शुभ कर्मोंसे प्राप्त हुआ है। इसपर बैठिये। आप परम सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं’ ॥ ३२ ॥

तमेवंवादिनमृषिर्देवदूतमुवाच ह ।
इच्छामि भवता प्रोक्तान् गुणान् स्वर्गनिवासिनाम् ॥ ३३ ॥
के गुणास्तत्र वसतां किं तपः कश्च निश्चयः ।
स्वर्गे तत्र सुखं किं च दोषो वा देवदूतक ॥ ३४ ॥

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देवदूतके ऐसा कहनेपर महर्षि मुद्गलने उससे कहा—'देवदूत! मैं तुम्हारे मुखसे स्वर्गवासियोंके गुण सुनना चाहता हूँ। वहाँ रहनेवालोंमें कौन-कौनसे गुण होते हैं? कैसी तपस्या होती है? और उनका निश्चित विचार कैसा होता है? स्वर्गमें क्या सुख है और वहाँ क्या दोष है? ।।

सतां साप्तपदं मैत्रमाहुः सन्तः कुलोचिताः ।
मित्रतां च पुरस्कृत्य पृच्छामि त्वामहं विभो ।। ३५ ।।
'प्रभो! सत्पुरुषोंमें सात पग एक साथ चलनेसे ही मित्रता हो जाती है, ऐसा कुलीन सत्पुरुषोंका कथन है। मैं उसी मैत्रीको सामने रखकर तुमसे उपर्युक्त प्रश्न पूछ रहा हूँ ।। ३५ ।।

यदत्र तथ्यं पथ्यं च तद् ब्रवीह्यविचारयन् ।
श्रुत्वा तथा करिष्यामि व्यवसायं गिरा तव ।। ३६ ।।
'इसके उत्तरमें जो सत्य एवं हितकर बात हो, उसे बिना किसी हिचकिचाहटके कहो। तुम्हारी बात सुनकर उसीके द्वारा मैं अपने कर्तव्यका निश्चय करूँगा' ।। ३६ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि व्रीहिद्रौणिकपर्वणि मुद्गलोपाख्याने षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २६० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत व्रीहिद्रौणिकपर्वमें मुद्गलोपाख्यानसम्बन्धी दो सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३६ १/३ श्लोक हैं)


१. कुछ विद्वानोंके मतसे यह सोलह सेरका होता है।
२. 'उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्।' इस कोषवाक्यके अनुसार बाजार उठ जानेपर या खेत कटनेपर वहाँ बिखरे हुए अन्नके दाने बीनना 'उञ्छ' कहलाता है और खेत कट जानेपर वहाँ गिरी हुई गेहूँ-धान आदिकी बालें बीनना 'शील' कहा गया है।

देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट

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एकषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना

देवदूत उवाच

महर्षे आर्यबुद्धिस्त्वं यः स्वर्गसुखमुत्तमम् ।
सम्प्राप्तं बहु मन्तव्यं विमृशस्यबुधो यथा ॥ १ ॥
देवदूत बोला— महर्षे! तुम्हारी बुद्धि बड़ी उत्तम है। जिस उत्तम स्वर्गीय सुखको दूसरे लोग बहुत बड़ी चीज समझते हैं, वह तुम्हें प्राप्त ही है, फिर भी तुम अनजान-से बनकर इसके सम्बन्धमें विचार करते हो—इसके गुण-दोषकी समीक्षा कर रहे हो ॥ १ ॥

उपरिष्टादसौ लोको योऽयं स्वरिति संज्ञितः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथः शश्वद् देवयानचरो मुने ॥ २ ॥
मुने! जिसे स्वर्लोक कहते हैं, वह यहाँसे बहुत ऊपर है। वहाँ पहुँचनेके लिये ऊपरको जाया जाता है, इसलिये उसका एक नाम ऊर्ध्वग भी है। वहाँ जानेके लिये जो मार्ग है, वह बहुत उत्तम है। वहाँके लोग सदा विमानोंपर विचरा करते हैं ॥ २ ॥

नातप्ततपसः पुंसो नामहायज्ञयाजिनः ।
नानृता नास्तिकाश्चैव तत्र गच्छन्ति मुद्गल ॥ ३ ॥
मुद्गल! जिन्होंने तपस्या नहीं की है, बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा यजन नहीं किया है तथा जो असत्यवादी एवं नास्तिक हैं, वे उस लोकमें नहीं जा पाते हैं ॥ ३ ॥

धर्मात्मानो जितात्मानः शान्ता दान्ता विमत्सराः ।
दानधर्मरता मर्त्याः शूराश्चाहवलक्षणाः ॥ ४ ॥
तत्र गच्छन्ति धर्माग्र्यं कृत्वा शमदमात्मकम् ।
लोकान् पुण्यकृतां ब्रह्मन् सद्भिराचरितान् नृभिः ॥ ५ ॥
ब्रह्मन्! धर्मात्मा, मनको वशमें रखनेवाले, शम-दमसे सम्पन्न, ईर्ष्यारहित, दानधर्मपरायण तथा युद्धकलामें प्रसिद्ध शूरवीर मनुष्य ही वहाँ सब धर्मोंमें श्रेष्ठ इन्द्रिय-संयम और मनोनिग्रहरूपी योगको अपनाकर सत्पुरुषों-द्वारा सेवित पुण्यवानोंके लोकोंमें जाते हैं ॥ ४-५ ॥

देवाः साध्यास्तथा विश्वे तथैव च महर्षयः ।
यामा धामाश्च मौद्गल्य* गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ६ ॥

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एषां देवनिकायानां पृथक् पृथगनेकशः ।
भास्वन्तः कामसम्पन्ना लोकास्तेजोमयाः शुभाः ॥ ७ ॥
मुद्गल! वहाँ देवता, साध्य, विश्वेदेव, महर्षिगण, याम, धाम, गन्धर्व तथा अप्सरा—इन सब देवसमूहोंके अलग-अलग अनेक प्रकाशमान लोक हैं, जो इच्छानुसार प्राप्त होनेवाले भोगोंसे सम्पन्न, तेजस्वी तथा मंगलकारी हैं ॥ ६-७ ॥
त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि योजनानि हिरण्मयः ।
मेरुः पर्वतराड् यत्र देवोद्यानानि मुद्गल ॥ ८ ॥
नन्दनादीनि पुण्यानि विहाराः पुण्यकर्मणाम् ।
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न शीतोष्णे भयं तथा ॥ ९ ॥
स्वर्गमें तैंतीस हजार योजनका सुवर्णमय एक बहुत ऊँचा पर्वत है जो मेरुगिरिके नामसे विख्यात है। मुद्गल! वहीं देवताओंके नन्दन आदि पवित्र उद्यान तथा पुण्यात्मा पुरुषोंके विहारस्थल हैं। वहाँ किसीको भूख-प्यास नहीं लगती, मनमें कभी ग्लानि नहीं होती, गरमी और जाड़ेका कष्ट भी नहीं होता और न कोई भय ही होता है ॥ ८-९ ॥
बीभत्समशुभं वापि तत्र किंचिन्न विद्यते ।
मनोज्ञाः सर्वतो गन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ॥ १० ॥
शब्दाः श्रुतिमनोग्राहाः सर्वतस्तत्र वै मुने ।
न शोको न जरा तत्र नायासपरिवेदने ॥ ११ ॥
वहाँ कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो घृणा करने-योग्य एवं अशुभ हो। वहाँ सब ओर मनोरम सुगन्ध, सुखदायक स्पर्श तथा कानों और मनको प्रिय लगनेवाले मधुर शब्द सुननेमें आते हैं। मुने! स्वर्गलोकमें न शोक होता है, न बुढ़ापा। वहाँ थकावट तथा करुणाजनक विलाप भी श्रवणगोचर नहीं होते ॥ १०-११ ॥
ईदृशः स मुने लोकः स्वकर्मफलहेतुकः ।
सुकृतैस्तत्र पुरुषाः सम्भवन्त्यात्मकर्मभिः ॥ १२ ॥
महर्षे! स्वर्गलोक ऐसा ही है। अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप ही उसकी प्राप्ति होती है। मनुष्य वहाँ अपने किये हुए पुण्यकर्मोंसे ही रह पाते हैं ॥ १२ ॥
तैजसानि शरीराणि भवन्त्यत्रोपपद्यताम् ।
कर्मजान्येव मौद्गल्य न मातृपितृजान्युत ॥ १३ ॥
मुद्गल! स्वर्गवासियोंके शरीरमें तेजस तत्त्वकी प्रधानता होती है। वे शरीर पुण्यकर्मोंसे ही उपलब्ध होते हैं। माता-पिताके रजोवीर्यसे उनकी उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १३ ॥
न संस्वेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीषं मूत्रमेव च ।
तेषां न च रजो वस्त्रं बाधते तत्र वै मुने ॥ १४ ॥
उन शरीरोंमें कभी पसीना नहीं निकलता, दुर्गन्ध नहीं आती तथा मल-मूत्रका भी अभाव होता है। मुने! उनके कपड़ोंमें कभी मैल नहीं बैठती है ॥ १४ ॥

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न म्लायन्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमाः ।
संयुज्यन्ते विमानैश्च ब्रह्मन्नेवंविधैश्च ते ॥ १५ ॥
स्वर्गवासियोंकी जो (दिव्य कुसुमोंकी) मालाएँ होती हैं, वे कभी कुम्हलाती नहीं हैं। उनसे निरन्तर दिव्य सुगन्ध फैलती रहती है तथा वे देखनेमें भी बड़ी मनोरम होती हैं। ब्रह्मन्! स्वर्गके सभी निवासी ऐसे ही विमानोंसे सम्पन्न होते हैं ॥ १५ ॥
ईर्ष्याशोकक्लमापेता मोहमात्सर्यवर्जिताः ।
सुखं स्वर्गजितस्तत्र वर्तयन्ते महामुने ॥ १६ ॥
महामुने! जो अपने सत्कर्मोंद्वारा स्वर्गलोकपर विजय पा चुके हैं, वे वहाँ बड़े सुखसे जीवन बिताते हैं। उनमें किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं होती, वे कभी शोक तथा थकावटका अनुभव नहीं करते एवं मोह तथा मात्सर्य (द्वेषभाव)-से सदा दूर रहते हैं ॥ १६ ॥
तेषां तथाविधानां तु लोकानां मुनिपुङ्गव ।
उपर्युपरि लोकस्य लोका दिव्या गुणान्विताः ॥ १७ ॥
मुनिश्रेष्ठ! देवताओंके जो पूर्वोक्त प्रकारके लोक हैं, उन सबसे ऊपर अन्य कितने ही विविध गुणसम्पन्न दिव्य लोक हैं ॥ १७ ॥
पुरस्ताद् ब्राह्मणास्तत्र लोकास्तेजोमयाः शुभाः ।
यत्र यान्त्यृषयो ब्रह्मन् पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ॥ १८ ॥
उन सबसे ऊपर ब्रह्माजीके लोक हैं, जो अत्यन्त तेजस्वी एवं मंगलकारी हैं। ब्रह्मन्! वहाँ अपने शुभ कर्मोंसे पवित्र ऋषि, मुनि जाते हैं ॥ १८ ॥
ऋभवो नाम तत्रान्ये देवानामपि देवताः ।
तेषां लोकात् परतरे यान् यजन्तीह देवताः ॥ १९ ॥
वहीं ऋभु नामक दूसरे देवता रहते हैं, जो देवगणोंके भी आराध्यदेव हैं। देवताओंके लोकोंसे उनका स्थान उत्कृष्ट है। देवतालोग भी यज्ञोंद्वारा उनका यजन करते हैं ॥ १९ ॥
स्वयंप्रभास्ते भास्वन्तो लोकाः कामदुघाः परे ।
न तेषां स्त्रीकृतस्तापो न लोकैश्वर्यमत्सरः ॥ २० ॥
उनके उत्तम लोक स्वयंप्रकाश, तेजस्वी और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले हैं। उन्हें स्त्रियोंके लिये संताप नहीं होता। लोकोंके ऐश्वर्यके लिये उनके मनमें कभी ईर्ष्या नहीं होती ॥ २० ॥
न वर्तयन्त्याहुतिभिस्ते नाप्यमृतभोजनाः ।
तथा दिव्यशरीरास्ते न च विग्रहमूर्तयः ॥ २१ ॥
वे देवताओंकी तरह आहुतियोंसे जीविका नहीं चलाते। उन्हें अमृत पीनेकी आवश्यकता नहीं होती। उनके शरीर दिव्य ज्योतिर्मय हैं। उनकी कोई विशेष आकृति नहीं होती ॥ २१ ॥
न सुखे सुखकामास्ते देवदेवाः सनातनाः ।

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न कल्पपरिवर्तेषु परिवर्तन्ति ते तथा ॥ २२ ॥
वे सुखमें प्रतिष्ठित हैं, परंतु सुखकी कामना नहीं रखते। वे देवताओंके भी देवता और सनातन हैं। कल्पका अन्त होनेपर भी उनकी स्थितिमें कोई परिवर्तन नहीं होता—वे ज्यों-के-त्यों बने रहते हैं ॥ २२ ॥
जरा मृत्युः कुतस्तेषां हर्षः प्रीतिः सुखं न च ।
न दुःखं न सुखं चापि रागद्वेषौ कुतो मुने ॥ २३ ॥
मुने! उनमें जरा-मृत्युकी सम्भावना तो हो ही कैसे सकती है? हर्ष, प्रीति तथा सुख आदि विकारोंका भी उनमें सर्वथा अभाव ही है। ऐसी स्थितिमें उनके भीतर दुःख-सुख तथा राग-द्वेषादि कैसे रह सकते हैं? ॥ २३ ॥
देवानांमपि मौद्गल्य कांक्षिता सा गतिः परा ।
दुष्प्रापा परमा सिद्धिर्गम्या कामगोचरैः ॥ २४ ॥
मौद्गल्य! स्वर्गवासी देवता भी उस (ऋभु नामक देवताओंकी) परमगतिको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं। वह परा सिद्धिकी अवस्था है, जो अत्यन्त दुर्लभ है। विषयभोगोंकी इच्छा रखनेवाले लोगोंकी वहाँतक पहुँच नहीं होती ॥ २४ ॥
त्रयस्त्रिंशदिमे देवा येषां लोका मनीषिभिः ।
गम्यन्ते नियमैः श्रेष्ठैर्दानैर्वा विधिपूर्वकैः ॥ २५ ॥
ये जो तैंतीस देवता हैं, उन्हींके लोकोंको मनीषी पुरुष उत्तम नियमोंके आचरणसे अथवा विधिपूर्वक दिये हुए दानोंसे प्राप्त करते हैं ॥ २५ ॥
सेयं दानकृता व्युष्टिरनुप्राप्ता सुखं त्वया ।
तां भुङ्क्ष्व सुकृतैर्लब्धां तपसा द्योतितप्रभः ॥ २६ ॥
ब्रह्मन्! तुमने अपने दानके प्रभावसे अनायास ही वह स्वर्गीय सुख-सम्पत्ति प्राप्त कर ली है। अपनी तपस्याके तेजसे देदीप्यमान होकर अब तुम अपने पुण्यसे प्राप्त हुए उस दिव्य वैभवका उपभोग करो ॥ २६ ॥
एतत् स्वर्गसुखं विप्र लोका नानाविधास्तथा ।
गुणाः स्वर्गस्य प्रोक्तास्ते दोषानपि निबोध मे ॥ २७ ॥
विप्रवर! यही स्वर्गका सुख है और ऐसे ही वहाँ भाँति-भाँतिके लोक हैं। यहाँतक मैंने तुम्हें स्वर्गके गुण बताये हैं; अब वहाँके दोष भी मुझसे सुन लो ॥ २७ ॥
कृतस्य कर्मणस्तत्र भुज्यते यत् फलं दिवि ।
न चान्यत् क्रियते कर्म मूलच्छेदेन भुज्यते ॥ २८ ॥
अपने किये हुए सत्कर्मोंका जो फल होता है, वही स्वर्गमें भोगा जाता है। वहाँ कोई नया कर्म नहीं किया जाता। अपना पुण्यरूप मूलधन गँवानेसे ही वहाँके भोग प्राप्त होते हैं ॥ २८ ॥
सोऽत्र दोषो मम मतस्तस्यान्ते पतनं च यत् ।

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सुखव्याप्तमनस्कानां पतनं यच्च मुद्गल ॥ २९ ॥
मुद्गल! स्वर्गमें सबसे बड़ा दोष मुझे यह जान पड़ता है कि कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर एक दिन वहाँसे पतन हो ही जाता है। जिनका मन सुखभोगमें लगा हुआ है, उनको सहसा पतन कितना दुःखदायी होता है ॥ २९ ॥
असंतोषः परीतापो दृष्ट्वा दीप्ततराः श्रियः ।
यद् भवत्यवरे स्थाने स्थितानां तत् सुदुष्करम् ॥ ३० ॥

स्वर्गमें भी जो लोग नीचेके स्थानोंमें स्थित हैं, उन्हें अपनेसे ऊपरके लोकोंकी समुज्ज्वल श्रीसम्पत्ति देखकर जो असंतोष और संताप होता है, उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है ॥ ३० ॥
संज्ञामोहश्च पततां रजसा च प्रधर्षणम् ।
प्रम्लानेषु च माल्येषु ततः पिपतिषोर्भयम् ॥ ३१ ॥

स्वर्गलोकसे गिरते समय वहाँके निवासियोंकी चेतना लुप्त हो जाती है। रजोगुणके आक्रमणसे उनकी बुद्धि बिगड़ जाती है। पहले उनके गलेकी मालाएँ कुम्हला जाती हैं; इससे उन्हें पतनकी सूचना मिल जानेसे उनके मनमें बड़ा भारी भय समा जाता है ॥ ३१ ॥
आब्रह्मभवनादेते दोषा मौद्गल्य दारुणाः ।
नाकलोके सुकृतिनां गुणास्त्वयुतशो नृणाम् ॥ ३२ ॥

मौद्गल्य! ब्रह्मलोकपर्यन्त जितने लोक हैं, उन सबमें ये भयंकर दोष देखे जाते हैं। स्वर्गलोकमें रहते समय तो पुण्यात्मा पुरुषोंमें सहस्रों गुण होते हैं ॥ ३२ ॥
अयं त्वन्यो गुणः श्रेष्ठश्च्युतानां स्वर्गतो मुने ।
शुभानुशययोगेन मनुष्येषूपजायते ॥ ३३ ॥

मुने! परंतु वहाँसे भ्रष्ट हुए जीवोंका भी यह एक अन्य श्रेष्ठ गुण देखा जाता है कि वे अपने शुभ कर्मों-के संस्कारसे युक्त होनेके कारण मनुष्ययोनिमें ही जन्म पाते हैं ॥ ३३ ॥
तत्रापि स महाभागः सुखभागभिजायते ।
न चेत् सम्बुध्यते तत्र गच्छत्यधमतां ततः ॥ ३४ ॥

वहाँ भी वह महाभाग मानव सुखके साधनोंसे सम्पन्न होकर ही उत्पन्न होता है। परंतु यदि मानवयोनिमें वह अपने कर्तव्यको न समझे, तो उससे भी नीची योनिमें चला जाता है ॥ ३४ ॥
इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपभुज्यते ।
कर्मभूमिरियं ब्रह्मन् फलभूमिरसौ मता ॥ ३५ ॥

इस मनुष्यलोकमें मानव-शरीरद्वारा जो कर्म किया जाता है, उसीको परलोकमें भोगा जाता है। ब्रह्मन्! यह कर्मभूमि और वह फलभोगकी भूमि मानी गयी है ॥ ३५ ॥

मुद्गल उवाच

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महान्तस्तु अमी दोषास्त्वया स्वर्गस्य कीर्तिताः ।
निर्दोष एव यस्त्वन्यो लोकं तं प्रवदस्व मे ॥ ३६ ॥
**मुद्गल बोले—**देवदूत! तुमने स्वर्गके महान् दोष बताये, परंतु स्वर्गकी अपेक्षा यदि कोई दूसरा लोक इन दोषोंसे सर्वथा रहित हो तो मुझसे उसीका वर्णन करो ॥

देवदूत उवाच

ब्रह्मणः सदनादूर्ध्वं तद् विष्णोः परमं पदम् ।
शुद्धं सनातनं ज्योतिः परं ब्रह्मेति यद् विदुः ॥ ३७ ॥
**देवदूतने कहा—**ब्रह्माजीके भी लोकसे ऊपर भगवान् विष्णुका परम धाम है। वह शुद्ध सनातन ज्योतिर्मय लोक है। उसे परब्रह्म भी कहते हैं ॥ ३७ ॥
न तत्र विप्र गच्छन्ति पुरुषा विषयात्मकाः ।
दम्भलोभमहाक्रोधमोहद्रोहैरभिद्रुताः ॥ ३८ ॥
विप्रवर! जिनका मन विषयोंमें रचा-पचा रहता है, वे लोग वहाँ नहीं जा सकते। दम्भ, लोभ, महाक्रोध, मोह और द्रोहसे युक्त मनुष्य भी वहाँ नहीं पहुँच सकते ॥ ३८ ॥
निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वाः संयतेन्द्रियाः ।
ध्यानयोगपराश्चैव तत्र गच्छन्ति मानवाः ॥ ३९ ॥
जो ममता और अहंकारसे रहित, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे ऊपर उठे हुए, जितेन्द्रिय तथा ध्यानयोगमें तत्पर हैं, वे मनुष्य ही उस लोकमें जा सकते हैं ॥ ३९ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि मुद्गल ।
तवानुकम्पया साधो साधु गच्छाम मा चिरम् ॥ ४० ॥
मुद्गल! तुमने जो कुछ मुझसे पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया। साधो! अब आपकी कृपासे हमलोग सुखपूर्वक स्वर्गकी यात्रा करें, विलम्ब नहीं होना चाहिये ॥ ४० ॥

व्यास उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु मौद्गल्यो वाक्यं विममृशे धिया ।
विमृश्य च मुनिश्रेष्ठो देवदूतमुवाच ह ॥ ४१ ॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! देवदूतकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ मुद्गलने उसपर बुद्धिपूर्वक विचार किया। विचार करके उन्होंने देवदूतसे कहा— ॥ ४१ ॥
देवदूत नमस्तेऽस्तु गच्छ तात यथासुखम् ।
महादोषेण मे कार्यं न स्वर्गेण सुखेन वा ॥ ४२ ॥
‘देवदूत! तुम्हें नमस्कार है। तात! तुम सुखपूर्वक पधारो। स्वर्ग अथवा वहाँका सुख महान् दोषसे युक्त है; इसलिये मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४२ ॥
पतनान्ते महद् दुःखं परितापः सुदारुणः ।
स्वर्गभाजश्चरन्तीह तस्मात् स्वर्गं न कामये ॥ ४३ ॥

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'ओह! पतनके बाद तो स्वर्गवासी मनुष्योंको अत्यन्त भयंकर महान् दुःख और अनुताप होता है और फिर वे इसी लोकमें विचरते रहते हैं; इसलिये मुझे स्वर्गमें जानेकी इच्छा नहीं है ।। ४३ ।।
यत्र गत्वा न शोचन्ति न व्यथन्ति चलन्ति वा ।
तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गयिष्यामि केवलम् ।। ४४ ।।
'जहाँ जाकर मनुष्य कभी शोक नहीं करते, व्यथित नहीं होते तथा जहाँसे विचलित नहीं होते हैं। केवल उसी अक्षय धामका मैं अनुसंधान करूँगा' ।। ४४ ।।
इत्युक्त्वा स मुनिर्वाक्यं देवदूतं विसृज्य तम् ।
शिलोञ्छवृत्तिर्धर्मात्मा शममातिष्ठदुत्तमम् ।। ४५ ।।
ऐसा कहकर मुद्गल मुनिने उस देवदूतको विदा कर दिया और शिल एवं उञ्छवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करनेवाले वे धर्मात्मा महर्षि उत्तम रीतिसे शम-दम आदि नियमोंका पालन करने लगे ।। ४५ ।।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्भूत्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
ज्ञानयोगेन शुद्धेन ध्याननित्यो बभूव ह ।। ४६ ।।
उनकी दृष्टिमें निन्दा और स्तुति समान हो गयी। वे मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझने लगे और विशुद्ध ज्ञानयोगके द्वारा नित्य ध्यानमें तत्पर रहने लगे ।।
ध्यानयोगाद् बलं लब्ध्वा प्राप्य बुद्धिमनुत्तमाम् ।
जगाम शाश्वतीं सिद्धिं परां निर्वाणलक्षणाम् ।। ४७ ।।
ध्यानसे (परम वैराग्यका) बल पाकर उन्हें उत्तम बोध प्राप्त हुआ और उसके द्वारा उन्होंने सनातन मोक्षरूपा परम सिद्धि प्राप्त कर ली ।। ४७ ।।
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय न शोकं कर्तुमर्हसि ।
राज्यात् स्फीतात् परिभ्रष्टस्तपसा तदवाप्स्यसि ।। ४८ ।।
कुन्तीनन्दन! इसलिये तुम भी समृद्धिशाली राज्यसे भ्रष्ट होनेके कारण शोक न करो; तपस्याद्वारा तुम उसे प्राप्त कर लोगे ।। ४८ ।।
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।
पर्यायेणोपसर्पन्ते नरं नेमिररा इव ।। ४९ ।।
मनुष्यपर सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख बारी-बारीसे आते रहते हैं। जैसे अरे नेमिसे जुड़े हुए ऊँचे-नीचे आते रहते हैं, वैसे ही मनुष्यका दुःख-सुखसे सम्बन्ध होता रहता है ।। ४९ ।।
पितृपैतामहं राज्यं प्राप्स्यस्यमितविक्रम ।
वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ५० ।।
अमितपराक्रमी युधिष्ठिर! तुम तेरहवें वर्षके बाद अपने बाप-दादोंका राज्य प्राप्त कर लोगे, अतः अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ५० ।।